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100 दिन बाद किसान आंदोलन का हाल:गाजीपुर बॉर्डर पर अब काफी कम भीड़; किसान कहते हैं- हमने रणनीति बदली है, एक आवाज पर लाखों लोग आ जाएंगे

गाजीपुरएक महीने पहलेलेखक: पूनम कौशल

गाजीपुर बॉर्डर के किसान आंदोलन स्थल पर अब काफी कम भीड़ है। ज्यादातर पंडाल खाली पड़े हुए हैं। कहीं पंडालों में कुछ लोग बैठे हैं। इनमें भी ज्यादातर बुजुर्ग हैं। युवा चेहरे अब यहां नहीं दिखते। हालांकि, गाजीपुर के किसानों का धरनास्थल पहले से ज्यादा व्यवस्थित नजर आता है। 100 दिनों के बाद किसान आंदोलन का नजारा कुछ ऐसा है।

गाजीपुर, टीकरी और सिंघु बॉर्डर पर इस दौरान 248 से ज्यादा किसानों की आंदोलन के दौरान मौत हो चुकी हैं। सरकार-किसानों से 11 बार बातचीत हो चुकी है, लेकिन फिर भी कृषि कानूनों पर कोई नतीजा नहीं निकला। 26 जनवरी को किसान ट्रैक्टर परेड के दौरान हुई हिंसा के बाद फिलहाल बातचीत का कोई नया रास्ता खुलता नहीं दिख रहा है।

गाजीपुर बॉर्डर पर प्रदर्शन में शामिल अलीगढ़ से आए धर्मवीर कहते हैं, 'जब तक कानून वापस नहीं होगा धरना चलेगा। हम भी यहीं रहेंगे। हम यहां डटे हुए हैं, हमारे गांव से लोग आ-जा रहे हैं।' 70 साल के धर्मवीर कहते हैं, 'हमने चुनाव में मोदी जी को घोड़े पर बिठाकर फूल मालाएं पहनाकर दिल्ली भेजा। लेकिन, अब उन्हें दिल्ली से लौटाना पड़ेगा। हम असल किसान के बेटे हैं, हम पीछे कदम करने वालों में से नहीं हैं।'

किसान आंदोलन के युवा चेहरे अब यहां कम नजर आ रहे हैं। ज्यादातर बुजुर्ग ही धरनास्थल पर जमे हुए हैं।
किसान आंदोलन के युवा चेहरे अब यहां कम नजर आ रहे हैं। ज्यादातर बुजुर्ग ही धरनास्थल पर जमे हुए हैं।

गाजीपुर के जिस पंडाल में धर्मवीर बैठे हैं। वह लगभग खाली है। नजारा अब बदला हुआ है। न पंडालों में पहले जैसे भीड़ है न ही लंगर में। ठिठुराती सर्दी में दिल्ली की सरहदों पर डेरा डालने वाले किसान अब गर्मियों में टिके रहने की तैयारी कर रहे हैं। गाजीपुर बॉर्डर पर अब फूस के छप्पर डाले जा रहे हैं। ये छप्पर बिहार से बुलाए गए कारीगर तैयार कर रहे हैं।

एक दोमंजिला छप्पर के बाहर से सोशल मीडिया पर लाइव करते हुए किसान नेता गुरसेवक सिंह मोबाइल पर बोल रहे हैं, 'आगे स्टेज पर भी शेड डाल दिया गया है। तमाम जगह ऐसे छप्पर डल रहे हैं, जो गर्मी से बचाव करेंगे। ज्यादा से ज्यादा संख्या में आंदोलन स्थल पर पहुंचिए। गांव-गांव में कमेटी बन गई हैं। हर गांव से 10 आदमी आंदोलन स्थल आएंगे और गांव के बाकी लोग उनका खेती-बाड़ी का काम करेंगे।'

अपना लाइव खत्म कर गुरसेवक सिंह कहते हैं, 'सरकार की तरफ से अभी बातचीत का कोई ऑफर अभी हमें नहीं मिला है। लगता है सरकार किसानों के साथ टेस्ट मैच खेल रही है। किसान संयुक्त मोर्चा और किसान पूरी तरह से तैयार हैं। आंदोलन 200 दिन या 300 दिन भी चला तो भी किसान बॉर्डर पर डटे रहेंगे। अब गर्मियां आ रही हैं। हमने कैंपों के ऊपर चटाइयां बिछा दी हैं। कूलर-पंखे मंगवाए जा रहे हैं। एयरकंडीशंड ट्रॉलियां तैयार की जा रही हैं।'

गाजीपुर बॉर्डर पर अब लंगरों में भी पहले की तरह भीड़ नहीं है। बहुत कम लोग ही यहां काम करते दिखते हैं।
गाजीपुर बॉर्डर पर अब लंगरों में भी पहले की तरह भीड़ नहीं है। बहुत कम लोग ही यहां काम करते दिखते हैं।

गाजीपुर बॉर्डर पर पुलिस एक्शन की तैयारी और फिर 28 जनवरी को किसान नेता राकेश टिकैत के कैमरे के सामने फफक-फफककर रो पड़ने के बाद किसानों में उबाल आ गया था। इसके बाद काफी दिनों तक गाजीपुर बॉर्डर पर भारी भीड़ रही थी। अब ये भीड़ छंट गई हैं। अधिकतर किसान आंदोलनस्थल से लौट चुके हैं। शाम को गाजीपुर बॉर्डर पर जहां हुक्के गुड़गुड़ाते हुए किसानों की बैठकें लगती थीं, वहां अब कुछ बुजुर्ग ही नजर आते हैं।

