ग्राउंड रिपोर्ट3 साल की बच्ची का रेप, पिता के खिलाफ वारंट:6 महीने में केस खत्म होना था, 27 महीने में गवाही तक नहीं हुई

लखीमपुर खीरी2 महीने पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

UP के लखीमपुर जिले से करीब 60 किलोमीटर दूर सिंघाई तहसील है। इससे 10 किलोमीटर दूर है मटहिया गांव। 3 सितंबर 2020 को यहां के एक घर से 3 साल की बच्ची गायब हो गई। अगले दिन 4 सितंबर को खेत से उसकी लाश मिली। उसके साथ रेप हुआ था और फिर गला दबाकर मर्डर कर दिया गया। पीड़ित परिवार ने गांव के ही लेखराम पर आरोप लगाया, जिसे पुलिस ने अगले ही दिन 5 सितंबर को गिरफ्तार भी कर लिया।

इस घटना को दो साल, दो महीने और 26 दिन गुजर गए, लेकिन अब भी कोर्ट में एक गवाही नहीं हुई। पीड़ित परिवार का आरोप है कि उनकी पैरवी के लिए जो सरकारी वकील मिला है, वो उन्हें कोर्ट की तारीखों की जानकारी नहीं देता। कोर्ट बुलाकर दिन भर बैठाए रहता है, लेकिन गवाही नहीं कराता। कोर्ट में उनसे हाजिरी वाले रजिस्टर में साइन ही नहीं कराए जाते। कोर्ट की 30 तारीखों पर न पहुंचने से पीड़ित बच्ची के पिता के खिलाफ ही वारंट जारी हो गया।

अब हम बिटिया किका कहब, हमाई बिटिया चली गई
गांव की सीमा से करीब 1 किलोमीटर अंदर पीड़ित परिवार का घर है। मैं यहां पहुंची तो सबसे पहले बच्ची की दादी से मुलाकात हुई। जैसे ही बच्ची का जिक्र किया, दादी का दर्द फूट पड़ा। वह रो-रोकर बार-बार बस इतना ही कह रही थीं- 'अब हम बिटिया किका कहब। हमाई बिटिया चली गई-(अब हम बिटिया किसे कहेंगे, हमारी तो बिटिया चली गई)।'

बात करते-करते दादी एक तरफ चली गईं, लौटीं तो हाथ में एक बॉल और पिचक चुका हाथी का खिलौना था। बोलीं- ये भी मेरी बच्ची का है।
बात करते-करते दादी एक तरफ चली गईं, लौटीं तो हाथ में एक बॉल और पिचक चुका हाथी का खिलौना था। बोलीं- ये भी मेरी बच्ची का है।

दादी मुझसे लिपटकर रोए जा रही थीं। मैं सिर्फ इतना ही कह पाई कि मुझसे जो भी मदद होगी करूंगी। सवाल यही था कि आखिर 816 दिन में गुनहगार के लिए सजा तय क्यों नहीं हो पाई? आरोपी पुलिस की गिरफ्त में है, फिर इस केस की रफ्तार इतनी धीमी क्यों हैं?

दुआओं के बाद पैदा हुई थी मेरी बच्ची, गुनहगार को फांसी मिले
दादी कुछ शांत हुई तो कुछ ही दूर बैठी बच्ची की मां भी जोर-जोर से रोने लगीं। मैंने संभाला तो उन्होंने बताया- 'दवा और दुआ के बाद मेरी बच्ची पैदा हुई थी। मेरे बच्चे नहीं हो रहे थे। मेरी जेठानी के भी बच्चे नहीं थे। बहुत दवा-पानी कराया, तब मेरी बच्ची हुई। गांव के लोग कहने लगे थे कि फलाने के घर में बहुओं को बच्चे नहीं होते। हमारा मुंह तक लोगों ने देखना बंद कर दिया।'

मां से बात करते-करते नजरें उस बच्चे पर जा टिकीं, जो आंगन में खिलौनों को अपने हाथों में समेटे खेल रहा था। मां ने बताया- 'बेटी की मौत के बाद यह बेटा पैदा हुआ। इसके हाथ में जो खिलौने हैं, वो सब मेरी बच्ची के हैं।' मां और दादी फिर रोने लगीं।

केस आगे ही नहीं बढ़ता, बुला लेते हैं, लेकिन गवाही नहीं कराते
घर के अंदर से पीड़ित बच्ची के पिता भी आ गए। पिता ने बताया- 'मैं और बच्ची के दादा 2-3 बार कचहरी गए। वहां पूरा दिन बैठाए रखा, किसी ने हमसे कुछ पूछा ही नहीं। पुलिस ने कहा था कि 6 महीने में केस खत्म हो जाएगा।’

