ग्राउंड रिपोर्टरेप के बाद पैदा अनचाहे बच्चों की कहानियां:12-13 साल में मां बनी, लोग ताने देते हैं; कहते हैं- पाप पैदा किया

2 महीने पहलेलेखक: रवि श्रीवास्तव

जिस उम्र में उन्हें स्कूल में होना था, दोस्तों के साथ टिफिन शेयर करना था, शरारतें करनी थीं, वो उम्र अब अस्पतालों में, पुलिस के घेरे और कोर्ट के चक्करों के अलावा अपने अनचाहे बच्चों को पालने और लोगों के ताने सुनने में गुजर रही है। उनके चाचाओं, पड़ोसियों और गांव के लोगों ने उनके साथ रेप किया और अब इसकी गुनहगार भी यही बच्चियां ठहरा दी गई हैं।

पुलिस की फाइलों में भले ही ये घटनाएं एक FIR, एक चार्जशीट या एक इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट भर हों, अदालतों में किसी एक फैसले की फाइल भर हों, लेकिन इस सबसे इतर इन जुर्मों-जुल्मों से कुछ जीते-जागते बच्चे दुनिया में आ चुके हैं। दुनिया की नजर में ये पाप हैं।

इनकी मांएं अभी 12-13 साल की बच्चियां हैं, जिन पर ये जिंदगियां थोप दी गई हैं। आइए कुछ ऐसी कहानियों में चलते हैं, जहां कुछ सुंदर नहीं, कोई उम्मीद नहीं, कोई जवाब नहीं, सिर्फ सवाल हैं…

13 फरवरी 2022 को उन्नाव के मौरावां थाने के एक गांव में 11-12 साल की बच्ची अपने घर से देर शाम चीनी खरीदने के लिए निकली। गांव के ही 3 लोग उसे उठाकर पास के कब्रिस्तान ले गए। चाकू की नोक पर उससे गैंगरेप किया और तड़पता छोड़कर भाग गए।

पीड़ित परिवार पुलिस के पास गया, FIR दर्ज हुई, आरोपी गिरफ्तार हुए और कोर्ट-कचहरी के चक्कर शुरू हो गए। न घरवालों ने ध्यान दिया और न ही पुलिस ने जरूरी समझा, बच्ची प्रेग्नेंट हो गई। 4 महीने गुजर गए थे, अबॉर्शन नहीं हो पाया और बीते 20 सितंबर को इस बच्ची ने एक बच्चे को जन्म दिया।

मैं उसका घर ढूंढते हुए लखनऊ से करीब 55 किमी दूर उन्नाव के इस गांव में पहुंचता हूं। रास्ता पूछते-पूछते घर तक आया, तो सामने एक साफ सुथरी जगह पर छप्पर पड़ा हुआ था। परिवार कोर्ट में पेशी के लिए जाने की तैयारी कर रहा था। मां चूल्हे के बगल में बैठी रोटियां सेंक रही थी।

विक्टिम के बच्चे और उसके छोटे भाई-बहनों की उम्र में ज्यादा फर्क नहीं है। सभी को उसकी मां ही संभालती हैं।
विक्टिम के बच्चे और उसके छोटे भाई-बहनों की उम्र में ज्यादा फर्क नहीं है। सभी को उसकी मां ही संभालती हैं।

दो छोटे-छोटे बच्चे खाने की आस में चूल्हे के सामने ही बैठे थे। नााबालिग रेप पीड़िता भी अपने दो महीने के बच्चे को गर्म कपड़े में लपेटे हुए गोद में खिला रही थी। पिता का चेहरा परेशानियों से वक्त से पहले बूढ़ा हो गया है। वे बार-बार कोर्ट ले जाने वाले कागजात चेक करते हैं।

नाबालिग पीड़िता से पूछता हूं, कैसी हो? क्या सब ठीक है? वो थोड़ी रुआंसी हो जाती है, कहती है- ‘अब घर से बाहर नहीं निकलती। स्कूल भी छूट गया। गांव की सहेलियों से मिलना नहीं होता। जो पहले घर आते थे, अब उन्होंने भी घर आना छोड़ दिया है। कोई आ भी जाए तो घर का पानी भी नहीं पीता। मुझे ऐसे देखते हैं, जैसे मैंने कोई गुनाह किया हो।’

