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पश्चिम बंगाल से ग्राउंड रिपोर्ट:बोस के वंशज बोले- राजनीतिक प्लेटफॉर्म से जय श्रीराम का नारा लगना सही नहीं, चटर्जी के परिवार को लगता है वंदे मातरम अब कम्युनल हो गया है

कोलकाता9 महीने पहलेलेखक: अक्षय बाजपेयी
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बंकिमचंद्र चटर्जी, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस। बंगाल विधानसभा चुनाव में इन तीनों महापुरुषों के इर्द गिर्द राजनीति हो रही है। - Dainik Bhaskar
बंकिमचंद्र चटर्जी, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस। बंगाल विधानसभा चुनाव में इन तीनों महापुरुषों के इर्द गिर्द राजनीति हो रही है।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस, बंकिमचंद्र चटर्जी, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर...ये वो तीन नाम हैं, जो बंगाल में इन दिनों खूब सुनाई दे रहे हैं। BJP हो या TMC या फिर विपक्षियों का गठबंधन कोई भी इन महापुरुषों का जिक्र करना नहीं भूलता। PM मोदी हो या गृहमंत्री अमित शाह या तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी, सभी अपने भाषणों में इन महापुरुषों को याद जरूर करते हैं। BJP अध्यक्ष जेपी नड्डा कुछ दिनों पहले नैहाटी में बंकिम बाबू के पुश्तैनी घर भी गए थे और उन्हें श्रद्धांजलि देकर आए। इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि बंगाल की जनता अपने महापुरुषों से बहुत प्यार करती है। ऐसे में हमने इन तीनों ही महान शख्सियतों के वंशजों से बात की और जाना कि आखिर वो मौजूदा राजनीति लेकर क्या सोचते हैं...

मेरे लिए BJP सिर्फ एक प्लेटफॉर्म है, मैं नेताजी के आदर्श को लेकर ही काम करूंगा

चंद्रकुमार बोस, शरद चंद्र बोस के पौत्र हैं। सुभाषचंद्र बोस शरद चंद्र बोस के छोटे भाई थे। चंद्रकुमार BJP से जुड़े हुए हैं और कोलकाता में ही रहते हैं। वे कहते हैं कि अब जो राजनीति हो रही है, उसमें शायद बंगाल के समृद्ध इतिहास और संस्कृति को भुला दिया गया है। लोग अपने फायदे के लिए राजनीति से जुड़ रहे हैं। आज की राजनीति नेताजी के आदर्शों से मेल नहीं खाती। देश में हर दल बांटने वाली पॉलिटिक्स कर रहा है। वोट बैंक पॉलिटिक्स चल रही है। भारत में सब मिलकर रहते हैं। खासतौर पर बंगाल में। देश का बंटवारा होना ही दुर्भाग्यपूर्ण था। मगर अब जो भारत का समर्थन करता है, उसको किसी धर्म के आधार पर नहीं देखना चाहिए। वहीं जो भारत के खिलाफ है, उसे भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं है। हिंदू-मुस्लिमों को एक-दूसरे के साथ दिक्कत नहीं है। समस्या तो राजनीतिक दलों ने खड़ी कर दी है।'

वे कहते हैं कि 'मेरे लिए BJP सिर्फ एक प्लेटफॉर्म है। मैंने मोदी जी और अमित शाह जी को पार्टी ज्वॉइन करने के पहले ही बता दिया था कि मैं नेताजी के आदर्श को लेकर ही काम करूंगा। उन्होंने इसकी अनुमति दी इसलिए काम कर रहा हूं। यदि आदर्श को छोड़ने की बात आएगी तो फिर हम उनके साथ काम नहीं करेंगे। धर्म एक व्यक्तिगत बात है। नेताजी भी बहुत आध्यात्मिक थे। काली मां के भक्त थे। लेकिन, ये मेरा व्यक्तिगत मामला है।

