ब्लैकबोर्डवो स्कूल जहां अचानक चीखने लगीं लड़कियां:किसी ने अपना चेहरा लहूलुहान कर डाला, तो कोई दीवार पर सिर पटकने लगी

5 महीने पहलेलेखक: उत्तराखंड के बागेश्वर से मृदुलिका झा

हरियाली, ऊंचे पहाड़, नीलम-रंगी पानी और ताजी हवा। छुट्टियों पर हिल स्टेशन पहुंचे लोग ऊंचाई को इतना ही जानते हैं, लेकिन घने जंगलों से ढंपे-दबे पहाड़ों का दूसरा चेहरा भी है। ठंडा इतना कि हड्डियां सिहर जाएं। स्याह ऐसा कि दिल बैठ जाए।

इन घाटियों में कितने ही सपने खो गए। उफनती नदियों ने जाने कितने घर लील लिए। तबाहियों की ढेरों-ढेर कहानियों के बीच एक कहानी और भी है। जितनी अनसुनी, उतनी ही अंधेरी।

जुलाई में मैदानी लोग जब चाय के साथ बारिश की तस्वीरें डाल रहे थे, तभी उत्तराखंड का बागेश्वर जिला चीखों से दहल उठा। स्कूली बच्चियों की चीखें। अपने ही चेहरों को नोंचती और दीवारों पर सिर पटकती इन लड़कियों को भभूति देकर ‘शांत’ किया गया।

डॉक्टरों ने इसे मास हिस्टीरिया कहा, तो गांववालों ने ऊपरी साया। बीमारी एक से दूसरे स्कूल तक फैलती चली गईं। क्या और क्यों हुआ- कोई नहीं जानता। सहमी हुई इन बच्चियों की तकलीफ समझने हमने जिले के ऐसे ही कुछ गांवों को टटोला।

ये उसी स्कूल का बोर्ड है, जहां कुछ रोज पहले अचानक कई बच्चियां चीखने-रोने लगीं थीं। गांव के लोग इसे ऊपरवाले का साया मान रहे हैं।
ये उसी स्कूल का बोर्ड है, जहां कुछ रोज पहले अचानक कई बच्चियां चीखने-रोने लगीं थीं। गांव के लोग इसे ऊपरवाले का साया मान रहे हैं।

काठगोदाम से बागेश्वर करीब 6 घंटे की ड्राइव है। बारिश में रफ्तार और घट जाती है। संकरी सड़कों से गुजरते हुए जब मैंने स्कूल वाली घटना का जिक्र किया, तो बेहद बातूनी गाड़ी के ड्राइवर के चेहरे पर डर मंडराने लगा। 'पहाड़ी रास्ता है। कब, क्या हो जाए, कोई नहीं जानता। ये सब मत पूछिए।'

मेरे बार-बार कुरेदने पर आखिरकार कहता है- ‘पहाड़ों पर छल (स्थानीय बोली में प्रेत) लगता ही रहता है। खुद मुझ पर लगा, तब जाकर यकीन हुआ। अब आप भी जान जाएंगी!’

एक तरह की वॉर्निंग-सी देते हुए उसने मुझे शहर तक छोड़ा। वहां से तकरीबन 50 किलोमीटर दूर है पचार गांव। वही गांव, जहां मास हिस्टीरिया का शिकार हो चुकी कई लड़कियां रहती हैं। सबने बात करने से इनकार कर दिया। एक बच्ची की मां फुसफुसाते हुए कहती हैं- चेहरा दिखेगा, तो शादी में परेशानी आएगी।

मैं पूछती हूं- लेकिन बेटी तो आपकी 11वीं में है, शादी अभी दूर है! झुंझलाता हुआ जवाब आता है- हम शहर में नहीं रहते। छोटे-छोटे गांव हैं। जनम बीत जाएंगे, तो भी सबको याद रहेगा।