मैंने पूछा, आपने वकील से बात नहीं की? वो लोग क्या कह रहे हैं? जवाब मिला- 'वो कुछ नहीं कहते। सरकारी वकील कोई जवाब नहीं दे रहे थे, तो हमने खुद एक वकील किया। वो भी इस केस में लगे हैं। उन्होंने बताया है कि सरकारी वकील केस आगे ही नहीं बढ़ा रहे।'

इसी बीच मां घर के भीतर से बच्ची की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ले आती है। दिखाते हुए कहने लगती हैं- इसमें सब लिखा है, कब से ये रिपोर्ट आ चुकी है। लेखराम के लिए अब तक सजा तय नहीं हुई।’ धीरे से कहती है कि हमें तो पढ़ना नहीं आता, लेकिन वकील साहब ने बताया है कि इसमें यही सब लिखा है।

बच्ची की मां से रिपोर्ट लेकर मैं पढ़ने लगती हूं। वे एकदम ठीक कह रही थीं, रिपोर्ट साफ कहती है, 'बच्ची के साथ रेप हुआ और गला दबाकर उसकी हत्या हुई।' मन में सवाल उठ रहा था कि इस मामले का आरोपी हादसे के अगले दिन से ही जेल में है। घर वाले पूरी तरह आश्वस्त हैं कि गुनाह उसी ने किया। गवाही भी देना चाहते हैं। नामजद रिपोर्ट दर्ज है। मामला कोर्ट में है, तो केस आगे क्यों नहीं बढ़ रहा।

कोर्ट में सुनवाई की रफ्तार इतनी धीमी क्यों?
मैं बच्ची के पिता से सुनवाई धीमी होने पर सवाल करती हूं, तो वे बताते हैं कि सरकारी वकील कुछ बताता ही नहीं। बच्ची के दादा कहते हैं कि अनिल सिंह हमारे प्राइवेट वकील हैं, जबकि सरकारी वकील ब्रजेश पांडे हैं। ब्रजेश, वही वकील हैं जो लखीमपुर में दो दलित बहनों के साथ गैंगरेप और मर्डर में भी पक्षकार वकील हैं।

अनिल सिंह उस वक्त जिले में मौजूद नहीं थे। लिहाजा मैंने उन्हें फोन किया तो उन्होंने बताया, '3 बार दादा और 2 बार पिता लखीमपुर कचहरी गए। एक बार भी उनकी गवाही नहीं हुई। दलित बहनों के साथ हुए रेप से यह मामला कोई कम जघन्य तो नहीं। वहां वह लड़कियां 16-17 साल की थीं और यहां बच्ची 3 साल की है।'

मैं सवाल करती हूं, आपने सरकारी वकील से बात की? अनिल सिंह बताते हैं- ’मैंने कई बार इस पर बात की, लेकिन मैं उस बच्ची का वकील नहीं, केस में सिर्फ सलाहकार हूं। वकील तो ब्रजेश पांडे हैं। दो दलित लड़कियों के केस में सरकार का दबाव उन पर है, लेकिन इस केस के बारे में उनसे पूछने वाला कोई नहीं।’

गवाही के लिए पेश न होने की बात पर अनिल सिंह ने कहा- सरकारी वकील झूठ बोल रहे। वह 3 बार कोर्ट गए, पर उनसे कोई हाजिर होने के प्रूफ के तौर पर रजिस्टर पर हस्ताक्षर ही नहीं करवाता।

सरकारी वकील का आरोप- परिवार वाले गवाही देने ही नहीं आते
अनिल सिंह से बात करने के बाद मैंने सरकारी वकील ब्रजेश पांडे से सवाल किया। खुद पर लगे आरोपों पर वे भड़क गए, उन्होंने कहा- ‘’सुस्त न्याय की प्रक्रिया नहीं, पीड़ित का परिवार है। कोर्ट की तरफ से उन्हें अब तक 30 बार बुलाया गया। इस मामले में 4 गवाह हैं। लड़की के दादा, लड़की के पिता, एक पड़ोसी संदेश कुमार, एक और गवाह छत्रपाल। ये लोग आते ही नहीं।

15 दिसंबर 2020 को पुलिस को दिया उनका बयान कोर्ट में दर्ज किया गया था। बस एक बार 17 मार्च 2021 को मृत लड़की का पिता आया था। एक बार 20 सितंबर 2021 को जरूर आरोपी का वकील हाजिर नहीं हो पाया था, तो उस पर 400 रुपए का जुर्माना भी लगा।’

हालांकि, ब्रजेश पांडे ने माना कि पुलिस के पास दर्ज बयान ही कोर्ट में दर्ज हुआ है, कोर्ट में किसी की भी गवाही नहीं हो पाई है। ब्रजेश के मुताबिक, बच्ची के पिता के खिलाफ 6 जनवरी 2022 को वारंट भी जारी हुआ, तब भी वह नहीं आए। अब उनके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी होने वाला है।

