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आज की पॉजिटिव खबर:जिस गांव में 7 साल पहले न बिजली थी न सड़क; आज वहां के बच्चे स्केटिंग चैंपियन हैं, कंप्यूटर चलाते हैं, अंग्रेजी में बात करते हैं

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: सुनीता सिंह
फोटो क्रेडिट- विकी रॉय

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 400 किलोमीटर दूर पन्ना जिले में एक गांव है जनवार। 7 साल पहले तक 1400 लोगों की आबादी वाले इस गांव में न सड़क थी न बिजली की पहुंच। ज्यादातर जमीन बंजर थी, यानी खेती के लिए भी न के बराबर संभावना। गांव के लोग जैसे-तैसे मजदूरी करके जीवन गुजारा करते थे। महिलाओं की स्थिति तो और भी खराब थी। एक तरह से खानाबदोश तरह की उनकी लाइफ थी। बच्चों के लिए न पढ़ाई का माहौल था, न वे स्कूल जाते थे।

अब जनवार की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल गई है। छोटे-छोटे बच्चे भी किसी हाईटेक सिटी के बच्चों की तरह स्केटिंग करते दिख जाएंगे। गांव में सड़क और बिजली पहुंच गई है। स्कूल डेवलप हो गए हैं, बच्चे कंप्यूटर सीख रहे हैं, अंग्रेजी बोल रहे हैं। खेतों में ऑर्गेनिक फसलें लहलहा रही हैं, महिलाएं खुद के साथ-साथ अपने परिवार को भी संवार रही हैं। यह सबकुछ संभव हो सका है जर्मनी की रहने वाली उलरिके रीनहार्ड की लगन और मेहनत की बदौलत। आज की पॉजिटिव खबर में पढ़िए उनके संघर्ष और कामयाबी की कहानी...

गांव वालों को समझाना और उनका भरोसा जीतना चैलेंजिंग टास्क था

उलरिके रीनहार्ड जर्मनी की रहने वाली हैं। हालांकि भारत से उनका लगाव है और यहां वे अक्सर आती रहती हैं। फोटो- असलम सैयद
उलरिके रीनहार्ड जर्मनी की रहने वाली हैं। हालांकि भारत से उनका लगाव है और यहां वे अक्सर आती रहती हैं। फोटो- असलम सैयद

60 साल की उलरिके रीनहार्ड, जर्मन पब्लिशर, ऑथर और डिजिटल नोमैड हैं। 2014 में वे मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के एक छोटे से गांव जनवार पहुंचीं। यहां उन्हें हर तरफ से बदहाली की तस्वीर दिखी, इससे वे विचलित हो गईं। फिर उन्होंने तय किया कि इस गांव के लिए, यहां के लोगों के लिए, उनकी बेहतरी के लिए कुछ करने की जरूरत है। इसके बाद वे अपनी टीम के साथ कुछ दिनों तक गांव में रहीं। गांव के लोगों से बात की, उनकी दिक्कतों को समझा।

उलरिके बताती हैं कि यहां कुछ भी प्रोजेक्ट शुरू करने के पहले लोगों का भरोसा जीतना सबसे चैलेंजिंग टास्क था। लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते थे, लड़कियों की स्थिति और भी चिंताजनक थी। कम उम्र में ही उनकी शादी हो जाती थी। इसके साथ ही सबसे बड़ी दिक्कत ये भी थी कि यहां जाति-पात का भेदभाव ज्यादा था। इसको मिटाने के लिए मैंने स्पोर्ट्स प्रोग्राम शुरू करने का फैसला लिया, क्योंकि स्पोर्ट्स एक ऐसा माध्यम है जिसकी मदद से बच्चों के बीच भेदभाव को खत्म किया जा सकता है।

स्केटिंग शुरू की तो बच्चों का पढ़ाई की तरफ रुझान बढ़ने लगा

अब गांव के छोटे-छोटे बच्चे स्केटिंग सीख रहे हैं। इसी वजह से वे पढ़ने के लिए स्कूल भी जाते हैं। फोटो- गौरव संजय प्रभु
अब गांव के छोटे-छोटे बच्चे स्केटिंग सीख रहे हैं। इसी वजह से वे पढ़ने के लिए स्कूल भी जाते हैं। फोटो- गौरव संजय प्रभु

उलरिके कहती हैं कि काफी प्लानिंग करने के बाद मेरे जेहन में स्केटिंग शुरू करने का आइडिया आया। क्योंकि यह एक ऐसा गेम है जो बच्चों को मेंटली और फिजिकली दोनों ही लेवल पर मजबूत बनाता है। इसके बाद साल 2015 में एक स्केटिंग पार्क की नींव रखी। बच्चों के लिए यह काफी दिलचस्प और अनोखा मॉडल था। वे स्केटिंग करने के लिए आने लगे। फिर हमने यह शर्त रख दी कि स्केटिंग वही करेगा जो स्कूल जाता होगा। इसके बाद बच्चे स्कूल जाने लगे। छह महीने के अंदर जनवार के सभी सरकारी स्कूल आदिवासी बच्चों से भरने लगे। स्कूलों को नए शिक्षक रखने पड़े।

बच्चे नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर स्केटिंग कर रहे हैं
जनवार स्केटपार्क 4,843 स्क्वायर फीट एरिया में बनाया गया है। जहां लड़के और लड़कियां समान रूप से स्केटिंग करते हैं। कई बच्चों ने नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर भी स्केटिंग में पार्टिसिपेट की है। कुछ बच्चों ने खेल के मैदान में परचम भी लहराया है और अवॉर्ड भी जीते हैं।

