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23 साल 7 महीने पहले इंदौर में हत्या के दोषी को दी गई फांसी की आंखों देखी रिपोर्ट

5 महीने पहले
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शुक्रवार सुबह 5 बजे निर्भया के चारों दोषियाें को फांसी होनी है।
क्या होता है फांसी के वक्त? कौन क्या करता है? आखिरी के दो घंटे कैसे होते हैं? फांसी के बाद माहौल कैसा होता है?
क्या आपको मालूम है इस बारे में? नहीं ना... हमें भी नहीं मालूम। लेकिन हम आपसे एक फांसी का आंखों देखा हाल साझा कर रहे हैं। भास्कर आर्काइव से। ये फांसी 5 अगस्त 1996 को इंदौर जेल में दी गई थी। 23 साल 7 महीने पहले हुई इस फांसी की आंखों देखी रिपोर्ट सिर्फ भास्कर के पास थ
ी।

हत्यारे उमाशंकर को ऐसे दी गई फांसी
कीर्ति राणा
इंदौर, 5 अगस्त 1996
टिक-टिक करती घड़ी की सुइयां 4.57 से 58 की ओर खिसक रही हैं... पानी का बरसना जारी है... फांसी घर में एकत्र अधिकारियों, जेल कर्मचारियों के दिलों की धड़कन तेज होती जा रही हैं... 15 कदम की दूरी पर बने चबूतरे में मोटी रस्सी के फंदे में कैदी उमाशंकर पांडे की गर्दन फंसी हुई है... जल्लाद बालकृष्ण राव गर्दन पर रस्सी की गठान को हल्का सा झटका देकर अपने अनुभव का परीक्षण करता है... पांच के अंक पर खड़ा छोटा कांटा दोनों बड़े कांटों के 12 के अंक पर पहुंचने की बेताबी से प्रतीक्षा कर रहा है...। बड़ा कांटा 59 मिनट की परिक्रमा पूरी कर चुका है... सेकंड के कांटे का सफर जारी है...।

गहरे नीले रंग की नकाब से कैदी उमाशंकर का मुंह ढंका बंधा है... दोनों हाथ पीछे की तरफ कमर से नायलोन की गुलाबी रस्सी से कसकर बंधे हैं... पैरों में करीब 25 किलोग्राम रेत की पोटली बांधी जा चुकी है... कैदी की अनंत यात्रा की सभी तैयारियां ठीक हैं। जल्लाद के चेहरे पर निश्चिंतता के भाव हैं.....। सन्नाटा और गहराता जा रहा है। सबकी सांसें थम सी गई हैं...।

दोनों बड़े कांटे 12 की तरफ खिसक रहे हैं... हाथों में मजबूती से लीवर का हत्था पकड़े जल्लाद की नजर जेलर एसपी. जैन के हाथ के इशारे पर है... उधर, हाथ का हल्का सा इशारा होता है, इधर जल्लाद के लीवर के हत्थे को पूरी ताकत से अपनी ओर खींचता है... ‘खट’ की हल्की सी आवाज होती है... चबूतरे पर कुछ पल पहले छटपटाता-पानी मांगता उमाशंकर सबकी नजरों से ओझल हो चुका है...।