खतरनाक पहाड़ी रास्तों से होते हुए बच्चे कई किलोमीटर तक दूर स्कूल जाते हैं। कभी इन रास्तों में जंगली जानवर उनसे टकराते हैं, तो कभी खौफ की कहानियां पीछा करती हैं।
खतरनाक पहाड़ी रास्तों से होते हुए बच्चे कई किलोमीटर तक दूर स्कूल जाते हैं। कभी इन रास्तों में जंगली जानवर उनसे टकराते हैं, तो कभी खौफ की कहानियां पीछा करती हैं।

बड़ी मुश्किल से एक स्टूडेंट का परिवार बातचीत के लिए राजी हुआ। पिता गांव के पूर्व प्रधान। पढ़े-लिखे और खुली सोच वाले। शर्त इतनी कि चेहरा नहीं दिखाना और उतना ही पूछना, जिससे बच्ची घबरा न जाए। ‘अभी-अभी सदमे से निकली है’- उनकी आवाज में चिंता थी।

‘मैं अपने ही हाथों से अपना चेहरा नोंचते हुए रो रही थी। टीचर मुझे पकड़ रहे थे। कोई पानी छींट रहा था, कोई भभूति मल रहा था। फिर मैं बेहोश हो गई। होश आया तो पूरे शरीर में दर्द था, थकान इतनी जैसी हम पहाड़ियों को कभी न हो।’

दुबले शरीर और उजली हंसी वाली कुसुम ये बताते हुए बिल्कुल शांत हैं। मानो गहरी नींद से जागी हो।

सनेती के लाल बहादुर शास्त्री इंटर कॉलेज में अगस्त की शुरुआत में जब बच्चियां बीमार होने लगीं, कुसुम पर भी डर और बेहोशी का दौरा पड़ा था। 12वीं में आर्ट लेकर पढ़ती ये स्टूडेंट चीखते-चीखते होश खो बैठी। लगातार दो बार ऐसा हुआ। फिलहाल सब ठीक है, लेकिन कितने दिन, ये पक्का नहीं!

ढाई साल पहले भी इसी मौसम में स्कूली बच्चियां बीमार होने लगी थीं। उस वक्त स्कूल में एक मंदिर है, वहां पूजा कराई गई, तब जाकर शांति हुई। स्कूल मैनेजमेंट कमेटी के एक सदस्य ने ये बात खुद इंटरव्यू के दौरान बताई, जिसका जिक्र रिपोर्ट में आगे। फिलहाल हम कुसुम के साथ हैं।

क्या सारी लड़कियों के साथ यही हो रहा था? नहीं। सबके साथ अलग-अलग चीजें हो रही थीं। कोई रो रही थी। कोई चीख रही थी। मैं मुंह नोंच रही थी। कोई बाल खोलकर दीवार पर सिर पटकने जा रही थी। किसी-किसी के होंठ में थुरथुरी उठ (होंठ कांपना) रही थी। फिर सबकी सब बेहोश होने लगीं। कोई जल्दी होश में आ गई, किसी को टाइम लगा। एक लड़की 3 घंटे बेहोश रही। डॉक्टर तक डर गए थे।

डॉक्टरों ने क्या कहा? कह रहे थे कि ‘तुम लोग नाटक कर रही हो। एक को हो सकता है, सबको एक साथ कैसे कुछ हो जाएगा!’ कुसुम निहायत भोलेपन से सारी बातें कह जाती हैं। फिर एकदम से रुककर कहती हैं- मैं दूसरे दिन स्कूल नहीं गई। घर में थी। कंधे में, पैर में बहुत दर्द था। तीसरे रोज स्कूल गई, तो पहुंचते ही दम घुटने लगा। इसके बाद स्कूल के लोग मुझे घर पहुंचा गए।

अब? स्कूल जा रही हैं! 12वीं में हूं। नहीं जाऊंगी, तो काम कैसे चलेगा। जाना ही पड़ेगा। ये कहते हुए कुसुम के चेहरे पर उलझन है। वे बार-बार अपने कंधे को छू रही हैं। गले में काला धागा है, जो शायद इस वाकये के बाद पहनाया गया हो, क्योंकि बाकी किसी के गले में वैसा धागा नहीं दिखा।

