बात बराबरी की:बूढ़े मर्द में तो बच्चों की तरह ताकत होती है, लेकिन जो औरतें बच्चे पैदा नहीं कर सकतीं, वे बेकार हो चुकी दवा हैं, केवल जगह घेरती हैं

नई दिल्लीएक वर्ष पहले
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साल 2019 की बात है। तब कोरोना ने दस्तक नहीं दी थी। न कोई तूफान था, न टिड्डियों का हमला। यानी ऐसा कोई जलजला नहीं आया था जो खबर बन सके। ऐसे में महाराष्ट्र का बीड़ जिला सुर्खियों में आया। यहां गन्ने के खेतों में काम करती युवा औरतें बच्चेदानी निकलवा रही थीं ताकि पीरियड्स में छुट्टी न लेनी पड़ी। साथ ही इससे ठेकेदार की जबर्दस्ती पर बच्चा ठहरने का डर भी चला जाता था। बेहद युवा उम्र में ये औरतें मेनोपॉज देखतीं और 40 की होते-होते कमर झुक जाती। झुर्रियों भरी त्वचा और खरखराती आवाज वाली उन गरीब-अनपढ़ औरतों को मेनोपॉज का मतलब भी नहीं पता था, लेकिन शहरों में रहता संभ्रांत तबका भी उनसे अलग नहीं। वो मेनोपॉज जानता तो है लेकिन भूले से भी उसकी बात नहीं करता।

ये हम नहीं, दुनियाभर की कामकाजी औरतों पर हुई स्टडी कहती है। वेलबीइंग ऑफ वीमन सर्वे के मुताबिक मेनोपॉज (पीरियड्स का बंद होना) का सीधा असर कामकाजी महिलाओं पर पड़ता है। मदद न मिलने पर वे या तो काम छोड़ देती हैं, या फिर कई बीमारियों का शिकार हो जाती हैं। इसका नतीजा इकोनॉमी पर भी होता है। हर साल मेनोपॉज से जुड़ी परेशानियों के चलते लगभग 150 अरब डॉलर का नुकसान होता है। ये नुकसान कैंसर से होने वाले घाटे से कहीं ज्यादा है। इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर का साल 2016 का डाटा कहता है कि कैंसर से सालाना लगभग 46 बिलियन डॉलर का घाटा होता है।

यानी आर्थिक नफा-नुकसान से तौलें तो कैंसर की बजाए मेनोपॉज पर ज्यादा बात होनी चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा। 50 पार की महिलाओं में होने वाला ये सबसे बड़ा बदलाव अब भी हेल्थ सेक्टर का सबसे अछूता विषय है। हजारों रिसर्च और लेख पुरुषों की ताकत बढ़ाने की बात करते हैं। मर्दाना हॉर्मोन टेस्टोस्टेरॉन कैसे बढ़ाया जाए, इसके सुझाव देते हैं। पुरुष उम्र बढ़ने पर भी कम से कम बूढ़ा महसूस करें, इसके लिए दवा-दारू खोजते हैं, लेकिन अधेड़ महिलाओं की सेहत के इस मुद्दे को छूते भी नहीं।

मेनोपॉज यानी जब कुदरती तौर पर महिलाओं में पीरियड्स पूरी तरह से बंद हो जाएं। ये विषय उतना रसीला नहीं। इससे बुढ़ाती और चिड़चिड़ाती औरतों की महक आती है। अधेड़ होती औरतों पर कविता नहीं लिखी जा सकती। न ही उनसे उफनता हुआ प्रेम ही किया जा सकता है। मेनोपॉज को पहुंची औरत बहीखाता का वो पन्ना है, जो काफी पहले बेकाम हो चुका।

ऐसी औरत, जो पुरुषों का दिल न गुदगुदाए, भला हेल्थ सेक्टर भी उस पर अपने पैसे क्यों लगाए। यही कारण है कि वैज्ञानिक मेनोपॉज पर बात नहीं करते। वैज्ञानिक तो वैज्ञानिक, खुद औरतें भी इस पर बात करते डरती हैं। इसके पीछे भी हमारे समाज का वही घिसा हुआ पुरुष मनोविज्ञान काम करता है।

