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बात बराबरी की:मां बनना या न बनना महिलाओं की अपनी च्वॉइस है, फिर उनकी च्वॉइस का भुगतान कंपनियां या सरकार क्यों करें!

नई दिल्ली9 महीने पहले
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मां कामकाज के सिलसिले में दूर शहर में थी। मेरे छुटपन का बड़ा हिस्सा नानीगांव में बीता। नानी के पास किस्से-कहानियों का जखीरा था। बहादुर राजा की, ओस-सी पारदर्शी रानी की, बड़बोले राजकुमार की, आग उगलते नरक-कुंड की, सच-झूठ की, दैत्य-देवों की। लेकिन मेरे लिए तो नानी खुद एक जिंदा कहानी थी। रोज मैं उनसे उनकी कहानी सुनाने की फरमाइश करती।

ऐसी ही एक कहानी में नानी सिगड़ी के पास बैठी 12 जनों के लिए दाल की हांड़ी चढ़ाए थी, जब उन्हें लेबर पेन हुआ। वही उनकी वो औलाद हुई, जिसे मैं मां कहती हूं। जच्चा-बच्चा के अगले कुछ दिन गाय की कोठी से सटे एक छोटे कमरे में बीते, जहां सांसें चलती रहना ही कमरे के हवादार होने का सबूत था। रातभर लालटेन की धुंधाती टिमिर-टिमिर में नानी बच्चे को संभाला करती। 'आराम' की मियाद पूरी होते ही दुधमुंहे बच्चे को एक कांख में दबाए नानी दोबारा दुनियादारी की खटराग में जुत गई। ये कहानी 70 साल पुरानी है।

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चंडीगढ़ के व्यस्त चौराहे पर एक महिला ट्रैफिक कॉन्स्टेबल दुधमुंहे शिशु को एक हाथ में संभाले मुस्तैदी से ड्यूटी कर रही है। किसी राहगीर ने इसकी वीडियो बना डाली जो वायरल हो गई। जज्बे को सलाम- जैसी टिप्पणियां तोप के गोले की तरह दनादन बरसने लगीं। लोग एक के बाद एक ऐसी औरतों के नाम गिनाने लगे, जो मातृत्व के तुरंत बाद उठकर फर्ज निभाने दफ्तर पहुंच गईं।

कोई IAS है, जिसने कोरोना से मचे हाहाकार के बीच मैटरनिटी अवकाश को ठोकर मार दी और 22वें दिन ही दफ्तरी मोर्चा संभाल लिया। एक हाथ में शिशु और दूसरे हाथ में टेलीफोन का रिसीवर थामे उनकी तस्वीर कोरोना से भी तेजी से फैली। चहुंओर वाहवाहियां होने लगीं कि देखिए, फलां माएं फर्ज के आगे आराम तज देती हैं। बस आसमान से फूलों की बारिश होना बाकी रहा।

ऐसी खबरें इक्का-दुक्का नहीं, बल्कि धड़ल्ले से आ रही हैं। हर तस्वीर की कहानी यही कि सद्यप्रसूता जच्चा-घर छोड़ बच्चे समेत बाहर के काम भी संभाल रही है। जल्द ही वो दिन भी आ जाएगा, जब कंपनियों के मालिक इशारों में नई मांओं को मैटरनिटी लीव छोड़ने को कहेंगे। हवाले के लिए इन्हीं वायरल मांओं की तस्वीरें दफ्तर की दीवारों पर सजी होंगी कि आते-जाते सारी महिला कर्मचारी प्रेरणा ले सकें। नीचे कोई मारक कैप्शन भी होगा कि जब ये कर सकती हैं तो आप क्यों नहीं! वैसे भी मां बनना या न बनना महिलाओं की अपनी च्वॉइस है। फिर उनकी च्वॉइस का भुगतान कंपनियां या फिर सरकार क्यों करें!

इसके बाद भी मोटी खाल वाली महिलाएं अगर हक लेने पर अड़ गईं तो दूसरा, और ज्यादा सीधा रास्ता भी है। सारी दुनिया के मालिक एक हो जाएंगे। वे अखबारों, पत्रिकाओं और टेलीविजन के जरिए बताएंगे कि मातृत्व अवकाश कितना ऊलजुलूल कॉन्सेप्ट है। लेना ही है तो प्राग या पेरिस में एग्जॉटिक हॉलीडे के लिए छुट्टियां मांगो। लेकिन मां बनने पर छुट्टियों की भला क्या जरूरत! 10-12 दिन आराम करो और बच्चे को किसी दादी-नानी के हवाले कर दफ्तर लौट आओ। दादी-नानी न हो तो भी कोई बात नहीं। बड़े शहरों में झूलाघर भी तो एक से एक हैं। कहीं भी बच्चे को छोड़ आओ और दफ्तर से लौटते हुए 'पिक' कर लो। या फिर वो भी नहीं कर सकती तो नौकरी छोड़ घर बैठ जाओ।