चंद्रकुमार बोस, शरद चंद्र बोस के पौत्र हैं। सुभाषचंद्र बोस शरद चंद्र बोस के छोटे भाई थे।
चंद्रकुमार बोस, शरद चंद्र बोस के पौत्र हैं। सुभाषचंद्र बोस शरद चंद्र बोस के छोटे भाई थे।

चंद्रकुमार का मानना है कि धर्म को कभी राजनीति में नहीं लाना चाहिए। राजनीति आम लोगों के विकास के लिए होना चाहिए। धर्म का राजनीति में मिक्सअप करने से हम जो भारत का कॉन्सेप्ट है, उसके खिलाफ चले जाएंगे। वे कहते हैं कि जय श्रीराम कोई राजनीतिक नारा नहीं है। लेकिन, जय श्रीराम बोलने से किसी को गुस्सा आने का भी कोई कारण नहीं है। राजनीतिक प्लेटफॉर्म से जय श्रीराम का नारा नहीं लगना चाहिए। राम सबके हैं। CAA अच्छी बात है लेकिन इसमें सभी धर्मों को शामिल किया जाना था तो कोई विवाद नहीं होता। चंद्रकुमार के परिवार में करीब 170 सदस्य हैं। इसमें से करीब सौ सदस्य भारत में रहते हैं। बाकी विदेशों में रहते हैं।

रवींद्रनाथ का जो आइडिया है, उससे हम दूर जा रहे हैं

सुदरिप्त टैगोर, रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर के प्रपौत्र हैं। सुदरिप्त शिक्षाविद हैं। वे कोलकाता से 180 दूर स्थित शांति निकेतन में रहते हैं। टैगोर ने ही यहां एक आश्रम की स्थापना की थी, जिसे शांति निकेतन के नाम से जाना गया। यहीं 1921 में विश्वभारती यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई। फरवरी में PM मोदी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए यहां के दीक्षांत समारोह में शामिल हुए थे।

वे कहते हैं, 'रवींद्रनाथ सिर्फ हमारे परिवार के नहीं हैं। वे सबके हैं। इसलिए जो भी उनका जिक्र करते हैं, उनका हक बनता है। जिक्र करने वाले गुरुदेव के दिखाए, रास्ते पर चलेंगे या नहीं ये तो भविष्य ही बताएगा। नेताजी सुभाषचंद्र बोस, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महापुरुषों ने हमें एक दिशा दिखाई है।'

सुदरिप्त कहते हैं, 'मैं पॉलिटिक्स में ज्यादा सक्रिय नहीं हूं। अपने कामों में व्यस्त रहता हूं लेकिन उम्मीद रखता हूं कि, देश-प्रदेश में शांति रहे। बिजली, पानी और सड़क अच्छी हों। हमारे जैसे संगठनों को सुविधा मिले, क्योंकि हम सरकार से एक पैसे नहीं लेते। जो बड़ा इंस्टीट्यूट चला रहे हैं, वो पूरा डोनेशन से चला रहे हैं।

सुदरिप्त टैगोर, रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर के प्रपौत्र हैं। वे कोलकाता से 180 दूर स्थित शांति निकेतन में रहते हैं।
सुदरिप्त टैगोर, रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर के प्रपौत्र हैं। वे कोलकाता से 180 दूर स्थित शांति निकेतन में रहते हैं।

उनके मुताबिक बंगाल का कल्चर खत्म होने जैसी बातें विश्वसनीय नहीं हैं। बेस कल्चर मजबूत होता है तो वो कहीं नहीं जाता। आज भी रवींद्रनाथ टैगोर जी का गाना, कविताएं बंगाल के कोने-कोने में सुनी जाती हैं। लोग उनसे सीखते हैं। वसंत आ रहा है, आप जहां भी बंगाल में देखेंगे तो वसंत वंदना सुनने को मिलेगी। यह रवींद्र संगीत के जरिए ही सुनी जाती है। वो बंगाल से कहीं नहीं जा सकता।

