संडे जज्बातपाकिस्तान में मुझे काफिर कहते थे, भारत में पाकिस्तानी:रात-बे-रात महिलाएं उठा ली जातीं, भारत पहुंचा तो मम्मी-पापा और भाई मर गए

11 दिन पहलेलेखक: हिंदू सिंह सोढा

पाकिस्तान में लोग हमें काफिर कहते थे और भारत में पाकिस्तानी। वहां हमारे साथ मार-पीट हुई, खून खराबा हुआ, जेल में डाला गया, बहन-बेटियां उठा ली गईं। डर के मारे भारत आए तो यहां लोग शक करने लगे। वहां हम जमींदार थे, 35 कमरों की हवेली थी। यहां किराए का कमरा भी मुश्किल से मिलता है।

भारत आने के बाद पिता की कैंसर से मौत हुई, फिर मां चल बसीं और एक साल बाद भाई साथ छोड़ गया। तीन साल के भीतर तीन मौतें। बहुत बड़ा सदमा लगा। डिप्रेशन में चला गया। पूरा परिवार बिखर गया।

मरते वक्त पापा ने वचन दिया था- ‘पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं के लिए काम करना।’ 25 साल से उसी वादे को निभा रहा हूं।

मैं हिंदू सिंह सोढा, राजस्थान के जैसलमेर में रहता हूं। बंटवारे के बाद सबसे बड़ा विस्थापन हुआ। लाखों जानें गईं। लाखों लोग अपना घर-बार छोड़कर इधर से उधर गए। हमारे ज्यादातर रिश्तेदार भी भारत चले गए, लेकिन तब हमने पाकिस्तान में ही रहना ठीक समझा।

पाकिस्तान के थारपारकर जिले के छाछरो गांव में हमारा 200 लोगों का परिवार था। धन-दौलत हर तरह से संपन्न थे। राजनीतिक रसूख भी अच्छा-खासा था। इसलिए तब हमें कोई दिक्कत नहीं हुई। काफी सालों तक हमारा भारत आना-जाना रहा। अपने रिश्तेदारों के यहां आते-जाते रहे।

1965 के बाद माहौल खराब होना शुरू हो गया। हिंदू-मुस्लिम नफरतों का जहर हमारे गांव में भी घुलने लगा। 1969 में मार्शल लॉ चीफ एडमिनिस्ट्रेटर जनरल याह्या खान का दौर आया। यहीं से हमारा राजनीतिक रसूख भी कमजोर पड़ने लगा।

पूछताछ के नाम पर पुलिस हिंदुओं के घरों में घुसकर लोगों को उठाकर ले जाने लगी। हम वहां अल्पसंख्यकों की आवाज थे। इसलिए टारगेट पर थे। हमारे परिवार पर भारत की जासूसी करने का आरोप लगने लगा। धीरे-धीरे चारों तरफ दहशत बढ़ने लगी।

एक दिन परिवार में किसी की मौत हुई। तब मैं 10-12 साल का था। पुलिस पूछताछ के लिए आई और मेरे कजिन को उठाकर ले गई। उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया। लोग कहने लगे कि अब तो इन्हें फांसी हो जाएगी। पूरा परिवार सदमे में था। कई दिनों तक घर में खाना ही नहीं बना, लेकिन कुछ लोगों ने हमारी मदद की। जैसे-तैसे वे जेल से बाहर आए।

उसी दिन घर में तय हुआ कि अब पाकिस्तान में नहीं रहना है। धीरे-धीरे घर की महिलाओं को उनके मायके यानी जोधपुर और बाड़मेर जैसे शहरों में भेजा जाने लगा। दो महीने में घर की सभी महिलाएं भारत चली गईं। घर में सिर्फ पुरुष रह गए थे।

आठ फरवरी 1971, जैसे ही रात हुई हम लोग ऊंट और घोड़ों पर सवार होकर भारत के लिए निकल गए। हमारे साथ 250 लोग थे। तब बॉर्डर पार करना इतना मुश्किल नहीं था और हमें रास्ते भी पता थे। फिर भी मन में खौफ तो था ही।