पहाड़ों पर तकरीबन हर घर देवी-देवताओं और ऊपरी साये पर भरोसा करता है। उससे बचने के लिए घरों की दीवारों पर टोटके भी करता है।
पहाड़ों पर तकरीबन हर घर देवी-देवताओं और ऊपरी साये पर भरोसा करता है। उससे बचने के लिए घरों की दीवारों पर टोटके भी करता है।

कमरे की बाहरी दीवार पर ‘बुरी ताकतों’ से रक्षा के लिए पहाड़ी टोटके दिखते हैं। मैं ज्यादा पूछ-पाछ किए बिना कुसुम की मां से मिलती हूं। वे याद करती हैं- जब खबर आई, मैं घर पर नहीं थी। बड़ी बेटी ने उसे सुला दिया। जागी तो मैंने भभूति लगाई। दूसरे दिन छुट्टी थी, लेकिन उसके बाद स्कूल जाते ही फिर कुछ हो गया। देवता ने ही किया होगा।

देवता सबका अच्छा करते हैं। वे भला बच्चियों को परेशान क्यों करेंगे?

’परेशान नहीं करेंगे, तो कोई उन पर ध्यान क्यों देगा। चुप रहेंगे, तो कोई नहीं पूजेगा, इसलिए ही बीच-बीच में कुछ करते रहते हैं।’ टूटी-फूटी हिंदी में कैमरे के सामने आराम से ये सब कहतीं कुसुम की मां को शहरी तरीकों की समझ नहीं। वे ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ होना नहीं जानतीं। वे बस इतना जानती हैं कि उनकी तरफ देवी-देवता आते रहते हैं।

बात चल ही रही थी तभी पहाड़ी खीरों से सजी प्लेट लेकर कुसुम की बड़ी बहन आती हैं। साथ में पहाड़ी नूण (नमक) और लहसुन की चटनी।
बात चल ही रही थी तभी पहाड़ी खीरों से सजी प्लेट लेकर कुसुम की बड़ी बहन आती हैं। साथ में पहाड़ी नूण (नमक) और लहसुन की चटनी।

खीरों से सजी प्लेट देखकर पहले मैं हिचकिचाती हूं, फिर टुकुर-टुकुर देखते चेहरों को देखकर एक टुकड़ा उठा लेती हूं। तारीफ पर चटनी की रेसिपी बताते हुए बच्ची के पिता कह उठते हैं- बच्चियां बीमार हैं, या देवी-देवता का प्रकोप है, कुछ पता नहीं चल सका। मैं पूछती हूं- आप तो खुलकर बोल रहे हैं। बाकी लोग चुप क्यों हैं?

क्या बताएंगे वो, जब खुद उन्हें ही कुछ नहीं पता। फिर डर भी तो रहता है।

क्या डर? कुरेदने पर भी वे चुप रहते हैं।

हमारा अगला पड़ाव सनेती गांव का वो स्कूल था, जहां जुलाई के आखिर से लेकर अगस्त के पहले हफ्ते तक कई बार ये घटना घटी। लंबी घास और जंगली झाड़ियों के बीच इंटर कॉलेज (हायर सेकेंड्री स्कूल) का बोर्ड लगा है। सड़क से दूरी- 400 मीटर। सड़क यानी पत्थर की सीढ़ियां या फिर कच्ची मिट्टी का वो रास्ता, जहां चलते हुए सांपों से मुठभेड़ हो जाए।

खुद मेरे सामने से एक सांप सरसराता हुआ निकल गया। मेरे डर पर एक स्थानीय शख्स हंसते हुए बताने लगा कि कैसे उसका रास्ता नाग ने रोक लिया था, और वो बिना डरे डटा रहा।

कहानियों से गुजरते हुए हम लाल बहादुर शास्त्री इंटर कॉलेज आ पहुंचते हैं। स्कूल की कोई बाउंड्री नहीं। दूर-दूर तक चीड़ के पेड़, लंबी घास और जंगली पौधे लगे हैं, जिनके बीच-बीच में कमरे बिखरे हुए हैं। हरेक के सामने रूम नंबर और विषय लिखा हुआ।