गांव में मामले पर एक नई थ्योरी, पीड़ित परिवार पर सवाल
पीड़ित परिवार और वकीलों से बात करने के बाद मैं आरोपी के घर पहुंची। शायद मेरे आने की खबर पहले से लग गई थी, तो वहां काफी लोग इकठ्ठा थे। सभी का कहना था कि आरोपी लेखराम ऐसा कर ही नहीं सकता। उसे फंसाया गया है। लोगों का आरोप था कि पीड़ित परिवार और आरोपी के बीच पहले से विवाद है। बच्ची के ताऊ राम नरेश के खिलाफ लेखराम ने साल 2014 में अपनी पहली पत्नी की हत्या का केस दर्ज कराया था।

गांववालों का कहना है कि राम नरेश के खिलाफ दर्ज मुकदमा वापस लेने का दबाव बनाने के लिए पीड़ित परिवार ने लेखराम का नाम लिखवा दिया। ये सभी लोग इस तरह पीड़ित परिवार पर आरोप तो लगा रहे थे, लेकिन कोई भी कैमरे पर आने के लिए तैयार नहीं था।

काफी कोशिश के बाद लेखराम का पड़ोसी राजाराम, जो खुद को आरोपी का रिश्ते में चाचा बता रहे थे, कैमरे पर आए। राजाराम के मुताबिक- 'लेखराम निर्दोष है, बदले की भावना से यह मुकदमा दर्ज कराया गया।' उन्होंने भी वही कहानी बताई, जो गांव में कही-सुनी जा रही है।

राजाराम के मुताबिक, परिवारों में दुश्मनी की तीन वजहें
राजाराम ने बच्ची के ताऊ के खिलाफ लेखराम की पत्नी की हत्या के केस के अलावा परिवारों के बीच विवाद की तीन और कहानियां भी बताई। राजाराम ने बताया- 'बच्ची के ताऊ के परिवार वालों ने 3 बार लेखराम को फंसाने की कोशिश की है। पहली बार कहा कि मेरी लड़की से छेड़छाड़ की। इसकी पुलिस में शिकायत भी की।

दूसरी बार कहा कि मेरे बेटे को जहर दे दिया। तीसरी बार कहा कि बहू के साथ रेप किया और उसे जहर दे दिया। तीनों बार हमने किसी तरह लेखराम को बचा लिया।'

राजाराम के इशारे समझकर मैं उनसे पूछती हूं, क्या दुश्मनी के लिए कोई अपने घर की इतनी छोटी बच्ची के साथ ऐसा कर सकता है? राजाराम कहते हैं- 'ये लोग बहुत निर्दयी हैं, इससे भी बड़ा कांड कर सकते हैं।'

आरोपी की बेटी ने कहा- बच्ची की ताऊ ने खुद ही फेंका, फिर ढूंढ लाया
आरोपी लेखराम की दो बेटियां और एक बेटा है। बड़ी बेटी पूजा करीब 12 साल की है। कैमरा ऑन होते ही वह बरस पड़ी। कहा- 'जब गांव में उनकी पोती के गायब होने को लेकर हंगामा हुआ तो मेरे पापा घर पर ही थे। मैंने पापा को बताया कि उनकी पोती खो गई है, उसे ढूंढ़ो जाकर। उन्होंने कहा- हम क्या जाने कहां गई है। हमे तो डर लगता है कि कहीं हमें न फंसा दें। फिर वो वहां से चले गए।'

इसके बाद पूजा गुस्से में चिल्लाने लगती है- 'उनकी पोती 1 सितंबर को खोई। पूरा गांव गन्ने के खेत में बच्ची को खोज रहा था, किसी को नहीं मिली। लेकिन उसके ताऊ को वह बच्ची दूसरे ही दिन मिल गई। किसी और को नहीं, सिर्फ उसी को क्यों मिली? ताऊ खुद ही उसे खेत में डालकर आया और फिर खुद ही उसे खोज लाया।'

इतना कहकर पूजा रोने लगती है, मैं इस आरोप पर और कुछ पूछना नहीं चाहती। बस मन में सवाल उठता है कि क्या ये दुश्मनी इतनी बड़ी थी कि कोई अपने ही घर की 3 साल की बच्ची का रेप कर उसका मर्डर कर दे। मैं इन कहानियों का सच जाने पुलिस थाने का रुख करती हूं।

