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भास्कर एक्सक्लूसिव:उत्तराखंड में 1 साल में उपचुनाव नहीं हो सकते थे इसलिए रावत ने इस्तीफा दिया, बंगाल की CM ममता बनर्जी पर ऐसा कोई संवैधानिक संकट नहीं

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी
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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे तीरथ सिंह के इस्तीफे के बाद कयास लगने शुरू हो गए हैं कि केंद्र अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी पद छोड़ने का दबाव बनाएगा। दरअसल, ममता बनर्जी भी अपनी सीट से चुनाव हार गई थीं, लेकिन उसके बाद भी वे मुख्यमंत्री बनीं। संविधान के मुताबिक, किसी न किसी सीट पर 6 महीने के भीतर उपचुनाव कराकर उन्हें चुनाव जीतना होगा।

यही स्थिति तीरथ रावत की भी थी। उन्हें सांसद होते हुए राज्य का सीएम बनाया गया था, वे विधानसभा के सदस्य नहीं थे, इसलिए पार्टी ने उनसे इस्तीफा दिलवा दिया। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप के मुताबिक, दोनों राज्यों की तुलना करना ठीक नहीं है। उन्होंने भास्कर के साथ विशेष बातचीत में इस घटनाक्रम से जुड़े तमाम पहलुओं पर चर्चा की।

सवाल: क्या तीरथ रावत से इस्तीफा दिलाकर केंद्र ने बंगाल की मुख्यमंत्री पर दबाव बनाने का रास्ता साफ कर लिया है?
जवाब:
दोनों राज्यों का कोई मेल नहीं है। उत्तराखंड विधानसभा का 5 साल का कार्यकाल 17 मार्च 2022 को पूरा हो रहा है। यानी यहां अगले साल फरवरी 2022 में चुनाव होने हैं। लिहाजा, वहां निर्वाचन आयोग के नियमों के मुताबिक 1 साल के कम कार्यकाल बचने के दौरान संवैधानिक रूप से उपचुनाव नहीं हो सकते।

रावत ने 10 मार्च को शपथ ली थी। अनुच्छेद 164 (4) के अनुसार, उन्हें 6 महीने के भीतर विधानसभा की सदस्यता लेना अनिवार्य है। हालांकि, रावत जब सीएम बने तब कोई सीट खाली नहीं थी, जहां से वो चुनाव लड़ सकें। ये अलग बात है कि पार्टी आलाकमान किसी सेफ सीट को खाली करवाती और उन्हें 17 मार्च 2020 से पहले विधानसभा पहुंचाती, ताकि उनकी कुर्सी संवैधानिक रूप से सुरक्षित रहे।

हालांकि ऐसा हुआ नहीं। भाजपा विधायकों के निधन से राज्य में गंगोत्री (23 अप्रैल को) और हल्द्वानी (13 जून को) दो सीटें खाली हुई थीं। लेकिन ये सीटें एक साल से कम समय में खाली हुई थीं ,इसलिए संवैधानिक नियमों के मुताबिक यहां चुनाव करवाना नहीं था। जबकि बंगाल में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। ममता बनर्जी 6 महीने के भीतर उपचुनाव करवा सकती हैं।'

सवाल: क्या कोविड की वजह से निर्वाचन आयोग ये कर सकता है कि छह महीने बंगाल में उपचुनाव ही न होने दे?
जवाब: मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। विधानसभा चुनाव उस वक्त हुए, जब कोरोना संक्रमण चरम पर था। निर्वाचन आयोग ऐसा कदम नहीं उठाएगा, जिससे उस पर सीधे सवाल खड़े हों।' ममता बनर्जी ने 4 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। ऐसे में उन्हें शपथ लेने के दिन से छह महीने के अंदर यानी 4 नवंबर तक विधानसभा का सदस्य बनना संवैधानिक बाध्यता है।