वो बोलते-बोलते चुप हो जाती है। मेरी भी आगे पूछने की हिम्मत नहीं होती।

कुछ देर चुप रहने के बाद फिर बोलना शुरू करती है- ’जब ये सब हुआ, मैं छठी क्लास में थी। अब सब छूट गया है। किस-किसको जवाब दूं। सबको लगता है कि मेरी ही गलती है। उन लोगों ने चाकू दिखाकर मुझसे गलत काम किया। मुझे पता भी नहीं था कि ये बच्चा आने वाला है, मैं प्रेग्नेंट हूं। वो आठ महीने मेरे लिए नरक थे, हर कोई मेरे पेट को ही देखता था।

पुलिस वाले जब अल्ट्रासाउंड कराने ले गए, तो कह रहे थे कि तुम्हारे साथ रेप नहीं हुआ है। पुलिस, डॉक्टर और नर्स सब मुझे खूब बुरा-भला कहते थे, कहते- जो किया है वह भुगतो।’

वो फिर चुप हो जाती है, मुझे उसकी आंखों में आंसू नजर आते हैं। मैं ‘सब्र रखो, सब ठीक होगा’ जैसा कुछ बोलना चाहता हूं, लेकिन मुंह से कुछ नहीं निकलता। सोचता हूं, क्या अब कभी भी सब ठीक हो पाएगा।

पुलिस ने अल्ट्रासाउंड की फर्जी रिपोर्ट बना दी
पिता शायद इन सब सवालों-जवाबों को सुन-सुनकर तंग आ चुके हैं। थोड़ा सा चिढ़ते हुए कहते हैं- ‘साहब जल्दी बात कर लो, अभी 7-8 किमी पैदल जाना है। उसके बाद उन्नाव जाने के लिए बस मिलेगी।’

मेरे बात करने के दौरान ही आस-पड़ोस के कुछ लोग इकठ्ठा हो जाते हैं। परिवार और पीड़िता को कोसने लगते हैं, गालियां भी सुनाई देती हैं। मैं सवालिया नजरों से पिता की तरफ देखता हूं तो जवाब मिलता है- ‘आरोपियों में एक पड़ोसी भी शामिल है, ये उनके ही रिश्तेदार हैं। अक्सर ऐसे ही गालियां बकते हैं, कौन रोज-रोज झगड़ा करे।’

इसी बीच पीड़िता की मां बोलने लगती हैं- ’मेरी बेटी पहले स्कूल जाती थी। दूसरे बच्चों की तरह गांव में खेलती-कूदती भी थी। जिस दिन उसे उठा कर ले गए, वो लौटी तो तब से ही चुप रहने लगी। हम पुलिस-कोर्ट कचहरी में लग गए थे। अप्रैल में उसने मुझे बताया कि उसके पेट में दर्द होता है। मैं भी नहीं समझ पाई, वो बस 12 बरस की है।

डॉक्टर को दिखाया तो उसने भी दर्द की दवाएं दे दीं। करीब एक महीना निकल गया, दर्द बार-बार हो रहा था तो हमने दूसरे डॉक्टर को दिखाया। उसी ने बताया कि ये प्रेग्नेंट है। ये पता चलने के बाद तो जीना मुश्किल हो गया। हमने डॉक्टर से बच्चा गिराने के लिए कहा तो उन्होंने बताया कि बेटी की जान को खतरा हो सकता है।

हमने पुलिस को भी बताया, उन्होंने अल्ट्रासाउंड तो कराया, लेकिन रिपोर्ट गलत बना दी। कहा गया कि हमारी बेटी गर्भवती नहीं है। हमारी कोई मदद नहीं हुई। हम लोगों ने अपने रुपए-पैसों से बेटी का इलाज कराना शुरू किया। उसका तो बचपन ही छिन गया।

