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  • 60% have left for the auto taxi village, we all will not return for six eight months, never return but the loan has to be repaid

बंबई से बनारस: सातवीं रिपोर्ट / 60% ऑटो-टैक्सी वाले गांव के लिए निकल गए हैं, हम सब अब छह-आठ महीना तो नहीं लौटेंगे, कभी नहीं लौटते लेकिन लोन जो भरना है

जौनपुर जिले की बरसठी तहसील का ये युवक महाराष्ट्र से ऑटो रिक्शा से ही यूपी के लिए रवाना हुआ हैं। रोजाना 300 किमी का सफर तय करते हुए ये आगे बढ़ रहे हैं। जौनपुर जिले की बरसठी तहसील का ये युवक महाराष्ट्र से ऑटो रिक्शा से ही यूपी के लिए रवाना हुआ हैं। रोजाना 300 किमी का सफर तय करते हुए ये आगे बढ़ रहे हैं।
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जौनपुर जिले की बरसठी तहसील का ये युवक महाराष्ट्र से ऑटो रिक्शा से ही यूपी के लिए रवाना हुआ हैं। रोजाना 300 किमी का सफर तय करते हुए ये आगे बढ़ रहे हैं।जौनपुर जिले की बरसठी तहसील का ये युवक महाराष्ट्र से ऑटो रिक्शा से ही यूपी के लिए रवाना हुआ हैं। रोजाना 300 किमी का सफर तय करते हुए ये आगे बढ़ रहे हैं।

  • अखिलेश गुप्ता अपने ऑटो से ही मुंबई से देवरिया जा रहे हैं। इन्हें फिर से मुंबई लौटने का पूरा भरोसा है। वह कहते हैं, बीमारी खत्म होते ही लौट आऊंगा
  • मोहम्मद इमरान रोज 350- 400 किमी टैक्सी चलाकर प्रयागराज जिले के अपने रिठुआं गांव जा रहे हैं। वह कहेत हैं, ड्राइविंग आती है अब गांव में ही काम करूंगा

विनोद यादव और मनीषा भल्ला

May 20, 2020, 04:45 PM IST

मुंबई. दैनिक भास्कर के जर्नलिस्ट बंबई से बनारस के सफर पर निकले हैं। उन्हीं रास्तों पर जहां से लाखों लोग अपने-अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। नंगे पैर, पैदल, साइकिल, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर। हर हाल में वे घर जाना चाहते हैं, आखिर मुश्किल वक्त में हम घर ही तो जाते हैं। हम उन्हीं रास्तों की जिंदा कहानियां आप तक ला रहे हैं। पढ़ते रहिए..

सातवीं खबर, नेशनल हाईवे-27 से:

नेशनल हाईवे 27 पर एक ऑटो रुका है और पांच लोग उसी के आसपास बैठकर कुछ खा रहे हैं। हम उनसे बतियाने लगे तो पता चला कि ऑटो के मालिक गोपाल कृष्ण पांडे जौनपुर के रहने वाले हैं और अपने चार पड़ोसियों को लेकर मुंबई से लेकर जौनपुर के लिए निकले हैं। वह बताते हैं, मुंबई से लगभग 60 फीसदी ऑटोवाले निकल आए हैं। वहां ज्यादातर ऑटोवाले उत्तर प्रदेश के जौनपुर, बनारस, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और आजमगढ़ से हैं।

महाराष्ट्र में ऑटो चलाने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग समूहों में अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। 

पांडे कहते हैं, हम इतने सारे ऑटोवाले निकल आए हैं तो शायद मुंबई में ट्रैफिक कम हो जाएगा लेकिन ऑटोवाला अब कम मिलेगा। पांडे का यह ऑटो लोन पर है। उनका कहना है कि तीन महीने तक इसकी 7,000 रुपये किश्त नहीं जाएगी लेकिन उसके बाद किश्त भरनी पड़ेगी। पांडे फिलहाल 6 महीने तक मुंबई नहीं लौटने का फैसला कर चुके हैं। कह रहे हैं कि घर पर रहेंगे। कोई भी काम कर लेंगे लेकिन ये बीमारी ठीक होने के बाद ही मुंबई आएंगे।

झांसी से 40 किलोमीटर पहले अखिलेश गुप्ता अपना ऑटो लेकर खड़े हैं। वह मुंबई के बोरीवली से देवरिया जा रहे हैं। परिवार पहले से गांव में ही रहता है। अखिलेश को फिर से मुंबई लौटने का पक्का भरोसा है। वह कहते हैं, मैं हर हाल में मुंबई लौटूंगा ये बीमारी जल्दी खत्म हो जाए बस। अखिलेश का अपना ऑटो है और इसका लोन भी पूरा हो चुका है। इनके ऑटो में इनके ही पड़ोस के राजू भी हैं जिनकी बोरीवली में भाजी की दुकान है।

