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बात बराबरी की:औरतें काम की जगह प्यार करने लगती हैं, गलती बताओ तो टसुएं बहाती हैं; फिर उनके आंसू पोंछते रहिए

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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औरतों के लिए एक दिलखुश खबर है कि साइंस ने उनकी खूबसूरती मापने का तरीका खोज निकाला। गहरी आंखें, नुकीली नाक और गुलाब की पंखुरियों से भी नाजुक रसदार होंठ- इन सबके बीच कितने अंगुल दूरी हो कि खातून सबसे हसीन कहलाए, ये सब राज मर्द वैज्ञानिक खोल रहे हैं। इस बीच एक और खबर आई, जो उतनी फैंसी नहीं। इसके मुताबिक साइंस में औरतों की जगह वही है, जो सालों से फेल हो रहे बच्चे की क्लास में होती है। यानी वे कहीं नहीं हैं।

न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में हुई रिसर्च नामी साइंस मैगजीन नेचर टुडे में आई। ये बताती है कि विज्ञान में बराबरी से काम करती महिलाएं भी पुरुषों से 59% पीछे हैं। वे काम तो करेंगी, लेकिन 59 प्रतिशत मामलों में क्रेडिट मर्दानी जेब में चला जाएगा। इसके लिए दुनियाभर की 9 हजार 778 रिसर्च टीमों से बात की गई, जिनमें करीब डेढ़ लाख औरत-मर्द शामिल थे।

खुद पुरुष वैज्ञानिकों ने माना, अगर किसी खोज पर औरतों का नाम जाए, तो लोगों को उस पर यकीन नहीं होगा। ये वैसा ही है, जैसे टटपूंजिया कंपनी अगर दुनिया की सबसे मजबूत चप्पल बनाने का दावा करे तो कोई नहीं मानेगा। वहीं उस चप्पल पर अगर बड़े ब्रांड का ठप्पा लग जाए तो लोग हाथोंहाथ लेंगे। तो साइंस पर लोगों का यकीन बना रहे, नेकदिल मर्द, इसीलिए उससे जनाना टैग हटाकर अपना नाम चिपका देते हैं।

महिला वैज्ञानिक लैब जाएं। टेस्ट ट्यूब और कंप्यूटर भी छुएं। रात-रातभर जागकर काम भी करें। लेकिन जब खोज का एलान हो, वे कोने में खड़ी होकर मुहब्बत भरी आंखों से मर्द वैज्ञानिक को गुलदस्ता लेते देखें। कभी मन बौखला भी जाए तो होंठ निकालकर जरा-थोड़ा रो लें। या रेशमी गाउन पहनकर छुट्टी पर चली जाएं। या फिर चरखा कातने लगें। यकीन जानिए, मन की भटकन तड़ से शांत हो जाएगी। वैसे भी काम कोई भी करे, असल बात तो उसका आम लोगों तक पहुंचना है।

जुलाई 1920 में लंदन में जन्मी रोजलिंड एल्सी फ्रेंकलिन ने खुद को ऐसे ही पुचपुचाया था। रोजलिंड वो वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने डीएनए के स्ट्रक्चर का पता लगाया था। सबसे पहले! किंग्स कॉलेज की लैब में काम करते उनके साथी साइंटिस्ट मॉरिस विलकिन्स ने कुढ़न में इसकी तस्वीर यार-दोस्तों में बांट दी। मॉरिस ने अपने संस्मरण ‘द थर्ड मैन ऑफ डबल हेलिक्स’ में इस बात को स्वीकारा। वे गुस्सा थे कि रोजी ‘जरूरत से ज्यादा’ आत्मनिर्भर और मेहनती थीं।

बहुत आखिर-आखिर में रोजी को पता लग सका कि उनकी खोज न सिर्फ चोरी चली गई, बल्कि चना-मुर्रा की तरह बंट भी गई। वे छुट्टी पर थीं। साल 1962 में तस्वीर चुराने और आपस में बांटने वाले तीनों मर्दों को डीएनए कोड की खोज पर नोबल पुरस्कार मिला। रोजी डिप्रेशन में थीं- जैसी जनानियों की आदत होती है। उन्होंने किंग्स कॉलेज छोड़ दिया। आखिर में ओवेरियन कैंसर से वे खत्म हो गईं।

