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पंचायत चुनाव बना कोरोना का सुपर स्प्रेडर:यूपी में पंचायत चुनावों के बाद गांवों में कोरोना की दूसरी लहर का असर, तेजी से बढ़ रहे खांसी-बुखार के मरीज

कानपुर/वाराणसी7 महीने पहले

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव और वहां भीड़ भरी रैलियों के बाद कोरोना फैलने की रफ्तार ने कई गुना तेजी आई है। इन सबके बीच उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों की चर्चा कम है। यूपी के सभी बड़े शहरों में मचे हाहाकार के बाद कोरोना ने अब गांवों में भी तेजी से पांव पसारना शुरू कर दिया है। राज्य में हर दिन करीब 30 हजार केस मिल रहे हैं। इनमें दूरदराज के जिलों की हिस्सेदारी काफी ज्यादा है।

इसकी वजह चार चरणों में हुए पंचायत चुनाव माने जा रहे हैं। दैनिक भास्कर की टीम ने उत्तर प्रदेश के कानपुर के गांव टिकरा और वाराणसी के असवारी गांव का जायजा लिया। ये गांव जयापुर से 3 किलोमीटर पहले हैं। जयापुर को प्रधानमंत्री ने सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद लिया था। इन दोनों गांवों से रिपोर्ट...

कानपुर से सटे टिकरा गांव में 70-80 लोग बीमार
कानपुर का गांव टिकरा कल्याणपुर ब्लॉक में है और शहर के काफी नजदीक है। यहां पंचायत चुनाव के लिए वोटिंग हो चुकी है। गांव वाले बताते हैं कि पंचायत चुनाव के दौरान तो खूब चहल-पहल थी, लेकिन अब फिलहाल गलियों में सन्नाटा नजर आता है। इस समय गांव में 70 से 80 लोग बीमार हैं।

गांव के लोग संक्रमण बढ़ने की दो वजहें मानते हैं। एक शख्स अपना नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि एक तो प्रधानी के चुनाव के दौरान लोग भीड़ में घूम रहे थे। दूसरा गांव शहर के पास है, इसलिए वहां भी लोगों का आना-जाना लगा रहता है। इससे भी केस बढ़े हैं।

कानपुर के टिकरा गांव में पंचायत चुनाव की वोटिंग के वक्त काफी चहल-पहल थी, लेकिन अब वोटिंग हो जाने के बाद गलियों में सन्नाटा पसरा है।
कानपुर के टिकरा गांव में पंचायत चुनाव की वोटिंग के वक्त काफी चहल-पहल थी, लेकिन अब वोटिंग हो जाने के बाद गलियों में सन्नाटा पसरा है।

गांव के लोग बताते हैं कि संक्रमण से 2 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बाद लोग कोरोना को लेकर सावधान हुए हैं। प्रेम प्रकाश कहते हैं कि पंचायत चुनाव के प्रत्याशियों ने भी तय किया है कि रिजल्ट आने के बाद कोई जुलूस, रैली या जमावड़ा नहीं किया जाएगा, क्योंकि कोरोना बहुत तेजी से फैल रहा है।

प्रशासन पहले चुनाव कराने में लगा रहा, अब कोरोना की याद आई
ग्रामीण राजेश ने बताया कि पिछले साल कोरोना के समय जब लॉकडाउन लगा था, तब गांव में निगरानी समिति बनी थी कि गांव में बाहर से कौन आ-जा रहा है। फिर उसका क्या हुआ, पता नहीं।

गांव वाले बताते हैं कि चुनाव के दौरान पंचायत भवन, प्राइमरी स्कूल जैसी सरकारी इमारतें चुनावी काम के लिए इस्तेमाल हो रही थीं। पूरे प्रदेश में कोरोना के केस बढ़ने और ऑक्सीजन की किल्लत के बाद फिर निगरानी समिति बनी है। इसमें 12 लोग हैं। फिलहाल बाहर से आने वाले लोगों के लिए प्राइमरी पाठशाला में आइसोलेशन सेंटर बनाए गए हैं।