ज्यादातर ऑटोवाले महामारी खत्म होने पर फिर से मुंबई लौटने की बात कह रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो अब गांव में ही गुजर बसर करने की सोच रहे हैं।

सब-वे में मैनेजर का काम करने वाले मुकुंद भी ऑटो से जौनपुर जा रहे हैं। वह कहते हैं, सब-वे तो बंद नहीं हुआ, सैलरी भी 25,000 रुपया महीना है लेकिन हालात ठीक होने के बाद ही वापस लौटूंगा।

मुंबई के मदनपुरा इलाके में रहने वाले मोहम्मद इमरान रोज 350- 400 किमी टैक्सी चलाकर प्रयागराज जिले के अपने रिठुआं गांव जा रहे हैं। वे बताते हैं कि दो महीने बैठकर खाया। हर महीने करीब 10 हजार से अधिक का घर खर्च है। ऊपर से टैक्सी पर लाखों रुपये का लोन भी है। जिसकी ईएमआई 10 हजार रुपए आती है। दो महीने से ईएमआई नहीं भर पाया हूं। लॉकडाउन की वजह से टैक्सी भी मुंबई में नहीं चला पा रही थी। अब छोटे भाई और गांव के कुछ लोगों को लेकर गांव जा रहा हूं। ड्राइविंग आती है, इसलिए उम्मीद है कि गांव में कोई न कोई रोजगार मिल ही जाएगा।

झांसी की ओर बढ़ते हुए हमें रास्ते में ऐसे कई परिवार ऑटो में सफर करते दिखाई दिए। सभी लगभग महाराष्ट्र से आ रहे थे।

पत्नी का इलाज कराने मुंबई गए मोहम्मद खुश हैं क्योंकि घर लौटने का इंतजाम हो गया

शिवपुरी हाईवे पर हमें प्रयागराज जिले के कहरा-कठरा गांव के मोहम्मद मिले। उनकी पत्नी शुफिया पास में खड़ी टैक्सी में आराम करती नजर आईं। वे घर लौटने का इंतजाम हो गया है ये सोच सोचकर ही खुश हो रहे हैं। 8वीं तक पढ़े मोहम्मद फर्नीचर का काम करते थे और गांव में रह कर 10-12 हजार रुपए आराम से कमा लेते थे।

मोहम्मद मुंबई को सपनों की नगरी तो मानते हैं, लेकिन कहते हैं कि गांव में यदि कोई भूखा रहता है, तो पड़ोसी खाना पहुंचा देता है। पर मुंबई में आप काम करते हैं तभी खाना मिलता है।

जब ऑटो पर चलते-चलते थकान बढ़ जाती है तो हाईवे के नजदीक ही छांव देखकर लोग कुछ देर चहलकदमी कर लेते हैं। 

मैं पत्नी शुफिया का इलाज कराने फरवरी के आखिर में मुंबई के जोगेश्वरी स्थित गुलशननगर आया था। सोचा था पत्नी का इलाज करा लूंगा और उसे मुंबई की सैर भी करा दूंगा। डॉक्टर को दिखाने और इलाज कराने का सिलसिला 10-15 दिन चला ही था कि लॉकडाउन हो गया। मैं पत्नी को लेकर तब से वहीं फंसा रहा।

मेरे दो छोटे भाई भी यहीं रहते हैं। मैं मुंबई आया तो वे राशन भराकर गांव चले गए क्योंकि बहुत दिनों से वे गांव नहीं गए थे। लॉकडाउन की वजह से मैं ऐसा मुंबई में फंसा कि न पत्नी के इलाज के लिए पैसे बचे और न ही खाने के लिए राशन।

मोहम्मद अब जब यूपी बॉर्डर और अपने गांव के करीब आ गए हैं तो मजाकिया लहजे में कहते हैं कि दोनों छोटे भाई सिलाई का काम शुरू होने पर भले मुंबई वापस जाएं, परंतु मैं अब वहां जाने के बारे में सौ बार सोचूंगा।

ऑटो चलाने वालों के पास खाने-पीने के लिए अपना इंतजाम है। इसमें रोटी-सब्जी तो नहीं है लेकिन पेट भरने के लिए भेल भरपूर है।

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