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UP के मदरसों में राष्ट्रगान जरूरी:कोई छात्र खड़ा नहीं होता या नहीं गाता तो क्या होगा? जानिए राष्ट्रगान से जुड़े हर सवाल का जवाब

8 दिन पहलेलेखक: निकिता अग्रवाल

उत्तर प्रदेश के मदरसों में अब पढ़ाई से पहले राष्ट्रगान अनिवार्य कर दिया गया है। 12 मई को UP मदरसा शिक्षा बोर्ड परिषद ने इसका आदेश जारी किया। ये आदेश मान्यता प्राप्त, अनुदान पाने वाले और अनुदान नहीं पाने वाले सभी मदरसों पर लागू होगा। क्लासेस शुरू होने से पहले सुबह की प्रार्थना के समय राष्ट्रगान होगा।

इससे पहले भी राष्ट्रगान के नियमों और उसे बजाने को लेकर कई विवाद हो चुके हैं। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के अलग-अलग रुख भी सामने आए हैं।

हम यहां जानेंगे कि राष्ट्रगान को लेकर हमारे संविधान में क्या नियम हैं? क्या राष्ट्रगान बजते वक्त खड़े न होना या राष्ट्रगान न गाना अपराध है? ऐसे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट क्या कहता है?

राष्ट्रगान से इससे जुड़े नियम-कानून पर पहले भी विवाद हो चुके हैं। ऐसा ही एक मामला 1986 में केरल में हुआ था। इस केस पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया था जिसे आगे चलकर राष्ट्रगान से जुड़े कई मामलों में आधार माना गया। तो सबसे पहले जानते हैं 1986 में केरल में हुए विवाद के बारे में?

बिजोय इमैनुअल vs केरल 1986 विवाद

क्या था मामला: अगस्त 1986 में केरल में तीन छात्रों को जन-गण-मन न गाने पर स्कूल से निकाल दिया गया था। इन तीनों छात्रों ने अपनी धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए राष्ट्रगान गाने से इनकार कर दिया था। इनमें से एक छात्र का नाम बिजोय इमैनुएल था। हालांकि, ये तीनों छात्र जन-गण-मन के वक्त खड़े जरूर होते थे।

दरअसल, 1985 में केरल के एक विधायक स्कूल पहुंचे थे। जहां उन्होंने बिजोय और बाकी दोनों छात्रों को राष्ट्रगान न गाते हुए देख लिया। इस मुद्दे को केरल विधानसभा में उठाया गया और इस मामले की जांच करने के लिए एक आयोग बना। आयोग की रिपोर्ट बच्चों के पक्ष में थी।

इमैनुएल और उनकी पत्नी लिलिकुट्टी आगे बैठे हुए हैं। इनके 3 बच्चे बीनू, बिजोय और बिंदू पीछे खड़े हुए हैं।
इमैनुएल और उनकी पत्नी लिलिकुट्टी आगे बैठे हुए हैं। इनके 3 बच्चे बीनू, बिजोय और बिंदू पीछे खड़े हुए हैं।

रिपोर्ट के बावजूद भी स्कूल प्रशासन ने 26 जुलाई 1985 को बच्चों को स्कूल से निकाल दिया। यह फैसला 1969 और 1975 में पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के आदेश को आधार मान कर लिया गया था, जिसमें राष्ट्रगान गाना जरूरी कहा गया था। स्कूल के फैसले के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट के सामने ये सवाल उठा था कि क्या किसी को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है?

मामले पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश: कोर्ट ने सुनवाई के बाद फैसला बच्चों के हक में सुनाया था। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ है, जिससे किसी की धार्मिक भावनाएं या देश के सम्मान को ठेस पहुंचे। कोर्ट के मुताबिक अगर कोई राष्ट्रगान नहीं गाता है, लेकिन उसका सम्मान करता है, तो राष्ट्रगान गाने के लिए न ही उस व्यक्ति को दंड दिया जा सकता है और न ही प्रताड़ित किया जा सकता है। इसके साथ ही कोर्ट ने तीनों स्टूडेंट्स को स्कूल में वापस जाने की इजाजत दी थी।

राष्ट्रगान से जुड़े नियम कानूनों पर और क्लैरिटी के लिए एक और मामले के बारे में जानते हैं...

सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान का मामला
मामले की शुरुआत 2003 में हुई थी। भोपाल के रहने वाले श्याम नारायण ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में याचिका दायर कर निर्देशक करण जौहर पर अपनी एक फिल्म 'कभी खुशी कभी गम' में राष्ट्रगान का अपमान करने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि राष्ट्रगान बजने पर उनके अलावा कोई नहीं खड़ा था। उन्होंने राष्ट्रगान के उचित सम्मान की मांग के मुद्दे पर एक जनहित याचिका दायर की थी।

इस पर MP हाई कोर्ट ने जब तक फिल्म से राष्ट्रगान वाले हिस्से को हटा नहीं दिया जाता तब तक फिल्म को सिनेमाघरों से हटाने का आदेश दिया। साथ ही सभी सिनेमा हॉल से फिल्म वापस लेने के लिए कहा गया।

'कभी खुशी कभी गम' फिल्म के इस सीन में बच्चों को राष्ट्रगान गाते दिखाया गया है।
'कभी खुशी कभी गम' फिल्म के इस सीन में बच्चों को राष्ट्रगान गाते दिखाया गया है।

इसके बाद 2004 में निर्देशक करण जौहर ने MP हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। करण जौहर ने इस दौरान केंद्र सरकार के 2015 के फैसले का जिक्र किया। इसमें भारत सरकार ने आदेश जारी कर कहा था कि जब भी राष्ट्रगान गाया या बजाया जाता है, तो दर्शक खड़े होंगे। हालांकि, जब किसी न्यूजरील या डॉक्यूमेंट्री के दौरान राष्ट्रगान को फिल्म के एक हिस्से के रूप में बजाया जाता है, तो दर्शकों के लिए खड़े होना जरूरी नहीं होगा क्योंकि इससे फिल्म की स्क्रीनिंग में दिक्कत होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या दिया फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए MP हाई कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया। 30 नवंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रगान, यानी 'जन गण मन' से जुड़े एक अहम आदेश में कहा कि देशभर के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजेगा। राष्ट्रगान बजते समय सिनेमा हॉल के पर्दे पर राष्ट्रीय ध्वज दिखाया जाना भी जरूरी होगा। साथ ही सिनेमाघर में मौजूद सभी लोगों को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा होना होगा।

केंद्र सरकार का रुख
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्र सरकार ने 5 दिसंबर को इंटर मिनिस्ट्री समिति का गठन किया था। इसके बाद सरकार ने हलफनामा देकर सुप्रीम कोर्ट से अपने 2016 के आदेश में सुधार की अपील की थी। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक शपथपत्र दाखिल कर कहा था कि सिनेमाघरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान बजाना और उस दौरान खड़ा होना जरूरी न किया जाए।

केंद्र सरकार की दलीलों पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 9 जनवरी, 2018 को अपना फैसला वापस ले लिया था। आदेश में संशोधन करते हुए कोर्ट ने कहा था कि अब देशभर के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना जरूरी नहीं होगा।

ये तो हो गई सुप्रीम कोर्ट की बात। अब जानते हैं कि राष्ट्रगान को लेकर हमारे संविधान में क्या प्रावधान हैं?

राष्ट्रगान को लेकर क्या कहता है संविधान?
केंद्र सरकार ने 1971 में प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, पेश किया था, जो संसद में पारित हुआ था। इसके तहत किसी भी राष्ट्रीय प्रतीक जैसे ध्वज, संविधान, राष्ट्रगान, देश के नक्शा का उल्लंघन या अपमान करने पर सजा का प्रावधान है। इस एक्ट की धारा 3 के मुताबिक, ‘अगर कोई राष्ट्रगान में बाधा डालता है या किसी को राष्ट्रगान गाने से रोकने की कोशिश करता है, तो उसे सजा दी जाएगी।

राष्ट्रगान को संविधान के डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स में भी शामिल किया गया है। इसमें आर्टिकल 51A के तहत नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार दिए गए हैं, जिसका पालन करना हर नागरिक का कर्तव्य है। इनमें पहला मौलिक कर्तव्य ये है कि सभी को संविधान के आदर्शों और संस्थानों, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना होगा।

अब जानते हैं कि राष्ट्रगान बजते वक्त खड़े होना या राष्ट्रगान गाने को लेकर क्या नियम हैं?

  • क्या राष्ट्रगान के लिए खड़े होना जरूरी है? हमारे संविधान में राष्ट्रगान को लेकर ऐसा कोई नियम नहीं है, कि इस दौरान आपको खड़े रहना है। जन-गण-मन के दौरान इसे सम्मान देना जरूरी होता है, न कि खड़े रहना, लेकिन, 1986 में केरल में राष्ट्रगान को लेकर उठे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि राष्ट्रगान को उचित सम्मान देना जरूरी है। इसके लिए कोर्ट ने राष्ट्रगान बजते वक्त सावधान की मुद्रा में खड़े होने को सम्मान का पैमाना तय किया था।
  • क्या राष्ट्रगान न गाना अपराध है? 1986 के मामले पर ही फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुप रहना भी अभिव्यक्ति का अधिकार माना जाता है। इसके तहत किसी भी नागरिक के लिए राष्ट्रगान गाना जरूरी नहीं है। राष्ट्रगान बजते वक्त खड़े होकर भी उसे उचित सम्मान दिया जा सकता है। संविधान के मुताबिक भी राष्ट्रगान गाने को लेकर कोई नियम नहीं है। हालांकि, राष्ट्रगान के समय किसी भी अनुचित गतिविधि में संलग्न होना गलत है।
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