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दीदी ने बदली अपनी सीट:इस बार नंदीग्राम से चुनाव क्यों लड़ रही हैं ममता बनर्जी? यहीं से लेफ्ट का किला ध्वस्त किया था, लेकिन क्या BJP को रोक पाएंगी?

कोलकाता2 महीने पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र
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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस बार नंदीग्राम से चुनाव लड़ेंगी। इससे पहले ममता कोलकाता के भवानीपुर सीट से चुनाव लड़ती रही थीं। - Dainik Bhaskar
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस बार नंदीग्राम से चुनाव लड़ेंगी। इससे पहले ममता कोलकाता के भवानीपुर सीट से चुनाव लड़ती रही थीं।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए तृणमूल कांग्रेस ने 291 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस बार नंदीग्राम से चुनाव लड़ेंगी। वही नंदीग्राम जिसको मुद्दा बनाकर ममता बनर्जी ने एक दशक पहले वाममोर्चा का किला ध्वस्त किया था। इससे पहले ममता दक्षिण कोलकाता के भवानीपुर सीट से चुनाव लड़ती रही थीं। इस बार शोभनदेव चट्टोपाध्याय को भवानीपुर से टिकट दिया गया है।

ममता के इस फैसले के बाद विधानसभा चुनाव में किसे फायदा होगा? नंदीग्राम की अहमियत क्या है? क्या ममता के इस फैसले से भाजपा बैकफुट पर है? क्या ये ममता का मास्टर स्ट्रोक है? या एक सोची-समझी रणनीति के तहत ममता नंदीग्राम आ रही हैं / आइए जानते हैं...

बंगाल चुनाव में नंदीग्राम की अहमियत क्या है?

नंदीग्राम बंगाल की राजनीति में बदलाव का प्रतीक है। इसका इतिहास क्रांतिकारियों से जुड़ा है। आधुनिक भारत का यही एकमात्र इलाका है, जिसे दो बार आजादी मिली है। 1947 से पहले, यहां के लोगों ने इस इलाके को अंग्रेजों से कुछ दिनों के लिए मुक्त करा लिया था। बदलाव का प्रतीक इसलिए क्योंकि एक दशक पहले ममता बनर्जी नंदीग्राम के बल पर ही सत्ता हासिल करने में कामयाब रही थीं। 2006-07 में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन CM बुद्धदेव भट्टाचार्य ने नंदीग्राम में इंडोनेशिया के सलीम ग्रुप को केमिकल हब बनाने के लिए 10 हजार एकड़ जमीन देने का ऐलान कर दिया। इस फैसले का जमकर विरोध हुआ। स्थानीय लोग अपनी जमीनें छोड़ने को तैयार नहीं थे।

लेकिन, बुद्धदेव अड़े रहे और अंततः बल प्रयोग से जमीन अधिग्रहण करने का आदेश दे दिया। इसके बाद शुभेंदु अधिकारी ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर आंदोलन शुरू कर दिया। 14 मार्च 2007 को पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें 14 लोगों की जान चली गईं। विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त झेलने वाली ममता बनर्जी ने मुद्दे को लपक लिया और खुद पुलिस बैरिकेडिंग को पार करती हुईं नंदीग्राम पहुंच गईं। वहां उन्होंने मां, माटी और मानुष का नारा दिया। ये नारा खूब चला। लाल झंडे के साथ जीने-मरने की कसमें खाने वाले लोग भी इस नारे के साथ खड़े हो गए।

क्या ये ममता का मास्टर स्ट्रोक है ?

नंदीग्राम से चुनाव लड़ना ममता की सोची समझी रणनीति है। वरिष्ठ पत्रकार शुभाशीष मोइत्रा कहते हैं, 'अब तक बंगाल की राजनीति में मोदी वर्सेज ममता टॉप पर था। लेकिन, ममता के इस फैसले के बाद ये सियासी लड़ाई ममता वर्सेज शुभेंदु की तरफ शिफ्ट हो सकती है। ये भी संभव है कि ऐसा बहुत दिनों तक न रहे। लेकिन, जब तक है तब तक निश्चित रूप से ममता के लिए लीडिंग एज है। ममता खुद भी चाहती थीं कि ऐसा हो ताकि वो स्थानीय लोगों का सपोर्ट हासिल कर सकें। वे अपने मां, माटी और मानुष के नारे को खाद-पानी दे सकें।'

वहीं वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी कहती हैं, 'निश्चित रूप से ममता बनर्जी का ये मास्टर स्ट्रोक है। BJP के पास बंगाल में अपना कोई मजबूत चेहरा नहीं है। वो शुभेंदु के सहारे इलेक्शन कैंपेन में ताकत झोंकना चाहती थी। वहीं TMC की कोशिश है कि शुभेंदु को नंदीग्राम में रोक लिया जाए। इसमें वो बहुत हद तक कामयाब भी दिख रही हैं। ममता के इस फैसले के बाद भाजपा को नंदीग्राम में काफी मेहनत करनी पड़ेगी। शुभेंदु के साथ उसके टॉप लीडर्स को पूरे दमखम के साथ यहां उतरना पड़ेगा। इसका फायदा ममता को मिलेगा, क्योंकि दूसरे इलाकों में भाजपा और शुभेंदु मजबूती से प्रचार नहीं कर सकेंगे। जबकि ममता बनर्जी को यहां से चुनाव जीतने के लिए कोई खास मेहनत नहीं करनी होगी।'

नंदीग्राम से चुनाव क्यों लड़ रही हैं ममता?

