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बात बराबरी की:कितनी अलग होती हैं रातें, औरतों के लिए और पुरुषों के लिए, रात मतलब अंधेरा और कैसे अलग हैं दोनों के लिए अंधेरों के मायने

नई दिल्ली3 महीने पहलेलेखक: मनीषा पांडेय
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  • कोशिश यही रहती है कि रात बाहर रहने को कई जतन करना पड़े, रात बहुत सुंदर है, लेकिन उस सुंदरता में अपनी हिस्सेदारी के लिए लड़ना मैंने छोड़ दिया
  • मैं कई बार पूरी रात सड़कों पर घूमना चाहती थी, चीख-चीखकर रोना, मैं रात में सड़क पर डरी हुई बस एक जगह से दूसरी जगह नहीं जाना चाहती थी

आज वुमन इक्विलिटी डे है। औरतों की बराबरी का दिन। बराबरी के इस दिन में मुझे वो रातें याद आ रही हैं, जहां मेरे लिए कभी बराबरी की जगह नहीं रही। तकरीबन नौ साल पहले मेरा दूसरा और आखिरी ब्रेकअप हुआ था। ब्रेकअप के बाद की सारी कहानियां कमोबेश एक सी होती हैं। लेकिन इस कहानी की जो बात याद रह गई, वो ये कि उसके बाद मेरी आउटिंग अचानक 90 फीसदी खत्म हो गई। घूमना-फिरना बंद हो गया। रात में तो बिलकुल बंद।

रात मतलब अंधेरा। अंधेरे के मेरे लिए बहुत सारे मायने थे। इलाहाबाद में मैं अंधेरा होने के बाद कभी घर से बाहर नहीं रही। दिन में चाहे जहां जाऊं, अंधेरा होने से पहले घर लौटना ही होता था। एक बार बड़ी मिन्नतों से मैंने रात 9 बजे तक घर से बाहर रहने की इजाजत ली। एक मित्र के घर कविता पाठ था। आठ बजते-बजते मेरा ध्यान कविता से हटकर रात, घड़ी और अंधेरे पर जा चुका था। 9 बजे मुझे एक लड़के को सुपुर्द किया गया कि इसे सलामत घर छोड़कर आओ।

9 बजे तक घर से बाहर रहना अच्छा जरूर लगा, लेकिन उसके गिर्द ये तमाम मिन्नतें, सावधानियां, पहरेदार, सब मन पर बोझ की तरह थे। और बोझ तो बोझ होता है। बोझ ढोते-ढोते कंधे कमजोर हो जाते हैं। फिर शहर बदला। नया शहर मुंबई। शहर बदला, लेकिन रात नहीं बदली। वहां हाॅस्टल की डेडलाइन थी 8 बजे। मैं मरीन ड्राइव पर बैठी होती, लेकिन 7 बजते ही दिमाग में घंटियां बजने लगतीं। कभी ऐसा नहीं हुआ कि ख्यालों में गुम वहीं बैठे-बैठे आठ बज गए हों। पौने सात भी नहीं। ठीक साढ़े सात पर मैं उठती और हाॅस्टल की तरफ चलना शुरू कर देती। आठ बजे के बाद पहली बार फ्लोरा फाउंटेन मैंने उस दिन देखा, जिस दिन साढ़े नौ बजे वीटी स्टेशन से मुंबई-हावड़ा मेल पकड़नी थी।

नौ बजे भी फ्लोरा फाउंटेन वैसा ही था, जैसा सात बजे होता है। लेकिन उस दिन कुछ नया सा लगा। अपने रूटीन से अलग हटकर कुछ भी करना कैसे अच्छा सा लगता है। जैसे घर में ही सोफे और पलंग को कभी दाएं कोने से हटाकर बाएं कोने में रख देने में जो एक नयापन होता है। कुछ वैसा ही। हाॅस्टल से नाइट आउट भी मिलता था। एक दिन अपनी एक कजिन के साथ जुहू गई। हम लोग रात ग्यारह बजे तक समंदर किनारे बैठे रहे।

बारह बजे घर पहुंचे। फिर कुछ अच्छा सा लगा। एक नयापन सा। जुहू हाॅस्टल से काफी दूर था, इसलिए सामान्य दिनों में जुहू घूमने हम दोपहर में ही जाते थे। फोटो में देखा था कि हाजी अली रात में कैसा सुंदर दिखाई देता है। लेकिन वहां भी हम दोपहर में ही जाते। वालकेश्वर खुला रहता है रात दस बजे तक। वो शहर का सबसे उंचा पार्क है, जहां से पूरा साउथ बाॅम्बे दिखता है। दिन में देखा है मैंने, पता नहीं रात में कैसा दिखता है।