चेहरे पर नकाब, पैरों में 25 किलो बालू रेत की पोटली, वह नीचे की कोशिश....
पत्नी और दो बच्चों के हत्यारे उमाशंकर की देह झूल रही है, मोटी रस्सी से। हैलोजन की तेज पीली रोशनी...। बारिश पानी और सन्नाटे में कुछ सुनाई दे रहा है, तो बूंदों की टप-टप... स्टेशन से गुजरती हुई रेलगाड़ी की सीटी...। अपने सेवाकाल में पहली फांसी देखने और इस कार्रवाई को कराने वाले करीब 50 लोग बुत बने खड़े हैं। मानो इन सबने ही फांसी की पीड़ा को भोगा हो...। सावन के पहले सोमवार पर ब्रह्ममुहुर्त में उमाशंकर पांडे की इस फांसी बाद निर्मित खामोशी जल्लाद बालकृष्ण राव की चहलकदमी से टूटती है...। गर्दन झुकाकर नीचे कोठरी में कुछ देखने के बाद उसकी गर्दन गर्व से तन जाती है...। कुछ पल पहले लीवर का हत्था पकड़ने वाले हाथ अपनी बड़ी-बड़ी मूंछों पर फेरते हुए वह अधिकारियों की तरफ देखता है...। जेल अधिकारी और कर्मचारी हरकत में आते हैं। चबूतरे के नीचे बनी कोठरी का दरवाजा खुल रहा है...। हल्के उजाले में मृत उमाशंकर पांडे की देह झूल रही है...। कुछ पल पहले मौत से बचने के लिए छटपटाने वाले उमाशंकर की आत्मा सारे बंधनों से मुक्त हो चुकी है...। आस्था की इस अनंत यात्रा में कहीं न कहीं उसकी पत्नी और दो बच्चों की आत्माएं भी भटक रही होंगी।

सुबह के चार बजने को हैं...। सेंट्रल जेल में स्थित कैदियों की बैरक से पृथक एक कोने में बनी काल कोठरी में जाग रहे उमाशंकर की जिंदगी और मौत मात्र एक छोटा सा शेष है...। जेल कर्मचारियों के साथ पहुंचे जेलर जैन आवाज लगाते हैं... ‘ऐ उमाशंकर। बाहर आओ।’ अन्य जवान भी पुकारते हैं। ‘पांडेजी बाहर आ जाओ... देखो, साहब आए हैं मिलने’ जवानों की फुसफुसाहट से स्पष्ट होता है कि जेलर के समीप खड़े एसडीएम पीसी. राठी हैं, कुछ जवान बहस कर रहे हैं कि ये नए कलेक्टर हैं....।

वृद्ध पुलिसकर्मी खान को जेल की कोठरी का दरवाजा खोलने का निर्देश देते हैं। अपना छाता और डंडा दूसरे जवानों को सौंपते हुए खान दरवाजा खोलता है...। कुछ समय बाद मरने जा रहे उमाशंकर के ‘अंतिम दर्शन’ हेतु जेल जवान गर्दन ऊंची कर-करके उसे देख रहे हैं। लठ्ठे के मटमैले कपड़े....उनींदी आंखें... एक हड्डी की काया... बढ़ी हुई दाढ़ी... चढ़ी हुई त्योरियां... एक नजर में सबको पहचानने का प्रयास करती आंखें...। फिर भी हालत ऐसी कि शेर के सामने मेमना खड़ा हो...। एसडीएम राठी पूछ रहे हैं, ‘क्या नाम है? अरे भाई क्या नाम है तुम्हारा....। रूखा सा जवाब, उमाशंकर पांडे। फिर बाप, गांव, जिले आदि के बारे में पूछा जाता है, हर प्रश्न का संक्षिप्त जवाब देने के साथ ही उमाशंकर की बेचैनी भी बढ़ती जाती है...।