तीन-चार टुकड़ियों में बंटकर पूरी रात हम चलते रहे। अगले दिन सुबह भारत पहुंच गए। यहां राजस्थान का बाड़मेर हमारा ठिकाना बना। वहां के बाउरी गांव में अपनी झोपड़ी लगाई। एक रात में ही अर्श से फर्श पर आ गए थे।

उस समय मैं 10वीं में था। पढ़ाई छूट गई थी। पापा के पास भी कोई रोजगार नहीं था। लोग शक की निगाहों से देखते थे। जहां भी जाते लोग पाकिस्तानी कहकर बुलाते। बड़ी मुश्किल से एक साल गुजरा। इसके बाद मुझे पढ़ने के लिए जोधपुर भेज दिया गया। वहां से ग्रेजुएशन किया और उसके बाद एलएलबी।

पढ़ाई के दौरान ही मैं राजनीति से जुड़ चुका था। धरना-प्रदर्शन और आंदोलनों में जाने लगा था। इसलिए लॉ करने के बाद पापा से कहा कि नौकरी नहीं करूंगा। मम्मी नाराज हुईं, लेकिन पापा ने इजाजत दे दी। उन्होंने कहा जो तुम्हें पसंद वही करो। इसके बाद मैं छात्र राजनीति में उतर गया।

90 के दशक की बात है। पापा को फेफड़ों का कैंसर डिटेक्ट हुआ। उनकी हालत देखकर मुझे लगने लगा कि अब वे बचेंगे नहीं। मन ही मन सोचने लगा कि अब तक मैं इधर-उधर ही भागता रहा, पापा को कभी वक्त नहीं दे पाया। उनके पास नहीं बैठा।

इसलिए तय किया कि अब जो भी वक्त है, उसे पापा के साथ ही गुजारना है। मैंने सारे काम छोड़ दिए। इधर-उधर जाना बंद कर दिया। अस्पताल में पापा के बेड के पास ही अपना भी बिस्तर लगा लिया। दोनों खूब बातें करते थे।

एक दिन पापा कहने लगे विस्थापन की बड़ी लहर आने वाली है। 1947, 1971 के बाद फिर से लोग बड़ी तादाद में भारत आएंगे। तुम उनके लिए काम करना। मैंने पापा से वादा किया कि मैं उन लोगों के लिए काम करूंगा।

6 महीने बाद पापा की मौत हो गई। इसके बाद मैं जोधपुर, बाड़मेर और जैसलमेर जैसे शहरों में पाकिस्तान से आ रहे लोगों से मिलने लगा। उनकी तकलीफें समझने की कोशिश करने लगा। शुरुआत में तो पता ही नहीं चलता कि करना क्या है, सीमा पार से आने वालों लोगों की परेशानियां क्या हैं।

कई महीने बाद समझ में आया कि ज्यादातर लोग वो हैं जिनके घर की महिलाओं को खतरा है। इसी वजह से वे लोग पाकिस्तान से पलायन करके भारत आने के लिए मजबूर हो रहे हैं। इसी बीच मम्मी की मौत हो गई। इस सदमे से उबरा भी नहीं था कि छोटा भाई दुनिया छोड़कर चला गया।

एकाएक सबकुछ बिखर गया। कई महीने डिप्रेशन में रहा। बेंगलुरु में इलाज कराया तब जाकर ठीक हुआ। फिर अपने मिशन में लग गया।

मुझे उस समय का एक वाकया याद आ रहा है। राणा राम नाम का एक आदमी मुझसे मिला। उसकी गोद में दो छोटे-छोटे बच्चे थे। पाकिस्तान में उसकी पत्नी को कुछ लोग उठाकर ले गए थे।

उसने हर जगह गुहार लगाई। महीनों इधर-उधर ढूंढा, लेकिन कहीं कुछ पता नहीं लगा। एक दिन उसे एक तस्वीर दिखाई गई। जिसमें उसकी पत्नी बुर्का पहने हुई थी, नमाज पढ़ रही थी। इसके बाद थक हारकर अपने बच्चियों के साथ वह भारत आ गया। ऐसे अनगिनत केस मुझे मिले। उनकी कहानियां सुनाने बैठूं तो वक्त कम पड़ जाएगा।

