भास्कर एक्सक्लूसिवबिलकिस के दोषियों की रिहाई सही नहीं:सेंट्रल गवर्नमेंट या CBI गुजरात सरकार के फैसले को चुनौती नहीं देगी, तो बिलकिस कोर्ट जाएंगी

6 दिन पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

क्या गुनहगारों ने सच में पश्चाताप किया है? ये सवाल है बिलकिस केस में 11 दोषियों को CBI की एक विशेष अदालत में सजा सुनाने वाले पूर्व जज यूडी साल्वी का। इन दोषियों को 15 अगस्त 2022 को रिहा किया जा चुका है। जश्न मना, मिठाइयां बांटी गईं और अब दोषी मन्नतें पूरी करने गए हैं। उधर बिलकिस और अन्य गवाहों को डर के मारे छुपकर रहना पड़ रहा है।

CBI की चार्जशीट के मुताबिक ये कोई आम केस नहीं था। गैंगरेप के बाद बिलकिस को खुद पुलिस स्टेशन आकर शिकायत दर्ज करानी पड़ी। पुलिस ने बिलकिस को आरोपियों का नाम न लेने के लिए धमकाया, लेकिन उन्होंने आरोपियों का नाम बार-बार, हर बार लिया। इसके बाद पुलिस ने बिलकिस को 3 दिन थाने में रखा।

घटनास्थल पर उनके घरवालों के शवों की पहचान के लिए बिलकिस की जगह किसी और को ले जाया गया, जिसने शिनाख्त नहीं की। 14 में से 7 शव ही गायब हो गए। डॉक्टर्स ने लाशों और बिलकिस से गैंगरेप की जांच से जुड़े सैंपल्स नहीं लिए। शवों को जल्दी सड़ाने के लिए नमक की थैलियों के साथ दफनाया गया था।

CPM नेता सुभाषिनी अली, सामाजिक कार्यकर्ता रूपरेखा वर्मा, रेवती लाल और तृणमूल कांग्रेस की नेता महुआ मोइत्रा ने गुजरात सरकार के इस आदेश को रद्द करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है।

25 अगस्त को तत्कालीन चीफ जस्टिस एन वी रमना, जस्टिस अजय रस्तोगी और विक्रम नाथ की बेंच ने इस पर नोटिस जारी किया और गुजरात सरकार से 2 हफ्ते के भीतर जवाब मांगा। इसके बाद 9 सितंबर को कोर्ट ने सुनवाई 3 हफ्ते के लिए टाल दी।

बिलकिस का केस लड़ने वालीं एडवोकेट शोभा गुप्ता बताती हैं- एक प्रेग्नेंट लेडी अगर गिर जाए तो हम डर जाते हैं, लेकिन यहां तो उसने मल्टीपल रेप झेले। अपनी मां, दो बहनों का गैंगरेप होते देखा, फिर हत्या भी देखी। अपनी बच्ची को मरते देखा। बिलकिस के जिंदा रहने का मतलब वहां दैवीय दखल (डिवाइन इंटरवेंशन) का होना था। बिलकिस को जिंदा रहना ही था।

पढ़िए एडवोकेट शोभा गुप्ता से दैनिक भास्कर की विशेष बातचीत...

सवाल- बिलकिस केस के 11 दोषियों की रिहाई का इतना विरोध क्यों?
जवाब- माफी इतनी आसानी से मिलती नहीं, जितनी आसानी से इस केस में मिल गई। फिर केस अगर रेयर ऑफ रेयरेस्ट हो, तो माफी का कोई ग्राउंड ही नहीं बनता। बिलकिस के केस में तो रेयरिटी का तूफान है। 5 महीने की प्रेग्नेंट बिलकिस के साथ मल्टीपल गैंगरेप। मां, दो बहनों का गैंगरेप, उनकी हत्या। ढाई साल की बेटी को उनके सामने पत्थर पर पटककर मार दिया। इसमें तो हरेक फैक्ट रेयर है।

मैंने सुना कमेटी के एक मेंबर ने कहा कि 14 साल पूरे हो चुके थे और इन दोषियों का जेल में व्यवहार बहुत अच्छा था। इसलिए इन्हें रिहा कर दिया गया। माफी की अपील के लिए ये दोनों मिनिमम ग्राउंड है। कमेटी मेंबर को पता नहीं क्यों लगा कि ये मिनिमम ही मैक्सिमम है। रिहाई से पहले एक इम्पैक्ट रिपोर्ट बनती है। इसमें चार ग्राउंड का मूल्यांकन होता है।

पहला- क्राइम का नेचर क्या इस लायक है कि दोषी रिहा हों।

दूसरा - सोसाइटी पर इनकी रिहाई का क्या असर होगा?