ऐसा नहीं कि रात मैंने कभी नहीं देखी, लेकिन अकेले कभी नहीं देखी। अजीब रिश्ता है रात के साथ। लगता नहीं कि दोस्त है मेरी। हालांकि अब तक की जिंदगी में जब भी उसका साथ मिला, अच्छा बहुत लगा। फिर भी दोस्ती नहीं है ऐसी कि जब चाहे, मुंह जोरकर बोल सकूं, चल घूमने। और वैसे भी मुंबई की बात अलग है। वहां रात का मतलब रात ही होता है। रात का मतलब सूनसान नहीं होता। एकांत नहीं होता। जब देखो तब भीड़, लोग, गाड़ियां, शोर।

रात का मतलब सूनसान और फिर भी डर नहीं, ऐसा मैंने 15 साल पहले जेएनयू में देखा। रात दो बजे एक दोस्त ने कहा, चल वाॅक करके आते हैं और हम सुबह चार बजे तक जेएनयू की सड़कों पर टहलते रहे। पहली बार मुझे सिर्फ अच्छा सा नहीं लगा। बहुत सुंदर, बहुत रूमानी सा लगा। चारों ओर घुप्प अंधेरा, दूर कहीं जलता लैंपपोस्ट, आसमान में तारे, सभ्यता के शोर से दूर सिर्फ पक्षियों, झींगुरों की आवाज। पता नहीं था कि रात इतनी रूमानी भी हो सकती है।

फिर ऐसी और भी रातों की कहानी मेरी कहानी में दर्ज है। पल्लवी के साथ पार्थसारथी राॅक पर बैठकर मैंने रात दो बजे बीयर पी है। घंटों वहां बैठकर हमने जिंदगी और मुहब्बत के तमाम मसाइल हल किए। नाचे, रोए। दो लड़कियां अकेले। वहां रात का मतलब अंधेरा और सूनसान जरूर था, लेकिन रात का मतलब डर नहीं था। और जिस भी चीज का मतलब डर नहीं होता, वह चीज अच्छी लगती है। डर अच्छा नहीं लगता। हालांकि बाकी सब समय डर बहुत लगता है, इसलिए कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

मेरी रात वाली कहानी इतनी ही है। बाकी कहानियां मैंने किताबों में पढ़ी हैं, लड़कों से सुनी हैं। ओरहान पामुक की रातें, जब वो मां से लड़कर पूरी-पूरी रात इस्तांबुल की सड़कों पर अकेले भटकता रहता था। हेमिंग्वे और बाल्जाक की शराबखानों, चकलाघर और अवसाद की रातें। मार्खेज और मिलान कुंदेरा की रातें। सिनेमा पैरादिसो की वो सारी उन्तीस रातें, जब वो लड़का पूरी रात लड़की की खिड़की के सामने खड़ा रहा। कोहेन की वो बर्फीली रात, जिस रात उन्होंने सिस्टर्स आॅफ मर्सी लिखी थी। अल्मोदुवार की फिल्मों की वेश्याओं की रातें। मिडनाइट इन पेरिस की रातें। रिचर्ड लिंकलेटर की रातें- सनराइज से पहले, सनसेट के बाद।

इन कहानियों से जाना कि रात को सड़कों पर निकला हर मर्द शिकार की तलाश में ही नहीं निकला होता। कुछ चोट खाए भी होते हैं। कुछ ऐसे भी कि जिनके लिए दिन के उजाले की दुनिया अजनबी सी है। जिनके दिलों में उतना ही अंधेरा है, जितना रात के हिस्से आया। जब कोई नहीं होता बात करने को तो वे सूनसान सड़कों से बतियाते हैं। पामुक कौन सा दुख बांटते थे आधी रात इस्तांबुल की सड़कों के साथ।

बाल्जाक क्यों हर रात शराब के नशे में धुत्त पेरिस की सूनसान सड़कों पर भटकते। लास्ट टैंगो इन पेरिस का नायक पाॅल जैसे अवसाद और अकेलेपन में अंधेरी सड़कों की शरण लेता है। जैसे बैंड विजिट में लड़की कहती है लड़के को आधी रात बाहर चलने के लिए। जैसे सर्टिफाइड काॅपी में चलते-चलते बहुत रात हो जाती है और लड़के के जाने का वक्त हो जाता है। लगता है मानो रात इतनी अंधेरी पहले कभी नहीं थी। जैसे हेड ऑन में वो लड़की पूरी-पूरी रात सड़कों पर बदहवास रोती घूमती है।