ये तस्वीर लाल बहादुर शास्त्री इंटर कॉलेज के हालात को बयां कर रही है। जमीन की तो बात छोड़िए यहां के कमरों की छतों पर लंबी-लंबी घास उग आई हैं। सांप-बिच्छू का खौफ हमेशा रहता है।
ये तस्वीर लाल बहादुर शास्त्री इंटर कॉलेज के हालात को बयां कर रही है। जमीन की तो बात छोड़िए यहां के कमरों की छतों पर लंबी-लंबी घास उग आई हैं। सांप-बिच्छू का खौफ हमेशा रहता है।

मैं यहां रविवार को पहुंची। स्कूल बंद, लेकिन कमरों पर लटके ताले भी उनकी बदहाली छिपा नहीं पा रहे। हर जगह काई जमी हुई। कहीं-कहीं दीवार फोड़कर छोटे-छोटे पौधे निकल आए हैं। पेड़ों से घिरा हुआ एक टॉयलेट भी है, शायद इस्तेमाल में न आता हो। उसकी छत तक पर घास उग आई है। मैं हिम्मत नहीं जुटा पाती कि सांपों का रिस्क लेकर सामने से उसकी तस्वीर ले सकूं। ऊपर से ही जुगाड़ करते हुए एक क्लिक करके आगे बढ़ती हूं।

आगे स्टाफ रूम है। दीवार पर लिखा है- ‘शिक्षक और सड़क दोनों एक समान होते हैं। दोनों स्थिर होकर दूसरों को मंजिल तक पहुंचाते हैं।’

यहीं हमें स्कूल मैनेजमेंट कमेटी के सदस्य कैप्टन धनसिंह बाफला मिलते हैं, जो सेना से रिटायर्ड हैं। वे कहते हैं- ढाई साल पहले भी ऐसा हुआ था, तब स्कूल के मंदिर में पूजा कराई गई थी। फिर सब शांत हो गया। अब दोबारा होने लगा है।

मैं बच्चियों के खान-पान और उम्र (13 से 17 साल की स्टूडेंट्स में ही दिख रहा है) की तरफ इशारा करती हूं, जिसे खारिज करते हुए वे कहते हैं- ये सब कुछ नहीं, जो है प्राकृतिक है। तभी तो मंदिर की पूजा काम आई थी।

शाम ढलने से पहले हम शहर लौट आते हैं, जहां के डुग बाजार में हमारी मुलाकात होती है दयाल सिंह दानु से। वे ‘पुछारी’ हैं, जो झाड़-फूंक भी करता है और रूठे देवताओं को भी मनाता है।

तकरीबन 50 की उम्र के दयाल पूजा-पाठ के सामान के साथ रूटीन चीजें भी बेचते हैं। हालांकि, इसकी कोई जरूरत नहीं। मेरी स्थानीय मित्र बताती हैं कि एक झाड़-फूंक पर उन्हें 5 से 10 हजार रुपए मिल जाते हैं। रोज ऐसे कई मामले आते हैं।

खुद दयाल कहते हैं- हर दिन बच्चे आ रहे हैं। सबको एक जैसी परेशानी। ये कोई बीमारी नहीं कि दवा दी, इंजेक्शन लगाया और बच्चा ठीक। घरवाले हमारे पास लाते हैं। हम नाखून देखते हैं और समझ जाते हैं कि देवता लगे हैं, या छल।

इलाज कैसे करते हैं? भभूति लगाकर कहते हैं कि जो भी बच्चे के शरीर में है, वो चला जाए। उसे जो चाहिए होगा, हम दे देंगे।

अगर छल या देवता हैं तो हमेशा ही ऐसा क्यों नहीं होता, बारिश में ही क्यों होता है? मेरे सवाल पर दयाल जोर से हंस देते हैं। फिर कहते हैं- प्रेतात्मा तो हवा होती है। हवा का क्या है, कभी भी चल जाएगी। कभी शांत रहती है, कभी चल निकलती है। आजकल यही हो रहा है।

मैं इसरार करती हूं कि मेरे भी नाखून देखकर बताएं कि मुझे भी तो कुछ नहीं लगा। वे सुबह खाली पेट आने को कहकर लौटा देते हैं।