आठवें महीने में जब उसे ज्यादा दर्द बढ़ा तो हमने उसे जिला अस्पताल में एडमिट कराया। यहां डॉक्टर बोले कि बेटी को हैलेट अस्पताल कानपुर ले जाओ। हम उसे लेकर वहां 15 दिन पड़े रहे। कभी-कभी तो ऐसा भी दिन गया कि पूरा परिवार भूखा सोया। मेरे भी छोटे-छोटे बच्चे हैं। उनको भूख से बिलखता देख मैं रो ही सकती थी। 15 दिन बाद ऑपरेशन से बेटी को एक बेटा पैदा हुआ।’

डॉक्टर-नर्स, पुलिस सब हमसे ऐसे बात करते हैं जैसे हमने गुनाह किया हो
मां चुप हो गई तो पिता एक बार फिर बोलने लगे- ’हम दिनभर मेहनत-मजदूरी कर शाम को खाना खाने वाले लोग हैं। इतना रुपया-पैसा नहीं है कि सब भरपेट खाना भी खा सकें। लोगों से उधार लेकर आठ महीने तक बिटिया का इलाज कराया। जिला अस्पताल और हैलेट अस्पताल में भी डॉक्टर और नर्स हम लोगों से ऐसे बात करते कि जैसे हम गुनहगार हों।

अब लौट आए हैं तो पूरा गांव ताने देता है। आरोपी के परिवार वाले धमकी भी देते हैं। सरकार से भी कोई मदद नहीं मिली। मैं इस बच्चे को पालूंगा और अपनी बेटी को भी पालूंगा। बेटी की शादी हो पाएगी तो उसकी भी कोशिश करूंगा।’

कचहरी जाने का वक्त हो गया है, पिता कागज समेटते हैं। एक बार फिर सब चेक करते हैं। मां घर के कोने में बैठी देखती रहती है। बेटी भी 2 महीने के बच्चे को लेकर पिता के साथ जाने के लिए तैयार है। मेरे पास उनसे कहने को कुछ भी नहीं, वो मेरी तरफ किसी उम्मीद से देखते भी नहीं।

उन्नाव के बाद मैं बाराबंकी के असंदरा थाना इलाके के एक गांव पहुंचा। गांव के एक कोने में रेप पीड़िता का घर है। ये मकान आवास योजना के तहत मिला है। घर के सामने थोड़ी सी जगह है, जहां एक भैंस बंधी है। बरामदे में एक तरफ गेहूं फैला है और पीड़िता उसी को समेट रही है।

घर के एक अंधेरे कमरे में हाथ-पैर में प्लास्टर बांधे उसके मां-बाप पराली पर बिस्तर डाल कर लेटे हैं। मैं पीड़िता से पूछता हूं, तो वो बताती है कि बीते 30 अक्टूबर 2022 को आरोपियों के परिवार वालों ने हमला कर दिया था। लाठी, बांके और कुदाल से खूब पीटा। इसमें बूढ़े माता-पिता के हाथ-पैर टूट गए। पीड़िता के सिर पर भी गंभीर चोट लगी। 15 दिन तक तीनों अस्पताल में एडमिट थे।

वो अब भी उस हमले से सहमी हुई है, बताती है- ‘अभी मेरी उम्र 16 साल है। 2 साल पहले, वो जून का महीना था, तारीख कौन सी थी याद नहीं। मैं दुकान से सामान लेने गई थी। वहां से गांव के ही तीन लोग मुझे उठा ले गए और 6 महीने तक मुझे बांधकर रखा, बार-बार गैंगरेप किया।

मैं जब होश में आती तो रूमाल मुंह पर रख देते, और मैं फिर से बेहोश हो जाती। वो मुझे खाना खिलाने या रेप करने के लिए होश में लाते थे। जब मेरी आंख खुलती तो मेरे कपड़े भी बदले होते थे। कभी-कभी कुछ दवाई भी देते थे।

छह महीनों तक मुझे जानवरों की तरह रखा गया। मैं चीखती-चिल्लाती तो इतना पीटते कि बोलने से भी डर लगने लगा था। जब इन लोगों का मन भर गया तो मुझे मारपीट कर गांव के बाहर फेंक दिया। किसी तरह मैं अपने घर पहुंची। पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर दिया, हमें थाने से भगा दिया। तीन-चार महीनों बाद मुझे उल्टियां शुरू हो गईं। टेस्ट कराया तो मैं प्रेग्नेंट थी।’

