सिंघु बॉर्डर से ग्राउंड रिपोर्ट:भास्कर ने पूछा- धरने में कितने निहंग मौजूद हैं? जवाब मिला- हम महाराज की मिलिट्री हैं, यह गोपनीय है, हमारे पास बहुत साजो-सामान

सिंघु बॉर्डर (सोनीपत)3 महीने पहलेलेखक: पूनम कौशल

"परवाह नहीं करनी पुत्रों किसी गल की। इतना ध्यान रखियो दुष्ट-पापी यदि गीता या कुरान की बेअदबी करता या गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी करता तो गुरु की फौजें ऐसा ही सौदा करतीं।"

शिरोमणि पंथ अकाली बुड्ढा दल के जत्थेदार अमान सिंह ने शुक्रवार को धमकी भरी यह बात सिंघु बॉर्डर पर लखबीर सिंह नाम के एक शख्स के हाथ-पैर काटकर नृशंस हत्या के आरोपी निहंग सरबजीत सिंह और दूसरे साथी निहंगों से कही।

साफ है जिस हत्याकांड से पूरे देश में आक्रोश फैल गया, लेकिन उसमें शामिल निहंग सिखों को इसका कोई अफसोस नहीं।

शुक्रवार तड़के किसान आंदोलन में शामिल निहंग सिखों के दल ने पंजाब के तरनतारन के रहने वाले लखबीर सिंह के हाथ-पैर काटकर नृशंस हत्या कर दी। फिर उसका शव करीब ही एक पुलिस बैरिकेड से टांग दिया था। लखबीर पर पवित्र गुरुग्रंथ के अपमान का आरोप था।

सिंघु बॉर्डर पर कैंप लगाए निहंग सिखों के समूह बुड्ढा दल के निहंग सरबजीत सिंह ने हत्या की जिम्मेदारी लेते हुए पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है।

सिंघु बॉर्डर पर पवित्र गुरुग्रंथ साहिब की कथित बेअदबी के लिए नृशंसता से मारे गए लखबीर सिंह की हत्या के आरोपी निहंग सरबजीत (बाएं) ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया।
सिंघु बॉर्डर पर पवित्र गुरुग्रंथ साहिब की कथित बेअदबी के लिए नृशंसता से मारे गए लखबीर सिंह की हत्या के आरोपी निहंग सरबजीत (बाएं) ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया।

अमान सिंह का कहना है कि "गुरु की फौज के सैनिक का यही कर्तव्य है।" निहंग सिख अपने आपको गुरु की फौज का सैनिक मानते हैं और सिख इन्हें लाडली सेना कहकर पुकारते हैं। सिंघु बॉर्डर पर इस समय निहंग सिखों के 6 दल हैं। बुड्ढा दल भी इनमें से एक है। सैनिक पोशाक में सजे-धजे ये निहंग सिंह कटार और तलवार चलाने में प्रशिक्षित होते हैं। इनके पास घोड़े भी हैं और ये सभी घुड़सवारी का भी प्रशिक्षण लेते हैं। इनकी नीली पगड़ी और पोशाक इन्हें प्रदर्शन में शामिल बाकी लोगों से अलग करती है। यह सभी तलवारों और कटारों से भी लैस रहते हैं।

सिंघु बॉर्डर धरनास्थल पर निहंगों ने अस्तबल भी बना रखा है। वहां कितने घोड़े हैं यह वे बताने को तैयार नहीं।
सिंघु बॉर्डर धरनास्थल पर निहंगों ने अस्तबल भी बना रखा है। वहां कितने घोड़े हैं यह वे बताने को तैयार नहीं।

सिंघु बॉर्डर पर एक तरफ दिल्ली पुलिस के बैरिकेड हैं। बड़े-बड़े सीमेंट के स्लैब और कंटीली तारें किसानों के प्रदर्शनस्थल और पुलिस के बीच लगाए गए हैं। यहां पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों के जवान भारी संख्या में तैनात हैं।

