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Sunday जज्बात:6 महीने तक दिन-रात अस्पताल, एंबुलेंस और लाशों के बीच रहा; अब तो मौत से भी डर नहीं लगता

मुंबई25 दिन पहलेलेखक: इकबाल ममदानी

अगस्त 2020 की बात है। चारों ओर रूह कंपाने वाला डर का मंजर था। हर कोई खौफ में सांस ले रहा था। जैसे ही मालूम पड़ता कि फलां आदमी को कोविड है तो हाहाकार मच जाता था। आंखों के सामने मौत नाचने लगती थी। मुंबई के मालवाणी इलाके में कोविड से पहली मौत हुई, लेकिन इस कदर इंसानियत और अपनेपन ने दम तोड़ दिया था कि दफन के लिए न तो परिवार से कोई आया और न समाज से। आनन-फानन में नगरपालिका ने उसे जला दिया। फिर वही हुआ जिसकी आशंका थी, दफन के लिए कोई नहीं आया, लेकिन मजहबी ठेकेदार बवाल करने आ गए।

मुझे पता लगा कि अस्पतालों में कोविड डेड बॉडीज बढ़ती जा रही हैं। मेरी पत्नी ने मुझे सलाह दी और कहा कि आप कोविड डेड बॉडीज को दफनाने का काम करें। मैंने अपने एक दोस्त के साथ इस काम को करने की ठानी। ​​​​​​

हालांकि वो वक्त अब निकल गया है, लेकिन जब चारों तरफ मौत और डर का तांडव था तो इस काम को करने की हिम्मत लाना आसान नहीं था। सबसे बड़ी मुश्किल थी कि डेड बॉडी के लिए एंबुलेंस नहीं मिलती थी। प्राइवेट एंबुलेंस ने डर के मारे काम बंद कर दिया था और सरकारी अस्पताल की एंबुलेंस जिस बॉडी को क्रिमेशन के लिए लेकर जाती थी, उसे अस्पताल से क्रिमेट करने या दफन करने में 6 से 8 घंटे लगते थे। एक दिन में सिर्फ 6 से 8 बॉडी ही क्रिमेट या दफन हो पाती थीं।

क्योंकि इससे ज्यादा बॉडी क्रिमेट करते तो मशीन के जलने की संभावना होती। अपने हाथ में हमें डेड बॉडी लेने में 16 से 18 घंटे लगते थे। अस्पतालों में डेड बॉडी की भीड़ लगने लगी थी जिसकी वजह से एक अलग ही महामारी फैलने का खतरा भी बढ़ रहा था। फिर मैंने सोचा कि हम खटारा जंग लगी एंबुलेंस लेते हैं और उसे ठीक करवाकर अपने ड्राइवर रखेंगे। पता करना शुरू किया तो कई ऐसी एंबुलेंस मिलीं। मैंने उन्हें टो करवा कर मैकेनिक तक पहुंचाया। अलग-अलग जगह से पार्ट्स हासिल किए। दो दिन में 7 एंबुलेंस ठीक करवाकर अस्पतालों में लगवा दी।

मैं जब अस्पताल डेड बॉडी लाने जाता था, तो वहां बहुत सारी डेड बॉडी रखी होती थी। पूछे जाने पर पता लगा कि इन लोगों के रिश्तेदारों ने इनकी बॉडी लेने से साफ इनकार कर दिया है। मुझे लगा कि ऐसे तो महामारी फैल जाएगी। मैंने गैर मुस्लिम डेड बॉडी की उनकी विधि अनुसार क्रिमेशन की इच्छा जाहिर की, जिसे प्रशासन ने फौरन मान लिया। क्योंकि उन डेड बॉडीज को कोई क्लेम करने ही नहीं आता था। परिवार फोन स्विच ऑफ कर देता था।

शुरुआत में बहुत डर लगा। लगभग 6 महीने तक परिवार से दूर रहे। फिर एक महीने के बाद लगने लगा कि सरकार ने जो नॉर्म्स दिए हैं उस तरह से काम करते हैं तो कोविड नहीं होगा। डर धीरे-धीरे काफूर होने लगा, लेकिन जो हालात मैंने देखे हैं वह बहुत खौफनाक थे, वो यादें परेशान करती हैं। उस वक्त की यादें चुभती हैं।

छह महीने मैं दिन-रात सिर्फ अस्पताल, एंबुलेंस और डेड बॉडी में रहा। कभी कभार सिर्फ फ्रेश होने के लिए ही घर आता था। कहीं-कहीं बिस्किट मिल जाते थे तो पीपीई किट में उसे ही खाकर गुजारा करता था। इस काम को करते-करते मेरे अंदर एक निजी तौर पर तब्दीली आई है कि अगर भगवान ने जिंदगी लिखी है तो मौत खुद उसकी इफाजत करेगी, जिसकी मौत आई है वह उसे लेकर ही जाएगी और उसे ही लेकर जाएगी। मौत से पहले मौत नहीं होगी। जब लेने वाला आएगा तो छोड़कर नहीं जाएगा। दुनिया फानी है, मौत ही सत्य है। कुछ अमर नहीं है। समय पूरा आपका रोल पूरा, सारा पैसा धरा का धरा रह जाएगा।