आंदोलन में भीड़ कम होने के सवाल पर मुजफ्फरनगर से आए जोगिंदर सिंह कहते हैं, 'भीड़ तो हम 26 जनवरी और 28 जनवरी को दिखा ही चुके हैं। अब हम यहां जानबूझकर भीड़ कम रखी जा रही है।आलू की खुदाई और गन्ने की बुवाई का समय चल रहा है। इसलिए ही गांव-गांव के पास पंचायतें हो रही हैं, ताकि लोग घर के पास ही आंदोलन में शामिल हो सकें। जिस दिन जरूरत होगी यहां एक आवाज पर लाखों लोग इकट्ठा हो जाएंगे।'

इस समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में किसान महापंचायतों का सिलसिला चल रहा है। इन महापंचायतों में बड़ी तादाद में लोग जुट रहे हैं। राकेश टिकैत भी अक्सर ऐसी ही पंचायतों के सिलसिले में हरियाणा,राजस्थान जाते रहते हैं।

पहले हर रोज शाम को गाजीपुर बॉर्डर पर जहां हुक्के गुड़गुड़ाते हुए किसानों की बैठकें लगती थीं, वहां अब कुछ बुजुर्ग ही नजर आते हैं।
पहले हर रोज शाम को गाजीपुर बॉर्डर पर जहां हुक्के गुड़गुड़ाते हुए किसानों की बैठकें लगती थीं, वहां अब कुछ बुजुर्ग ही नजर आते हैं।

एडवोकेट योगेंद्र आंदोलन स्थल से किसानों की संख्या कम होने को रणनीति बताते हुए कहते हैं, 'अब आंदोलन ने नया स्वरूप ले लिया है। गाजीपुर बॉर्डर हेड ऑफिस बन गया है। यहीं से किसानों के कार्यक्रमों की रणनीति तैयार हो रही है। ये एक तरह से हमारा पीएम हाउस है, जहां टिकैत साहब बैठते हैं। सिंघु बॉर्डर अब हमारा संसद भवन है, जहां सभी किसान नेता बैठते हैं।'

वो कहते हैं, 'अब हमने रणनीति बदल दी है। अब हम गांव-गांव में आंदोलन को मजबूत कर रहे हैं। यदि आंदोलन की ताकत देखनी है तो महापंचायतों में आइए।'

गाजीपुर बॉर्डर पर अब पत्रकारों की संख्या भी कम हो गई हैं। इक्का-दुक्का यूट्यूबर ही नजर आते हैं। नाम न जाहिर करते हुए ये पत्रकार कहते हैं, 'बॉर्डर पर अब पहले जैसी बात नहीं है। किसानों ने आंदोलन को गांव-गांव शिफ्ट कर दिया है। अब कुछ बड़ा होगा तब ही यहां भीड़ जुटेगी।'

लंगरों में भले ही अब खाने वाले कम हों लेकिन सामान और सुविधा की कोई कमी नहीं हैं। एक लंगर में खाना खा रहे एडवोकेट संजय सिंह कहते हैं, 'ये गुरु का लंगर है, 500 साल से चल रहा है, आगे भी चलता रहेगा। इसके लिए रसद की कभी कमी नहीं होगी।' संजय सिंह इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं।

धीरे-धीरे गर्मी अब बढ़ रही है। इसको लेकर किसानों ने तैयारियां शुरू कर दी है। वे अब फूस के छप्पर डाल रहे हैं।
धीरे-धीरे गर्मी अब बढ़ रही है। इसको लेकर किसानों ने तैयारियां शुरू कर दी है। वे अब फूस के छप्पर डाल रहे हैं।

गाजीपुर बॉर्डर पर रोजाना 50 लीटर दूध भेजने वाले एक युवा डेयरी कारोबारी आंदोलन स्थल पर वॉलंटियर की भूमिका भी निभाते हैं। लेकिन, अब वो कैमरा के सामने आने से डरते हैं। वो कहते हैं, 'सरकार आंदोलन में शामिल लोगों पर बाद में एक्शन भी कर सकती है। इसलिए मैं अब किसी से बात नहीं करता।' वो कब तक दूध भेज पाएंगे इस सवाल पर वो कहते हैं, 'अगले 4-6 महीने तक अपनी निजी हैसियत से मैं रोजाना 50 लीटर दूध भेज सकता हूं। किसानों के आंदोलन के लिए कम से कम इतना तो मैं कर ही सकता हूं।'

भीड़ कम होने के अलावा दिल्ली पुलिस भी यहां अब उतनी एक्टिव नहीं दिखती। सख्त बैरिकेडिंग में ढील दे दी गई है। हाईवे का एक लेन ट्रैफिक के लिए खोल दिया गया है। फिर भी सड़कों पर जगह-जगह अवरोध के कारण जाम लगातार बना रहता है।

दिल्ली, गाजियाबाद-नोएडा के बीच अपडाउन करने वाले लोग कहते हैं कि अब तो जाम में फंसना रूटीन हो गया है। इंदिरापुरम में रहने वाले एक इंजीनियर कैमरे से अपना चेहरा छुपाते हुए कहते हैं, 'हमारा पेट्रोल और वक्त दोनों बर्बाद होता है। किसी को हमारी परवाह नहीं है। किसानों और सरकार की इस लड़ाई में हमारे जैसे लोग कर भी क्या सकते हैं?'

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