ब्लैकबोर्ड:भगवाधारी ने करवा चौथ के अगले ही दिन पति का गला रेत दिया था, अब कैदी जैसी जिंदगी; 3 गनर हमेशा साथ रहते हैं

3 महीने पहलेलेखक: लखनऊ से मृदुलिका झा

‘करवा चौथ का दूसरा दिन था। तिवारी जी (कमलेश तिवारी) और हम बतिया रहे थे, जब दो लोग आए। भगवा कपड़े पहने हुए, हाथों में मिठाई के डिब्बे लिए। वो उनसे मिलने चले गए। मिनटभर के लिए मेरी आंख झपकी होगी। खुली, तो वे जा चुके थे। हमेशा के लिए! उनकी हत्या के बाद रातों-रात सब बदल गया। लोग हमसे रिश्ता रखने से डरने लगे। मुझे और बच्चों को धमकियां मिलने लगीं।

जिस घर में रात-बेरात कोई भी आ-जा पाता था, अब उसी के नीचे छोटी पुलिस चौकी बन चुकी है। कोई मायके से आए, या पड़ोस से- उसका सामान, कपड़े तलाशे जाते हैं। खुद मैं बाहर जाती हूं तो तीन गनर साथ चलते हैं। हत्या उन लोगों ने की, कैद में हम जी रहे हैं।’

दरअसल 2019 में 18 अक्टूबर को लखनऊ के कमलेश तिवारी नाम के हिंदू नेता की हत्या कर दी गई। हत्यारों ने पहले गला रेता, फिर जान बाकी न रह जाए, ये पक्का करने के लिए गोली मार दी। कमलेश पर आरोप था कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को चोट पहुंचाई थी। इस हत्या के बाद देशभर में बवाल भी खूब हुआ।

अब उस घटना के करीब ढाई साल बीत चुके हैं, लेकिन कमलेश की पत्नी और उनके बच्चे आज भी खौफ के साये में जी रहे हैं। हाल ही में 22 जून को उनके घर पर एक बेनाम-बेपता लिफाफा आया, जिसमें उर्दू में मौत का पैगाम लिखा था। तब से उनके घर के नीचे सुरक्षा और पक्की हो चुकी है।

स्याह कहानियों की सीरीज ब्लैकबोर्ड के लिए हम पहुंचे लखनऊ के खुर्शीद बाग कॉलोनी। बकरीद का दिन! बाजार बंद थे, लेकिन शहर-ए-तहजीब के हर गली-चौराहे से किस्म-किस्म के अत्तर की महक आ रही थी।

मैंने लोकेशन डालकर टैक्सी बुक करनी चाही तो एक के बाद एक तीन कैब वालों ने इनकार कर दिया। ‘मैडम, उस जगह बहुत भीड़ होती है, घुसेंगे तो निकल नहीं पाएंगे।’ बहुत झिकझिक के बाद एक ड्राइवर राजी हुआ, लेकिन शर्त थी कि वो अमीनाबाद चौराहे पर ड्रॉप कर देगा। वहां से खुर्शीद बाग कॉलोनी पहुंचना खास मुश्किल नहीं था। ‘कमलेश तिवारी का घर’ अपने-आप में एक एड्रेस था, जो हर कोई जानता है। साथ में एक गहरी निगाह कि ये लोग भी कहीं ‘वो’ तो नहीं!

घर के नीचे हिंदू एकता के पर्चे लगे हैं, साथ में एक और पोस्टर भी है- कमलेश के हत्यारों को फांसी दो। पोस्टर काफी पुराना है और एक-दो जगहों से उखड़ रहा है, जो मर चुके इस शख्स की पत्नी के जख्म की गवाही देता है।

दरम्यानी उम्र की किरण तिवारी अपने पति कमलेश तिवारी की मौत पर बात करती हैं तो उनका चेहरा उनके घर की दीवारों से भी ज्यादा सपाट दिखता है। कोई भाव नहीं! बता-बताकर थकी हुई जबान, लेकिन बोलते हुए अचानक ही वे फफककर रो पड़ती हैं।