तीसरा- पीड़ित पर क्या असर होगा?

चौथा- इनका जेल में व्यवहार कैसा था?

हमने इस असेसमेंट रिपोर्ट को पाने के लिए RTI डाली है। हमारी जहां तक पहुंच है, हमें तो इस रिपोर्ट के बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं मिली।

रिहाई के तीसरे आधार का मूल्यांकन बिना पीड़ित को नोटिस भेजे तो हो ही नहीं सकता। कानूनन बिलकिस के पास एक नोटिस आना चाहिए था। बिलकिस को तो तब पता चला, जब मीडिया में दोषियों के स्वागत की खबरें आईं।

सवाल- अपराध अगर इतना रेयर था तो फिर मौत की सजा क्यों नहीं मिली?
जवाब-
हमने डेथ पेनल्टी की अपील की थी। यह डेथ पेनल्टी का सिंपल केस था। कोर्ट अपराध के नेचर की रेयरिटी का मूल्यांकन करने के बाद सजा तय करती है। क्या इस केस में कोई भी तथ्य ऐसा था, जिसे रेयर की श्रेणी से नीचे रखा जा सके।

हालांकि कोर्ट ने लिबरल रवैया अपनाते हुए आजीवन कारावास की सजा दी। काश कि कोर्ट कम से कम उस वक्त सजा के साथ यह लिखवा देती- आजीवन कारावास बिना किसी माफी के। इससे तो किसी को भी लगेगा कि इस तरह का अपराध करो और 14 साल के गोल्डन नंबर को टच करो और बाहर आ जाओ।

सवाल- उस वक्त आप लोगों ने इस सजा के खिलाफ अपील क्यों नहीं की?
जवाब-
बिलकिस उस कोर्ट के फैसले के खिलाफ जाकर मौत की सजा की अपील कर सकती थीं। इस पर हमने बहुत बात की। वह लोग भी इस बहस का हिस्सा थे, जो बिलकिस की लगातार मदद कर रहे थे। हमने तय किया कि बिलकिस इतने साल से यहां से वहां भाग रही हैं। अब उन्हें थोड़ा सुकून मिलना चाहिए, ताकि वह नई जिंदगी शुरू कर सकें।

बिलकिस को मदद करने वाले लोग जानते थे कि हर हफ्ते वह लगातार एक जगह से दूसरी जगह भाग रही हैं। उनका एंटी डिप्रेशन का इलाज भी चल रहा है। सबने तय किया कि चलो कम से कम दोषी अब पूरी जिंदगी जेल में तो रहेंगे। अब बिलकिस को अपनी जिंदगी आगे बढ़ानी चाहिए और नॉर्मल जीवन में लौटना चाहिए।

सवाल- केस में थोड़ा पीछे जाएं, पुलिस ने इस मामले में 2002 में ही क्लोजर रिपोर्ट दे दी थी, तब आधार क्या थे?
जवाब- दरअसल पुलिस के पास दो कम्प्लेंट आईं थीं। एक के मुताबिक दो जीप में भरकर 20-25 लोग हथियार लेकर गांव आए थे। जान बचाकर भागने में गांव में दो ग्रुप बन गए। एक ग्रुप कहीं और चला गया और दूसरा ग्रुप बिलकिस के साथ जंगल में आ गया।

एक दूसरी कम्प्लेंट जनरेट हुई, जिसमें कहा गया कि 500-600 लोग गांव में आए और फिर यह सब हुआ। तो इन दोनों में संदेह यह पैदा हुआ कि गांव में इतनी संकरी गली में आखिर 500-600 लोग आए कैसे। इतनी भीड़ में बिलकिस ने लोगों को कैसे पहचान लिया।

इन्हीं दोनों आधार पर पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को सौंप दी। मजिस्ट्रेट ने भी बिना बिलकिस को सूचना दिए केस क्लोज कर दिया।

