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कामाख्या देवी दुनिया का सबसे बड़ा तंत्र पीठ:यहां 9 नहीं, 15 दिनों तक चलता है उत्‍सव, नवरात्र में होती है 45 कुमारी पूजा

2 महीने पहले
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कामाख्या मंदिर देश की 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यताओं के अनुसार, माता सती की योनि कामाख्या नामक स्थान पर गिरी थी। तभी से यहां कामाख्या पीठ की स्थापना हुई। वर्तमान मंदिर का निर्माण 15वीं शताब्दी का माना जाता है। 51 शक्तिपीठ में से सिर्फ कामाख्या मंदिर को महापीठ का दर्जा हासिल है, लेकिन इस मंदिर में मां दुर्गा और मां जगदंबा का कोई चित्र और मूर्ति नहीं है। भक्त मंदिर में बने एक कुंड पर फूल अर्पित कर पूजा करते हैं।

असम में गुवाहाटी के नीलांचल पर्वत पर कामाख्या देवी मंदिर है। मंदिर परिसर के आसपास कुल दंस मंदिर हैं, इसके गर्भगृह में सोने के बने तीन दरवाजे हैं। यहां 15 दिनों तक चलने वाली दुर्गा पूजा का उत्सव 19 सितंबर से शुरू हो गया है। यहां दुर्गा पूजा के आयोजन का लंबा इतिहास रहा है और यह उत्सव भारत के अन्य हिस्सों से काफी अलग होता है।

नवरात्र के पहले मंदिर को इस प्रकार सजाया गया
नवरात्र के पहले मंदिर को इस प्रकार सजाया गया

यहां कृष्ण पक्ष की नवमी से ही शुरू होता है उत्‍सव, दुर्गा पूजा के साथ शुरू होती है कुमारी पूजा

नवरात्र के समय कामाख्या मंदिर में कुल 15 दिनों का उत्सव होता है, यह आयोजन कृष्ण पक्ष नवमी से शुरू हो जाता है और शुक्ल पक्ष नवमी में समाप्त होता है। इसलिए इसे पखुआ पूजा भी कहा जाता है। कामाख्या मंदिर के वरिष्ठ पुरोहित मोहित चंद्र शर्मा बताते हैं, " कामाख्या मंदिर में दुर्गा पूजा बिलकुल अलग है। हमारे यहां नवरात्रि से दुर्गा पूजा के साथ ही कुमारी पूजा शुरू होती है। नवरात्र में बाहर से काफी लोग यहां चंडी पाठ करने आते हैं, लेकिन यहां दुर्गा पूजा शुरू होने के पहले दिन से चंडी पाठ शुरू हो जाता है।"

कामाख्या मंदिर विश्व का सर्वोच्च कुमारी तीर्थ भी माना जाता है। इसलिए इस शक्तिपीठ में कुमारी-पूजा अनुष्ठान का अत्यंत महत्व है। ऐसी मान्यता है कि कुमारी पूजा यहां की जाने वाली लगभग सभी प्रमुख पूजाओं में से एक है और खासकर यह दुर्गा पूजा के समय होती है।

कामाख्या देवालय के कोषाध्यक्ष रिदीप शर्मा बताते हैं, "हमारे यहां 19 सितंबर से दुर्गा पूजा शुरू हो गई है। इस उत्सव के साथ ही 26 सितंबर से शुरू हो रहे नवरात्र के पहले दिन एक कुंवारी लड़की (कुमारी) की पूजा की जाती है। इस तरह दूसरे दिन दो लड़कियों की, तीसरे दिन तीन लड़कियां ऐसे नवरात्र में कुल 45 लड़कियों की कुमारी पूजा होती है। "ऐसा कहा जाता है कि कुमारी पूजा सभी संकटों को दूर करती है। इसका दार्शनिक आधार नारी के मूल्य की स्थापना करना है। नारी उन शक्तियों के बीज का प्रतीक है जो सृजन, स्थिरता और विनाश को नियंत्रित करती हैं।

कामाख्‍या देवी मंदिर में ऐसे होती है कुमारी पूजा
कामाख्‍या देवी मंदिर में ऐसे होती है कुमारी पूजा

कामाख्या मंदिर में पूजा करने के लिए 10वीं सदी में उत्तर प्रदेश के कन्नौज से लाए गए थे पुजारी

कामाख्या मंदिर के जो पुजारी हैं उनके परिवार को बोरदेउरी समाज कहते हैं। असम में ज्यादातर मंदिरों के मुख्य पुजारी को बोरदेउरी कहा जाता है। बोरदेउरी शब्द असम में अहोम राजा के शासन के समय से इस्तेमाल हो रहा है।

मोहित चंद्र शर्मा का परिवार कन्नौज से कामाख्या आया था। वह बताते हैं, 'कामाख्या मंदिर में पुजारियों का इतिहास एक हजार साल पुराना है। यह 10वीं सदी की बात है जिस समय असम में पाल राजवंश का साम्राज्य था उस दौरान राजा धर्मपाल ने मां कामाख्या की पूजा के लिए उत्तर प्रदेश के कन्नौज से पांच पुजारी के परिवार को कामाख्या में लाकर बसाया था। उसी समय से हमारा परिवार कामाख्या देवी की पूजा करते आ रहा है। इस समय चार परिवार बचे हैं, जिनके परिवार के कुल पुरुष सदस्यों की संख्या 465 है। एक पुजारी का परिवार अब नहीं है। यही लोग कामाख्या मंदिर के मूल पुजारी हैं। एक निश्चित समय के बाद प्रत्येक परिवार के पुजारी की कामाख्या में पूजा करने की बारी आती है'।

स्वामी विवेकानंद भी रुक चुके हैं कामाख्या मंदिर के पुजारी के घर

मोहित चंद्र शर्मा बताते हैं, "कामाख्या मंदिर के 90 फीसदी पुजारी का घर मंदिर में आने वाले दर्शनार्थियों से चलता है। कोविड के दौरान पुजारियों को आर्थिक तौर पर बहुत परेशानी उठानी पड़ी। क्योंकि हमारे यहां पंडा (पुजारी) के घर पर रात को रुकने की बहुत पुरानी परंपरा रही है। साल 1901 में स्वामी विवेकानंद भी कामाख्या में एक पंडा के घर पर तीन दिन रुके थे। इस परंपरा के तहत बाहर के प्रदेशों से आने वाले यजमान पंडा के घर पर ही रुकते हैं। यहां के पंडा अपने यजमान के लिए घर पर एक-दो कमरे हमेशा उपलब्ध रखते हैं और इस तरह उन्हें यजमान से कुछ पैसा मिल जाता है। लेकिन कोविड के कारण भक्तों के नहीं आने से सबको काफी आर्थिक नुकसान उठाना पडा।"

कामाख्या मंदिर के पुरोहित परिवार से आने वाले रिदीप शर्मा कहते हैं कि कामाख्या मंदिर महाभारत के कुरूक्षेत्र के युद्द से पहले का है। नरकासुर ने इस मंदिर को बनाया था। नरकासुर का पुत्र भगदत्त कामरूप का राजा था जिसने कुरूक्षेत्र के युद्द में कौरवों का साथ दिया था। लिहाजा कामाख्या मंदिर कुरूक्षेत्र के युद्द से पहले का है।

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