अबॉर्शन कराना चाहते थे, डॉक्टरों ने मना कर दिया
पीड़िता आगे कहती है- ’आरोपियों को जब इस बारे में पता चला तो वे घर से मुझे जबरदस्ती ले जाकर डॉक्टरों को दिखाने लगे। वे लोग मेरा बच्चा गिराना चाहते थे, लेकिन डॉक्टरों ने मना कर दिया। मेरी उम्र कम थी और जान को खतरा था। जब कोई रास्ता न मिला तो उन्होंने 28 जून 2021 को मेरी शादी जबरदस्ती आरोपियों में शामिल एक नाबालिग से करा दी। मेरे पिता ने बाराबंकी जाकर पुलिस से इसकी शिकायत की।

केस दर्ज हुआ और पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। नाबालिग आरोपी को बाल सुधार गृह भेज दिया गया। शादी को नियति मानकर मैं उसके घर में एक महीने तक रही। बात-बात पर वो लोग मुझे मारते-पीटते थे। कहते- जिससे शादी हुई है उसका नाम बदल कर किसी और पर रेप का आरोप लगा दे। मां को ये सब बताया तो वह मुझे वापस घर ले आई। कुछ ही दिन बाद 16 अगस्त को मेरा एक बेटा हुआ। जो अब डेढ़ साल का है।’

एक ही सांस में पीड़िता अपना पूरा दर्द कह देती है। इसी बीच पिता आवाज देते हैं और वह अंधेरे कमरे में चली जाती हैं। पिता ने शायद पानी मांगा था, हाथ-पैर टूटे हैं, तो खुद से कुछ कर नहीं पा रहे।

पीड़ित परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। लड़की के माता-पिता सूखी घास के बिस्तर पर बैठे रहते हैं। आरोपियों के परिवार के हमले में दोनों के पैर और हाथ टूट गए थे।
पीड़ित परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। लड़की के माता-पिता सूखी घास के बिस्तर पर बैठे रहते हैं। आरोपियों के परिवार के हमले में दोनों के पैर और हाथ टूट गए थे।

अब मेरी शादी कहां हो पाएगी, बेटे को पालूंगी...
पीड़िता लौट आती है, हाथों में मेरे लिए भी एक गिलास पानी है। फिर कहना शुरू करती है- ’इस घटना के बाद से कोई घर आता-जाता भी नहीं है। न ही मैं घर से निकल कर कहीं जाती हूं। गांव में गए तो कई महीने हो गए। कभी-कभी पापा के साथ बाराबंकी कोर्ट तारीख पर जाती हूं। अब मेरी शादी होगी या नहीं, इस बारे में नहीं सोचती।’ मैं पिता से मिलने की इच्छा जाहिर करता हूं, वो हाथ से उस अंधेरे कमरे की तरफ इशारा कर देती है।

माता-पिता के हाथ और पैर में प्लास्टर बंधा है। पिता सहारे से बैठने की कोशिश करते हैं, फिर कहते हैं- ‘30 अक्टूबर को मैं खेत पर गया था। वहां पहले से ही आरोपी के परिवार के लोग खड़े थे। मुझे देख वह गाली देने लगे तो मैंने रोका, उन्होंने मारपीट शुरू कर दी। मैं घर चला आया।

कुछ देर में वे सब हथियारों के साथ घर में घुस आए। मैं अपनी पत्नी और बेटी के साथ था। उन लोगों ने मुझे, बेटी और पत्नी को खूब पीटा। हाथ-पैर तोड़ दिए। मेरी बेटी के सिर पर कुदाल मार दिया। उसकी जान जाते-जाते बची। हम लोग 2 हफ्ते अस्पताल में रहे। परिवार की जान को खतरा है, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं।’

पिता चुप हो जाते हैं तो मां बोल पड़ती हैं- ’गांव में आते-जाते ताने मिलते हैं। लोग गाली देते हैं। गांव वालों को लगता है कि मेरी बिटिया गर्भवती हुई, तो उसमें मेरी या मेरी बेटी की गलती है। अब हम थक चुके हैं। पुलिस वालों ने भी न मदद की और न ही कभी सुरक्षा दी। डर से एक बेटे को हम गांव में नहीं बुला रहे। हम लोग सुरक्षित नहीं है, कम से कम वह तो सुरक्षित रहेगा।’