शहर से सटा गांव, लेकिन कोई जांच नहीं

बाहर से आने वाले प्रवासियों के लिए प्राइमरी स्कूल में आइसोलेशन सेंटर बनाए गए हैं।
बाहर से आने वाले प्रवासियों के लिए प्राइमरी स्कूल में आइसोलेशन सेंटर बनाए गए हैं।

ग्रामीणों के मुताबिक, शहर के इतना नजदीक होने के बाद भी टिकरा में किसी तरह की जांच नहीं हुई है। गांव में बहुत से लोगों को खांसी-बुखार है। वे दावा करते हैं कि अगर ठीक से जांच हो जाए तो गांव में बहुत बड़ी संख्या कोरोना संक्रमितों की निकलेगी।

वैक्सीन को लेकर भी गांव में कोई जागरूकता अभियान नहीं चलाया गया है। गांव में प्रवासी मजदूरों की वापसी के सवाल पर लोगों ने बताया कि यहां के बहुत लोग बाहर नहीं रहते हैं। हां, कुछ लोग होली और फिर प्रधानी के चुनाव में वोट देने के लिए आए थे, वे नहीं लौटे हैं।

अब कोरोना कानपुर के ग्रामीण क्षेत्रों की तरफ भी बढ़ता हुआ नजर आ रहा है। 24 घंटे के आंकड़ों पर नजर डालें तो कानपुर में 1741 नए संक्रमित मरीज सामने आए हैं और 4 संक्रमित मरीजों की मौत हुई है।

वाराणसी के असवारी गांव का हाल
मुंबई में बढ़ते कोरोना के कहर, लॉकडाउन और पंचायत चुनाव के कारण पूर्वांचल के प्रवासी मजदूर बड़ी संख्या में लौटे हैं। कोरोना की दूसरी लहर का कहर झेल रहे बनारस में भास्कर की टीम PM मोदी के गोद लिए गांव जयापुर से 3 किलोमीटर पहले असवारी गांव का जायजा लेने के लिए निकली। गांव के क्षेत्र पंचायत सदस्य अनिल पटेल हमें दिल्ली-मुंबई से लौटे प्रवासियों से मिलवाते हैं।

बीमारी फैली है तो सरकार चुनाव क्यों करा रही है
सुरेंद्र राजभर बताते हैं कि वे महाराष्ट्र में ऑटो चलाते थे। लेकिन, बढ़ती बीमारी और लॉकडाउन के डर से लौट आए। वे बताते हैं कि इस बार कोई आइसोलेशन सेंटर गांव के अगल-बगल भी नहीं बना। छोटे से घर में किसी तरह बचते-बचाते रहे।

सुरेंद्र गुस्से में कहते हैं कि सरकारों के लिए चुनाव में कोरोना नहीं होता है। आम आदमी के लिए कोरोना आ जाता है। अब हम ऑटो के लिए लिया ढाई लाख रुपए का लोन कहां से भरेंगे। महाराष्ट्र की गाड़ी बनारस में पुलिस चलाने भी नही देती, परिवार कहां से चलेगा।’

पिछले साल असवारी गांव के प्राथमिक विद्यालय को क्वारैंटाइन सेंटर बनाया गया था। इस बार यह व्यवस्था नहीं है।
पिछले साल असवारी गांव के प्राथमिक विद्यालय को क्वारैंटाइन सेंटर बनाया गया था। इस बार यह व्यवस्था नहीं है।

मुंबई से लौटे सुजीत पटेल को हल्की खांसी आ रही है। वे बताते हैं कि वे जब पिछली बार गांव लौटे थे तो पंचायत भवन पर राशन, 1000 रुपए और रोजगार के लिए नाम नोट हुआ था, लेकिन कुछ नहीं मिला। इस बार तो कोई रुकने का सेंटर भी गांव में नहीं बना हैं। पंचायत चुनाव के सवाल पर वे कहते हैं कि क्या चुनाव से पेट भरता है। वे कहते हैं कि हालात थोड़े सुधरे तो फिर मुंबई लौट जाएंगे।