डीएनए की खोज किसने की- इसे हिंदी या अंग्रेजी में खोजिए- रोजलिंड का नाम कहीं नहीं मिलेगा। नोबेल पाने और रोजी के मर-खप जाने के बाद उनके साथी साइंटिस्ट मॉरिस ने आखिरकार राज खोला कि डीएनए कोड की असल खोज का श्रेय रोजी को मिलना चाहिए था। मॉरिस नोबेल पा चुके थे- सच बोलकर वे महान भी बन गए।

औरतों की असल जगह रसोई में है, जहां वे दिल खोलकर प्रयोग कर सकती हैं। चाहें तो रसखीर में शराब की छौंक लगाएं, या बैंगन को गुड़ डालकर पकाएं- उनकी मर्जी। इससे शौहर का जायका भले बिगड़े, दुनिया में जलजला नहीं आएगा। लैब अलग चीज है। यहां छोटी गड़बड़ी भी बड़ा कहर बरपा सकती है। तिसपर औरतों की रोने-गाने की आदत!

यही वजह है जो नोबेल पुरस्कार पा चुके अंग्रेज बायोकेमिस्ट टिम हंट ने महिलाओं को साइंस से एकदम हटाने की बात कर दी। जून 2015 में उन्होंने बयान दिया कि काम करने की बजाय वे (औरतें) प्यार करने लगती हैं और जब आप उनकी गलती बताएं, वे टसुएं बहा पड़ती हैं। फिर आप खोज-वोज भूलकर उनके आंसू पोंछते रहिए।

सीनियर महिला वैज्ञानिकों और पत्रकारों के बीच एक कॉन्फ्रेंस में टिम ने कहा- मैं ‘गर्ल्स’ की बुराई नहीं कर रहा, लेकिन या तो वे साइंस से दूर रहें, या उनके और हमारे लिए अलग-अलग लैब्स बना दी जाएं। तभी दुनिया में कुछ नया हो सकेगा। बयान पर बवाल तो मचा, लेकिन सॉफ्ट-ड्रिंक के बुलबुले की तरह तुरत शांत भी हो गया। एक और बात- टिम जब रोंदू लड़कियों की बात कर रहे थे- कॉन्फ्रेंस में आए पुरुष पत्रकार एकदूसरे पर लुढ़कते हुए हंस रहे थे।

चलते-चलते लंदन यूनिवर्सिटी में पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च कर रही औरतों से पूछताछ का एक नमूना भी पढ़ते जाएं...

  • बच्चेदार महिलाओं के लैब में आने पर मनाही होनी चाहिए।
  • मैं तुम्हें नहीं सिखाऊंगा क्योंकि तुम शादी करके घर ही संभालोगी।
  • रिसर्च कैसे करोगी, जब तुम्हारी जेनेटिक्स में ही खाविंद, सास-ननद, की बुराई है।
  • लैब में खटती औरतों को देख तरस तो आता है, लेकिन कम से कम उनसे हमारा मन बहल जाता है।

खैर! प्रोटीन मॉलिक्यूल की खोज करने वाले टिम हंट ने रोंदू और प्यार में पड़ने वाली महिला वैज्ञानिकों से माफी नहीं मांगी। इसके उलट हंसते हुए कहा- नोबेल पा चुका हूं। जो भोगा, वो बताया।

वजह साफ है, कैसे साइंस में मिले 600 से ज्यादा नोबेल पुरस्कारों में से औरतों के हिस्से 50 भी नहीं पहुंच सका। जनानियों के एजेंट लाख गुलगपाड़ा मचाएं, हर खोज से जेन नाम खुरचकर जॉनी नाम खोदा जाएगा। आखिरकार भरोसे की बात है!