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  • The Rest Of The Saints Are Preparing To Bathe In Kumbh, The Saint Associated With The Mother House Is On A Fast Unto Death For Ganga.

हरिद्वार से ग्राउंड रिपोर्ट:एक तरफ साधु-संतों के अखाड़ों में शाही स्नान की तैयारियां चल रही हैं, दूसरी तरफ यहां के संत गंगा के लिए आमरण अनशन पर बैठे हैं

​हरिद्वार9 महीने पहलेलेखक: राहुल कोटियाल
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हरिद्वार में इन दिनों कुम्भ मेले की धूम है। साधु-संतों के अखाड़ों में दूसरे शाही स्नान की तैयारियां चल रही हैं। देश के कोने-कोने से आए रमता जोगी, नगा साधु और अलग-अलग पंथों से जुड़े संन्यासी गंगा में स्नान को लेकर उत्साहित हैं। इन सबके बीच संतों का एक समूह ऐसा भी है जिसमें अधिकतर ग्रेजुएट हैं, इंजीनियर या वैज्ञानिक भी रह चुके हैं या IIT जैसे संस्थानों से निकले हैं।

ये संत गंगा के आध्यात्मिक पहलू के साथ ही उसके वैज्ञानिक पहलू पर जोर दे रहे हैं और गंगा को बचाने की लड़ाई में बीते कई सालों से संघर्ष कर रहे हैं। अब भी जब तमाम अन्य साधु-संत कुंभ में स्नान की तैयारी में लगे हैं तो वहीं मातृ सदन से जुड़े ये संत गंगा के लिए आमरण अनशन पर बैठे हैं और इनके एक संत ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद ने तो 8 मार्च से जल भी त्याग दिया है।

गंगा को बचाने के उद्देश्य से मातृ सदन की स्थापना साल 1997 में स्वामी शिवानंद सरस्वती ने की थी।
गंगा को बचाने के उद्देश्य से मातृ सदन की स्थापना साल 1997 में स्वामी शिवानंद सरस्वती ने की थी।

ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद कहते हैं, ‘हम लोग गंगा को बचाने के लिए दशकों से लड़ रहे हैं। चाहे वो गंगा में खनन बंद करवाने की लड़ाई हो या जगह-जगह गंगा को बांध कर उस पर डैम बनाने की, हमने वैज्ञानिक तर्कों के साथ इसका विरोध किया है। इसके लिए हमारे कई संतों ने अपना बलिदान भी दिया है। हम उनके बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने दे सकते। हम उनकी ही लड़ाई आगे बढ़ा रहे हैं।’

मातृ सदन की स्थापना साल 1997 में स्वामी शिवानंद सरस्वती ने की थी। कभी केमिस्ट्री के प्रोफेसर रहे शिवानंद बताते हैं कि इसके दो मुख्य उद्देश्य थे, ‘आत्मा की मुक्ति’ और ‘जगत का हित।’ वो बताते हैं कि इन उद्देश्यों को पाने के लिए मातृ सदन ने ध्यान में लीन होने या प्रवचन बांचने का रास्ता नहीं चुना बल्कि सबको जीवन देने वाली गंगा को बर्बाद करने वाले भूमाफियाओं और खनन कारोबारियों से सीधा लोहा लेने की ठानी।

मातृ सदन ने गंगा में हो रहे खनन के खिलाफ 1998 में संघर्ष शुरू किया। कई भूख हड़तालों और अनशनों के बाद मातृ सदन को अपनी पहली कामयाबी और कुम्भ क्षेत्र में खनन पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया, लेकिन इस संघर्ष में मातृ सदन से जुड़े दो संन्यासियों की जान चली गई। मातृ सदन का आरोप है कि स्वामी गोकुलानंद सरस्वती और स्वामी निगमानंद सरस्वती की संदेहास्पद परिस्थिति में हुई मौत के पीछे खनन माफियाओं का हाथ रहा है।

स्वामी शिवानंद सरस्वती बताते हैं कि हमने गंगा को बर्बाद करने वाले भूमाफियाओं से सीधा लोहा लेने की ठानी है।
स्वामी शिवानंद सरस्वती बताते हैं कि हमने गंगा को बर्बाद करने वाले भूमाफियाओं से सीधा लोहा लेने की ठानी है।

इन संतों की मौत के बाद भी मातृ सदन का संघर्ष कमजोर नहीं हुआ। नतीजा यह रहा कि सरकार को कई जगह खनन पर रोक लगानी पड़ी, वन विभाग जो जमीन राजस्व विभाग में दर्शाई गई थी, उन्हें वन विभाग को लौटाया गया, दर्जनों स्टोन क्रशर बंद हुए और कई पॉवर प्रोजेक्ट तक सरकार को मातृ सदन के आंदोलन के चलते रोकने पड़े।

2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो मातृ सदन के संतों को उम्मीद जगी कि अब शायद गंगा की बेहतरी के लिए कुछ काम हो सकेंगे। ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद कहते हैं, ‘स्वामी सानंद जब 2013 में अनशन कर रहे थे तो भाजपा नेता नरेंद्र मोदी से लेकर राजनाथ सिंह तक उनका समर्थन कर रहे थे। उन्होंने तब ट्वीट भी किए थे कि स्वामी सानंद की मांगें बिल्कुल जायज हैं, लेकिन सरकार बदलने के बाद ये लोग गंगा को बचाने में नहीं बल्कि पूरी तरह बेचने के काम में लग गए।’

