बात बराबरी की:मर्दों की नजर से देखें तो औरत वो है, जिसे रसोई में खटकर पसीना तो आए, लेकिन कमल की खुशबुओं वाला

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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दूसरे विश्व युद्ध के आखिर-आखिर की बात है, जब सैनिक जहाजों में भरकर अपने घरों को लौट रहे थे। इधर सब्जी-मांस की गंध में लिपटी औरतें घर चमकाने में लगी थीं। कोशिश थी कि लौटकर आए उनके शौहर जंग की थकान भूल जाएं। तभी एक विज्ञापन आया, जिसकी पहली लाइन थी- ‘खूबसूरत लेकिन बेवकूफ!’ जाहिर है, बात बीवियों की हो रही थी।

परफ्यूम बनाने वाली कंपनी ओडोर-ओ-नो (Odor-o-no) के ऐड का मोटा अंग्रेजी अनुवाद है- औरतों को हसीन दिखने का पहला कायदा ही नहीं मालूम। वो चेहरा और बाल तो संवार लेती हैं, लेकिन पसीने से महमहाती रहती हैं। ऐसे में करीब आता मर्द भी उससे बिदक जाता है। पसीने की ये गंध जितनी बढ़ेगी, औरत की जिंदगी से रोमांस उतना दूर भागेगा!

साल 1946 तक इत्र-फुलेल से लेकर स्त्री के अंदरुनी हिस्सों को मोती जैसा बेदाग रखने के विज्ञापनों की भरमार हो गई। अब बात परफ्यूम के इस ऐड की करें, तो सालभर में ही कंपनी का मुनाफा कई गुना बढ़ गया। इसके बाद पसीना तो हर औरत को आता, लेकिन उसमें कमल की खुशबू घुली होती। रसोई में घंटों खटने के बाद भी बीवी से खुशबुओं का वो समंदर उछाल मारता, कि शौहर झट से सब भूल जाता।

अब करीब 75 साल बाद परफ्यूम का नया ऐड आया। लड़कों के लिए! लेकिन रुकिए, इसमें लड़कियों को मोहने के नुस्खे नहीं हैं, बल्कि सीधे-सीधे गैंग-रेप का संकेत है। शॉट नाम से परफ्यूम के इस विज्ञापन की शुरुआत एक कपल से होती है। वे कमरे में हैं, तभी दरवाजा खुलता है और चार लड़के भीतर आते हैं। जोड़ा सहमकर छिटक जाता है। लड़कों में से एक कहता है- शॉट मारा लगता है! लड़की के साथ बैठा लड़का बोलता है- ‘हां’! अबकी बार उसके चेहरे पर मर्दानगी के भाव हैं।

हाथों को बिस्तर पर आराम से टिकाते हुए वो मानो बाकियों को भी ‘शॉट मारने’ का ग्रीन सिग्नल दे रहा हो। लड़की के चेहरे पर डर और हैरत साथ-साथ हैं, तभी चारों में से एक आगे बढ़ता है और डर में उसे लगभग डुबोते हुए मेज से परफ्यूम की बोतल उठा लेता है। लड़की के चेहरे पर रेप के बगल से गुजर जाने की राहत है।

देसी चलन के मुताबिक ऐड पर खूब झांय-झमक हुई और आनन-फानन कई जगहों से हटा लिया गया। हालांकि सोशल मीडिया पर अब भी ये मजे में देखा जा सकता है, जैसे मैंने देखा। उसे देखते हुए मुझे बचपन के कई चेहरे एक साथ याद आ रहे थे। कई बच्चे जानबूझकर रास्ते में केले का छिलका रख देते ताकि आता-जाता आदमी रपटकर गिर जाए। उसके गिरने में जो लुत्फ था, हंसी के जो कहकहे गूंजते, वो किसी कॉमेडी शो में भी नहीं होते होंगे। परफ्यूम का विज्ञापन भी कुछ ऐसा ही है। रेप, तिसपर गैंग-रेप के डर पर चुटकुला!

मर्दाने संसार में रेप पर चटखारे लेने की रवायत बहुत पुरानी है। अमेरिकी कॉमेडियन रेजिनाल्ड डी हंटर ने अपने शो के दौरान कहा था- रेप न होता, तो सभ्यता आगे नहीं बढ़ी होती! हंटर की बात खत्म होने से पहले पूरा सभागार ठहाकों से हिलने लगा। कॉमेडियन ने हंसी का ये नुस्खा इसके बाद कई सभाओं में दोहराया।रेप न होता, तो सभ्यता आगे न बढ़ सकी होती!

