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आज की पॉजिटिव खबर:पाकिस्तान से आए 5वीं पास विष्णु एप्लिक आर्ट से साड़ियां बनाते हैं, 20 लाख टर्नओवर, 500 महिलाओं को नौकरी दी

14 दिन पहले

गुजरात के बनासकांठा के रहने वाले विष्णु सुथार का परिवार 1971 में पाकिस्तान से भारत आया। उनके पिता एप्लिक आर्ट का काम करते थे। भारत आने के बाद उन्हें रिफ्यूजी कैंप में रहना पड़ा। वे मजदूरी करके गुजारा करते थे। बाद में विष्णु ने अपने पिता के आर्ट को आगे बढ़ाया और एप्लिक वर्क से साड़ियां, दुपट्टे, चादर जैसी चीजें बनानी शुरू कीं। जल्द ही उनके प्रोडक्ट को पहचान मिलने लगी। देशभर से उन्हें ऑर्डर मिलने लगे। अभी वे इससे सालाना 20 लाख रुपए का बिजनेस कर रहे हैं। 500 से ज्यादा महिलाओं को उन्होंने रोजगार भी दिया है।

भास्कर से बात करते हुए विष्णु कहते हैं कि हमारा परिवार पाकिस्तान के नगरपारकर में रहता था, लेकिन हमारी ज्यादातर जमीनें गुजरात बॉर्डर के पास थीं। साल 1971 की लड़ाई के बाद मेरे पिता परिवार सहित राजस्थान के बाड़मेर आ गए। यहां वे लोग रिफ्यूजी कैंप में रहने लगे। करीब 3 साल तक वे लोग यहां रहे। उसके बाद गुजरात के बनासकांठा आ गए। यहां कुछ सालों तक उन्होंने मजदूरी की और साथ में एप्लिक वर्क भी करते रहे। इससे थोड़ी बहुत आमदनी हो जाती थी।

विष्णु बड़े हुए तो नए सिरे से शुरू किया काम

तस्वीर में गुजरात की पूर्व CM आनंदीबेन पटेल विष्णु के बनाए प्रोडक्ट देखती हुईं।
तस्वीर में गुजरात की पूर्व CM आनंदीबेन पटेल विष्णु के बनाए प्रोडक्ट देखती हुईं।

39 साल के विष्णु कहते हैं कि परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इसलिए पढ़ाई नहीं हो सकी, 5वीं तक ही पढ़ सके। इसके बाद पिता के साथ काम करने लगे। तब हम लोग एप्लिक आर्ट से चादर और तकिए का कवर बनाते थे। उस वक्त इसका ज्यादा क्रेज नहीं था और हम लोग मार्केट तक पहुंच भी नहीं पा रहे थे। ज्यादातर प्रोडक्ट हम छोटे शहरों में बेचते थे। लिहाजा हमारी अच्छी कमाई नहीं हो रही थी। बहुत मुश्किल से परिवार चल रहा था।

उन्होंने आगे बताया, 'फिर मुझे किसी ने सुझाव दिया आप इस आर्ट को साड़ी और दुपट्टे बनाने में इस्तेमाल करिए, क्योंकि साड़ियों का मार्केट ज्यादा है और बड़े शहरों में इसकी डिमांड है। मुझे भी यह सुझाव अच्छा लगा और मैंने घर से ही एप्लिक आर्ट से कुछ साड़ियां बनाईं और स्थानीय मार्केट में लेकर गया, जो लोगों को खूब पसंद आईं। इसके बाद कई दुकानदारों ने कहा कि आप हमारे लिए इस तरह की साड़ियां बनाकर दीजिए, हम उसकी मार्केटिंग करेंगे। इस तरह हमारा काम चलने लगा। धीरे-धीरे अच्छी कमाई होने लगी।'

डिमांड बढ़ी तो गांव की महिलाओं को ट्रेनिंग देना शुरू किया

विष्णु शुरुआत में लोकल मार्केट और अलग-अलग जगहों पर स्टॉल लगाकर अपने प्रोडक्ट बेचते थे।
विष्णु शुरुआत में लोकल मार्केट और अलग-अलग जगहों पर स्टॉल लगाकर अपने प्रोडक्ट बेचते थे।

विष्णु कहते हैं कि कुछ ही सालों में हमारा काम गुजरात के कई जिलों में पहुंच गया। तब हमारे पास टीम नहीं थी। खुद से ही परिवार के लोग मिलकर काम करते थे। जब डिमांड बढ़ी तो मैंने सोचा कि टीम बढ़ाई जाए, लेकिन दिक्कत ये थी कि यहां के लोगों को काम के बारे में जानकारी नहीं थी। फिर मैंने कुछ स्थानीय महिलाओं से बात की जो दूसरों के घरों में काम और मजदूरी करती थीं। वे हमारे साथ काम करने के लिए राजी हो गईं। फिर मैंने उन्हें काम सिखाया, एप्लिक आर्ट की ट्रेनिंग दी। इसके बाद हम डिमांड के मुताबिक प्रोडक्ट की सप्लाई करने लगे। साथ ही जरूरत के मुताबिक अपनी टीम भी बढ़ाते गए।