स्वामी सानंद, जो IIT के प्रोफेसर रहे थे और जिनका असल नाम जीडी अग्रवाल था, उन्होंने 2018 में एक बार फिर से मातृ सदन के संतों के साथ अनशन शुरू किया। वे 110 दिनों तक भूख हड़ताल पर रहे जिसके बाद उनका निधन हो गया। उन्हीं की मांगों को लेकर मातृ सदन के कई अन्य संत तब से आंदोलन कर रहे हैं।

स्वामी सानंद (प्रोफेसर जीडी अग्रवाल)। गंगा के लिए आमरण अनशन पर बैठे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की 11 अक्टूबर 2018 को मौत हो गई।
स्वामी सानंद (प्रोफेसर जीडी अग्रवाल)। गंगा के लिए आमरण अनशन पर बैठे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की 11 अक्टूबर 2018 को मौत हो गई।

आत्मबोधानंद कहते हैं, ‘स्वामी सानंद (प्रोफेसर जीडी अग्रवाल) जिन बांधों पर रोक लगाने की मांग कर रहे थे, उनमें से एक बांध वो भी था, जो पिछले महीने चमोली में आई आपदा में बह गया। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी मांगें सही थी या नहीं। वो तो ये गनीमत है कि ये आपदा मानसून में नहीं आई, वर्ना न जाने कितना बड़ा नुकसान होता। सरकारों को अपना लालच छोड़ कर प्रकृति की इन चेतावनियों से सावधान होना चाहिए।’

कुम्भ की चकाचौंध से दूर मातृ सदन के ये संत मानते हैं कि कुम्भ जैसे आध्यात्मिक मेले का महत्व भी अब पहले जैसा नहीं रह गया है। वे बताते हैं कि पहले जहां कुम्भ में देश भर के ज्ञानी संन्यासी पहुंचते थे और उनसे प्रभावित होकर कई लोग उनकी शरण पाने को कुम्भ में आते थे, वहीं अब ये उत्सव दिखावा ज्यादा हो गया है जहां बैंड और डीजे के शोर में कथित महामंडलेश्वर अपना-अपना शक्ति प्रदर्शन करते हैं और लोग भी ये तमाशा देखने ही ज्यादा पहुंचते हैं।

मातृ सदन में अनशन कर रहे संत कहते हैं कि हरिद्वार में गंगा पर किसी भी तरह का खनन पूरी तरह बंद होना चाहिए।
मातृ सदन में अनशन कर रहे संत कहते हैं कि हरिद्वार में गंगा पर किसी भी तरह का खनन पूरी तरह बंद होना चाहिए।

ये संत मानते हैं कि अगर गंगा ही नहीं बचेगी तो कुम्भ भी कैसे होगा और गंगा को बचाने की ही लड़ाई वो लड़ रहे हैं। वो क्या मांगें हैं जिन्हें लेकर मातृ सदन के लोग अनशन कर रहे हैं और आत्मबोधानंद अपने प्राण तक त्यागने को तैयार हैं? यह सवाल करने पर वो कहते हैं, ‘हमारी मुख्यतः चार मांगें हैं-

  1. गंगा और उसकी सभी उपधाराओं (अलकनंदा, भागीरथी, धौली गंगा, पिंडर आदि) में निर्माणाधीन और प्रस्तावित पॉवर प्रोजेक्ट बैन किए जाएं और जो बने हुए डैम हैं, उनका किसी स्वायत्त संस्था से परीक्षण करवाया जाए। अगर परीक्षण में यह पाया जाता है कि यह परियोजनाएं पर्यावरण की दृष्टि से ठीक नहीं हैं तो इन्हें बंद किया जाए।
  2. गंगा को लेकर एक ‘गंगा भक्त परिषद’ का गठन किया जाए। ये परिषद किसी भी तरह के सरकारी दबाव से मुक्त होकर काम करे। ये पूरी तरह गंगा के लिए समर्पित होकर काम करे और किसी भी मंत्री या अफसर का इसमें प्रभाव न हो।’
  3. हरिद्वार में गंगा पर किसी भी तरह का खनन पूरी तरह प्रतिबंधित हो।
  4. गंगा के लिए स्वामी सानंद (प्रोफेसर अग्रवाल) ने एक ड्राफ्ट तैयार किया था। सरकार ने चालाकी की और इस ड्राफ्ट को बदल कर अपना एक दूसरा ड्राफ्ट बना दिया। हमारी मांग है कि स्वामी सानंद द्वारा बनाया गया ड्राफ्ट संसद में पारित किया जाए।’

इन्हीं चार मांगों को लेकर मातृ सदन इन दिनों भी अनशन पर है और ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद बीते 23 फरवरी से भूख हड़ताल कर रहे हैं। इसी भूख हड़ताल को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने 8 मार्च से जल भी त्याग दिया है। वे कहते हैं, ‘हमारे कई संत पहले भी अपने प्राण त्याग चुके हैं। अगर गंगा को बचाने के लिए ये सरकार खून ही मांगती है तो हम इसके लिए भी तैयार हैं।’

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