सवाल- केस दोबारा खुलने का आधार क्या बना?
जवाब-
देखिए, जब क्राइम बहुत सीरियस होता है, तो वह खुद अपने फुट प्रिंट छोड़ता जाता है। इस केस में भी वही हुआ। हमारे पास बहुत फैक्ट्स थे। जो लोग बिलकिस से मिले, उन्होंने उनके बयान को बार-बार नोट किया। बिलकिस बार-बार जो बताती थीं, वह सब कुछ डॉक्यूमेंट में तब्दील हो गया। बिलकिस बार-बार दोषियों के नाम ले रही थीं। बयान में बार-बार एक जैसी बातें दर्ज होती गईं। इसका पूरा पक्का डॉक्यूमेंट बन गया।

बिलकिस ने आरोपियों के नाम लेकर उन पर रिपोर्ट दर्ज कराई थी। उन्होंने खुलकर अपराधियों के नाम लिए। उधर, पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट में कहा कि आरोपी मिल नहीं रहे, इसलिए यह केस हम बंद करते हैं। यह नहीं कहा कि अपराध नहीं हुआ, कहा कि आरोपी मिल नहीं रहे।

बिलकिस को रिपोर्ट क्लोज करने का कोई नोटिस नहीं दिया गया। यह कानूनन गलत था। इसलिए हमारे पास इस केस को खुलवाने का मजबूत आधार था। दूसरी तरफ बिलकिस के बयान कई अथॉरिटी के सामने दर्ज हुए। घटना के बाद एक डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर बिलकिस के पास गई थीं। उन्होंने केस से जुड़े सारे फैक्ट नोट कर लिए थे।

वे बिलकिस की कहानी जानकर इतना डिस्टर्ब हुईं कि उन्होंने उसी वक्त हायर अथॉरिटी को यह डॉक्यूमेंट फॉरवर्ड कर दिया। इसके अलावा NHRC, कई गैर सरकारी संगठन और सबसे अहम उस कैंप में दर्ज बयान सबसे बड़ा सबूत बना, जहां घटना के बाद बिलकिस को लाया गया था। हमारे पास फैक्ट इतने मजबूत थे कि केस दोबारा खुलवाने में ज्यादा दिक्कत नहीं आई।

सवाल- इस केस में CBI की एंट्री कैसे हुई?
जवाब- हमारे पास फैक्ट्स तो बहुत मजबूत थे। बस जरूरत एक फ्रेश इन्क्वायरी की थी। तो अब सवाल उठता है कि इन्क्वायरी कौन करे? वो तो नहीं कर सकते, जिन्होंने ये मामला क्लोज करा दिया। गुजरात स्टेट के जो वकील इस मामले में शामिल थे, उन्होंने भी कहा कि अगर केस CBI को सौंप दें तो ठीक रहेगा। हम तो यही चाहते थे। केस का CBI के पास जाना ही हमारी पहली सफलता थी।

CBI ने भी कमाल का काम किया। 2003 में सीबीआई इन्वेस्टिगेशन का ऑर्डर हो गया। CBI ने इतनी डीटेल्ड इन्क्वायरी की थी कि वो वहां तक पहुंच गई, जहां पर शवों को छिपा दिया गया था।

डॉक्टर्स ने गलत पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बनाई। जबकि शुरुआत में जो फोटो क्लिक हुईं, उसमें भी उन शवों के लोअर क्लॉथ नीचे थे। सेक्शुअल असॉल्ट साफ दिख रहा था। डॉक्टर के लिए तो यह पहला काम होना चाहिए कि चेक करें कि सेक्शुअल असॉल्ट हुआ या नहीं। बिलकिस ने अपने स्टेटमेंट में साफ कहा कि उस पर स्टेटमेंट वापस लेने का दबाव बनाया गया।

पुलिस भी दबाव बनाने वालों में शामिल थी। मैं यह नहीं कहती कि पूरा सिस्टम इसमें शामिल था, लेकिन कुछ लोग तो इन्वॉल्व थे ही। इसलिए केस को गुजरात से बाहर ले जाने का मन हमने बना लिया था। मेरे ख्याल से CBI के हाथ में यह केस जाना और गुजरात से बॉम्बे हाईकोर्ट में यह केस ट्रांसफर होना हमारी मेजर विक्ट्री थी।