सीमेंट के इन स्लैब के दूसरी तरफ निहंग सिखों का डेरा है। यहां उन्होंने अपना अस्थाई अस्तबल भी बना लिया है। प्रदर्शनस्थल पर निहंग सिखों की संख्या कितनी है ये स्पष्ट नहीं है। लेकिन कम से कम सौ निहंग सिख तैनात खड़े हर समय दिखाई देते हैं। इनके पास दर्जनों घोड़ों के अलावा कुत्ते और बाज भी हैं। इन निहंग सिखों में सेना का अनुशासन नजर आता है।

बीते साल 26 नवंबर को पंजाब और हरियाणा से आए किसानों ने तीन कृषि कानूनों का विरोध करते हुए राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाल दिया था। पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से निहंग सिख भी सिंघु बॉर्डर पहुंचे थे और यहां अपने तंबू गाड़ दिए थे।

पिछले साल दिसंबर में भास्कर से बात करते हुए अमान सिंह ने कहा था, 'जब तक किसानों का प्रदर्शन चलेगा, हमारी फौज इनकी रक्षा करेगी। यदि पुलिस किसानों पर कार्रवाई करने की कोशिश करेगी तो हम बीच में आ जाएंगे। किसानों और पुलिस के बीच गुरु की फौज खड़ी है। गुरु की फौज का हर सैनिक अपनी जान देने को तैयार है।'

अमान सिंह और उनका दल अब भी सिंघु बॉर्डर पर है। बॉर्डर पर हत्याकांड की घटना के बाद अमान सिंह ने फिर यही बात दोहराई। उन्होंने कहा कि गुरु की फौज अपना काम करने के लिए हमेशा तैयार है।

सिंघु बॉर्डर पर निहंगों ने एक अस्थाई गुरुद्वारा बना लिया है। मारे गए लखबीर सिंह पर यहीं गुरुग्रंथ साहिब से बेअदबी करने का आरोप है।
सिंघु बॉर्डर पर निहंगों ने एक अस्थाई गुरुद्वारा बना लिया है। मारे गए लखबीर सिंह पर यहीं गुरुग्रंथ साहिब से बेअदबी करने का आरोप है।

प्रदर्शनकारियों ने सिंघु बॉर्डर पर अस्थाई गुरुद्वारे भी बना लिए हैं। जिस गुरुद्वारे में कथित तौर पर गुरु ग्रंथ साहिब का अपमान हुआ, वह बुड्ढा दल के डेरे से करीब तीन सौ मीटर दूर है। बीच में संयुक्त किसान मोर्चा का मंच, लंगर स्थल और अस्थाई अस्पताल है। ये निहंग सिखों के समूह पंथ अकाली निरबैर खालसा दल का गुरुद्वारा है।

इस गुरुद्वारे के बाहर चरमपंथी सिख कमांडर भिंडरावाले की तस्वीर लगी है। आरोप है कि मृतक लखबीर सिंह ने यहीं रखे पवित्र ग्रंथ की बेअदबी की। लखबीर के शव को इसी गुरुद्वारे के बाहर बैरिकेड से टांग दिया गया था।

पंथ अकाली निरबैर खालसा दल के जत्थेदार बलविंदर कहते हैं, "ये जो सब यहां बैठे हैं ये हमारी प्रजा हैं। हम इनके रखवाले हैं। गुरु गोविंद सिंह महाराज ने हमें इनकी रखवाली के लिए छोड़ रखा है। गुरु का आदेश है कि जहां जरूरत पड़े हमें जाना है। हम यहां धरना लगाकर नहीं बैठे हैं। हमारे पास बहुत घोड़े और राजसाज है। हम इनकी ढाल बनकर बैठे हैं कि इन्हें कुछ ना हो।"