ये राणा राम हैं, जो पाकिस्तान से अपने बच्चों के साथ आए थे। इनकी पत्नी का अपहरण हो गया था पाकिस्तान में।
ये राणा राम हैं, जो पाकिस्तान से अपने बच्चों के साथ आए थे। इनकी पत्नी का अपहरण हो गया था पाकिस्तान में।

उसी तरह जनता माली का केस मैं कभी नहीं भूल पाता। वह अपने पति के साथ भारत आ रही थी। परिवार को तो आने दिया गया, लेकिन उसे पाकिस्तान में ही रोक लिया गया। उसके बाद उसका कुछ पता ही नहीं लगा।

पाकिस्तान के संविधान से लेकर संसद तक अल्पसंख्यकों की कहीं सुनवाई नहीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक हर साल वहां एक हजार अल्पसंख्यक महिलाएं लापता होती हैं। घर में तेज आवाज में आरती नहीं कर सकते। मंदिर तोड़ दिए जाते हैं, घर में जबरदस्ती घुसकर भगवान की मूर्तियां खंडित कर दी जाती हैं। नौकरियां तो दूर की बात है, इन्हें काम तक नहीं दिया जाता है।

इधर भारत आने पर उन्हें झुग्गी-झोपड़ी में रहना पड़ता है। कई लोगों को ना नौकरी मिलती है, ना उनके बच्चों का स्कूलों में दाखिला हो पाता है। उल्टे शोषण का शिकार भी हो जाते हैं।

जब मैं इनके लिए काम करने लगा तो पहली बार 1998 में पूर्व राष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत ने हमारी बात सुनी। इसके बाद 2004 में 13 हजार लोगों को नागरिकता मिली। जब सुषमा स्वराज विदेश मंत्री थीं, तो उन्होंने भी बहुत मदद की।

राजस्थान की पूर्व सीएम वसुंधरा राजे और अभी के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी हमारी मदद की। नागरिकता की बढ़ाई गई फीस कम कर दी, लेकिन अभी भी बहुत मुश्किलें हैं।

तस्वीर जुलाई 2020 की है। एक साथ 11 लाशें रखी गई हैं। पाकिस्तान से आए एक परिवार के 11 लोगों ने आत्महत्या की थी।
तस्वीर जुलाई 2020 की है। एक साथ 11 लाशें रखी गई हैं। पाकिस्तान से आए एक परिवार के 11 लोगों ने आत्महत्या की थी।

नागरिकता दिलाने के लिए रिश्वत मांगने की शिकायतें हमारे पास आती हैं। इनकी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं भी होती हैं। इसी वजह से जुलाई 2020 में पाकिस्तान से आए हिंदुओं के एक परिवार के 11 लोगों ने आत्महत्या की थी।

हाल के दिनों में बॉर्डर पर कड़ी सुरक्षा और थार एक्सप्रेस बंद होने के बाद पाकिस्तान से आने वाले लोगों की संख्या घटी है। इसके बाद भी करीब 25 हजार ऐसे लोग हैं, जिन्हें नागरिकता नहीं मिली है। इसमें हिंदुओं के साथ ईसाई और दूसरे अल्पसंख्यक भी हैं।

मैं पाकिस्तान से आने वाले लोगों की मदद करता हूं। उन्हें खाने-पीने की चीजें मुहैया कराता हूं। उनके बच्चों को एजुकेशन दिलवाता हूं।
मैं पाकिस्तान से आने वाले लोगों की मदद करता हूं। उन्हें खाने-पीने की चीजें मुहैया कराता हूं। उनके बच्चों को एजुकेशन दिलवाता हूं।

हिंदू सिंह सोढा ने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की हैं...

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मैं जोगिंदर सिंह तूर, पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में एडवोकेट हूं। आजादी के 75 साल गुजर गए, लेकिन मेरे लिए बंटवारे का दर्द जस का तस है। हर तरफ खौफ, चीख-पुकार, लहूलुहान लोग और बिखरी पड़ी लाशें। सब कुछ आंखों में तैरता रहता है, जैसे कल की ही बात हो। कई बार तो रात में एकाएक उठकर बैठ जाता हूं। हम जिंदा हिंदुस्तान तो आ गए, लेकिन मन लाहौर में ही रह गया। आज भी उसी बारे में सोचता रहता हूं। (पढ़िए पूरी खबर)

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