महाराष्ट्र में स्टील प्लांट में 8 हजार की नौकरी करने वाले संतोष राजभर कहते हैं कि बहुत सारे लोग चुनाव की वजह से आए हैं। अगर बीमारी फैली है तो सरकार चुनाव करा ही क्यों रही है? क्षेत्र पंचायत सदस्य अनिल पटेल भी कहते हैं कि कोरोना के समय सरकार क्यों चुनाव करा रही है। टेस्टिंग ही नहीं हो रही है तो कोरोना मरीजों का क्या पता चलेगा। जो बीमार हैं भी, वे मेडिकल स्टोर से दवा लेकर खा रहे हैं।

पंचायत चुनाव में देश भर से लौटते हैं प्रवासी
हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. एम लाल कहते हैं कि पंचायत चुनाव कोरोना स्प्रेडर की तरह काम कर रहा है। पिछली वेव में कोरोना शहर तक सीमित था, लेकिन इस बार कोरोना का डर गांव में भी दिख रहा है। डॉ. एम लाल बताते हैं कि पंचायत चुनाव में देश मे इधर-उधर काम करने वाले ज्यादातर प्रवासी मजदूर लौटते हैं क्योंकि इन छोटे स्तर के चुनावों में एक-एक वोट कीमती होता है। अब चूंकि यह प्रवासी उन महानगरों से लौटे है जहां कोरोना की दूसरी लहर ने पहले अटैक किया है, इसलिए यह अब यूपी में भी फैल रहा है।

सुरेंद्र राजभर महाराष्ट्र में ऑटो चलाते थे, अब वे गांव लौट आए हैं। वहीं सुजीत पटेल भी मुंबई से लौटे हैं, उन्हें हल्की खांसी आ रही है।
सुरेंद्र राजभर महाराष्ट्र में ऑटो चलाते थे, अब वे गांव लौट आए हैं। वहीं सुजीत पटेल भी मुंबई से लौटे हैं, उन्हें हल्की खांसी आ रही है।

2022 विधानसभा चुनाव के लिए दमखम दिखाना चाहती है भाजपा
सीनियर जर्नलिस्ट प्रदीप कपूर कहते है कि चूंकि इस पंचायत चुनाव की अहमियत राजनैतिक दलों के लिए इसलिए बढ़ी है, क्योंकि एक साल बाद सूबे में चुनाव है। ऐसे में भाजपा समेत सभी प्रमुख दलों ने पहली बार पंचायत चुनाव में भी सिंबल देने का फैसला लिया है।

सीनियर जर्नलिस्ट रतन मणि लाल कहते है कि पंचायत चुनाव के तीनों चरण तब बीते जब कोरोना यूपी समेत राजधानी में कहर मचा रहा था, लेकिन किसी भी राजनैतिक दल ने चुनाव टालने की मांग नहीं की। इसके पीछे वजह यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव में बहुत कम समय बचा है। ऐसे में कोई पार्टी रिस्क नही लेना चाहती है। अगर किसी पार्टी ने यह मांग की भी तो उस पर कमजोर का ठप्पा लग जाएगा।

जब सरकार लॉकडाउन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकती है तो चुनाव के लिए क्यों नहीं?
प्रदीप कपूर कहते है कि भले ही पंचायत चुनाव हाईकोर्ट के कहने पर हो रहे हैं, लेकिन जब हाईकोर्ट ने लॉकडाउन का आदेश दिया था तब सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी। वह वहां पंचायत चुनाव टालने की गुहार लगा सकती थी, लेकिन नहीं लगाई क्योंकि उसके भी राजनैतिक फायदे हैं।

चार चरणों में चुनाव
यूपी में 4 चरणों मे 15, 19, 26 और 29 अप्रैल को चुनाव हुए हैं। तीन चरण में चुनाव पूरे हो चुके हैं जबकि 29 अप्रैल को आखिरी चरण की वोटिंग हो रही है 2 मई को इसका रिजल्ट आएगा।

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