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  • Wanted To Go Into The Army, If The NDA Could Not Qualify, Then Farming Became A Career; Today Earning Millions Every Month From Integrated Farming

आज की पॉजिटिव खबर:सेना में जाना चाहते थे, NDA क्वालिफाई नहीं कर पाए तो खेती को ही करियर बनाया; आज इंटीग्रेटेड फार्मिंग से हर महीने लाखों कमा रहे

नई दिल्ली3 महीने पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र
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पंजाब के फाजिल्का जिले के रहने वाले सुरेंद्र पाल सिंह 10वीं पास हैं, लेकिन खेती में लगातार नए प्रयोग और अपनी मेहनत के दम पर अच्छा-खासा मुनाफा कमा रहे हैं। - Dainik Bhaskar
पंजाब के फाजिल्का जिले के रहने वाले सुरेंद्र पाल सिंह 10वीं पास हैं, लेकिन खेती में लगातार नए प्रयोग और अपनी मेहनत के दम पर अच्छा-खासा मुनाफा कमा रहे हैं।

आज की पॉजिटिव खबर में बात पंजाब के फाजिल्का जिले के रहने वाले सुरेंद्र पाल सिंह की। 10वीं पास सुरेंद्र सिंह पेशे से किसान हैं। 100 एकड़ से ज्यादा जमीन पर इंटीग्रेटेड फार्मिंग कर रहे हैं। वे फ्रूट्स, सब्जियां, धान, गेहूं और कपास की खेती करते हैं और इससे प्रोडक्ट तैयार करके मार्केट में सप्लाई करते हैं। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली सहित देश के कई राज्यों में इनके कस्टमर्स हैं। इससे हर महीने वे लाखों की कमाई कर रहे हैं।

60 साल के सुरेंद्र सिंह किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इनके पिता आर्मी में थे। इसलिए सुरेंद्र भी सैनिक बनना चाहते थे। वे कहते हैं, 'मेरे गांव में लोग या तो किसानी करते हैं या फिर सेना में जाते हैं। मैंने भी सेना में भर्ती होने के लिए पूरी कोशिश की। सैनिक स्कूल का रिटेन एग्जाम क्लियर किया, लेकिन फाइनल राउंड में जगह नहीं बना सका। इसके बाद NDA की तैयारी की, लेकिन उसमें भी सफल नहीं हो सका। इसके बाद मैंने तय किया कि अब खेती ही करेंगे।'

सुरेंद्र अभी 100 एकड़ से ज्यादा जमीन पर खेती कर रहे हैं। वे कपास के साथ फल, सब्जियां, धान और गेहूं उगाते हैं।
सुरेंद्र अभी 100 एकड़ से ज्यादा जमीन पर खेती कर रहे हैं। वे कपास के साथ फल, सब्जियां, धान और गेहूं उगाते हैं।

पारंपरिक खेती छोड़कर इंटीग्रेटेड फार्मिंग पर जोर

सुरेंद्र बताते हैं कि पहले उनका परिवार पारंपरिक खेती करता था। शुरुआत में उन्होंने भी पारंपरिक खेती ही की। इसके बाद वे ऑर्गेनिक और इंटीग्रेटेड खेती की तरफ मूव कर गए। उन्होंने अपने जमीन के कुछ हिस्से में साइट्रस प्रजाति के अलग-अलग वैराइटी के बीज लगाए और बागवानी शुरू की। दूसरे हिस्से में कपास और बाकी जमीन पर धान-गेहूं और सब्जियों की खेती शुरू की। इसके साथ ही उन्होंने पशुपालन का भी काम शुरू कर दिया। इससे उन्हें अच्छी कमाई होने लगी।

सुरेंद्र अभी 100 एकड़ से ज्यादा जमीन पर खेती कर रहे हैं। इनमें 50 एकड़ जमीन पर उन्होंने बाग लगाए हैं। 5 एकड़ जमीन पर वे कपास की खेती करते हैं और बाकी जमीन पर धान-गेहूं और सब्जियों की खेती कर रहे हैं। उनके पास 50 से ज्यादा गाय भी हैं। जिनसे दूध और घी निकालकर वे मार्केट में सप्लाई करते हैं। सुरेंद्र कहते हैं कि पहले मैं अपना प्रोडक्ट लोकल मंडियों और मार्केट में भेजता था, लेकिन आज हमारे पास पंजाब के बाहर से भी कई कस्टमर्स आते हैं और अपनी जरूरत के प्रोडक्ट खरीदकर ले जाते हैं।

खेती के साथ-साथ सुरेंद्र पशुपालन का भी काम करते हैं। वे दूध और घी बनाकर मार्केट में सप्लाई करते हैं।
खेती के साथ-साथ सुरेंद्र पशुपालन का भी काम करते हैं। वे दूध और घी बनाकर मार्केट में सप्लाई करते हैं।