ये पूछने पर कि कुल कितने निहंग सिख सैनिक प्रदर्शनस्थल पर होंगे, बलविंदर सिंह कहते हैं, "ये गुप्त जानकारी है। हम महाराज की मिलिट्री हैं। हम एक सेना हैं और सेना कभी अपनी मौजूदगी की पूरी जानकारी नहीं देती है।"

बलविंदर कहते हैं, "हम गुरु ग्रंथ को अपना कानून मानते हैं। ग्रंथ की रक्षा भी हमारा कर्तव्य है। हम यहां किसानों के लिए लगातार गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ कर रहे हैं।"

किसान नेताओं ने आंदोलन को निहंग सिखों से अलग किया है। लेकिन निहंगों का कहना है कि आंदोलनकारी संगठन उन्हें अपना मानें या ना मानें, वो किसानों को अपना मानते हैं और उनकी सुरक्षा में तैनात रहेंगे।

बलविंदर सिंह का दल 2 फरवरी 2021 को सिंघु बॉर्डर पहुंचा था और तब से यहीं है। उनके दल के पास भी घोड़े और कुत्ते हैं।

उन्हें लखबीर की हत्या का बिलकुल भी अफसोस नहीं है बल्कि वो इस पर गर्व महसूस कर रहे हैं। हत्या को जायज ठहराते हुए बलविंदर कहते हैं, "सब ये तो कह रहे हैं कि हाथ काट दिया, पैर काट दिया, कोई ये क्यों नहीं बता रहा है कि गुरु ग्रंथ की बेअदबी हुई है। जो ग्रंथ साहिब की बेअदबी करेगा उसे यही सजा दी जाएगी।"

बलविंदर कहते हैं, "इस तरह की हत्या यदि पहले शुरू हो गई होती तो किसी की हिम्मत नहीं होती गुरु का अपमान करने की। लाडले सिखों ने पापी का सौदा कर अपना कर्तव्य निभाया है।"

हाथ में भाला लिए कैंप के बाहर तैनात खड़े 18 साल के सतनाम सिंह श्री आनंदपुर साहिब के रहने वाले हैं। वो सात साल पहले निहंग सजे थे। सतनाम सिंह कहते हैं, "हम निहंग सिख गुरु की लाडली फौज हैं। दसवें बादशाह गुरु गोविंद सिंह ने हमें सजाया है। हम उनके बच्चे हैं। खालसा पंथ दिल्ली तख्त पर राज करने के लिए सजाया गया है। हमारी खालसा फौज दिल्ली तख्त पर राज करेगी।"

सतनाम सिंह को सिंघु बॉर्डर पर हुई हत्या का कोई अफसोस नहीं है। वो कहते हैं, "जो गुरु साहिब की बेअदबी करेगा उसका यही अंजाम होगा। उसका सिर कलम कर दिया जाएगा। बेअदबी करने वालों को छोड़ा नहीं जाएगा। जिसकी जो मर्जी कहना है कहे।"

हमेशा तैनात खड़े रहने वाले सतनाम सिंह को डर नहीं लगता है। वो कहते हैं, "जिस दिन हम निहंग सजे डर खत्म हो गया। हम यहां आंदोलन में बाबा जी के साथ घोड़े लेकर आए हैं। हमें ये नहीं लगता कि हम कहां आ गए हैं, सड़कों पर बैठ गए हैं। जब तक किसानों का फैसला नहीं होता हम यहीं रहेंगे। जरूरत पड़ी तो यहीं शीश चढ़ाएंगे।"

निहंग शेरसिंह का दल भी फरवरी में ही प्रदर्शनस्थल पहुंचा था। उनका कहना है कि गुरुग्रंथ साहिब की रक्षा करना ही हमारा काम है।
निहंग शेरसिंह का दल भी फरवरी में ही प्रदर्शनस्थल पहुंचा था। उनका कहना है कि गुरुग्रंथ साहिब की रक्षा करना ही हमारा काम है।