छल, ऊपरी साया, देवता लगना- जैसी तमाम बातों के बीच बच्चियों के हालात जस के तस हैं। वे खौफ में हैं कि कोई अनजान ताकत कभी भी उनके शरीर पर कब्जा कर लेगी। इधर हमारे पास भी सवाल ही सवाल हैं। बारिश में ही ऐसा क्यों होता है। लड़कियों के साथ ही क्यों होता है। पहाड़ों पर ही क्यों होता है।

सनेती के स्कूल कैंपस में ये सरस्वती मंदिर भी है, जहां मन्नत की ढेरों घंटियां लटकी हैं। पास ही नंदा देवी का मंदिर भी है, जिन पर स्थानीय लोगों को बहुत आस्था है।
सनेती के स्कूल कैंपस में ये सरस्वती मंदिर भी है, जहां मन्नत की ढेरों घंटियां लटकी हैं। पास ही नंदा देवी का मंदिर भी है, जिन पर स्थानीय लोगों को बहुत आस्था है।

सवालों के अंधड़ के बीच हमारी मुलाकात डॉ. केएस रावत से हुई, जो डायट टीचर भी हैं। उनके पैतृक गांव में भी यही घटना हाल में हुई। वे याद करते हैं- अपने इतने सालों के करियर में हर साल कहीं न कहीं ये देख रहा हूं।

रहा सवाल पहाड़ों पर ही ऐसा होने का, तो कई वजहें हैं। यहां बारिश बहुत भयंकर होती है। कई बार गड़ी हुईं लाशें नदी-नालों से बहकर ऊपर आ जाती हैं। स्कूल जाने के लिए जंगलों से गुजरते बच्चे ऐसी डरावनी चीजें देखते हैं। वे किसी से कह नहीं पाते, आपस में ही बात करते रहते हैं। यही असर रहता है कि किसी दिन अचानक एक बच्चा डरे तो सबके सब डर जाते हैं।

किशोर उम्र की बच्चियां वैसे ही कई बदलावों से गुजर रही होती हैं। उनके शरीर में कैल्शियम-आयरन की कमी से भी ऐसा हो सकता है कि वे दहशत में जल्दी आ जाएं।

डॉ. रावत पहले ऐसे शख्स थे, जो साइंस की बात कर रहे थे। वे इसे मानसिक बीमारी कहते हुए काउंसिलिंग की बात भी कहते हैं, लेकिन दबी जबान से। आखिर में कहते हैं- देवभूमि को बेकार में लोग प्रेतभूमि बना रहे हैं।

इंटरव्यू का सिलसिला खत्म हो चुका। मैं बागेश्वर की सरयू नदी पर हूं। पहाड़ों के बीच बहती इसी नदी के चारों ओर शहर बसा है। साल 1903 में बना पुल शहर के दोनों छोरों को जोड़ता है। साथ की मित्र बताती हैं- कुछ दिन पहले यहीं से एक आदमी ने छलांग लगा दी। लाइफ जैकेट, रस्सी, सब फेंकी गई। बचने के लिए वो हाथ-पैर भी मार रहा था, लेकिन उफनते पानी में बह गया।

बातचीत के बीच सरयू आरती शुरू हो जाती है। धर्म-आस्था से परे नदी की पूजा। प्रकृति की पूजा। मैं कुसुम की आंखें याद करती हूं। बरसात में उफनती नदी की तरह वो भाव, जिसे रिकॉर्ड करते हुए मेरा कैमरा थरथरा गया था। उसने कहा था- डर लगे तो भी, जाना तो होगा!

वहां से लौटकर अभी मैं दिल्ली पहुंची ही थी कि कल शाम यानी 31 अगस्त को फोन की घंटी बजी। खबर थी- सनेती के इंटर कॉलेज में एक बार फिर कई लड़कियों ने दीवार पर सिर मारने की कोशिश की। जिसके बाद स्कूल में छुट्टी कर दी गई। चीफ मेडिकल ऑफिसर अब इसकी तफ्तीश कर रहे हैं।

अब इस पोल से होकर भी गुजर जाइए

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