उद्धव का रवैया शिवसेना पर भारी:दो गलतियों से नहीं ली सीख, तीसरी गलती ने पार्टी को टूट की कगार पर ला खड़ा किया

मुंबई3 महीने पहलेलेखक: आशीष राय

उद्धव ठाकरे की इमोशनल अपील के बावजूद महाराष्ट्र में शिवसेना अब टूट के कगार पर खड़ी है। बागी हो चुके एकनाथ शिंदे के साथ तकरीबन 40 विधायक हैं। कुछ और के जल्द उनके साथ आने की संभावना जताई जा रही है। वर्तमान में शिवसेना की जो स्थिति है उसके लिए बागी विधायकों ने उद्धव ठाकरे को जिम्मेदार बताया है।

बताया जाता है कि जब उद्धव ने शिवसेना की कमान संभाली, तो BJP नेता प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे तक को उनसे मिलने के लिए इंतजार करना पड़ता था। यह पहली बार नहीं है जब उद्धव की वजह से पार्टी में टूट की स्थिति पैदा हुई है। इससे पहले नारायण राणे और राज ठाकरे ने भी उद्धव से नाराज होकर पार्टी छोड़ी थी। जैसे राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उद्धव ने इन दो मौकों से सीख नहीं ली और अब तीसरी गलती की वजह से पार्टी का टूटना तय है।

मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार धवल कुलकर्णी द्वारा राज और उद्धव ठाकरे की लाइफ पर लिखी किताब 'ठाकरे भाऊ' में यह बताया गया है कि कैसे उद्धव के रवैये से नाराज होकर शिवसेना के दो बड़े दिग्गजों, राज ठाकरे और नारायण राणे ने पार्टी का दामन छोड़ दिया था।

हालांकि, बाला साहब की वजह से दोनों बार पार्टी टूटने से बच गई। लेकिन इस बार नाराजगी इतनी बड़ी है कि एक तिहाई से ज्यादा विधायक और सांसद उद्धव के खिलाफ खड़े हैं।

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जैसे-जैसे उद्धव की पकड़ मजबूत हुई, पार्टी कमजोर हुई

किताब के मुताबिक, बाला साहब की उम्र जैसे-जैसे बढ़ रही थी, शिवसेना पर उद्धव ठाकरे की पकड़ मजबूत होती जा रही थी। हालांकि, वे पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की पहुंच से बाहर होते जा रहे थे। BJP नेताओं का यह भी दावा था कि प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे जैसे नेताओं के लिए भी शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष तक पहुंच पाना मुश्किल हो जाता था।

राणे ने परेशान करने का लगाया था आरोप

किताब में नारायण राणे के हवाले से यह दावा किया गया है कि पार्टी के सम्मेलनों में बोलने के कारण उद्धव उनको परेशान करते थे। राणे ने एक बयान में कहा था कि राज ठाकरे के जन्मदिन पर शिवसैनिकों द्वारा उनके कट आउट लगाए जाने पर उन्हें हटाने का निर्देश दिया गया था।

राज ने उद्धव पर आरोप लगा छोड़ी थी पार्टी

वरिष्ठ पत्रकार सचिन परब ने एक इंटरव्यू में बताया कि शिवसेना से राज ठाकरे के दूर होने की वजह भी उद्धव ठाकरे ही थे। इसकी नींव 1997 के BMC चुनाव से पड़ी थी, जब राज ठाकरे की सक्रियता के बावजूद टिकट बांटने में उद्धव दखल देते थे।
वरिष्ठ पत्रकार सचिन परब ने एक इंटरव्यू में बताया कि शिवसेना से राज ठाकरे के दूर होने की वजह भी उद्धव ठाकरे ही थे। इसकी नींव 1997 के BMC चुनाव से पड़ी थी, जब राज ठाकरे की सक्रियता के बावजूद टिकट बांटने में उद्धव दखल देते थे।

27 नवंबर 2005 को राज ठाकरे ने शिवाजी पार्क स्थित अपने घर कृष्णकुंज के बाहर अपने समर्थकों को संबोधित किया। उन्होंने कहा, ‘मेरा झगड़ा विट्ठल (भगवान) से नहीं उनके आसपास के पुजारियों से है। कुछ लोग हैं जो राजनीति का एक अक्षर नहीं समझते हैं इसलिए मैं शिवसेना से इस्तीफा दे रहा हूं। बालासाहेब ठाकरे में मेरे देवता थे, हैं और बने रहेंगे।'

इस एक घटना से काफी आहत हुए थे राज

वरिष्ठ पत्रकार सचिन परब ने एक इंटरव्यू में बताया था कि साल 1997 में BMC चुनाव के दौरान राज ठाकरे के सक्रिय होने के बावजूद तमाम टिकट उद्धव ठाकरे की सहमति और मंजूरी से बांटे गए थे। इस बात से राज ठाकरे काफी आहत हुए थे। शिवसेना धीरे-धीरे कई खेमों में बंट रही थी। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना ने BMC का चुनाव करवाया। इसके बाद पार्टी संगठन में भी उद्धव ठाकरे की ताकत और पकड़ मजबूत होने लगी। अब तक शिवसैनिकों को भी यह बात समझ में आने लगी थी कि भविष्य में नेता उद्धव ठाकरे ही होंगे।