आज सब राजनेता उनका नाम लेते हैं। रवींद्रनाथ को बंगाल में नकारा नहीं जा सकता। कई लोग प्रमोट कर रहे हैं लेकिन सरकार की पॉलिसी पर तो कुछ नहीं कहूंगा। विश्व भारती में अभी मुझे लगता है कि रवींद्रनाथ का जो आइडिया है, उससे हम दूर जा रहे हैं। यहां का माहौल नष्ट किया जा रहा है। पिछले पांच-आठ सालों में ये ज्यादा देखने में आया है। उनका आइडिया था कि विश्वभारती और शांति निकेतन एक हैं।

वे कम्युनिटी पर जोर देते थे। लेकिन, अब विश्वभारती और शांति निकेतन के बीच एक दीवार खड़ी की जा रही है। यहां जो प्रशासक हैं, वे जो बोलते हैं, उससे पता चलता है कि उनकी कम्युनिटी में रूचि नहीं है। जबकि कम्युनिटी रवींद्रनाथ के लिए बहुत मायने रखती थी। राजनीति को धर्म से क्यों जोड़ा जा रहा है पता नहीं। सब अपना अपना कैलकुलेशन करते हैं। किसने कैम्पेनिंग अच्छी की ये तो चुनाव के बाद पता चलेगा। मेरी रुचि बस इसमें है कि कौन हमारी आधारभूत जरूरतों को पूरी करने की बात कर रहा है। बाकी बातों में मुझे कोई रुचि नहीं।

श्रीराम एक माइथोलॉजी के कैरेक्टर हैं, इसमें पॉलिटिक्स नहीं होनी चाहिए

सुभाषिश चटर्जी, बंकिमचंद्र चटर्जी के सबसे छोटे भाई पूर्णचंद्र चटर्जी के प्रपौत्र हैं। सुभाषिश रिटायर्ड IPS ऑफिसर हैं और परिवार के साथ कोलकाता में ही रहते हैं। बंकिम बाबू ने शादी नहीं की थी इसलिए उनकी प्रॉपर्टी, धरोहरों को संभालने का काम परिवार के यही सदस्य करते हैं।

सुभाषिश कहते हैं, 'बंकिम बाबू ने वंदे मातरम लिखा, जो स्वतंत्रता का जयघोष बना। उन्हें कुछ लोग कम्युनल बोलते थे। जो कम्युनल मानते हैं, वे उन्हें फॉलो नहीं करते। अब वंदे मातरम एक कम्युनल स्लोगन हो गया है। वंदे मातरम बोलने पर कुछ लोगों को गुस्सा आ जाता है। जबकि बंकिम बाबू ने वंदे मातरम भारत माता के लिए लिखा था।' दूसरी कम्युनिटी भारत माता को नहीं मानती, बस यहीं पर दिक्कत हो जाती है। यहां कई नामी मुस्लिम लेखक हुए हैं। अब उनका नाम नहीं लेते। उनका नाम भी लेना चाहिए। उन्हें भी यहां बुलाना चाहिए।

सुभाषिश चटर्जी, बंकिमचंद्र चटर्जी के सबसे छोटे भाई पूर्णचंद्र चटर्जी के प्रपौत्र हैं। सुभाषिश रिटायर्ड IPS ऑफिसर हैं और परिवार के साथ कोलकाता में ही रहते हैं।
सुभाषिश चटर्जी, बंकिमचंद्र चटर्जी के सबसे छोटे भाई पूर्णचंद्र चटर्जी के प्रपौत्र हैं। सुभाषिश रिटायर्ड IPS ऑफिसर हैं और परिवार के साथ कोलकाता में ही रहते हैं।

वे कहते हैं कि बंगाली सब एक हैं। सब भारतीय हैं। बहुत सारे लोग यहां फायदा उठाने आते हैं। CPM के एक शिक्षा मंत्री थे। एक कार्यक्रम में वे सिर्फ इसलिए उठकर चले गए थे क्योंकि वहां सरस्वती वंदना शुरू हो गई थी। नेताओं का ऐसा आचरण अच्छा नहीं है। श्रीराम एक माइथोलॉजी के कैरेक्टर हैं। इसमें पॉलिटिक्स नहीं होनी चाहिए।

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