शिखा मुखर्जी कहती हैं कि इस बार लड़ाई BJP और TMC के बीच है। शहरों में मोदी की लोकप्रियता बढ़ रही है और उनके खिलाफ कहीं न कहीं एंटी इनकंबेंसी का माहौल है। ममता बनर्जी ये बात समझ रही हैं। इसलिए वे चाहती हैं कि इस बार के चुनाव में नंदीग्राम फिर से केंद्र में रहे। ताकि वे ग्रामीण वोटर्स को अपने पाले में बनाए रखें। दूसरी तरफ ममता बनर्जी शुभेंदु के गढ़ में उनके खिलाफ उतर कर ये मैसेज भी देना चाहती हैं कि वे किसी दबाव में नहीं हैं। इसके साथ ही एक बड़ी वजह यह भी है कि इस वक्त देशभर में किसान आंदोलन और बेरोजगारी का मुद्दा गरमाया हुआ है। ऐसे में खुद को किसानों और मजदूरों का हितैषी साबित करने के लिए नंदीग्राम से बेहतर जमीन ममता को नहीं मिलेगी।

ये इलाका मुस्लिम बहुल रहा है। नंदीग्राम में 30% से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। पिछले तीन चुनावों को हम देखें तो 2006 में पहले और दूसरे नंबर पर रहने वाले दोनों ही प्रत्याशी मुसलमान थे। 2011 में भी यहां मुस्लिम प्रत्याशी ही जीता था और सबसे बड़ी बात कि जीत-हार का अंतर 26% था। वहीं 2016 में यहां शुभेंदु जीते थे, लेकिन अंतर महज 7% ही था। सियासी गलियारे में कयास लगाए जा रहे थे कि शुभेंदु के जाने के बाद TMC यहां से किसी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट देगी। वैसी स्थिति में BJP नंदीग्राम और यहां के बाकी इलाकों में धुव्रीकरण की कोशिश करती, लेकिन ममता बनर्जी ने खुद मैदान में उतरकर भाजपा को झटका दिया है।

भवानीपुर सीट छोड़ने का कारण क्या हो सकता है?

अब तक ममता कोलकाता के भवानीपुर से चुनाव लड़ती रही हैं। इस बार वो यहां चुनाव नहीं लड़ेंगी। आंकड़ों के मुताबिक इस इलाके में ममता का प्रभाव घट रहा है और भाजपा का असर बढ़ रहा है। भवानीपुर गैर-बंगाली हिंदुओं की बहुलता वाला इलाका है। कोलकाता में हिंदी भाषियों की तादाद राज्य में सबसे ज्यादा है जिनके वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश भाजपा करती रही है। 2011 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को यहां करीब 3% वोट हासिल हुआ था, लेकिन 2016 में ये आंकड़ा बढ़कर 19% जा पहुंचा।

शुभाशीष मोइत्रा भी इन आंकड़ों से सहमत हैं। वे कहते हैं कि तृणमूल का प्रभाव यहां कम हुआ है और भाजपा का असर बढ़ा है। हो सकता है कि यहां से चुनाव लड़ने से पार्टी को बहुत फायदा न हो। इसलिए ममता बनर्जी नंदीग्राम से चुनाव लड़ रही हैं।

भवानीपुर से ममता के चुनाव नहीं लड़ने का कितना असर होगा?

कोलकाता में विधानसभा की कुल 11 सीटें हैं। 2011 और 2016 दोनों ही विधानसभा चुनावों में तृणमूल ने यहां सभी सीटों पर जीत हासिल की थी। शिखा मुखर्जी कहती हैं कि कहीं न कहीं वोटिंग पर इसका असर होगा। पिछले कुछ सालों से शहरी वोटर खासकर गैर बांग्लाभाषी वोटर्स भाजपा की तरफ शिफ्ट हुए हैं। वे मोदी के नाम पर वोट करेंगे। ऐसी स्थिति में भाजपा तृणमूल को यहां कड़ी टक्कर दे सकती है। यानी पहले की तरह कोलकाता में इस बार एकतरफा मुकाबला नहीं होने वाला है।

हार के डर से भाग रही हैं दीदी-भाजपा

भाजपा प्रवक्ता राहुल सिन्हा कहते हैं कि ममता बनर्जी ने भवानीपुर और नंदीग्राम दोनों की जनता के साथ विश्वासघात किया है। जिस नंदीग्राम ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया वहां वे जीतने के बाद नहीं गई। अब जब दीदी हार रही हैं तो वापस नंदीग्राम जा रही हैं। इस बात को जनता समझ रही है और चुनाव में उन्हें जवाब भी मिलेगा।

क्या शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम से चुनाव लड़ेंगे?

शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम से विधायक हैं। पूर्व मेदिनीपुर उनका अपना गढ़ रहा है। वे ममता बनर्जी को यहां से हराने का ऐलान कर चुके हैं। जब हमने राहुल सिन्हा से यह सवाल किया तो उन्होंने कहा कि अभी इस बात को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ है। वे यहां चुनाव लड़ सकते हैं, दीदी से हमें डर नहीं है। वहीं शुभाशीष मोइत्रा कहते हैं कि मुझे नहीं लगता कि वे यहां से चुनाव लड़ेंगे। और रणनीतिक तौर पर उनको लड़ना भी नहीं चाहिए। क्योंकि इस सीट पर ममता को हराना मुश्किल काम है। शुभाशीष ये भी कहते हैं कि अगर शुभेंदु यहां से चुनाव लड़ते हैं और जीत दर्ज करते हैं तो वे बंगाल के मुख्यमंत्री भी हो सकते हैं।

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