विधायकों के लिए उद्धव के दरवाजे बंद रहते थे

वर्तमान में भी बगावती गुट में शामिल औरंगाबाद पश्चिम से विधायक संजय शिरसाट ने पत्र लिखकर बगावत की वजह उद्धव की अनरीचेबिलिटी को बताया है। इसमें दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री ठाकरे की करीबी चाटुकार मंडली, विधायकों को उनसे मिलने तक नहीं देती थी।

विधायकों को सीधे 'वर्षा' में दाखिल होने की इजाजत नहीं थी और वे मुख्यमंत्री के करीबियों को फोन करते थक जाते और कुछ घंटों में निराश होकर लौट जाते थे।

शिरसाट ने आरोप लगाया कि आमतौर पर विधायक मुख्यमंत्रियों से मंत्रालय में उनके कार्यालय में भी मिलते हैं, लेकिन उद्धव ठाकरे मंत्रालय ही नहीं जाते थे, इसलिए विधायकों के लिए यह रास्ता भी बंद था।

शिरसाट ने लिखा कि बुधवार को CM के सरकारी बंगले ‘वर्षा’ के दरवाजे लोगों के लिए खुले और वहां बड़ी संख्या में शिवसैनिक पहुंचे यह देखकर खुशी हुई, लेकिन पिछले ढाई सालों से 'वर्षा' के दरवाजे हमारे लिए बंद थे।

गेट पर घंटों इंतजार करवाने का आरोप

शिरसाट ने लिखा है कि विधानसभा क्षेत्र के काम के लिए, दूसरे मुद्दों पर बात करने के लिए और निजी परेशानियों के चलते मुख्यमंत्री से मिलना हो तो कई बार फोन करने पर आपके चाटुकार बताते थे कि मुख्यमंत्री ने बंगले पर बुलाया है। फिर गेट पर खड़े होकर घंटों इंतजार करना पड़ता था।

आपके करीबी फोन उठाना बंद कर देते और खाली हाथ लौटना पड़ता। हमारा सवाल है कि तीन चार लाख लोगों के बीच से चुनकर आने वाले विधायकों को इस तरह अपमानित क्यों किया जाता था। सभी विधायकों के साथ ऐसा हो रहा था और शायद आप तक सूचना भी नहीं पहुंचती थी।

मछलियों की मौत पर दुखी थे तो कार्यकर्ताओं से नहीं मिले!

उद्धव जल्दी ऐसे लोगों के साथ नहीं मिलते-जुलते थे जो उनके आसपास के नहीं होते थे। 'ठाकरे भाऊ' किताब में दर्ज एक किस्से के मुताबिक, भंडारा के सड़क अर्जुनी के रहने वाले शिवसेना कार्यकर्ता गिरहेपुंजे एक मामले में उद्धव से मिलने मुंबई गए थे। हालांकि, उद्धव के मीटिंग में होने की बात कहते हुए गिरहेपुंजे को उद्धव से मिलने नहीं दिया गया।

बाद में गिरहेपुंजे को उद्धव की सुरक्षा में लगे एक पुलिसकर्मी ने बताया था कि उद्धव ने विदेश से 1.25 लाख की मछलियां मंगवाई थीं, जो मर गई थीं और इस कारण वे इतने दुखी थे कि किसी से मिलना नहीं चाहते थे। उस समय इस कहानी का उल्लेख करते हुए राणे ने यह बताने का प्रयास किया था कि उद्धव कार्यकर्ताओं से नहीं मिलते हैं।

हालांकि, बाद में उद्धव ने इस तरह की किसी घटना से इनकार किया और कहा कि यह उनको बदनाम करने की कोशिश हो रही है। इस घटना के राणे के साथ गिरहेपुंजे ने 2 जुलाई 2005 में शिवसेना छोड़ कांग्रेस जॉइन कर ली और आज दोनों BJP में हैं।

बाला साहब के समय भुजबल ने भी की थी बगावत

वर्तमान में NCP कोटे से मंत्री छगन भुजबल कभी बाला साहब के राइट हैंड कहे जाते थे। दबंग OBC नेता के रूप में प्रसिद्ध भुजबल और बाला साहब के बीच विवाद 1985 में शुरू हुआ था। उस साल हुए विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना सबसे बड़ा विरोधी दल बनकर उभरा था।

जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चुनने की बारी आई तो भुजबल को लगा कि जाहिर तौर पर बाल ठाकरे उन्हें ही ये जिम्मेदारी देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भुजबल को ये जानकर सदमा लगा कि नेता प्रतिपक्ष का पद ठाकरे ने मनोहर जोशी को दे दिया। इसके बाद भुजबल को प्रदेश की राजनीति से हटाकर शहर की राजनीति तक सीमित कर दिया गया और उन्हें मुंबई का मेयर बनाया गया।

इसके बाद भुजबल लगातार बाला साहब से नाराज रहने लगे और मार्च 1991 में उन्होंने सार्वजनिक तौर पर मनोहर जोशी के खिलाफ बयान दिया। ये भी साफ कर दिया कि अब वह मुंबई का दोबारा मेयर नहीं बनना चाहते हैं। उन्हें विपक्ष का नेता बनाया जाना चाहिए।

इसके बाद 5 दिसंबर 1991 को भुजबल ने बाल ठाकरे के खिलाफ विद्रोह कर दिया। 8 शिवसेना विधायकों ने विधानसभा स्पीकर को खत सौंपा कि वे शिवसेना-बी नाम का अलग से गुट बना रहे हैं और मूल शिवसेना से खुद को अलग कर रहे हैं। हालांकि, बाद में भुजबल कांग्रेस में शामिल हो गए और अब वे NCP में हैं।