सेंट्रल जेल के अनुभवी चिकित्सक डॉक्टर बीएल निधान और शरद जैन आगे बढ़ते हैं और उसका मरने से पहले स्वास्थ्य परीक्षण करते हैं....। वजन तौलने की मशीन उसका वजन बताती है 50 किलो। डॉक्टर निधान आश्चर्यचकित स्वर में कहते हैं, ‘अरे साहब, इसका तो वजन बढ़ गया है...’ जेलर जैन एसडीएम राठी को बताते हैं कि पहले इसका वजन 46 किलो था...। अब कैदी भी समझ चुका है कि ये सारी तैयारियां उसकी अंतिम विदाई की हैं...। जेल जवान अनुरोध करते हैं, आओ पंडित जी स्नान कर लो...। वह आगे बढ़ता है। एक जवान साबुन, तौलिया लेकर खड़ा है...। गर्म पानी की कोठी, ठंडे पानी से भरी बाल्टी के समीप जाकर वह ठिठक जाता है...। जवान फिर अनुरोध कर रहे हैं, ‘चलो पांडे जी नहा लो, आज महाकाल का दिन है... सावन का पहला सोमवार है।’ एक जवान चुल्लु में गर्म पानी लेकर उसके हाथ पर डालता है। ये लो पांडे जी, आप गर्म पानी से नहा लो। सबके अनुरोध मनुहार की अनसुनी करते हुए वह निर्विकार भाव से खड़ा रहता है...। जेल अधीक्षक राजाराम खन्ना पूछते हैं, ‘क्यों भई पांडेजी, क्या बात है इच्छा नहीं है क्या...’ अब वह धीरे से कहता है... टट्टी जाना है। जेल जवान लोटा भरके उसके हाथ में देते हैं, कहते हैं वहां सामने आड़ में कर लो, चार जवानों के घेरे में वह शौच के लिए जा रहा है...। लौटने पर साबुन से हाथ धोता है, फिर मनुहार की जाती है, नहा लो भाई, लेकिन वह इनकार कर देता है, तो अधिकारी कहते हैं- चलो जैसी तुम्हारी इच्छा वैसे भी बारिश में भीगने से स्नान जैसा तो हो ही गया...।

नीले रंग की स्लीपर पहने उमाशंकर को जेल जवान पकड़कर पुन: कोठरी की तरफ ला रहे है... एक जवान हाथ में लठ्ठे के कपड़े की आधे बांह की कमीज, पैजामा लेकर आगे बढ़ता है... लो उमाशंकर नए कपड़े पहन लो। आज सावन सोमवार है... भगवान को याद करो... चादर की आड़ की जाती है....उमाशंकर नए कपड़े पहन रहा है। वह उदास है और उसकी उदासी जेलकर्मियों को झकझोर रही है। नामी गिरामी अपराधियों की दादागिरी भुला देने वाले जेलकर्मियों में से कई के लिए किसी आदमी को कुछ मिनट बाद अपनी आंखों के सामने मरते देखने का पहला अनुभव है।

सुबह के 4 बजकर 25 मिनट हो चुके हैं, जेलर जैन अधिकारियों से अनुरोध करते हैं कि सब अपनी घड़ियां मिला लें... जल्लाद बालकृष्ण राव, जेल अधीक्षक राजाराम खन्ना, एसडीएम पीसी. राठी, सीएसपी राजेश हिंगनकर आदि अपनी-अपनी घड़ियों के कांटे 4.25 पर कर लेते हैं, यह व्यवस्था इसलिए की जाती है, ताकि सुबह ठीक 5 बजे फांसी देने के आदेश के पालन में समय का हेरफेर न हो पाए।

जेल जवानों-अधिकारियों के बीच से निकलकर सफेद-कुर्ता पैजामा पहने एक व्यक्ति उमाशंकर के पास जाने लगता है, अधिकारी पूछते हैं तो जवाब मिलता है, ‘पंडित जी हैं...’ कुर्ते की जेब में रखी एक पुस्तिका निकालकर पंडित सत्यनारायण जोशी गीता के श्लोक बुदबुदाने लगते हैं। कंबल पर खड़े पांडे से चप्पल उतारकर बैठने के लिए कहा जाता है, वह चप्पल उतार देता है, लेकिन खड़ा ही रहता है...पंडित जी बैठ चुके हैं, दरवाजे की देहरी पर उमाशंकर का ध्यान भी श्लोक सुनने में नहीं है, पंडित जी भी जैसे-तैसे पाठ करके खड़े हो जाते हैं।

साढ़े चार बज चुके हैं... जल्लाद बालकृष्ण राव दो मुस्टंडे जवानों को पांडे के हाथ पीछे कसने के लिए कहता है, वह विरोध करता है, लेकिन फुर्ती से अपने एक हाथ में पकड़ी नायलोन की गुलाबी रस्सी से उसके हाथ कमर के पीछे बांध देता है... जेल अधीक्षक आरआर खन्ना ब्लैक वॉरंट की फाइल लाने के लिए कह रहे हैं। फाइल जेलर जैन के हाथों में सौंपी जाती है।