अभी विष्णु के साथ करीब 500 महिलाएं जुड़ी हैं। जो अपने घरों में काम करने के साथ ही पार्ट टाइम एप्लिक वर्क करती हैं और साड़ी, सूट, दुपट्टे, चादर जैसी चीजें बनाती हैं। इससे इन महिलाओं की भी अच्छी कमाई हो जाती है।

सोशल मीडिया और वॉट्सऐप के जरिए देशभर में कर रहे मार्केटिंग

विष्णु बताते हैं कि हम लोग साड़ी, दुपट्टे सहित दर्जन भर से ज्यादा वैराइटी के प्रोडक्ट तैयार करते हैं।
विष्णु बताते हैं कि हम लोग साड़ी, दुपट्टे सहित दर्जन भर से ज्यादा वैराइटी के प्रोडक्ट तैयार करते हैं।

मार्केटिंग को लेकर विष्णु बताते हैं कि शुरुआत में हम लोग दुकानों पर जाकर और स्टॉल लगाकर अपना प्रोडक्ट बेचते थे। इससे अच्छी खासी कमाई हो जाती थी, लेकिन कोरोना में जब ऑफलाइन काम बंद हो गया, तो हमने सोशल मीडिया की मदद ली। चूंकि मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूं तो NIFT के जो छात्र मेरे पास सीखने आते थे, उन्होंने ही मेरे सोशल मीडिया अकाउंट बना दिया। वॉट्सऐप पर ग्रुप बना दिया। जिसके बाद दूसरे राज्यों के लोग भी हमारे प्रोडक्ट की डिमांड करने लगे। इस तरह हमारा काम आगे बढ़ गया।

वे कहते हैं कि अब आम लोगों के साथ ही बॉलीवुड से जुड़े लोग भी हमारे प्रोडक्ट खरीदते हैं। मेरा आर्ट देखकर संजय दत्त ने मुझे अपने घर बुलाया था। उनके घर के लिए हमने कई चीजें डिजाइन कीं। साउथ की कई एक्ट्रेस के लिए भी मैंने ड्रेस डिजाइन की है। अभी हमारे पास हर महीने सैकड़ों ऑर्डर आते हैं। हर साल 20 लाख से ज्यादा का कारोबार करते हैं। हमारी एक साड़ी कीमत 5 हजार रुपए से लेकर 50 हजार रुपए तक है।

एप्लिक आर्ट क्या होता है?

विष्णु के साथ अभी 500 से ज्यादा महिलाएं जुड़ी हैं। इनमें बुजुर्ग महिलाएं भी हैं जो इससे जुड़कर अपना खर्च निकाल रही हैं।
विष्णु के साथ अभी 500 से ज्यादा महिलाएं जुड़ी हैं। इनमें बुजुर्ग महिलाएं भी हैं जो इससे जुड़कर अपना खर्च निकाल रही हैं।

एप्लिक आर्ट दो कपड़ों की मदद से बनाया जाता है। इसमें पहले कपड़े को अपने डिमांड की डिजाइन के मुताबिक काट लिया जाता है। उसके बाद उसकी डिजाइन बनाकर दूसरे कपड़े के ऊपर लगा दिया जाता है। इसमें साड़ी, सूट, दुपट्टा, चादर और तकिए कवर बनाए जाते हैं। गुजरात में इस आर्ट की काफी डिमांड है। वहां के लोग लंबे समय से इस आर्ट पर काम करते रहे हैं। अब इसकी देश के दूसरे राज्यों में भी डिमांड बढ़ रही है। कमर्शियल लेवल पर इससे जुड़े कई आर्टिस्ट काम कर रहे हैं और अच्छी कमाई कर रहे हैं।

कोरोना के दौरान मास्क बनाकर बेचने लगे

विष्णु कहते हैं कि कोरोना के दौरान जब मार्केट बंद हो गया और साड़ियों की डिमांड कम हो गई तो हमने एक नया काम शुरू किया। चूंकि हम लोग सिलाई-बुनाई से जुड़े हैं तो हमने मास्क बनाना शुरू कर दिया। तब मास्क की भरपूर डिमांड थी। इसलिए हमने मौके को भांपते हुए उस पर काम करना शुरू कर दिया। इसका हमें फायदा भी मिला और अच्छी कमाई भी हुई। हमने 3 लाख से ज्यादा के मास्क बेचे। अभी भी हम लोग मास्क बना रहे हैं।

विष्णु कहते हैं कि हमारी साड़ियों की डिमांड बॉलीवुड में भी है। साउथ की कई एक्ट्रेस ने भी हमसे साड़ियां खरीदी हैं।
विष्णु कहते हैं कि हमारी साड़ियों की डिमांड बॉलीवुड में भी है। साउथ की कई एक्ट्रेस ने भी हमसे साड़ियां खरीदी हैं।