इसी बीच बच्चा रोने लगता है, शायद भूखा है। पीड़िता उसे गोद में लेकर चुप कराने लगती है। उन्नाव के घर वाली शांति बाराबंकी के इस घर में भी छा जाती है, मेरे पास कहने को कुछ नहीं होता। मैं विदा लेता हूं, पीड़िता मुड़कर भी नहीं देखती, बस एक ‘हां’ सुनाई देती है।

बाराबंकी से मैं कौशांबी के जिला अस्पताल पहुंचता हूं। पीड्रियाटिक वॉर्ड के बेड पर करवटें बदलती हुई एक 13 साल की लड़की छत की तरफ एकटक देखे जा रही है। इस बच्ची का रेप 15 जून 2022 को हुआ था। पड़ोस के ही 40 साल के चाचा शिवमूरत ने रेप किया था।

5 अगस्त 2022 को लड़की के पेट में दर्द हुआ, तो डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड कराया। पता चला वो प्रेग्नेंट है। मां ने उसे वहीं पीटना शुरू कर दिया, तब उसने बताया कि उसके साथ पड़ोसी चाचा ने रेप किया है और किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दे रहा है।

6 अगस्त को पिता पुलिस से शिकायत करने पहुंचे, लेकिन उन्हें भगा दिया गया। 7 अगस्त को पीड़ित परिवार मंझनपुर SP दफ्तर पंहुचा। इसके बाद केस दर्ज हुआ। मेडिकल टेस्ट के बाद 10 अगस्त को आरोपी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

लड़की के पिता ने अदालत में अपील कर बेटी के गर्भ को गिराने की गुहार लगाई। हालांकि मेडिकल बोर्ड ने अबॉर्शन किए जाने पर बच्ची की जान को खतरा बता दिया। कोर्ट ने CMO कौशांबी को आदेश दिया कि वह अपनी देख रेख में बच्ची का इलाज कराएं। तभी से बच्ची जिला अस्पताल के पीड्रियाटिक वार्ड में एक बेड पर है। डॉक्टरों के मुताबिक, दिसंबर के आखिरी या जनवरी के पहले हफ्ते में उसकी डिलीवरी हो सकती है।

मैं इस पाप को नहीं पालूंगा, बस मेरी बच्ची बच जाए
पीड्रियाटिक में लड़की के बगल में उसके पिता खड़े हैं, मैं उनसे बात करना शुरू करता हूं। वो उखड़ जाते हैं, कहते हैं- ’मेरी बेटी के पेट में पाप पल रहा है। हम उसका अबॉर्शन भी नहीं करा सकते। कुछ भी हो, लेकिन ये पाप मैं नहीं पाल पाऊंगा। बस किसी तरह से मेरी बेटी की जान बच जाए।

वो पढ़ना चाहती है, कहती है इस पेट के साथ स्कूल कैसे जाऊं। एग्जाम भी नहीं दे पाई, घर भी नहीं जा सकती। पिछले एक महीने से अस्पताल में भर्ती है। मैं यहीं रहता हूं। कभी भूखा-प्यासा तो कभी आधापेट भरा हुआ। मेरी बेटी तो जैसे हंसना-बोलना ही भूल गई है। डॉक्टर कह रहे हैं कि अभी एक महीना और लगेगा। तब बच्चे की डिलीवरी होगी।’

पीड़िता बात नहीं करना चाहती, मैं ज्यादा जोर भी नहीं देता। कुछ दिनों से उसकी तबीयत ठीक नहीं है। उसने बोलना छोड़ दिया है। वो मेरी तरफ देखती भी नहीं, बस छत को देखती रहती है। पिता कोशिश करते हैं कि न रोएं, लेकिन आंखों से आंसू छलक जाते हैं, मुझे फिर समझ नहीं आता कौन सा दिलासा है, जो ऐसे मौकों के लिए किसी भी भाषा में मौजूद है। मैं चुपचाप अस्पताल से बाहर निकल आता हूं।

