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  • Whether The Woman Living In The Live in Gets The Pension Of The Deceased Partner; Till The Decision On This, The Character Of That Woman Must Have Been Decided Many Times.

बात बराबरी की:लिव-इन में रह रही महिला को मृतक पार्टनर की पेंशन मिले या नहीं; इस पर फैसला आने तक उस महिला के चरित्र का फैसला कई बार आ चुका होगा

नई दिल्लीएक वर्ष पहले
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मद्रास हाईकोर्ट में नए ढंग का मामला आया। इसमें एक महिला ने अदालत से मांग की कि वो जिस सरकारी कर्मचारी के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में थी, उसकी मौत के बाद अब उसकी पेंशन महिला को मिले। मामले में पेच ये है कि मृतक की वसीयत में उसकी पत्नी का नाम है, जिसकी कुछ साल पहले कैंसर से मौत हो चुकी। पति-पत्नी के वयस्क बच्चे हैं, जिन्हें लिव-इन-पार्टनर को पेंशन दिए जाने पर ऐतराज नहीं। कम से कम खबरों में तो यही दावा है, लेकिन तब भी मामला हाईकोर्ट के घुमावदार गलियारों की परिक्रमा कर रहा है।

शायद साल-दो साल में फैसला आ जाए। ये भी हो सकता है कि वो महिला के पक्ष में जाए, लेकिन उतने समय में उसकी जिंदगी से लेकर चरित्र का फैसला कई बार हो चुका होगा। बगैर शादी के साथ रहना उसे चरित्रहीन बना देगा। महिला जब भी घर से निकलेगी, पास-पड़ोस के किवाड़ बंद होंगे और खिड़कियां खुल जाएंगी। परिवार अपनी बहू-बेटियों को महिला से मेलजोल रखने पर घुड़केंगे। और तो और, उस पर लालची होने का आरोप सामाजिक अदालतें बारहों दफा लगा देंगी।

एक तो लिव-इन में रही, तिस पर पेंशन की मांग! अरे, ढंग की औरत होती तो साथी की मौत पर कम से कम सालभर तो आंसू ढुलकाती। ये तो सीधे कोर्ट-कचहरी चली गई।

घर-घर खुली इन अदालतों को नजरअंदाज कर दें तो भी बात खत्म नहीं होती। कई बार सरकारें इन खुसपुसिया-घरेलू कोर्ट को पछाड़ देती हैं। कुछ समय पहले हरियाणा के जींद में ऐसा ही कुछ हुआ। वहां बगैर शादी रहते एक प्रेमी-जोड़े की सुरक्षा को नकार दिया गया। मामले की सुनवाई करते जज एचएस मदान ने कहा- 'याचिकाकर्ता याचिका की आड़ में लिव-इन-रिलेशनशिप पर स्वीकृति की मुहर लगवाने की कोशिश कर रहे हैं। एक ऐसा रिश्‍ता, जो नैतिक और सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं। इसलिए उनकी इस याचिका पर सुरक्षा आदेश नहीं दिया जा सकता।'

इसी तरह के एक और मामले में प्रेमी जोड़े की सुरक्षा की मांग इसलिए रद्द हो गई कि इस तरह के रिश्तों से समाज का ताना-बाना बिखर जाता है। कोर्ट की इन बातों को डिकोड करें तो सुनाई पड़ता है कि कपल का परिवार उन्हें मारने-पीटने और गांव में मुंह काला करके घुमाने को आजाद है। वो प्रेमियों की धुनाई कर 'भूल-सुधार' करवा सकता है। वो मिसाल पेश कर सकता है कि आगे कोई ऐसी गुस्ताखी न करे।

सीधे-सीधे देखा जाए तो मामला यहां लिव-इन का नहीं। मामला ये है कि कोई लड़की भला कैसे अपना जीवनसाथी चुनने के लिए आजाद हो सकती है! वो लड़की, जिसके कपड़े हमने तय किए। 11वीं पढ़ेगी तो कौन सा विषय लेगी, जो हमने उसे बताया। वो लड़की, जिसके दोस्तों के होंठ देखकर हमारी गिद्ध-नजरें तय करती रहीं कि फलां सिगरेट पीती है और मेरी बेटी के लायक नहीं।