2018 में स्केटबोर्डिंग वर्ल्ड चैंपियनशिप नानजिंग-चीन में आयोजित हुई थी, जिसमें दो बच्चे आशा और अरुण ने भारत को रिप्रेजेंट किया। इसके बाद 2019 में नेशनल रोलर स्केटिंग चैंपियनशिप विशाखापट्नम और 2020 में चंडीगढ़ में आयोजित नेशनल स्केटिंग चैंपियनशिप में भी कई बच्चों ने हिस्सा लिया और अवॉर्ड्स जीते। अब तक 30 से ज्यादा अवॉर्ड्स यहां के बच्चे जीत चुके हैं।

जनवार के बच्चे अब नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर स्केटिंग में पार्टिसिपेट करते हैं। कई बच्चों ने अवॉर्ड भी जीते हैं। फोटो- बेयरफुट स्केट बोर्ड ऑर्गेनाइजेशन
जनवार के बच्चे अब नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर स्केटिंग में पार्टिसिपेट करते हैं। कई बच्चों ने अवॉर्ड भी जीते हैं। फोटो- बेयरफुट स्केट बोर्ड ऑर्गेनाइजेशन

इन 6 सालों में स्केटिंग के अलावा बच्चों के शिक्षा का स्तर भी काफी बढ़ा है। स्केटिंग का मकसद ही बच्चों के हुनर को निखारना और उन्हें बेहतर जिंदगी के लिए प्रेरित करना था। बच्चों के साथ बड़ों को भी आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जा रही है। आज गांव में कंप्यूटर लैब की सुविधा है। इंटरनेट की मदद से बच्चे ऑनलाइन क्लास में पढ़ाई हैं। इंग्लिश और म्यूजिक की क्लास करते हैं। ओपन स्कूल की मदद से इस साल तकरीबन 20 बच्चों ने दसवीं का एग्जाम पास किया है और अब आगे की पढ़ाई की तैयारी भी कर रहे हैं।

अब गांव के बच्चे विदेशों में लहरा रहे हैं परचम
जनवार की रहने वाली 20 वर्षीय आशा गोंड, जो स्केटिंग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिस्सा ले चुकी हैं, कहती हैं, "स्केटिंग ने मेरी जिंदगी काफी बदली है। अगर उलरिके हमारे गांव नहीं आई होतीं तो बचपन में ही मेरी शादी हो जाती, लेकिन आज उनकी मदद से मैंने स्केटिंग को इंटरनेशनल लेवल पर रिप्रेजेंट किया और मैं विदेश पढ़ने भी गई। मैं अपने गांव की पहली लड़की हूं जो विदेश गई, वापस आने के बाद मैं गांव के ही बच्चों को पढ़ाती हूं।"

गांव में ही बच्चों के लिए कंप्यूटर सिखाने की सुविधा शुरू की गई है। बच्चे ऑनलाइन क्लास भी करते हैं। फोटो- बेयरफुट स्केट बोर्ड ऑर्गेनाइजेशन
गांव में ही बच्चों के लिए कंप्यूटर सिखाने की सुविधा शुरू की गई है। बच्चे ऑनलाइन क्लास भी करते हैं। फोटो- बेयरफुट स्केट बोर्ड ऑर्गेनाइजेशन

16 साल के अनिल कुमार ने पहले स्केटिंग सीखी, कई कॉम्पिटिशन्स में हिस्सा लिया और आज छोटे बच्चों को स्केटिंग और कंप्यूटर सिखाते हैं। अनिल का कहना है, "कुछ साल पहले हमारे छोटे से गांव को कोई नहीं जानता था, लेकिन आज हमारा गांव स्केटिंग की वजह से काफी मशहूर हो गया और मुझे खुशी है कि मैं अपने गांव की तरक्की में भूमिका निभा रहा हूं।"

स्केटिंग से गांव के लोगों को मिल रहा रोजगार
अपनी इस मुहिम के जरिए उलरिके गांव के लोगों को खास कर महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही हैं। वे कहती हैं, "जब इस गांव में स्केटिंग शुरू हुई, हमने पार्क बनाया तब इसे देखने के लिए बड़े शहरों से, यहां तक कि विदेशों से भी लोग आने लगे। इन लोगों के ठहरने के लिए यहां जगह नहीं थी। उन्हें 5-6 किलोमीटर ट्रेवल करने के बाद पन्ना जाना पड़ता था। इस परेशानी को दूर करने के लिए गांव वालों की मदद से हमने यहां कुछ होम स्टे डेवलप किए। जहां बाहर से आने वाले लोगों के लिए ठहरने और खाने-पीने का इंतजाम किया गया। इससे गांव के लोगों को अच्छी खासी आमदनी होने लगी।"

इसके बाद उन्होंने लोन प्रोवाइड करने की मुहिम शुरू की। वे गांव के लोगों और महिलाओं को आर्थिक मदद करती हैं, उन्हें जरूरत के मुताबिक लोन देती हैं। जिसकी मदद से गांव की महिलाएं और पुरुष लोन लेकर छोटे लेवल पर ऑर्गेनिक खेती या कोई काम शुरू करते हैं। जब उनकी फसल तैयार हो जाती है या वे अपने प्रोडक्ट बेच लेते हैं तब वे उनका पैसा लौटा देते हैं। इससे यहां के लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव आया है।

गांव की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऑर्गेनिक फार्मिंग पर जोर दिया जा रहा है। ज्यादातर महिलाएं इससे जुड़कर खुद की आजीविका कमा रही हैं। फोटो- अरुण कुमार
गांव की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऑर्गेनिक फार्मिंग पर जोर दिया जा रहा है। ज्यादातर महिलाएं इससे जुड़कर खुद की आजीविका कमा रही हैं। फोटो- अरुण कुमार
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