सवाल- अब यह केस कैसे आगे बढ़ेगा?
जवाब- हमने बिलकिस केस के सभी स्टेकहोल्डर से अपील की है कि वह इस माफी योजना के तहत हुई रिहाई को चुनौती दें। सेंट्रल गवर्नमेंट, CBI इस रिहाई को चुनौती दे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो बिलकिस को जाना पड़ेगा। हम एक बार इस रिहाई से जुड़े सारे डॉक्यूमेंट इकट्ठा कर लें, उसके बाद अगर कोई इस फैसले को चैलेंज नहीं करता है तो बिलकिस पिटीशन डालेंगीं।

सवाल- जब तक माफी वापस नहीं होती, तब तक क्या बिलकिस को सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए?
जवाब- अभी पंजाब में किसी ने कहा कि बिलकिस को यहां भेज दीजिए, हम सुरक्षा देंगे। कई लोग कह रहे हैं कि उसे सुरक्षा दे दो, लेकिन मेरा सवाल है कि बिलकिस कहीं क्यों जाए? वह तो 17-18 साल से एक से दूसरी जगह घूम ही रही हैं। बिलकिस की आजादी क्यों छीनी जाए?

बिलकिस को प्रोटेक्शन देना है तो एक सिंपल सॉल्यूशन है। जब तक गुनहगारों की रिहाई कैंसिल नहीं होती, तब तक क्यों न उनके चारों तरफ 4-4 पुलिस वाले खड़े कर दिए जाएं। इससे वे लोग बिलकिस को नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे। बिलकिस की आजादी क्यों छीनी जाए। ये अजीब है कि गुनहगार आजाद रहें, इसलिए बिलकिस की आजादी छीन ली जाए।

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1. दंगाइयों के हमले के इकलौते चश्मदीद सद्दाम ने बताया- उस दिन क्या हुआ था

ये 3 मार्च 2002, संडे का दिन था। हमें कुछ लोग हमारी तरफ आते दिखे। उनके हाथ में तलवार, हंसिया, कुल्हाड़ी और लोहे के पाइप थे। वह आकर मारने-काटने लगे। मेरी अम्मी हाथ पकड़कर मुझे दूसरी तरफ लेकर भागीं। तभी किसी ने मुझे अम्मी से छुड़ाकर एक गड्ढे में फेंक दिया। मेरे ऊपर एक पत्थर रख दिया। इसके बाद मैं बेहोश हो गया। तब 7 साल के रहे सद्दाम को ये सब याद है। इस बारे में बताते हुए सद्दाम उसी बच्चे की तरह नजर आते हैं, जिसके सामने उसकी अम्मी की लाश पड़ी है।
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2. सुलेमान-अबेसी नहीं भूले वह दिन, बिलकिस को रोक लेते तो 13 जिंदगियां बच जातीं

28 फरवरी 2002 की सुबह दाहोद के रंधीकपुर गांव की एक बस्ती खाली हो चुकी थी। बूढ़े-बच्चे, औरत-मर्द सब बदहवासी और डर की हालत में खेतों-जंगलों के रास्ते भाग रहे थे। पीछे एक भीड़ थी। हाथों में कुल्हाड़ी, हंसिया और तलवारें लिए। उनसे बचकर बिलकिस की टोली कुआंजर और पत्थनपुर में रुकी थी। यहां तब सरपंच रहे सुलेमान और अबेसी के यहां उन्हें पनाह मिली। दोनों को अब भी अफसोस है कि वे उन लोगों को गांव में नहीं रोक पाए। ऐसा किया होता तो 13 लोग जिंदा होते।
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3. रिहा हुए दोषियों के परिवार बोले- हम भी बर्बाद हुए, हमारी कोई नहीं सुनता

रंधीकपुर में बिलकिस बानो का मायका है। बिलकिस की बस्ती में करीब 75 घर हैं, लेकिन लोग बमुश्किल चार-पांच घरों में ही हैं। बाकी के दरवाजों पर लटकते ताले। रिहा किए गए 11 गुनहगार भी अपने-अपने घरों से गायब हैं। ज्यादातर मन्नत मांगने निकले हैं। एक दोषी बाका भाई खीमा के बेटे से हमने पूछा पिता के बारे में पूछा तो उसने जवाब दिया- मुझे कुछ याद भी नहीं। मेरी तो जिंदगी बर्बाद हो गई। मीडिया ने तब से पीछा ही नहीं छोड़ा। हमसे ऐसे मिलने आते हैं, जैसे हम कोई अजूबा हों।
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