निजी कंपनियां अपने तरीके से ये बात समझाने भी लगी हैं। 6 महीने की छुट्टी मनाकर दफ्तर लौटी मां पाती है कि उसकी डेस्क और काम का तरीका बदल चुका है। उसे ज्यादा आसान काम दे दिया जाता है, जो बॉस के मुताबिक उसकी रहमदिली होती है। सालभर बाद कमोबेश सबका अप्रेजल होता है, सिवाय उसके या उस जैसी नई मांओं के। हर तरीके से कोंचकर उसे अहसास दिलाया जाता है कि अब उसके होने या न होने से खास फर्क नहीं पड़ता। नतीजा ये होता है कि लगभग जीनियस और दबंग महिला कर्मचारी डरी-सहमी-सी क्लर्क या डाटा ऑपरेटर बनकर रह जाती है।

साल 1919 में इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) ने पहली बार कामकाजी महिलाओं को मांओं की तरह भी देखा। इससे पहले औरतें या तो पेड वर्क में ही नहीं आती थीं, या फिर आई भी तो मां बनते ही नौकरी छोड़नी पड़ जाती थी। कंपनियों को इस बात का 'आविष्कार' करने में काफी वक्त लगा कि ये जो महिलाएं उनके दफ्तरों-कारखानों में काम कर रही हैं, उनके ही गर्भ से सोसायटी आगे बढ़ रही है। खैर! ILO की पहल पर मैटरनिटी प्रोटेक्शन कन्वेंशन बना। इसमें लगातार सुधार होते गए। देश में मैटरनिटी लीव बेनिफिट एक्ट 1961 के तहत 10 या 10 से अधिक कर्मचारियों वाली कंपनियों में ये सुविधा मिली। भारत में पहले ये अवकाश 12 हफ्तों का था, जो अब 26 सप्ताह हो चुका है।

मुफ्त में मिल रही इन छुट्टियों का खामियाजा भी महिलाएं भुगत रही हैं। दिल्ली की संस्था टीमलीज (TeamLease) का साल 2018 का सर्वे बताता है कि मुफ्त में 6 महीने की तनख्वाह देना कंपनियों को इतना अखर रहा है कि वे महिला कर्मचारियों की नियुक्ति पर ही बिदक रही हैं। सर्वे के मुताबिक देश में नौकरी के योग्य लगभग 12 मिलियन महिलाओं को मैटरनिटी लीव पॉलिसी के कारण नौकरियां नहीं मिल सकीं।

ये ट्रेंड मैटरनिटी लीव में संशोधन के साथ ही दिखने लगा था। जैसे ही साल 2017 में 3 महीने का अवकाश बढ़ाकर 6 महीने हुआ, कंपनियों में महिला कर्मचारियों की नियुक्ति का प्रतिशत एकदम से घट गया। यही हाल रहा तो जल्द ही हम दोबारा साल 1919 से पहले के काल में होंगे, जहां दफ्तरों में या तो महिला कर्मचारी नहीं होंगी या रखी भी जाएंगी तो कुनमुनाते शिशु और अपने शरीर के ताजा घावों को भूलकर काम करने की शर्त पर। मैटरनिटी लीव छोड़ काम पर लौटी मांओं का महिमामंडन यही इशारा कर रहा है।

शिशुजन्म के चंद रोज बाद ही अपने समेत बच्चे और दफ्तरी काम संभालने वाली मांओं का गुणगान जैसे काफी न हो, बची-खुची कसर ग्लैमर वर्ल्ड पूरी कर रहा है। अभिनेत्रियां डिलीवरी के महीनेभर के भीतर तबले जैसा कसा हुआ पेट लेकर इंटरव्यू देती हैं कि मां बनना कोई उतना भी मुश्किल काम नहीं। चाहे तो कोई भी उनकी तरह फिट होकर काम पर लौट सकता है। चमकीली मुस्कान से धजी इन अभिनेत्रियों के इंटरव्यू और भी चमकीले पन्नों पर छपते हैं। ये अभिनेत्रियां अनजाने ही तमाम औरतों के खिलाफ महीन साजिश का हिस्सा बन रही हैं। उनकी देखादेखी बाकी मांएं ग्लानि में डूब जाती हैं कि शायद वे ही कमजोर हैं जो मैटरनिटी टेस्ट पास नहीं कर सकी।

जाते हुए लौटते हैं उस कॉन्स्टेबल पर जो गोद में बच्चा संभाले चौराहों की धूल फांक रही थी। एक तरफ तो उनकी तस्वीर बहानेबाज मांओं के सामने प्रेरणा की तरह सजाई जा रही है, तो दूसरी ओर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की बात चल पड़ी है। दरअसल विभागीय जांच में सामने आया है कि वो मां उस दिन बच्चे की जरूरतों के चलते ड्यूटी पर देर से पहुंची थी। वीडियो वायरल होने पर महिला कॉन्स्टेबल की इस लापरवाही की भनक आला अधिकारियों तक पहुंच गई और अब एक्शन लिया जा सकता है।

तो चलो औरतों- चूल्हा-फुकनी संभालो। दाल-भात रांध पति-परिवार की सेवा करो। और इससे फारिग हो जाओ तो अपनी रचनात्मक का अचार बना मर्तबान में सुखा डालो। बीच-बीच में मातृत्व का दौर भी आता रहेगा, तब घर पर बैठ छुट्टियां मनाओ क्योंकि 'पेड वर्क' तो अब हाथ लगने से रहा।

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