संडे जज्बातघर में बेटी बीमार थी, मैं ट्रैफिक संभाल रहा था:वक्त पर दिल पहुंचाना सबसे जरूरी काम, भले अपने घर में किसी को अटैक क्यों न आ जाए

4 महीने पहलेलेखक: सचिन राजा राम घागरे

मेरा नाम सचिन राजा राम घागरे है। मुंबई ट्रैफिक पुलिस में कॉन्स्टेबल हूं। लोगों को मुंबई की बारिश बहुत रोमांचित करती है, लेकिन इन दिनों सबसे ज्यादा तकलीफ ट्रैफिक पुलिस को झेलनी पड़ती है। लोगों को लगता है कि ट्रैफिक पुलिस का काम सिर्फ चालान काटना है, लेकिन ऐसा नहीं है। हम वो लोग हैं, जो हर दिन कई कई जानें बचाते हैं। वो भी अपने शरीर पर कष्ट लेकर।

कई बार ऐसे हादसे होते हैं कि कई-कई दिन खाना नहीं खा पाता हूं। घर नहीं जा पाता हूं।

मुझे आज भी याद है। साल था 2019, एक दिन जोरदार बारिश हो रही थी। मुंबई में ऑरेंज अलर्ट था। लग रहा था कि आसमान बाल्टियां गिरा रहा है। दादर के पास किंग सर्कल पानी से भर गया था। लग्जरी गाड़ियां पानी में खड़ी थीं। उनके मालिक अपनी कारें छोड़कर घर चले गए थे। यही रास्ता साएन, टाटा मैमोरियल कैंसर अस्पताल को भी जाता है। लिहाजा कई एंबुलेंस भी फंसी हुई थीं।

मैं घुटनों से ऊपर तक के पानी में ट्रैफिक मैनेज कर रहा था। एक बीएमडब्ल्यू में 65 साल की बुजुर्ग औरत बैठी थी। उसकी गाड़ी में पानी भर गया था। लंबी कार की कतारों में यह पता ही नहीं चल रहा था कि कार में कोई है या नहीं। वह महिला कार के अंदर से चिल्ला रही थी। आवाज दे रही थी, लेकिन किसी को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।

मुझे अचानक दिखाई दिया कि एक कार के अंदर से कोई हाथ हिला रहा है। करीब गया तो एक औरत हाथ जोड़कर मदद की गुहार लगा रही थी। मैंने कार का शिशा तोड़ना चाहा, लेकिन नहीं टूटा। उस महिला को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। वह लगातार खांस रही थी। आनन-फानन में मैंने पत्थर उठाकर कार का कांच तोड़ दिया।

वह औरत मेरी मां की उम्र की थी, लेकिन जैसे ही कार से बाहर निकली, मेरे पांव पर गिर गई। कहने लगी कि तुमने मुझे बचा लिया। इस वक्त तक मैं भी अपनी नौकरी को कुछ खास अहमियत नहीं देता था, लेकिन उस दिन समझ में आया कि सड़क पर खड़े ट्रैफिक पुलिस वाले की अहमियत क्या होती है।

जो लोग सही से गाड़ी नहीं चलाते हैं या काम को बाधित करते हैं, वह हमें गाली देकर चले जाते हैं।
जो लोग सही से गाड़ी नहीं चलाते हैं या काम को बाधित करते हैं, वह हमें गाली देकर चले जाते हैं।

कल की ही बात है। एक आदमी टिंटिड ग्लास वाली कार में तेज रफ्तार से जा रहा था। उसकी कार ने एक महिला को धक्का मारा और वह गिर गई। मैं सामने खड़ा था। उल्टे वह लड़का मुझसे बहस करने लगा। गाली देने लगा। मुझे चोर तक कह डाला।

मन तो कर रहा था कि उसके खिलाफ नॉन बेलेबल धारा लगाकर सबक सिखाऊं, लेकिन फिर लगा कि उसकी जिंदगी खराब हो जाएगी। जब गुनाह करने पर हम गुनाहगार को पकड़ते हैं और बोलते हैं न कि चालान भरो तो बोलते हैं कि वो हमारी वर्दी उतरवा लेंगे। उस वक्त बहुत खराब लगता है।

एक और वाकया आपसे शेयर करना चाहता हूं। मुंबई में पानी भर गया था। एक एंबूलेंस में ठाणे से आई हुई एक प्रेग्नेंट औरत चिल्ला रही थी। उसे जेजे अस्पताल रेफर किया गया था।मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं। जैसे-तैसे मैंने उसे किंग सर्कल से तो निकाल दिया, लेकिन पता लगा कि किसी भी हालत में वह जेजे अस्पताल नहीं पहुंच सकती है। दूसरी तरफ डर ये कि अगर नहीं पहुंची तो उसकी मौत हो जाएगी।