12 साल की होते-होते बच्ची को एकदम से औरत बना दिया जाता है। ऐसे कपड़े पहनो। पैर पसारकर मत बैठो। हरेक से हंस-बोलकर मत मिलो। ये मत करो। वो करो। विदेश जाते लोगों को रिश्तेदारों से इंपोर्टेड चीजों की उतनी लंबी लिस्ट नहीं मिलती, जितनी टीन-एज लड़की को हिदायतों की। वजह! बच्ची के पीरियड्स शुरू हो चुके होते हैं। अब किसी अनहोनी का खतरा रहता है। अब डर होता है कि हॉर्मोन्स के असर में बच्ची ही किसी से दिल न लगा बैठे। तो हिदायतों की बेंत उस पर हरदम बरसती है।

लेकिन, कोई भी उसे ये नहीं बताता कि अब साफ-सफाई कितनी जरूरी है? पीरियड्स की साइकिल क्या होती है? या फिर अगर दर्द हो तो डॉक्टर के पास जाना चाहिए। यहां तक कि अल्ट्रा-मॉडर्न विज्ञापनों तक में दिखता है कि फलां सैनिटरी पैड लें तो दर्द या तकलीफ छू-मंतर हो जाएगी और लड़की दनादन सारे काम निपटाती चली जाएगी।

पीरियड्स को किसी खुफिया जानकारी की तरह सबसे छिपाकर रखने की सलाह मिलती है। साथ ही ये अहसास भी कराया जाता है कि लड़की का वजूद इन्हीं पांच दिनों के कारण है। ऐसे में जाहिर है कि पीरियड्स का हमेशा के लिए रुकना उसके लिए जिंदगी थमने जैसा हो जाता है। मेनोपॉज से गुजर रही औरतों को लगता है कि उनका स्त्रीत्व खत्म हो रहा है। वे सारे दर्द, शरीर में हो रहे सारे बदलाव, हॉर्मोन्स का उतार अकेली झेलती हैं लेकिन किसी से इस बारे में बात नहीं करतीं।

एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रान, जिन्हें फीमेल हॉर्मोन भी कहते हैं- मेनोपॉज में ये एकदम कम हो जाते हैं। इससे केवल यही नहीं बदलता कि औरत बच्चे पैदा नहीं कर पाती। बल्कि खिलंदड़ और फुर्तीली औरत एकदम से चिड़चिड़ी हो सकती है। उसे नींद नहीं आती। चेहरा और तलवे आग की तरह जलते हैं। वजन तेजी से बढ़ता है। हर बात पर आंसू टपकने को होते हैं। ये बदलाव इतने यकायक और तेजी से होते हैं कि कोई भी संभाल न सके। तिस पर मुंह सिले रखने की मजबूरी।

दूसरी ओर इसी पड़ाव पर खड़े मर्दों के लिए ढेर से ऐसे मुहावरे हैं, जो उन्हें देर तक युवा महसूस कराएं। उम्रदराज मर्द के लिए कहा जाता है- साठा तो पाठा। यानी बुढ़ाता पुरुष नए बछड़े जैसी ताकत से भरा होता है। इसके उलट उसी उम्र की औरतें अगर लिपस्टिक लगा लें या नई काट के कपड़े सिलवाएं तो तुरंत 'बूढ़ी घोड़ी, लाल लगाम' का तीर छूटता है। ‘एक्सपायरी डेट’ भी एक टर्म है, जो मेनोपॉज की देहरी पर खड़ी औरतों के लिए इस्तेमाल होती है। मतलब साफ है- जो औरतें बच्चे पैदा नहीं कर सकतीं, वे बेकार हो चुकी दवा हैं, जो केवल जगह घेरती हैं।

चांद और मंगल पर लकड़ी के सैटेलाइट से जाती दुनिया का शायद पहली ही दफा इस पर ध्यान गया। बैंक ऑफ इंग्लैंड ने अपने यहां काम करने वाली कर्मचारियों से मेनोपॉज पर बात शुरू की है। बैंक मान रहा है कि ये औरतों के जीवन का खास पड़ाव है और जिस पर कामकाजी दुनिया को ध्यान देना ही चाहिए। इसे मेनोपॉज क्रांति कहा जा रहा है। साथ ही इस पर कुछ नियमों की भी बात हो रही है। इससे मेनोपॉज पर पहुंचती महिलाओं की बात सुनी जाएगी। उन्हें छुट्टियां भी मिलेंगी ताकि वे अपना ध्यान रख सकें। ये शुरुआत है। उम्मीद है कि बाकी दुनिया भी इस इंकलाब से अछूती नहीं रह सकेगी।

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