फांसी दिए जाने वाले कैदी का हुलिया बताया जा रहा है... कद पांच फीट ढाई इंच, दाएं तरफ नाक पर मस्सा, दाएं कंधे पर तिल, बाएं कंधे पर चोट के निशान...। अब ब्लैक वॉरंट पढ़ा जा रहा है, जिसमें आजीवन कारावास, उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय में चले प्रकरण, दया की अपील पर राज्यपाल एवं राष्ट्रपति की असहमति के उल्लेख के साथ कहा गया है उम्र 42 वर्ष, जाति ब्राह्मण, निवासी लक्ष्मीपुरा (कायथा थाना) उज्जैन- आपको प्रथम श्रेणी अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एससी. व्यास के न्यायालय ने 22 फरवरी 95 को धारा 302, 302, 302 एवं धारा 307, 307, 307 के अंतर्गत मृत्युदंड-आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। 24 फरवरी 95 को उच्च न्यायालय इंदौर से आपकी अपील पत्र क्रमांक 340/ विधि दिनांक 11 जुलाई 95 को खारिज कर दी गई थी। इस कार्यालय के माध्यम से उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली को की गई अपील क्रमांक 771/95 भी खारिज कर दी गई थी। उच्च न्यायालय डेथ रिफरेंस क्रमांक 2/95 क्रिमिनल अपील 113/95 पेश हुआ, जिस पर मृत्यु दंडादेश की पुष्टिकर अपील निरस्त कर दी गई।

काल-कोठरी परिसर में सन्नाटा है... बारिश से बचने के लिए अधिकारी, कर्मचारी छाते ताने खड़े हैं... जेलर जैन अंतिम पत्र पढ़ रहे हैं... उज्जैन के प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश केके सक्सेना के पत्र क्रमांक 216, 27 मार्च 96 द्वारा सूचना भेजी गई कि मध्य प्रदेश की जेल नियमावली वॉल्यूम 2 के नियम 475 के नियम तथा समस्त जेल नियमों के पालन पश्चात मृत्युदंड का निष्पादन करें। कार्यालय के पत्र 2475/ डेथ वॉरंट/ 3 अप्रैल 96 द्वारा आपकी दया याचिका मृत्युदंड को निरस्त करने के लिए राज्यपाल एवं राष्ट्रपतिजी को भेजी गई थी। राज्यपाल एवं राष्ट्रपतिजी द्वारा दया अपील को मंजूरी देने में असमर्थता व्यक्त की गई। तदपश्चात जेल नियमावली 778 (6) डी. द्वारा निर्धारित नियमों के तहत 5 अगस्त 96 की सुबह पांच बजे फांसी देना तय किया गया है।

...तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा हो तो बोलो उमाशंकर... वह चुप है, उसकी चुप्पी यथावत है, जेल के बंदूकधारी जवान गीले हो रहे हैं, लेकिन उसका चेहरा देखने की उत्सुकता भी है...। कलेक्टर के प्रतिनिधी के रूप में मौजूद एसडीएम पीसी. राठी स्नेह भरे स्वर में पूछ रहे हैं... देखो भई तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा हो तो बोलो। कुछ खाना चाहते हो... किसी से मिलना हो... बच्चों के लिए कुछ संदेश देना हो तो बता दो... उसका शरीर निढाल हो चुका है... चेहरे के हावभाव में लाचारी झलक रही है। राठी फिर पूछते हैं- क्यों भई कोई इच्छा तो नहीं है... मृत्यु मार्ग की ओर धकेले जाने की मुद्रा में जवान सतर्क हो जाते हैं...। एसडीएम राठी के निर्देश पर उमाशंकर को फांसी घर की तरफ ले जाने की तैयारी हो जाती है...।