निहंग प्रदर्शनस्थल पर घुड़सवारी भी करते हैं। युवा निहंग शेरसिंह घोड़ों की देखभाल में लगे हैं। शेरसिंह कहते हैं, "हम तो यहां आए ही जान न्योछावर करने हैं। पंथ की रक्षा ही हमारा काम है।"

शेरसिंह का दल भी फरवरी में ही प्रदर्शनस्थल पहुंचा था। वो भी तब से यहीं है। निहंगों का एक और कर्तव्य होता है कि गुरु ग्रंथ साहिब की सुरक्षा में तैनात रहना। निहंगों का दल चौबीस घंटे ग्रंथ साहिब की सुरक्षा में खड़े रहता है। ये हमेशा नंगे पैर ही रहते हैं। शेरसिंह कहते हैं कि कितनी ही गर्मी या सर्दी हो वो चप्पल नहीं पहनते हैं।

आंदोलन के दौरान ही निहंग बना एक युवा कहता है, "मैं मोर्चे में ही निहंग बना हूं। ये हमारे गुरुओं की शुरू की गई परंपरा है। घुड़सवारी और शस्त्र विद्या हमारी परंपरा है। शस्त्र ही हमारा वस्त्र है। हमारे हाथ में जो तलवार है उसकी धार कभी कुंद नहीं पड़ती। बंदूक की गोलियां खत्म हो जाती हैं, लेकिन हमारी तलवार की धार असीमित है। हमारे बाजुओं में बल है। जब हम तलवार उठाते हैं तो बहुत अच्छा महसूस होता है।"

प्रदर्शनस्थल पर जितने भी निहंग सिखों से हमने बात की, किसी ने भी लखबीर की हत्या पर अफसोस जाहिर नहीं किया। बल्कि कई ने ये जरूर कहा कि यदि पंथ की रक्षा में ये कदम पहले उठा लिया गया होता तो किसी की बेअदबी करने की हिम्मत नहीं होती।

यही वह जगह है जहां तरनतारन के लखबीर सिंह को मार कर पुलिस के बैरिकेड से लटका दिया गया था।
यही वह जगह है जहां तरनतारन के लखबीर सिंह को मार कर पुलिस के बैरिकेड से लटका दिया गया था।

लखबीर की हत्या के पहले और बाद के जो वीडियो सामने आए हैं और घटनास्थल पर मौजूद जिन चश्मदीदों से हमने बात की उससे स्पष्ट होता है कि हत्याकांड में कई लोग शामिल थे।

हत्याकांड के बाद हरियाणा पुलिस कई बार प्रदर्शनस्थल पर आई, लेकिन किसी भी निहंग से कोई पूछताछ नहीं की गई। गिरफ्तारी के सवाल पर बलविंदर सिंह कहते हैं, "हमें परवाह नहीं है। पुलिस गिरफ्तार करेगी तो वो भी देखा जाएगा।"

शाम होते-होते सरबजीत सिंह ने हत्या की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें हिरासत में लेने गया हरियाणा पुलिस का दस्ता चुपचाप बुड्ढादल के कैंप के बाहर खड़ा रहा।

आत्मसमर्पण से पहले सरबजीत सिंह ने मीडिया से बात की और कहा कि उन्हें हत्या करने का कोई अफसोस नहीं है बल्कि उन्हें अपने किए पर गर्व है।

सिखों के समूहों ने उनका सम्मान किया। उनके गले में शरोपा और मालाएं डाली गईं। फिर वो गुरुद्वारे गए और मत्था टेका। यहां उनके लिए प्रार्थना भी हुई।

इस दौरान हरियाणा पुलिस खड़ी देखती रही। मानों वो किसी हत्यारे को पकड़ने नहीं बल्कि किसी सम्मानित व्यक्ति को ले जाने आई हो। लखबीर सिंह की हत्या ने कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पुलिस हत्या में शामिल सभी लोगों को गिरफ्तार कर पाएगी या सिर्फ सरबजीत को ही हत्या का जिम्मेदार मानकर ये मामला बंद कर दिया जाएगा।

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