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  • The Girl Was An Adult, Yet Was Imprisoned In A Room For 11 Years, Hungry, After Coming Out No One Even Tried To Know Her Condition

बात बराबरी की:लड़की थी इसलिए बालिग होने के बाद भी 11 साल तक एक कमरे में कैद रही, भूखी रही, बाहर आने के बाद किसी ने उसका हाल भी नहीं पूछा

नई दिल्लीएक वर्ष पहले
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साल 2010 में केरल के एक गांव से 19 साल की लड़की लापता हो गई। घर वालों ने रिपोर्ट लिखाई, लेकिन लड़की का गायब होना घर के पीछे से सुस्ताती साइकिल के गायब होने से भी मामूली निकला। धीरे-धीरे उसे सब भूल गए। शादी होती तो दान-फूल देना होता। मौके-बेमौके कई दूसरे चढ़ावे लगते। अच्छा ही हुआ जो गायब हो गई। अब 11 सालों बाद लड़की मिल चुकी है। वो भी किसी दूसरे देश, दूसरे राज्य या जिले में नहीं, बल्कि अपने ही घर से चंद कदम दूर। इतने सालों तक वो अपने प्रेमी के साथ रही। प्रेमी जब काम पर जाता, कमरे पर ताला जड़ देता। बगैर बाथरूम के उस छोटे-से अंधेरे कमरे में प्रेमिका रात का इंतजार करती ताकि दूसरी जरूरतें पूरी कर सकें।

हम दोहराते हैं- युवती पूरे 19 साल की थी और प्रेमी 24 का। दोनों बालिग। शादी के लिए शरीर और मन से तैयार। ऐसे में देश के कानून समेत, दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें शादी या साथ जीवन बिताने से रोक नहीं सकती थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अलग-अलग मजहबों का ये बालिग जोड़ा चाहे तो दूसरे राज्य जा सकता था, जहां दोनों मर्जी से कमाते-खाते जीवन बिताते, लेकिन ये भी नहीं हुआ। ऐसे में युवक को बंधी-बंधाई नौकरी और घर का खाना छोड़ना पड़ता। तो हुआ ये कि युवती एक रात घर से गायब होकर पड़ोस के घर में समा गई।

संयुक्त परिवार में रहने वाले प्रेमी ने पक्का किया कि घर से निकलते हुए कमरा खूब अच्छी तरह से बंद रहे। उसने पक्का किया कि कमरे से खटपट की कोई आवाज न आए। प्यार में पड़ी युवती ने अपनी आवाज बंद कर ली। अपनी भूख मार ली। और यहां तक कि शौच जाने जैसी जरूरत पर भी तालाबंदी कर दी। रात में सबके सोने के बाद युवती खिड़की के रास्ते बाहर निकलती और तब जाकर अपनी जरूरतें पूरी कर पाती।

अब 29 साल की हुई ये स्त्री एक तरह से उम्रकैद काट चुकी है। खबरों में उसके 11 सालों तक एक तंग कमरे में चुपचाप रहने की बात है। पुलिस ने ये तक जांचा कि वो रात में शौच के लिए कैसे खिड़की से बाहर छलांग लगाती थी। तमाम बातों पर पुलिस और कोर्ट की हैरानी का भी जिक्र है, लेकिन किसी ने भी उसकी मानसिक स्थिति पर बात नहीं की। 11 सालों तक जिसने सूरज का उगना या डूबना नहीं देखा, जिसने एक शख्स के अलावा कोई दूसरी आवाज नहीं सुनी, जिसने भरपेट खाना नहीं खाया, उसका दिल और दिमाग अब किस हाल में है, किसी भी खबर में इसका कोई जिक्र नहीं। और इसकी कोई जरूरत भी तो नहीं है!