ऑस्ट्रेलियाई कॉमेडियन जिम जैफरीज अपनी रेप-कॉमेडी के लिए जाने जाते थे। एक शो में खूब शोखी से भरकर उन्होंने बताया-- मुझे एक लड़की पसंद थी। उसने मेरे साथ हमबिस्तर होने से मना कर दिया।...(लंबी चुप्पी के बाद) तो मैंने उसका रेप कर दिया। ये मजाक था, जिसपर ऑडियंस हंसते हुए एक-दूसरे पर लुढ़कने-फुढ़कने लगी।

वैसे रेप का इशारा देती देसी मिसालों की भी कमी नहीं। कुछ साल पहले डेनमार्क के एक फैशन ब्रांड में रणवीर सिंह आए थे। उनके कंधे पर एक लड़की टांग रखी है। नीचे कैप्शन है- डोंट होल्ड बैक, टेक योर वर्क होम! मोटी जबान में कहें तो मर्द का किसी चीज (पढ़ें- औरत) पर दिल आ जाए, तो उसे रुकना नहीं चाहिए, मनमर्जी कर लेनी चाहिए।

विज्ञापन ही क्यों, कला का पूरा संसार ही औरतों की नग्न या खून में लिथड़ आंसू बहाती औरतों से सजा हुआ है। पूरी दुनिया में अपने हुनर के लिए मशहूर पाब्लो पिकासो ने एक तस्वीर बनाई, जिसे नाम दिया- वीपिंग वुमन, यानी रोती हुई स्त्री। ये पेंटिंग फ्रेंच कलाकार डोरा मार की थी, जो उस दौर में पिकासो की प्रेमिका थीं।

डोरा के बारे में कहा जाता था कि वो पिकासो से भी बेहतर आर्टिस्ट होतीं, ‘अगर’ काम करतीं, लेकिन वो सिर्फ प्रेम कर सकीं। ऐसे वे रोती हुई प्रेमिका बनकर रह गईं और अकेलेपन में ही खत्म हो गईं। बाद के बहुत सालों तक पिकासो अपनी भूतपूर्व प्रेमिका की तस्वीर प्रदर्शनियों में सजाते रहे।

औरतों के पास कलाकार बनने की छूट नहीं। दिल बड़ा करके वे कलाकारों की प्रेरणा बनने लगीं। कमोबेश हर पेंटर या फोटोग्राफर या लेखक के पास एक ऐसी अदद प्रेमिका जुट जाती, जिसकी आंखें नील नदी से भी गहरी हों। जो सुबह की ओस जितनी ताजा हो, और जिसका रंग ऐसा, मानो मक्खन में चुटकीभर सिंदूर छिड़क दो। देह के उभार किसी भूल-भुलैया से भी ज्यादा मोहक हों।

आर्ट में इस पुरुषिया लंपटता की तरफ पहली बार नब्बे के शुरुआत में एक अमेरिकी फेमिनिस्ट संस्था ने बात की। गुरिल्ला गर्ल्स ने बताया कि मॉडर्न आर्ट सेक्शन में केवल 5% ही कलाकार महिलाएं हैं, लेकिन यहां शामिल करीब 85% कलाकृतियां नग्न औरतों की हैं। यानी सभी पुरुष कलाकार नग्न और भरी हुई देह वाली औरतों से अपना कैनवास रंग रहे हैं।

खुलासे पर थोड़ा-बहुत हल्ला मचा और वैसे ही गायब हो गया, जैसे मछली बाजार में बांसुरी की आवाज। यहां तक कि गुरिल्ला गर्ल्स के आर्ट गैलरीज में आने-जाने तक रोक लग गई ताकि वे वहां कोई बखेड़ा न कर दें।

खैर! विज्ञापन से शुरू कहानी उसपर ही खत्म करते हैं। कुल सालों पहले शैंपू के एक ब्रांड हेड एंड शोल्डर्स का विज्ञापन आया था, जिसमें गुलाबी रंग और मीठी खुशबू वाला शैंपू लगाने पर मर्द के बाल लंबे होने लगते हैं। फिर एक कड़क चेतावनी आती है- ‘रुक जाओ, इससे पहले कि तुम्हारी मर्दानगी चली जाए’!

डियर मर्दों! हम भी यही दोहराएंगे- रुक जाओ, इससे पहले कि तुम्हारी मर्दानगी खत्म हो जाए!