लेकिन वह विधानसभा की सदस्य तभी बन पाएंगी जब तय अवधि के अंदर चुनाव हो सके। कोरोना की वजह से केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने सभी चुनाव स्थगित किए हुए हैं। चुनाव प्रक्रिया कब से शुरू होगी, इस बारे में अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसे में अगर नवंबर तक भवानीपुर उपचुनाव के बारे में चुनाव आयोग फैसला नहीं लेता है तो ममता की गद्दी के लिए भी खतरा हो सकता है। हालांकि ये भी संभव है कि अगर चुनाव नहीं हुए तो ममता इस्तीफा देकर अपने किसी विश्वासपात्र को चुनाव होने तक कुर्सी सौंप दें।

ममता ने अपने लिए एक सीट (भवानीपुर) खाली भी करा ली है। राज्य के कृषि मंत्री शोभनदेव चट्‌टोपाध्याय ने उनके लिए यह सीट खाली की है। बंगाल में अभी भवनीपुर के अलावा दो और सीटें भी खाली हैं, जहां चुनाव होने है। इसके साथ ही ममता के खास रहे मुकुल रॉय को भी अपनी सीट से इस्तीफा देना पड़ सकता है। क्योंकि वे भाजपा के टिकट से जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। हालांकि बाद में उन्होंने टीएमसी में वापसी कर ली।

सवाल: बंगाल में ममता बनर्जी ने विधान परिषद गठन करने का कदम उठाया है। क्या परिषद के रास्ते वे मुख्यमंत्री पद पर बने रहने का अपना रास्ता साफ कर रही हैं?
जवाब: ऐसी चर्चाएं हैं, पर मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई दम है, जहां तक मैं जानता हूं, ममता बनर्जी अपने लिए सीट खाली भी करवा चुकी हैं और उन्हें चुनाव जीतने में भी कोई दिक्कत नहीं आएगी। लिहाजा विधान परिषद का गठन इस मंशा से हुआ हो मैं इससे सहमत नहीं।

ऐसा कहीं दर्ज तो नहीं, पर एक अनौपचारिक बैठक में सरदार पटेल के साथ कई लोग थे। तब पटेल ने कहा था कि राज्य में अपर हाउस इसलिए बनाया जाता है, ताकि बेरोजगार राजनेताओं को समायोजित किया जा सके। अगर ऐसा नहीं किया तो यह लोग गड़बड़ियां पैदा कर सकते हैं। मुझे यह बात उस अनौपचारिक बैठक में शामिल एक व्यक्ति ने बताई थी।

जो लोग विधान परिषद के गठन को ममता बनर्जी के उपचुनाव न लड़ने से जोड़कर देख रहे हैं, उन्हें खुद से कुछ सवाल करने चाहिए। उन्हें पूछना चाहिए कि केंद्र की मुहर के बिना राज्य के अपर हाउस का गठन हो नहीं सकता और सभी जानते हैं कि केंद्र और राज्य के संबंध कैसे हैं? क्या केंद्र ममता बनर्जी के फायदे के लिए इस पर मुहर लगाएगा? क्या यह बात ममता नहीं जानतीं?

सवाल: तीरथ सिंह रावत ने कहा कि सवाल: उन्हें संवैधानिक संकट की वजह से इस्तीफा देना पड़ा। क्या वाकई तीरथ को बचाने का कोई रास्ता नहीं था?
जवाब: बिल्कुल था, 10 सितंबर को तीरथ के छह महीने पूरे होने थे। उन्हें यह कार्यकाल पूरा करने देते। संविधान भले ही इस अवधि में उपचुनाव करवाने की अनुमति न देता हो, लेकिन विधानसभा चुनाव तय तारीख से छह महीने पहले कभी भी करवाए जा सकते हैं। लिहाजा सितंबर में केंद्र चाहता तो उत्तराखंड के चुनाव हो सकते थे। तीरथ रावत को हटाने का कारण मुझे संवैधानिक संकट नहीं बल्कि राजनीतिक लगता है।

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