किरण कहती हैं- पूरी जिंदगी घूंघट में रही। घर-पति-बच्चे ही मेरी दुनिया थे। उनके जाने के बाद दफ्तर में बैठना पड़ा। फोटो पर माला देखती हूं तो कलेजा कलपता है। उनके साथ मैं भी चली जाती, तो अच्छा होता।

भोजपुरी-घुले लहजे में किरण याद करती हैं- हम और तिवारी जी बतिया रहे थे कि तभी नीचे से बुलौआ आया। निचली मंजिल पर ही ऑफिस है। तिवारी जी बोलकर गए कि थोड़ी देर में आता हूं। हमको उतनी ही देर में झपकी आ गई। आंख कुकर की सीटी से खुली। दाल बंद करके हम कमरे में पहुंचे तो बेटा रो रहा था। हमें देखकर कहने लगा- मम्मी, कोई पापा को मारकर चला गया!

एक दिन पहले उनकी लंबी उम्र के लिए व्रत रखा था- कहते हुए किरण दीवार की तरफ देख रही हैं। उम्मीद से खाली सूखी हुई आंखें। जिनके बल पर घर चलता था, जिनके कारण हम हंसते-रोते थे, वही चले गए। अब जीने का क्या मतलब।

उसके बाद?...

चुप बैठी किरण को टटोलती हूं। उसके बाद आपको क्या-क्या बताएं! आज वो जिंदा होते तो शादी को 25 साल हो जाते। मैं हरदम ठोड़ी तक घूंघट में रही। माथे पर लाल बिंदी और गाढ़ा सिंदूर सजाए खाना बनाती, खाती और सास-ससुर की सेवा करती। सालोंसाल यही किया। फिर एकदम से वो चले गए।

मुझे कुछ पता नहीं था। घर में कितने पैसे हैं? रात में क्या सब्जी बनेगी? इन सभी बातों का वही ध्यान रखते थे। अब सब मुझे करना था। रोते हुए बच्चों को चुप कराना था। पैसों का इंतजाम करना था। सबसे बड़ी बात उनके लिए इंसाफ जुटाना था। मेरे लिए ये वैसा ही था, मानो अभी-अभी चलना सीखे बच्चे को लंबी दौड़ में खड़ा कर दिया जाए।

कल्पना कीजिए, गांव के माहौल में रहती ऐसी औरत, जिसने कभी बैंक का काम तक न किया हो, उसे अब पूरा घर चलाना था। मुझे नहीं पता था कि पति के पास कितना बैलेंस था, कहां जमीन थी, या कहां पैसे बकाया थे। मायके से पैसे मांग नहीं सकती थी। ससुराल में अपने समेत पढ़ते बच्चों का बोझ डाल नहीं सकती थी। जैसे-तैसे सब संभाला।

ये बताते हुए किरण घर की तरफ देखती हैं। मैं उनकी नजरों के साथ देखती हूं- पुराने ढंग का मकान, जिसकी दीवारें सीलन और वक्त से जर्द हो चुकी हैं। माचिस की डिबिया जैसी रसोई और निचली से पहली मंजिल तक आने के लिए अंधेरी-संकरी सीढ़ियां। खुर्शीद बाग कॉलोनी की चौड़ी सड़कें और चौड़े मकानों के बीच ये मकान कुछ बेमेल लगता है, जैसे विदेशी तर्ज के बाथरूम में लकड़ी का मटमैला स्टूल रख दिया जाए।

उनके पास बहुत पैसे हैं। केस प्रयागराज ट्रांसफर करा लिया। लखनऊ से 200 किलोमीटर दूर। पेशी पर जाती हूं तो जान का खतरा रहता है। कोर्ट में उनके पक्ष में कई बड़े-बड़े वकील हैं। दिल्ली तक उनकी पहुंच है। हम बस पोस्टर ही लगवा रहे हैं कि कमलेश तिवारी के हत्यारों को फांसी मिले। अब तो उसके भी पैसे नहीं।

अजी, ये भी कोई जीना है! सालों तक जो औरत सब्जी-भाजी लेने बाजार जाती रही, जिसे कपड़े खरीदना पसंद था, अब वो घर से बाहर नहीं निकल सकती। हंसते हुए ही किरण बताती हैं।