इन अनचाहे बच्चों का क्या होगा?
इस सवाल का जवाब देने से पहले मैं आपको बाराबंकी के ही 2015 के एक केस के बारे में बताता हूं। यहां भी एक 13 साल की नाबालिग लड़की से गांव के ही एक युवक ने रेप किया था। इसके बाद वह गर्भवती हो गई। पिता ने हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में गर्भपात की अर्जी डाली थी, लेकिन 21 हफ्ते का समय बीत चुका था। डॉक्टरों ने अबॉर्शन के लिए मना कर दिया।

इसके बाद कोर्ट ने UP सरकार को पीड़िता के भविष्य के लिए इंतजाम करने का आदेश दिया। पीड़िता के नाम 10 लाख की फिक्स राशि रखी गई है। वह बालिग होगी, तो उसे मिलेगी। साथ ही लड़की की ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई मुफ्त कराने के निर्देश दिए गए।

पढ़ाई के हिसाब से लड़की को सरकारी नौकरी भी राज्य सरकार को देनी होगी। पीड़िता लखनऊ में कस्तूरबा स्कूल में पढ़ाई कर रही है। उसके बेटे को बाल संरक्षण गृह समिति को पालने के लिए दे दिया गया है।

सवाल ये है कि इन तीन केस में क्या हुआ?
उन्नाव, बाराबंकी और कौशांबी के बारे में जब मैंने संबंधित अधिकारियों से सवाल किया तो उन्होंने मामला कोर्ट होने की बात कहकर कैमरे पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। उन्नाव, बाराबंकी में जवाब था कि मामला कोर्ट में है। कौशांबी में कहा गया- पीड़ित परिवार कोई मांग करेगा तो देखेंगे।

इन तीनों ही केस में रेप पीड़ित नाबालिग लड़किया दलित हैं। हालांकि, इनमें से सिर्फ बाराबंकी केस में ही रेप पीड़िता को सरकारी मुआवजा मिला है। उन्नाव और कौशांबी में अब तक कोई सहायता नहीं दी गई। कौशांबी में DM सुजीत कुमार ने ऑफ द रिकार्ड बताया कि अगर परिवार सरकारी सहायता के लिए अप्लाई करता है तो जांच के बाद उसे सरकारी मदद दिलाई जाएगी।

पीड़ित परिवार को अब तक मुआवजा नहीं मिला, शुरुआत में उनकी शिकायत नहीं सुनी गई, इस पर आपके लिए एक सवाल...

जानकारी मांगी तो बुकलेट पकड़ा दी
इन मामलों पर जब जिले के अधिकारियों ने बात करने से इनकार कर दिया तो मैं लखनऊ में समाज कल्याण विभाग के निदेशालय पहुंचा। मेरी मुलाकात विभाग के निदेशक IAS राकेश कुमार से हुई। उन्होंने भी कैमरे पर बोलने से इनकार कर दिया। उन्होंने मुझे शासनादेश की बुकलेट पकड़ा दी। अनचाहे बच्चों की इन अधूरी कहानियों के साथ मैं वो बुकलेट लेकर लौट आता हूं।

यूपी के उन्नाव में ही गैंगरेप पीड़ित को जलाकर मार दिया गया था, इसका केस अब तक चल रहा है, पढ़िए ये रिपोर्ट...
प्यार, रेप फिर जिंदा जला दिया, 2 साल से भतीजा गायब; 4 आरोपी जमानत पर बाहर

UP के उन्नाव की ये कहानी प्यार से शुरू हुई और रेप तक पहुंची। आरोपी गिरफ्तार हुए, जमानत पर बाहर आए और फिर 5 दिसंबर 2019 की एक सुबह लड़की को सरेआम जिंदा जलाकर मार दिया। इसके बाद कथित प्रेमी समेत 5 लोग फिर गिरफ्तार हुए, 3 साल गुजरे और इनमें से 4 अब जमानत पर बाहर हैं। जला दी गई लड़की के घर के बाहर बीते 3 साल से पुलिस तैनात है। उसकी छोटी बहन पढ़ाई-लिखाई और अपने सपने छोड़कर ये केस लड़ रही है। आरोपियों की तरफ से ये जिम्मेदारी उनकी बहनों ने संभाली है।
पढ़ें पूरी खबर...