कोरोना के दौर में कुछेक महीने घर के भीतर रहने से छटपटाई 'पहली-आधी' आबादी को ठीक-ठीक अंदाजा है कि बाकी-आबादी की सही जगह घर ही है। आज तक ऐसी कोई खबर नहीं आई कि घर में रहते हुए औरत की मानसिक हालत बिगड़ गई हो। या फिर वो बागी हो गई हो। हां, कुछेक ‘पाजी’ औरतें जरूर हैं, जो घर पर रहते तड़पड़ा जाती हैं। ईंट-गारे और मसाले-बच्चों से इतर भी कुछ चाहती हैं।

ऐसी औरतों के लिए कई सजाएं हैं, जो बगावत धोकर उनकी शुद्धि कर देती हैं। ‘बाहर जाओगी तो लुटकर आओगी’- जैसे अनमोल वचन हम अक्सर ही सुनते रहे। वैसे इन औरतों की बातें कभी और। फिलहाल इतिहास को टटोलते हैं कि क्यों बालिग होकर भी प्रेमिका ने कैद में रहना चुना?

प्राचीन रोम के शासक सीजर ऑगस्टस ने तय किया था कि घर की बच्चियों-औरतों को घर के भीतर ही रहना चाहिए। अगर वे बाहर पंख पसारें या फिर प्रेम करें तो उनका सिर काट दिया जाए। ये सजा चौराहों पर दी जाती और आदेश होता था कि घरों की खिड़कियां खुली रहें ताकि बाकियों को भी सबक मिल जाए। इसके बाद आया फ्रेंच सिविल कोड। इसमें भी प्रेम में पड़ी लड़कियों या शादीशुदा बेवफा औरतों के लिए मौत की सजा थी। यहां तक कि अगर कोई नर्म दिल पुरुष हत्या का बोझ न ले तो उसे नपुंसक कहा जाता। हत्याओं का सदियों पुराना दस्तूर आज भी चला आ रहा है।

यूनाइटेड नेशंस (UN) के मुताबिक हर साल 5 हजार से ज्यादा औरतें ऑनर किलिंग का शिकार होती हैं। इसमें भारत के साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश और अरब मुल्क भी साथी हैं। हमारे यहां नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार साल 2015 से 2017 के बीच ऑनर किलिंग के 300 से ज्यादा मामले आए। वैसे संकेत ये भी है कि हत्याएं इससे कहीं ज्यादा होंगी। असल में सीधे-सीधे खून में अपने हाथ रंगने की बजाय बहुत से लोग लड़की को खुदकुशी के लिए उकसाते हैं। इसके दो फायदे हैं- परिवार की इज्जत भी लौट आती है और किसी पर हत्या का शक भी नहीं होता।

एक और तरीका है। इसमें परिवार की कटी नाक को जोड़ने के लिए लड़की की आनन-फानन में शादी करवा दी जाती है। भावी दामाद को फल-फूल से लादना होता है कि वो ‘ऐसी’ लड़की को ब्याह कर ले जा सके। तरीका थोड़ा महंगा है इसलिए चलन में भी जरा कम है। फिर ये भी खतरा होता है कि लड़की दोबारा भाग निकले। तो ऐसे में मार-मूरकर किसी बाड़ी या तलिया में फेंकना ज्यादा पॉपुलर रास्ता बना हुआ है।

ग्यारह साल पहले 19 बरस की उस लड़की को कानून पर यकीन नहीं था कि वो उसे महफूज रख सकेगा। उसे खुद पर यकीन नहीं था कि वो बर्बरताओं से बच सकेगी। उसे यकीन था तो केवल समाज और परिवार पर। वो पक्का थी कि गैर-मजहब में प्यार या शादी की बात करते ही वो काटकर फेंक दी जाएगी, या फिर किसी अनजान के साथ बांध दी जाएगी। इसी डर ने उसे इतनी लंबी कैद दे दी। ये समाज के तौर पर हमारी सबसे बड़ी हार है। वहीं युवती का सालों बाद ही सही, कमरे से बाहर आना- एक उम्मीद है, कि शायद कमरे के कपाट की तरह हमारी कुंद सोच के कपाट भी खुलें।

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