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सिंघु बॉर्डर से रिपोर्ट:प्रदर्शन में शामिल 73 साल के बुजुर्ग बोले- जब आंदोलन ऐतिहासिक है तो नतीजा भी ऐतिहासिक होगा

​नई दिल्ली7 महीने पहलेलेखक: राहुल कोटियाल
सुलखन कहते हैं- ये आंदोलन तो हमें उन फ़िल्मों की याद दिलाता है जिनमें देखा था कि कैसे अंग्रेज अफ़सर जनता पर अत्याचार करते थे।
  • सुलखन सिंह कहते हैं- हम तो अपनी जिंदगी जी चुके हैं लेकिन ये लड़ाई हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए है

सुलखन सिंह की उम्र 73 साल है। वे जालंधर के अपरा गांव के रहने वाले हैं। लेकिन बीते 12 दिनों से दिल्ली का सिंघु बॉर्डर ही उनका घर बना हुआ है। वे अपने गांव के कई अन्य किसानों के साथ यहां आए हैं और उनकी जिद है कि केंद्र सरकार जब तक नए बने तीनों कृषि कानूनों को वापस नहीं ले लेती तब तक वे अपने गांव वापस नहीं लौटेंगे। लिहाजा वे तमाम मुश्किलें झेलते हुए भी दिन भर लंगर में सेवा कर रहे हैं और दिसम्बर की ये सर्द रातें सड़कों पर ही काट रहे हैं।

जिस ट्रैक्टर ट्रॉली में सवार होकर सुलखन सिंह अपने गांव से करीब 400 किलोमीटर दूर पहुंचे हैं, वही ट्रॉली इन दिनों उनका घर भी बनी हुई है। उनके साथ ही इस ट्रॉली में 17 अन्य लोग भी रह रहे हैं। NH-44 पर बीचों-बीच खड़ी इसी ट्रॉली में सभी लोग अपनी रातें गुजारते हैं और सुबह होते ही प्रदर्शन में शामिल लोगों की सेवा में जुट जाते हैं। थकान होने पर ये लोग दिन में भी कुछ वक्त ट्रॉली में सुस्ता लेते हैं, लेकिन सुलखन ऐसा नहीं कर पाते। ढलती उम्र के साथ उनके घुटनों में दर्द रहने लगा है लिहाज़ा वे बार-बार ट्रॉली पर लगी सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते। ऐसे में वे ट्रैक्टर ट्रॉली के नीचे ही सड़क पर गद्दा बिछाकर कुछ देर आराम कर लेते हैं।

उम्र के 70 बसंत देख चुके सुलखन इस उम्र में भी इतनी तकलीफें झेलते हुए आंदोलन में क्यों शामिल हैं? यह सवाल करने पर वे कहते हैं, ‘हम तो अपनी ज़िंदगी जी चुके, लेकिन ये लड़ाई हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए है। ये लड़ाई हमारे बच्चों और उनके भविष्य को बचाने की लड़ाई है। ये हमारी जमीन की लड़ाई है। जिस जमीन ने हमें पैदा किया, हमें पाल-पोस के बड़ा किया और हमारे परिवारों को पाला, ये उस जमीन को बचाने की लड़ाई है।’

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मंडियां कमजोर हो जाएंगी
सुलखन के परिवार के पास कुल चार किल्ले जमीन है। इस जमीन पर वे कनक (गेहूं), झीरि (चावल) गन्ना और पशुओं का चारा उगाते हैं। उन्हें डर है कि अगर नए कृषि क़ानून लागू हुए तो पहले तो उन्हें अपनी फसलों का अच्छा दाम मिलना बंद हो जाएगा और धीरे-धीरे उनकी यह ज़मीन भी उनके हाथ से निकल जाएगी। वे कहते हैं, ‘ये बात सौ प्रतिशत तय है कि नए कानून लागू होने के बाद हमें फसलों का सही दाम मिलना खत्म हो जाएगा। पहले एक-दो साल तो शायद अच्छा दाम मिल जाए, लेकिन जब मंडियां कमजोर होंगी तो बड़े व्यापारी औने-पौने दामों पर हमसे फसल ख़रीदेंगे और हम बेचने को मजबूर होंगे।

पूरे देश में जहां भी मंडियां खत्म हुई हैं वहां ऐसा ही हुआ है। बिहार में ही देख लीजिए कि वहां फसल किस दाम पर बिकती है। हमें गेहूं और धान दोनों का ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) मिलता है तब जाकर खर्चे पूरे होते हैं। लेकिन जहां मंडियां नहीं है वहां के किसानों को तो MSP मिल ही नहीं पाती। नए क़ानून ऐसे ही हैं कि उनसे एक-दो साल में ही मंडियां खत्म हो जाएंगी और फिर पंजाब में भी MSP मिलना बंद हो जाएगा।’

इतना बड़ा आंदोलन पहले नहीं देखा
हालांकि ये पहली बार नहीं है जब वे आंदोलन करते हुए दिल्ली आए हैं। वे याद करते हुए बताते हैं कि इससे पहले भी कई बार वे किसानों की मांगों के चलते दिल्ली आ चुके हैं लेकिन इतना बड़ा और इतना कठिन आंदोलन उन्होंने पहले कभी नहीं देखा।

वे कहते हैं, ‘मैंने कई आंदोलन देखे हैं। हम लोग पंजाब से ट्रेन में बैठकर दिल्ली आते थे और यहां सरकार से बातचीत के बाद लौट जाते थे। ये पहली बार ही देखा है कि सरकार ने हमें आने से रोकने के लिए इतना ज़ोर लगा दिया जितना शायद पाकिस्तान से लड़ने में भी नहीं लगाया होगा। ये आंदोलन तो हमें उन फिल्मों की याद दिलाता है जिनमें देखा था कि कैसे अंग्रेज अफ़सर जनता पर अत्याचार करते थे। हमें बिलकुल उसी तरह से रोकने की कोशिश की गई।’

पूरे देश से समर्थन मिल रहा है
सरकार से पांच बार की असफल बातचीत के बाद भी क्या किसानों को उम्मीद है कि उनकी मांग मान ली जाएगी? इस सवाल पर सुलखन सिंह कहते हैं, ‘पहले उम्मीद नहीं थी लेकिन अब उम्मीद है। सच कहूं तो मुझे इस उम्र में हिम्मत इसलिए मिल रही है कि यहां चल रहा आंदोलन बहुत हिम्मत देता है। पूरे देश का समर्थन मिल रहा है। यहां इतने लोग सेवा के लिए पहुंच रहे हैं, इतना दान कर रहे हैं कि हमें अब चिंता भी नहीं कि यहां ज़्यादा दिन कैसे रह सकेंगे। अब मुझे पूरा विश्वास है कि ये आंदोलन जब ऐतिहासिक है तो इसका नतीजा भी ऐतिहासिक होगा।’

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