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बात बराबरी की:ट्रोलर्स को पक्ष या विपक्ष से कोई फर्क नहीं पड़ता, उन्हें फर्क इस बात से पड़ता है कि लिखने वाला मर्द है या औरत

नई दिल्ली20 दिन पहले
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हाल ही में मिया खलीफा, रिहाना, ग्रेटा थनबर्ग और मीना हैरिस जैसी इंटरनेशनल हस्तियों ने एक के बाद एक किसान आंदोलन का पक्ष लेते हुए ट्‍वीट किया। भारतीय अभिनेत्री कंगना रनोट तो फिल्मों से अघोषित ब्रेक लेकर ट्वीट की दुनिया में ही बस चुकी हैं। वे आजकल किसान बिल के पक्ष में लिख रही हैं यानी आंदोलन के खिलाफ। लेकिन, ट्रोलर्स को पक्ष या विपक्ष से कोई फर्क नहीं पड़ता, उन्हें फर्क इस बात से पड़ता है कि लिखने वाला मर्द है या औरत। मर्द है और बात गले नहीं उतर रही तो ट्रोलर्स दो-चार जुमले कसकर उन्हें बख्श देंगे, लेकिन औरत है तो कोई रियायत नहीं। औरत के बचपन से लेकर जवानी तक की किस्से-कहानियां निकाल ली जाएंगी। कब्र से मुर्दे जिंदा हो जाएंगे और श्मशान में वो अघोर नृत्य चलेगा जो औरत की हिम्मत तोड़कर ही रुकेगा।

फिलहाल यही हो रहा है। लिखने वाली सारी औरतों के लिए श्रेणियां बन चुकी हैं और साइंस की भाषा में वर्गीकरण भी हो चुका। मिया खलीफा पोर्न स्टार रह चुकी हैं जो अपने खानदान का नाम डुबो चुकीं। ग्रेटा थनबर्ग ऑस्टिस्टिक युवती हैं, जो पर्यावरण जैसा फैंसी विषय छोड़कर धपाक से किसान आंदोलन पर बोलने लगीं। वहीं देसी गर्ल कंगना इन सारी श्रेणियों को हल्का-फुल्का छूते हुए कोई नई बिरादरी रच रही हैं। अरे हां, एक नाम और भी है, मीना हैरिस, जो अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भतीजी हैं। फिलहाल वे ट्रंप को जबरन हटाने वाली लॉबी से होने का आरोप झेल रही हैं। अलग-अलग कैटेगरी में रखी इन सारी औरतों के साथ एक बात समान है, वे औरत हैं जिन्हें आंदोलन जैसे गंभीर मुद्दे पर राय रखने का हक नहीं।

तो ट्रोलिंग की आंधी इन तमाम औरतों की आंखें-मुंह धूल से भर चुकी है। किसी की न्यूड तस्वीर आ रही है तो किसी की अपने मर्द से पिटने के बाद की तस्वीर। इस पर कोई हैरानी नहीं। ये तो होना ही था, लेकिन हैरानी एक और बात पर है। क्याेें किसान आंदोलन में वाकई सक्रिय औरतों को लेकर सबके मुंह में दही जमी हुई है। नेता से लेकर मीडिया तक अन्नदाता का नारा बुलंद करते हैं तो स्क्रीन पर पुरुष किसान आ जाता है, झुर्रियों से भरे पोपले लेकिन मजबूत चेहरे वाला। या फिर कोई युवा किसान, जिसने विरासत में खेती संभाली और अब धरने पर बैठा है। जाहिर है, ये भी कोई पुरुष ही होता है। तब महिलाएं कहां हैं? क्या वे खेत में काम करते मर्दों को दोपहर में रोटी की पोटली पहुंचाने का काम ही करती थीं? क्या खेत वाकई मर्दानी जागीर रहे? इन सारे सवालों का जवाब आंकड़ों में मिलता है।

ऑक्सफेम (Oxfam) नाम की एक स्वयंसेवी संस्था बताती है कि देश की 75% ग्रामीण औरतें खेतों में काम करती हैं। वे खेत जोतने से लेकर रात में खेत की रखवाली तक करती हैं। धान की सुनहरी बालियां और सरसों के पीले खेतों में फसल काटती भी वही हैं। लेकिन जब बारी मंडी जाकर फसल बेचने की आती है, तो मर्द आगे रहता है। कारण? मंडियों में बिचौलिए होंगे, व्यापारी होंगे, ग्राहक होंगे। मंडी भले ही स्त्रीलिंग हो, लेकिन कारोबार पुल्लिंग होगा। तो खेत को जतन से देखतीं-सहेजतीं औरतें घर बैठकर अपने मर्दों को मंडी जाते और वहां से हल्की-भारी जेब लेकर आते देखती हैं।