वो लड़की जिसे नौकरी करने की 'इजाजत' हमने दी। उस गऊ जैसी लड़की ने भला कब नजरें बचाकर अपने लिए पार्टनर खोज लिया! ये गुस्सा केवल लिव-इन में जाने वाली लड़की पर ही नहीं, बल्कि हरेक उस लड़की पर होता है जो अपनी मर्जी से शादी कर ले।

हजारों साल पहले जब दुनिया में मर्द-औरत में शरीर के सिवा कोई फर्क नहीं था, तब शादियां भी नहीं थीं। तब थी केवल बराबरी। आदम और हव्वा पहला जोड़ा थे, जिनके प्रेम ने दुनिया बसाई। शादी की शुरुआत कब और क्यों हुई, इसका सबसे पहला प्रमाण मेसोपोटामिया (अब इराक) में मिलता है। आज से लगभग ढाई हजार साल पहले शुरू हुए इस 'बंदोबस्त' ने जल्द ही दुनिया को जकड़ लिया।

तब इसका मकसद जायदाद का बंटवारा था। दरअसल संपत्ति बना चुके मर्द अपना जैविक उत्तराधिकारी चाहते थे ताकि उनकी जायदाद किसी दूसरे को न मिले। पत्नी को भी नहीं। जी हां! पत्नी तब खुद एक संपत्ति थी जिसे घर, खेत, पैसे या पशुओं के साथ गिना जाता। तब प्राचीन ग्रीस में शादी के दौरान पिता अपनी बेटी का हाथ देते हुए कहता था- 'मैं अपनी बेटी को फलां पुरुष से नैतिक और कानूनी संतान पैदा करने के लिए गिरवी रख रहा हूं।' अगर औरत संतान पैदा न कर सके तो उसे पिता के घर वापस छोड़ दिया जाता था।

शादियों का चलन बढ़ता गया, लेकिन इसमें आदम और हव्वा का प्यार कहीं नहीं था। पुरुष घर का मुखिया और स्त्री उसकी संपत्ति होती। कुछ सौ सालों पहले ही शादी में प्यार का एंगल आया। इसका जिक्र इतिहासकार और लेखिका मेरिलिन यलोम की किताब द हिस्ट्री ऑफ द वाइफ (A History of the Wife) में मिलता है। हजारों साल की जंजीरें बीते कुछ सौ सालों और दशकों में तेजी से टूटीं।

अब कानूनी तौर पर कोई पति अपनी पत्नी को जायदाद नहीं कह सकता। न ही पिता अपनी बेटी को किसी मर्द को इसलिए दे सकता है कि वो उसकी जैविक संतानें पैदा करे, लेकिन ये केवल कानून है जो कागजों तक सीमित है। इसे कागजों से निकालकर जिंदा करने में औरतों की पीढ़ियां खाक हो चुकीं।

आज भी खूब आजादखयाल पिता बेटी को अपनी पसंद का साथी चुनता देख फनफना उठता है और बात मरने-मारने तक चली जाती है। लब्बोलुआब ये कि मसला शादी या बगैर शादी साथ रहने का नहीं, बल्कि आजादी का है। चुनने की आजादी। जो लड़कियां दुनिया में अपना आना तक नहीं चुन सकतीं, वे भला जिंदगी की दिशाएं क्यों चुनेंगी!

तब भी- वे चुन रही हैं। तय कर रही हैं कि किसका साथ उन्हें वाकई खुशी देगा। ये लड़कियां थोड़ी ही सही, लेकिन अपने फैसले के लिए घरवालों से लेकर कोर्ट तक से लड़ रही हैं। ये लड़कियां वो पका खरबूज हैं, जिसकी महक सारे कसैले खरबूजों को महमहा देगी।

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