दावत-ए-इस्लामी में औरतों की No Entry:मैडम…किसी मर्द को भेजिए, आप दफ्तर नहीं आ सकती; पराई औरत से इस्लाम के बारे में बात करना गुनाह

3 महीने पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी

ये कोई खबर नहीं है, बस खबर की खबर है…दरअसल उदयपुर के कन्हैयालाल हत्या मामले में एक नाम बार-बार आ रहा- ‘दावत-ए-इस्लामी’। इससे पहले अहमदाबाद में किशन भारवाड़ की हत्या मामले में भी ये नाम आया था। तो भास्कर रिपोर्टर संध्या ने इस संस्था की पड़ताल करनी चाही।

पहला जरिया था संस्था के दफ्तरों में फोन करना। किया भी, लेकिन कोई बात करने को ही तैयार नहीं। और वजह बेहद अजीब- ‘आप औरत हैं, उसूली तौर पर दफ्तर में दाखिल होना तो छोड़िए, आप से फोन पर इस्लाम के बारे में बात करना भी गुनाह होगा।’ बार-बार की कोशिशें नाकाम रहीं तो हमने उस कोशिश की ही खबर की है। इसलिए पहले ही कहा कि ये खबर की खबर है।

पढ़िए, शायद कुछ सच सामने आ जाए…

मुंबई, दिल्ली और कश्मीर में 6 दिनों तक कई फोन मिलाने और कड़ी मशक्कत के बाद दावत-ए-इस्लामी के दफ्तर तक पहुंच तो बन गई, लेकिन मुंबई स्थित दफ्तर ने बात करने से साफ मना कर दिया। इसके बाद दिल्ली के दफ्तर में 15-20 बार कॉल किया। हर बार एक ही जवाब मिला- हम आपको अपने दफ्तर में एंट्री नहीं दे सकते हैं।

मैंने कहा- ठीक है, फोन पर तो बात कर सकते हैं न! उधर से न कहकर फोन काट दिया गया। यह सब मुझे अखरा नहीं। न सुनना रिपोर्टिंग का एक अहम हिस्सा है। इसके बाद भी मैंने कोशिश नहीं छोड़ी। इधर-उधर पैर मारने के बाद मेरे एक जर्नलिस्ट दोस्त ने जम्मू-कश्मीर स्थित दावत-ए-इस्लामी संस्था के अपने एक दोस्त का फोन नंबर दिया। उनका नाम है-ताहिर अटारी और पद है चीफ इंजीनियर-दावत-ए-इस्लामी। मुझे यकीन था इस्लाम के मुताबिक ढीले-ढाले और थोड़े ढंके हुए लिबास के साथ मेरी एंट्री दिल्ली स्थित संस्था के दफ्तर में करा देंगे।

मैंने फट से उनके नंबर पर फोन मिलाया। मन में ख्याल था कि कहीं यहां भी न बोलकर मना न कर दिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। विस्तार से बात हुई। साथ ही यह भी मालूम चला कि बार-बार मुझे ‘न’ सुनने को क्यों मिल रहा था।

ये क्या….जेंडर मेरे जर्नलिज्म के आड़े आ गया

यकीन मानिए जब वजह पता चली तो गुस्सा कम, ताज्जुब ज्यादा हुआ। हैरान थी कि मेरा जेंडर मेरे जर्नलिज्म के आड़े आ गया। मतलब मेरी एंट्री पर पाबंदी एक जर्नलिस्ट होने की वजह से नहीं थी, असल विरोध मेरे औरत होने से था।

उन्होंने कहा- आप एक काम कीजिए। किसी जेंट्स को बात करने के लिए कहिए। हम दफ्तर में उनकी एंट्री करवाने की कोशिश करेंगे। फोन के उस पार से मिली इस सलाह के लिए मैं बिल्कुल तैयार नहीं थी। मैंने फिर कहा- नहीं स्टोरी तो मुझे ही करनी है।

मैं कुछ घंटे आपकी संस्था में गुजारकर, वहां दी जाने वाली ट्रेनिंग के बारे में जानकर हूबहू स्टोरी लिखना चाहती हूं, ताकि इस संस्था के बारे में बाहर हो रही चर्चाओं के इतर आपके मकसद और आपके काम को जस का तस लोगों के बीच रख सकूं।

उधर से फिर आवाज आई। आप समझी नहीं। औरतों को हम एंट्री देते ही नहीं। एक छोटी सी चुप्पी के बाद मैंने फिर रिक्वेस्ट की। आप जैसे कपड़े कहेंगे, मैं वैसे पहनकर आ सकती हूं। इस्लाम जिन कपड़ों की इजाजत देता है, वैसे कपड़े मैं पहन सकती हूं। सलवार सूट, कहें तो बुर्का भी।