मैं खुद एंबुलेंस बैठा। वहां से किसी तरह एंबुलेंस को लेकर साएन अस्पताल लेकर गया। वहां के डॉक्टर से बोला कि जेजे अस्पताल के किसी डॉक्टर से संपर्क करो और इस महिला का फौरन इलाज शुरू करो। डॉक्टर ने जेजे अस्पताल के डॉक्टरों से टेलीफोन पर मदद लेकर उस महिला का साएन अस्पताल में इलाज शुरू किया।

जब गुनाह करने पर हम गुनाहगार को पकड़ते हैं और बोलते हैं न कि चालान भरो तो बोलते हैं कि वो हमारी वर्दी उतरवा लेंगे।
जब गुनाह करने पर हम गुनाहगार को पकड़ते हैं और बोलते हैं न कि चालान भरो तो बोलते हैं कि वो हमारी वर्दी उतरवा लेंगे।

मुझे याद है कि एक दफा मेरी चार साल की बेटी को निमोनिया हो गया। मेरी पत्नी ऐसी नहीं है कि अकेले उसे अस्पताल ले जा सके। अचानक से पता लगा कि लोकल ट्रेन का ओवर हेड वायर टूट गया है और ठाणे जाने वाली ट्रेनें बंद हो गई हैं। मेरी छुट्टी का टाइम लगभग हो ही गया था, लेकिन हमें बोल दिया गया कि कोई भी घर नहीं जाएगा। लोगों ने ठाणे की तरफ पैदल चलना शुरू कर दिया।

मेरी ड्यूटी लगी कि मैं महिलाओं को ठाणे, कल्याण की तरफ जाने वाले टेंपो, ट्रक और ऑटो में बिठाऊं। उधर मेरी पत्नी रो रही थी, इधर मैं लोगों की मदद में लगा था। मेरी बेटी की हालत बिगड़ती जा रही थी, लेकिन मैं घर नहीं जा पाया। मेरे एक पड़ोसी बेटी को अस्पताल लेकर गए। अगले दिन मैं सीधा अस्पताल गया तो बेटी बोली कि पापा आप कहां थे, अब उसे मैं क्या बोलता कि मैं कहां था।

ऐस ही मेरे पापा को डाएबिटीज थी। उनके पांव में गैंगरीन हो गया था। पांव की उंगली काटनी थी। मेरे पापा मुझपर चिल्लाते रहे कि आकर मेरा ऑपरेशन करवा दो, लेकिन मैं घर नहीं जा पाया। पापा कई महीने तक मुझसे नाराज रहे।

ट्रेन बंद हो जाती है, लेकिन हमें जैसे-तैसे ड्यूटी पर पहुंचना होता है। मतलब सबसे खराब हालात तो हमारी बारिश में ही होती है। अगर ड्यूटी सात बजे से है, तो छह बजे पहुंचना होता है। गश्त करना होता है कि कहीं ट्रैफिक में कोई अड़चन तो नहीं, कोई एक्सीडेंट तो नहीं।

कई बार बारिश की वजह से हम फंस जाते हैं। दो-तीन दिनों तक घर नहीं जा पाते हैं। घंटों बारिश में भीग कर ड्यूटी करनी होती है।
कई बार बारिश की वजह से हम फंस जाते हैं। दो-तीन दिनों तक घर नहीं जा पाते हैं। घंटों बारिश में भीग कर ड्यूटी करनी होती है।

बारिश में घर नहीं जा पाते हैं। गंदे पानी में तीन-तीन दिन घूमते रहते हैं। शरीर पर फफोले और जख्म लिए। छुट्टी नहीं मिलती है। सबसे खराब हालत में होते हैं। इंफेक्शन हो जाता है, लेकिन काम करते हैं और लोग आसानी से बोलकर चले जाते हैं कि अरे करते क्या हैं, चालान ही तो काटते हैं।

सबसे बड़ा जो सेवा का काम करते हैं, वो यह है कि मुंबई में सबसे ज्यादा हार्ट ट्रांसप्लांट होता है। कई दफा घर जाने का टाइम होता है, वर्दी बदल ही रहे होते हैं कि ग्रीन कॉरिडोर के लिए कॉल आ जाता है।

अगर उसका समय रात के 9 बजे का होता है तो वो रात के 12 बजे आता है, लेकिन दिल को समय पर पहुंचाना हमारा काम होता है। चाहे हमारे अपने घर में किसी को हार्ट अटैक आ जाए। महीने में कम से कम चार से पांच बार ऐसा होता है। जिन अस्पतालों में दिल बदली होता है, यह वही रूट है। और एक्सीडेंट केस में तो रगड़ा पेर्टी बनी डेड बॉडीज को सबसे पहले हाथ लगाना होता है।

कुछ दिन पहले की बात है। मियां बीवी दादर से कुरला जा रहे थे। पीछे से एक ट्रक ने हिट किया और बीवी बाइक से गिर गई। उसका कंधे तक का हिस्सा ट्रक के नीचे आ गया दिमाग का सारा मलबा बाहर आ गया। मैं मौके पर गया। उसके पति को संभाला, मरी हुई उस महिला को उठाया। मेरा दिमाग खराब हो गया। कई दिन तक खाना नहीं खाया।

सचिन राजा राम घागरे ने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की हैं...

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