साल 2019 के बाद से मैंने हाट-बाजार नहीं किया। चौक तक भी जाना हो, तो तीन गनर साथ चलने को तैयार रहते हैं। निकलो तो सब अजीब ढंग से देखते हैं। तो मैंने कहीं जाना ही छोड़ दिया। और अब लोग भी मुझे अपने घर बुलाने से डरते हैं। तीन जना परिवार के होंगे, तो साथ में तीन सिपाही भी रहेंगे। 6 लोगों का खाना बनेगा। अब लोग कम ही बुलाते हैं। मैं जाऊं भी तो एकाध रात में लौट आती हूं।

किरण अचानक ठहरकर कहती हैं- हत्या उन लोगों ने की। कैद में हम जी रहे हैं। अब लगता है कि जब तक जीना है, कैद में रहना ही होगा।

कभी भी धमकी आ जाती है। कभी पाकिस्तान से, कभी बांग्लादेश से तो कभी सोशल मीडिया पर। कहते हैं कि जिस जहन्नुम में तुम्हारे पति को भेजा, तुम्हें भी वहीं पहुंचा देंगे। पहले डर लगता था। अब आदत हो गई। जिस काम को तिवारी जी छोड़ गए, हम मिलकर उसे पूरा करेंगे। मरना तो फिर है ही। वे धीरे-धीरे कह रही हैं।

उनके बाद हम सबसे छोटे बेटे मृदुल से मिलने के लिए भीतर के कमरे में जाते हैं। 18 पार का ये लड़का चुपचाप बैठा है। इंटरव्यू की बात पर झेंपता हुआ कहता है- मम्मी से बात तो हो गई आपकी! थोड़ी देर बाद बात करने को राजी होता है, लेकिन कैमरा ऑन होते ही चुप हो जाता है।

फिर कहता है- पापा के जाने के बाद सब बदल गया। न कोई सुनने वाला था, न समझने वाला। मैं छोटा भी था। दिनभर रोता, या गुस्सा करता। धीरे-धीरे स्कूल जाना शुरू हुआ तो वहां भी सब बदला हुआ था। बाकी बच्चे पापा-मम्मी के साथ जाते, मैं गनर के साथ पहुंचता। बच्चे हंसते। कमेंट करते। हमको भी शर्म आती। दोस्त बात नहीं करते थे।

और अब?...

अब इग्नोर करना सीख लिया- मृदुल कहते हैं। आगे जोड़ते हैं- सोचता हूं कि पापा होते तो जिंदगी कुछ बेहतर होती। वो नहीं हैं तो बहुत कमी है।

विदा लेकर मैं नीचे पहुंचती हूं तो पाती हूं कि किरण पुलिसवालों के पास विजिटर्स रजिस्टर देख रही हैं। शिकायती लहजे में कहती हैं- कोई भी आए तो एंट्री करवाकर ऊपर मत भेज दीजिए। पहले फोन करके पता कर लीजिए कि हम मिलना चाहते हैं, या नहीं। पुलिस को शिकायत थी कि मृदुल के दोस्त आते हैं तो एंट्री करने में आनाकानी करते हैं। वो सीधे ऊपर जाना चाहते हैं।

मुझे खड़ा पाकर किरण कहती हैं- अब जो है, यही है। बच्चे भी कितना मान पाएंगे!

इस सब पर वहां तैनात पुलिसवालों से भी बात करने की कोशिश की, लेकिन हो नहीं सकी। सुरक्षा वजहों से ये मुमकिन नहीं हुआ।

अपना दर्द बांटती किरण अकेली नहीं! देश में ऐसे बहुतेरे मामले होंगे, जहां धार्मिक उन्माद ने कभी किसी पुरुष, तो कभी किसी बच्चे या महिला की जान ले ली। हजारों मामले होंगे, जहां एक मजहबी यकीन ने दूसरे यकीन को लील लिया। और शायद लाखों मामले हों, जहां धर्म के नाम पर दंगे भड़कें, न भड़कें, लेकिन दिलों में नफरत की स्याही घुलने लगी है। वो स्याही, जिससे जगमगाता इतिहास नहीं, बल्कि खून से सनी कहानियां लिखी जाएंगी, अगर हम वक्त रहते न संभले।

(इंटरव्यू कोऑर्डिनेशन- अनुज शुक्ला)