जब भी कोई डेड बॉडी आती थी तो उनके अपनों का ख्याल आता था, जिसने जिसे भी खोया है वह कभी पूरा न होने वाला नुकसान था, लेकिन मेरा मातम इसलिए बढ़ जाता था कि उनके अपने उस मौके पर उनके साथ नहीं थे। वो घरों से ही बाहर नहीं निकले। हम सारी उम्र एक ही उम्मीद में जीते हैं कि मरने पर हमारी औलाद या रिश्तेदार धर्म कर्म की सारी क्रियाएं करेंगे, लेकिन ऐसे में मां-बाप मरे तो औलाद साथ खड़ी नहीं हुई और औलाद मरी तो मां-बाप नहीं आए। कोई देखने तक नहीं आया। मेरे पास उसके लिए कोई शब्द ही नहीं।

इस काली सच्चाई ने मुझे झकझोर कर रख दिया। मेरा दुनिया से विश्वास खत्म हो गया है। विश्वास करना बंद कर दिया है मैंने कि बुरे वक्त में कोई साथ खड़ा होगा। इस डेढ़ साल ने इतना सिखा दिया है। इतना बदल दिया है कि अब लगता है कि जो हम अपने लिए करते हैं, वही काम आएगा, कभी कोई और काम नहीं आएगा। उम्मीद करना सबसे बेकार की बात है। मैंने यह भी सीखा कि ऐसे बुरे वक्त में संभल कर कैसे काम करना है, क्योंकि अब ऐसे वक्त आते रहेंगे। डेढ़ साल का वो वक्त सारी जिंदगी में कभी नहीं देखा। अपनों का इतना मतलबी रवैया कभी सोचा नहीं जा सकता है। जब अपना अपनों के साथ नहीं।

मेरे पास ऐसे हजार किस्से हैं। ओशिवारा कब्रिस्तान में एक महिला की डेड बॉडी लेकर आए और मैंने उनके बेटे से कहा कि आप जरा हाथ लगा दें। बेटे ने साफ शब्दों में मना कर दिया। उसने कहा कि आपको इसे दफनाना है तो दफनाओ, फेंकना है तो बेशक फेंक दें, लेकिन मैं हाथ नहीं लगाऊंगा। न उसने मिट्टी दी। फिर मैंने कहा कि कब्र में जरा मिट्टी डाल दें तो उनके पति ने चुटकी भर मिट्टी दूर से ही फेंक दी। जीवन का सत्य वहां से पता लगा। बच्चे आते ही नहीं थे। कहते थे कि पैसे बता दो कितने चाहिए।

हर डेड बॉडी के लिए परिवार की मिन्नतें करते थे, लेकिन सुना था कि बुरे वक्त में साया भी साथ छोड़ देता है, मैंने इसे देखा। इंश्योरेंस के पैसे के लिए बच्चों में मारामारी देखी। इंसानियत को दम तोड़ती देखी। मेरी यादों से ऐसे हजार किस्से हैं, जिन्हें मैं भूल ही नहीं सकता। एक दफा मुंबई के मालवाणी इलाके में कोविड के दौरान एक इमारत गिर गई, एक ही परिवार के सात बच्चों समेत 13 लोग मर गए, लेकिन कोविड की वजह से कोई बाहर तक झांकने नहीं आया। मेरे लिए वह सबसे बुरी याद रही जब मैंने 7 साल लेकर 13 साल तक के बच्चों की लाशें उठाईं।

इस काम में मेरे परिवार का सहयोग और हौसला मेरे साथ रहा। परिवार के ही कहने पर मैंने इस काम को शुरू किया था। हालांकि सोसाइटी में मेरे इस काम का विरोध हुआ। उन्हें लगता था कि मैं जीती जागती मौत हूं, लेकिन उस समाज को समझाने, परिवारों को समझाने में मुझे कई महीने लग गए। कहने का मतलब कि कोई ऐसा काम या अनोखा काम परिवार के सपोर्ट के बिना नहीं हो सकता है।

इस तरह के काम को करना आसान नहीं होता है। कभी-कभी एक-एक डेड बॉडी 25-25 घंटे मेरे पास रह जाती थी। उसके क्रिमेशन के लिए नंबर ही नहीं आता था, लेकिन मेरी टीम ने इस काम को इतने संयम से किया कि बीएमसी ने हमें लावारिस लाशों को क्रिमेट करने का काम दिया है। कोविड में मेरी टीम ने लगभग 1500 से 2000 तक डेड बॉडी क्रिमेट की। लगभग एक डेड बॉडी पर 4 हजार से 5 हजार रुपए खर्च आता है, जिसे मेरी टीम खुद ही वहन करती है।

यह ऐसी लावारिस लाशें होती हैं जो लोग मुंबई में काम-काज की तलाश में आते हैं और यहीं मर जाते हैं। कोविड डेड बॉडी को क्रिमेट करते-करते मुझे लगने लगा कि हमें इस काम को जारी रखना चाहिए। इस काम ने मुझे ऐसा बदला कि अब मैं दुनियावी तौर पर सिर्फ अपने कब्र की साइज जितनी जमीन के बारे में सोचता हूं। बाकी जिंदा रहते एक-एक सांस दूसरों के काम आ जाए, यही कोशिश रहती है।

इकबाल ममदानी सोशल वर्कर हैं। पिछले एक साल से वे अपनी टीम के साथ मिलकर लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं। उन्होंने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की...

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