लेखराम ने 2014 में बच्ची के ताऊ के खिलाफ FIR कराई थी
मैं सिंघाई थाने पहुंची, तो पता चला कि 2014 की वह FIR दर्ज है, जिसका जिक्र किया जा रहा है। लेखराम ने मृत बच्ची के ताऊ के खिलाफ ये मुकदमा लिखवाया था। आरोप था कि बच्ची के ताऊ ने लेखराम की पत्नी का मर्डर किया। एक दूसरी रिपोर्ट मृत बच्ची के परिवार ने लेखराम के खिलाफ 2 सितंबर 2022 को लिखवाई। इसके मुताबिक, लेखराम ने उनकी बच्ची का रेप किया और फिर उसकी हत्या कर दी।

हालांकि, राजाराम की कहानियों में जिन पुलिस शिकायतों का जिक्र था, उनका कोई सबूत थाने में नहीं है। पीड़ित परिवार ने इससे पहले कभी कोई रिपोर्ट लेखराम के खिलाफ नहीं दर्ज कराई। राजाराम ने जो तीन कहानियां सुनाईं थी उनके मुताबिक पीड़ित परिवार लगातार कुछ न कुछ आरोप लेखराम पर लगाता ही रहा है। हालांकि, थाने में मृत बच्ची के मामले के अलावा एक भी रिपोर्ट लेखराम के खिलाफ दर्ज नहीं है।

पीड़ित और आरोपी दोनों के परिवार इस केस की सुनवाई न होने से परेशान हैं, इसी पर एक सवाल...

मैं लौटने लगती हूं तो याद आता है कि इसी साल 14 सितंबर को दो दलित बहनों के साथ गैंगरेप और मर्डर के बाद लखीमपुर से लेकर लखनऊ तक हंगामा मचा था। डिप्टी CM ब्रजेश पाठक ने दावा किया था कि आरोपियों को ऐसी सजा दी जाएगी, जिससे उनकी आने वाली पीढ़ियों की भी रूह कांप जाएगी।

वो मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में है और 68 दिन के भीतर 45 से ज्यादा तारीख पड़ चुकी हैं। ये इसलिए भी याद आता है कि दोनों केसों में सरकारी वकील एक ही है। दोनों केसों में एक समानता ये भी है कि जिन परिवारों की बच्चियों के साथ रेप हुआ, जिन्हें मार दिया गया, उन्हीं परिवारों को न्याय की लंबी लड़ाई में या तो वकीलों के अजीब सवालों के जवाब देने पड़ रहे हैं या फिर वारंट का सामना करना पड़ रहा है।

रेप पीड़ित लड़कियों के केस कई-कई महीनों बाद भी अदालतों में उलझे हैं। हर केस में एक दर्द भरी कहानी है। पढ़िए ये रिपोर्ट...

1. बेटियों से गैंगरेप-मर्डर, मां से सवाल- कपड़े कितने फटे थे; 68 दिन में 45 बार कोर्ट गए

14 सितंबर को यूपी के लखीमपुर खीरी जिले के तमोलीपुर गांव में 2 नाबालिग दलित बहनों की लाश पेड़ से लटकी मिली थी। सरकार ने सख्ती दिखाई, 6 आरोपी अरेस्ट हुए, 14 दिन में चार्जशीट भी फाइल हुई। 25 लाख रुपए मुआवजा, एक घर और सरकारी नौकरी का ऐलान हुआ। 68 दिन गुजर गए, पीड़ित परिवार करीब 45 बार कोर्ट के चक्कर लगा चुका है। सरकार भी मदद के वादे भूल गई।
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2. गैंगरेप के बाद पैदा अनचाहे बच्चों की कहानियां, मां की उम्र 12-13 साल
जिस उम्र में उन्हें स्कूल में होना था, शरारतें करनी थीं, वो उम्र अस्पतालों में, पुलिस के घेरे और कोर्ट के चक्करों के अलावा अपने अनचाहे बच्चों को पालने में गुजर रही है। ये मांओं की कहानी है, जो अभी 12-13 साल की हैं। चाचाओं, पड़ोसियों और गांव के लोगों ने उनके साथ रेप किया। इसकी गुनहगार यही बच्चियां ठहरा दी गईं। एक और लड़की है, जो डिलीवरी के इंतजार में हॉस्पिटल में है।
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3. प्यार, रेप फिर जिंदा जला दिया, 2 साल से भतीजा गायब; 4 आरोपी जमानत पर बाहर
यूपी के उन्नाव की ये कहानी प्यार से शुरू हुई और रेप तक पहुंची। आरोपी गिरफ्तार हुए, जमानत पर बाहर आए और फिर 5 दिसंबर 2019 की एक सुबह लड़की को सरेआम जिंदा जलाकर मार दिया। इसके बाद कथित प्रेमी समेत 5 लोग फिर गिरफ्तार हुए, 3 साल गुजरे और इनमें से 4 अब जमानत पर बाहर हैं। जला दी गई लड़की की छोटी बहन पढ़ाई-लिखाई और अपने सपने छोड़कर उसका केस लड़ रही है।
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