मंडी से जो कीमत लेकर लौटता है, चेहरा उसी का होता है। ठीक वैसे ही जैसे जीत के विजय एंड टीम या फिर अली एंड टीम। तो औरतें टीम में कहीं खोकर रह जाती हैं। यहां तक कि लाल किले की प्राचीर से जो पवित्र उद्बोधन आता है, उसमें भी खेती की बात चले तो जिक्र किसान-भाई का ही रहता आया। किसान बहनें- संबोधन शायद ही किसी ने दिया हो। फेमिनिज्म की बयार में भले ही भाषण में थोड़े बदलाव हो गए हों, लेकिन किसान बहनें अब भी गायब हैं।

इस गायब होने की भी एक ठोस वजह है। खेत में दिन-रात एक करने वाली औरतें केवल मजदूर हैं, जमीनों पर उनका कोई हक नहीं। आंकड़ों के मुताबिक देश में केवल 13% औरतों के पास अपने खेत हैं। नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) का आंकड़ा ज्यादा डरावना है, जो प्रतिशत को और घटाते हुए कहता है कि औरतों के पास खेती की जो थोड़ी-बहुत जमीनें थीं, वो भी धीरे-धीरे घट रही हैं। यानी औरतें काम तो कर रही हैं, लेकिन केवल मजदूर की हैसियत से। देखा जाए तो खेती से औरत का रिश्ता उस सरोगेट मां की तरह है जिसकी कोख में किसी और का भ्रूण होता है। नौ महीने में कोशिका से भरा-पूरा शिशु बनाने का काम औरत का, लेकिन नाभि-नाल अलग होते ही उसका रिश्ता बच्चे से हमेशा के लिए खत्म हो जाता है।

चलिए, जमीन पर दावेदारी की बात छोड़कर सीधे आंदोलन स्थल की छलांग लगाते हैं। आंदोलन में बड़ी संख्या में औरतें मौजूद हैं। हर उम्र की औरतें। वे साथी पुरुषों से ज्यादा मुश्किलें झेलती हुई यहां बनी हुई हैं। गौर फरमाएं कि सिंघु बॉर्डर पर बने इन खेमों में तय संख्या में बाथरूम हैं। ऐसे में पीरियड्स के दर्द से दोहरी-तिहरी होती औरतें उन्हीं सार्वजनिक शौचालयों का इस्तेमाल कर रही हैं। कहना गलत न होगा कि धरनास्थल पर बहुतेरी औरतें फिलहाल यूरिनरी ट्रैक्ट डिसीज जैसे संक्रमण का शिकार हो चुकी होंगी। लेकिन उस बारे में कोई चर्चा नहीं। चलिए, एकबारगी औरतों की इस तकलीफ को खेतों के लिए उनका बलिदान समझकर अनदेखा भी कर दें, लेकिन क्या वजह है कि किसान भाइयों के साथ सरकारी चर्चा में एक भी महिला किसान आंदोलनकारी शामिल नहीं!

यहां तक कि मीडिया के फ्लैश भी वहीं जाकर ठहर रहे हैं, जहां औरतें लहसुन छीलती होंगी या फिर गोभी काट रही होंगी। मुंह में कैमरे ठूंस दमकते चेहरे शान से किसान आंदोलन में औरतों के घरेलू योगदान की कथा बांचते हैं। यानी आज से सौ-पचास साल बाद जब किसान आंदोलन का जिक्र चलेगा तो 'किसान औरतें' तस्वीर में कहीं नहीं होंगी। उनकी जगह होंगी 'किसानों की औरतें', जो खाना पकाकर अपने पति का हौसला बुलंद करती रहीं।

साजिश अभी से शुरू हो चुकी। फिलहाल पंजाब में रबी की फसल लहलहा रही है। रातभर जागकर जंगली जानवरों से फसल को बचाते किसान अगर बेफिक्री से दिल्ली में डेरा डाले हैं तो इसके पीछे वो किसान औरत है, जो वहां खेतों में रतजगा किए है। वही फसल भी काटेगी और फसल-मालिक के लौटने तक उसे सहेजकर भी रखेगी। वही घर में छोटे बच्चों को खिला रही है। वही बुजुर्गों की मिजाजपुर्सी भी कर रही है। इन तमाम कामों के बीच वही सूखा नाश्ता बनाकर, कंबल धो-सुखाकर आंदोलन स्थल भेज रही है।

कुछ वक्त बाद किसान लौट आएगा। राजा की तरह, जिसके पीछे दुंदभी बजाते चारण होंगे। आंदोलन की गूंज दशकों तक हवाओं में होगी। कॉलेज सिलेबस में किसान चेहरे जुड़ेंगे। मुट्ठियां लहराते, जबड़े भींचे मर्द किसान। इक्का-दुक्का जगह औरतें भी होंगी, चेहरे झुकाए खेत गोड़ती हुई या फिर लहसुन-सब्जियां तराशती हुई। कम से कम फिलहाल की तस्वीर तो यही है।

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