प्रोडक्शन के साथ-साथ प्रोसेसिंग भी

सुरेंद्र बताते हैं कि पहले देसी कपास की खेती होती थी, लेकिन अब देसी कपास उगाने वाले किसान भी बहुत कम ही देखने को मिलते हैं। ज्यादातर किसान हाइब्रिड किस्म (BT Cotton) लगाते हैं। जो पशुओं के लिए नुकसानदायक होता है। सुरेंद्र प्योर ऑर्गेनिक कपास की खेती करते हैं ताकि उससे रूई निकालने के बाद जो बिनौला बचता है, उसे पशुओं को खिलाया जा सके। वे कहते हैं कि पहले चरखों या हथकरघों पर इसकी कताई, बुनाई करके कपड़ा बनाया जाता था, लेकिन आज के दौर में आपको चरखे ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेंगे। इसलिए मैंने तय किया कि क्यों न खुद से ही कपड़ा तैयार किया जाए।

पिछले करीब एक दशक से वे कपास की खेती के साथ इससे तरह-तरह के कपड़े भी तैयार करवा रहे हैं। उन्होंने कुछ पावरलूम से कॉन्टेक्ट कर रखा है। जिन्हें वे रूई उपलब्ध कराते हैं और वे इनके लिए कपड़े तैयार करते हैं। उसके बाद सुरेंद्र उसे मार्केट में बेचते हैं। सुरेंद्र बताते हैं कि पहले मैं जब सिर्फ रूई निकालकर बेचता था तो कम फायदा होता था, लेकिन जब से कपड़े तैयार करवाकर बेच रहा हूं, आमदनी बढ़ गई है। आगे वे खुद की मशीन लगाने की योजना बना रहे हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा कपड़े तैयार करवाकर मार्केट में भेज सकें।

खेती के साथ-साथ सुरेंद्र अब प्रोसेसिंग पर भी जोर दे रहे हैं। वे एक तरफ जहां दाल और मसाले तैयार करते हैं, वहीं दूसरी तरफ कपास से कपड़े बनवाकर बेचते हैं।
खेती के साथ-साथ सुरेंद्र अब प्रोसेसिंग पर भी जोर दे रहे हैं। वे एक तरफ जहां दाल और मसाले तैयार करते हैं, वहीं दूसरी तरफ कपास से कपड़े बनवाकर बेचते हैं।

वे कहते हैं कि कपास की फसल ऐसी फसल है, जिसमें चुनाई से लेकर इसकी बुनाई तक के हर पड़ाव पर, लोगों को रोजगार दिया जा सकता है। जब उनके खेत में कपास की चुनाई होती है तो एक बार में करीब 45 कामगारों को रोजगार मिलता है। इसलिए आने वाले दिनों में इससे महिला समूहों को जोड़ने वाले हैं ताकि उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सके। सुरेंद्र के बच्चे भी पढ़ाई के बाद खेती से जुड़ गए हैं। वे लोग भी खेती में पिता का हाथ बंटाते हैं।

कपास की खेती कैसे करें?

सुरेंद्र कहते हैं- कपास की खेती किसी भी मिट्टी पर हो सकती है, लेकिन इसके लिए हल्की दोमट मिट्टी ज्यादा सूटेबल होती है। मार्च से लेकर अप्रैल महीने में कपास की बुआई होती है। जबकि इसे तैयार होने में 8 से 9 महीने का वक्त लगता है। इस दौरान चार से पांच बार सिंचाई की जरूरत होती है। सबसे ज्यादा ध्यान इसके रखरखाव को लेकर करना होता है। हमें केमिकल फर्टिलाइजर की जगह गोबर खाद का इस्तेमाल करना चाहिए।

सुरेंद्र अभी पांच एकड़ जमीन पर कपास की खेती कर रहे हैं। वे इसमें किसी तरह का केमिकल नहीं मिलाते हैं, पूरी तरह ऑर्गेनिक तरीके से खेती करते हैं।
सुरेंद्र अभी पांच एकड़ जमीन पर कपास की खेती कर रहे हैं। वे इसमें किसी तरह का केमिकल नहीं मिलाते हैं, पूरी तरह ऑर्गेनिक तरीके से खेती करते हैं।

कपास की खेती से अच्छी आमदनी होती है। देशी किस्मों की खेती से करीब 10 से 15 क्विंटल प्रति एकड़ और अमेरिकन हाइब्रिड से करीब 20 क्विंटल प्रति एकड़ तक पैदावार हो सकती है। बाजार में इसका भाव 5 हजार प्रति क्विंटल के हिसाब से होता है। किसान प्रति एकड़ करीब एक लाख से ज्यादा की कमाई कर सकता है।

इंटीग्रेटेड फार्मिंग कैसे करें?

इंटीग्रेटेड फार्मिंग मतलब एक समय में एक ही खेत में कई फसलों को उगाना। इसमें एक घटक को दूसरे घटक के उपयोग में लाया जा सकता है। जैसे अगर आप फलों और सब्जियों की खेती करते हैं तो आप गाय और भैंस भी पाल सकते हैं। आपको चारे की कमी नहीं होगी। दूसरी तरफ इन मवेशियों के गोबर का उपयोग ऑर्गेनिक खाद के रूप में किया जा सकता है। इससे कम लागत में अधिक कमाई होती है। साथ ही समय की भी बचत होती है।

सुरेंद्र अपने गांव के किसानों को तो खेती की ट्रेनिंग देते ही हैं, साथ ही उनसे मिलने के लिए विदेश से भी लोग आते हैं।
सुरेंद्र अपने गांव के किसानों को तो खेती की ट्रेनिंग देते ही हैं, साथ ही उनसे मिलने के लिए विदेश से भी लोग आते हैं।