मैं कई बार उस लड़की की तरह पूरी रात सड़कों पर घूमना चाहती थी। चीख-चीखकर रोना। मैं रात में सड़क पर डरी हुई बस एक जगह से दूसरी जगह नहीं जाना चाहती थी। मैं उस सड़क पर होना चाहती थी। एक बार मैं कोवलम बीच पर देर रात समंदर की रेत पर घंटों अकेले लेटी रही। बिना डरे। और फिर मुझे लगा कि जैसे यह दृश्य मेरी जिंदगी का है ही नहीं। मैं किसी फिल्म की नायिका हूं, जो पूरी रात रेत पर लेटी रही।

ऐसी कितनी ही रातों की कितनी ही तो कहानियां हैं। लेकिन मेरी वाली में कोई खास एडवेंचर नहीं है। बंद खिड़कियों-दरवाजों वाला एक घर है और उस घर के भीतर उतरती अकेली रात। मेरी रातों में सड़क नहीं है। मेरे पास कोई नहीं होता बात करने को तो मैं ओरहान पामुक की तरह शहर के पुराने खंडहरों को अपनी कहानी नहीं सुनाती। मैं कमरे की छत पर लटके पंखे से बात करती हूं। पंखा कहीं नहीं जाता, मैं भी कहीं नहीं जाती।

रात कितनी भी सुंदर, कितनी भी रूमानी क्यों न हो, मैं जानती हूं मेरी नहीं है। मेरे लिए नहीं है। जो चीज मेरी नहीं, वहां घुसने की कोशिश में डर ही डर हैं। कुछ भी हो सकता है। कोई पीछा कर सकता है, छेड़खानी कर सकता है, रात बारह बजे शराब पीकर मुझे स्टाॅक कर सकता है, रेप कर सकता है। रेप करके मारकर फेंक सकता है। जो चीज मेरी नहीं, वहां मेरे साथ कुछ भी हो सकता है। लड़कों को ऐसा नहीं लगता कि रातें और सड़कें उनकी नहीं हैं।

मुझे दुख जरूर है इस बात का कि रात और सड़कें मेरी क्यों नहीं हैं। ये भी लगता है कि ये गलत है। लेकिन फिर जीवन में क्या ही सही है। किस-किस गलत को रोऊं , किस-किस सही की आस करूं। अब मां को ये कहने की जरूरत ही नहीं पड़ती कि टाइम से घर आना। मैं खुद ही टाइम से आ जाती हूं। देर रात तक घर से बाहर नहीं रहती। कभी रहना पड़ जाए तो आधा दिमाग इस प्लानिंग में खर्च होता है कि कैसे लौटूंगी, कौन घर छोड़ेगा, नहीं लौटूं तो रुकने की क्या व्यवस्था है।

देर रात की फ्लाइट नहीं लेती, भले टिकट 5000 रु महंगी ही क्यों न मिले। कभी रात तीन बजे एयरपोर्ट जाना ही पड़ जाए तो दिमाग रात की रूमानियत महसूसने के बजाय पूरे समय चैकन्ना रहता है। 100 नंबर पर फोन करूंगी, पुलिस को इन्फाॅर्म करूंगी। लाल मिर्च पाउडर बैग में रखूंगी। पांच दोस्तों को कैब की डिटेल भेजूंगी। पहुंचकर इन्फाॅर्म करूंगी कि पहुंच गई।

कितनी ताकत खर्च होती है ये सब करने में। इसलिए कोशिश यही रहती है कि ये सब न करना पड़े। रात बहुत सुंदर है, लेकिन उस सुंदरता में अपनी हिस्सेदारी के लिए लड़ना मैंने छोड़ दिया। पब्लिक स्फीयर में, रात में, सड़कों पर अपना दावा करने के लिए पहले भी औरतों ने काफी आवाज उठाई है। मैंने कई किताबों में पढ़ा है, डाॅक्यूमेंट्री फिल्मों में देखा है।

उसे देखकर, पढ़कर कुछ देर के लिए ऐसा होता है कि धमनियों में खून तेजी से दौड़ने लगता है। ऐसे हर नारे, हर स्लोगन, हर लड़ाई के साथ जुड़ाव का एक महीन तार भी महसूस होता है। लेकिन फिर फिल्म खत्म हो जाती है और मैं घड़ी का मुंह ताकती टाइम पर घर लौट आती हूं। लड़के बैखौफ रातों को घूमते रहते हैं। कोई पामुक, कोई बराला, कोई शिकार की तलाश में तो कोई थकाहारा, दिल का हारा। (मनीषा पांडे, सीनियर जर्नलिस्ट हैं और महिलाओं के मुद्दों पर लिखती हैं।)

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