चिड़ियों के चहचहाने से नई सुबह का आभास होने लगा है... सुबह के 4:40 हो चुके हैं... जेलर जैन व्यंग्य से कहते हैं- चलो उमाशंकर तुमने अपनी पत्नी और बच्चों को जहां भेजा है वहां भी तुम्हें भी चलना है... आगे बंदूकधारी जवान बीच में जवानों से घिरे उमाशंकर को धकियाते हुए ले जा रहे हैं, फांसी घर की तरफ पीछे-पीछे कीचड़ में मजबूती से पांव जमाते हाथ में छाता संभाले अधिकारी भी चल रहे हैं। काल-कोठरी से फांसी घर के चबूतरे का 50 कदम का फासला तय हो चुका है.... अधिकारी फांसी घर के आगे खड़े हैं... अधिकारियों से ऊंचाई पर खड़ा है वह... उसकी बेअदबी माफ है। उसके चेहरे पर गहरे नीले रंग के मोटे कपड़े का नकाब पहनाया जा चुका है। इस चबूतरे पर एक साथ दो कैदियों को फांसी देने की व्यवस्था है। थुल-थुल शरीर, बड़ी-बड़ी सफेद मूंछ, हल्के कत्थई रंग का चटकदार स्वेटर पहने जल्लाद बालकृष्ण राव अपने पैंट की जेब से रूमाल निकालकर हाथ और चेहरा पोंछते हैं... रस्सी को झटके से खींचने वाले लीवर के हत्थे को साफ करता है, तीन बार प्रणाम की मुद्रा में हाथों से लीवर को छूता है।

बारिश जारी है... घड़ी की टिक-टिक जारी है। चबूतरे के सामने खड़े अधिकारी-जवान देख रहे हैं... कुछ मिनट बाद मरने वाले उमाशंकर को। उमाशंकर के चेहरे पर नकाब है। पैरों में 25 किलो बालू रेत की पोटली बांधी जा चुकी है, फांसी का फंदा एक झटके में ही आपा ले ले इसलिए फंदे पर कम से कम 75 किलो का वजन लटकना जरूरी है, 50 किलो का उमाशंकर और 25 किलो की रेत की पोटली। तेल कम हो तो दिये के जैसे बुझने से पहले अचानक रोशनी से तेज हो जाती है। ऐसे ही उमाशंकर मौत के फंदे से मुक्ति के लिए जान छुड़ाने की कोशिश करता है। जेल के जवानों की मजबूत पकड़ उसके मंसूबों को विफल कर देती है...वह बैठने की कोशिश करता है, लेकिन जवान उसे फिर विफल कर देते हैं। मौत से कुछ सेकंड के फासले पर खड़ा उमाशंकर ताकत लगाकर बचने की कोशिश करता है। दूसरी तरफ, जल्लाद और चबूतरे पर खड़े जवान कहते हैं, ‘उमाशंकर राम-राम बोलो...’। उमाशंकर कुछ सुनने का प्रयास करता है कि तभी ‘खट’ की आवाज के साथ लीवर हिल जाता है। चबूतरे पर उमाशंकर के पैरों के नीचे लगी लोहे की प्लेट नीचे की तरफ खुल जाती है। और उमाशंकर नीचे कोठरी में लटक जाता है...हवा के जोर से हिल रही रस्सी के कारण उसकी देह लोहे के पिंजरे में हिल रही है लेकिन पंछी उड़ चुका है....। आधे घंटे तक शव कोठरी में लटका रहने दिया जाता है। कुछ देर पहले जो जवान अपने हाथों से पकड़कर उसे चबूतरे तक लाए थे, अब फटे हुए कपड़े एकत्र कर एक-दूसरे को बांटते हैं। और इन कपड़ों की मदद से उसकी भूत देह पकड़ते हैं। डॉक्टर विधान और डॉक्टर जैन द्वारा उसे मृत घोषित किए जाने के पश्चात ये जवान उसकी देह स्ट्रेचर पर रखकर बाहर खड़े रिश्तेदारों के सुपुर्द कर देते हैं।

5 अगस्त 1996 को भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट।

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