फोन के उस पार से फिर आवाज आई। बात लिबास की नहीं। बात-आपके औरत होने की है। इस्लाम में गैर मोहारिब यानी ऐसी औरतें जो न आपकी सगी बहन हैं, न मां, न पत्नी या कोई रिश्तेदार, उनसे आपका मिलना तो छोड़िए बात करना भी मुनासिब नहीं।

अटकी बात को बढ़ाने की गरज से मैंने कहा- चलिए मैं किसी जेंट्स को लेकर आऊं और वह सवाल करे, तब तो ठीक है न। तब तो मुझ पर पाबंदी नहीं होगी न! उधर से फिर जवाब मिला- किसी जेंट्स के साथ भी इस्लामिक संस्था में औरतों की एंट्री बैन है। न हासिल होने से कुछ भी हासिल होना अच्छा है। मैंने कहा- ठीक है। फोन पर ही मैं अपने सवाल आपसे पूछ लेती हूं। उन्होंने कहा-हमारी संस्था इस्लाम के बारे में ट्रेनिंग देती है। लिहाजा इसके बारे में एक औरत से फोन पर भी हम बात नहीं कर सकते।

मैडम… फोन पर भी गैर औरत से इस्लाम के बारे में बात करना गुनाह है

इतने दिनों की मशक्कत के बाद मुझे एक नंबर मिला था, इससे काफी कुछ उम्मीदें थीं। मैं खाली हाथ तो नहीं जा सकती थी। मैंने कहा- आप तो बात कर ही रहे हैं न। उधर से फट से आवाज आई.. मैं इस्लाम के बारे में या फिर संस्था के बारे में तो बात नहीं कर रहा।

उन्होंने कहा कि आप अपने सवाल लिखकर भेज दीजिए, हम जवाब दे देंगे। मैंने कहा-डन, लेकिन उन्हीं सवालों को अगर मैं फोन पर पूछ भी लूं और आप या कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति फोन पर जवाब दे दें तो ज्यादा बेहतर होगा। उन्होंने फिर हंसते हुए कहा- आप समझ नहीं रहीं। किसी पराई औरत को फोन पर जवाब देना भी इस्लाम में जायज नहीं।

अब मेरा सवाल था कि अगर कोई औरत देश की पीएम बन गई और आपको उनसे संवाद करना पड़ा तो क्या करेंगे? मां, बहन और पत्नी को छोड़कर औरत कुछ भी बन जाए हम सीधे बात नहीं करेंगे। अपने घर की किसी औरत के जरिए बात करेंगे।

मैंने फिर सवाल किया… फर्ज कीजिए मैं आपको जानने वाली हूं। किसी मुसीबत में हूं। और मदद के लिए आप ही हैं। तो क्या करेंगे? उधर से जवाब मिला। अपनी बहन, पत्नी या मां को आपकी मदद के लिए भेजूंगा। अगर वह दूर हुईं तो? उधर खामोशी थी।

10 महीने पहले मैंने इस्लामिक शिक्षा के केंद्र दारुल उलूम में सुबह से शाम तक वक्त गुजार कर रिपोर्ट की थी। वहां एंट्री तो मिल गई थी, लेकिन औरत होना अखर गया था। चलते-चलते आप वो दास्तां भी पढ़ लीजिए…

महिला पत्रकार के लिए दारुल उलूम के मायने…

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में बसे देवबंद में स्थित इस्लामी तालीम के केंद्र दारुल उलूम में जाते हुए मैंने खुद को एक बार नहीं कई बार आईने में देखा। अपनी अलमारी के सबसे बंद कपड़ों को निकालकर उन्हें इस्त्री करने के बाद दुपट्टे के साथ खुद को अपनी कोशिश भर पूरा ढंका। दारुल उलूम के दरवाजे पर पहुंचकर बेख्याली में ही दुपट्टे को मैंने फैलाकर ऐसे डाला कि मानो मैं अपने आपको छिपाने की कोशिश कर रही हूं।

खैर, मेरे लिए दरवाजा खुला और दारुल उलूम के एक पदाधिकारी मुझसे मिले। उनकी मेहमान नवाजी काबिल-ए तारीफ थी, लेकिन दारुल उलूम में घूमते हुए शरिया लॉ से जुड़े मेरे सवाल और उनके जवाब मेरे औरत होने की आजादी और वजूद पर हर बार पाबंदी बनकर बरसते रहे। पूरे 7 घंटों के इस सफर में 'यह जनाब' मेरे साथ थे।

दारुल उलूम में बिताए गए वक्त में कई दफा मैंने अपने कपड़ों, अपने पेशे और जीवन के हर हिस्से पर चुभने वाले सवालों को महसूस किया। शरिया लॉ औरत होने की जिस्म पर बनी हर निशानी के जाहिर होने पर पाबंदी लगाता है तो मर्दों के साथ उनके पढ़ने और काम करने पर उनके चरित्र पर भी सवाल उठाता है। (पढ़िए पूरी रिपोर्ट)