डीबी ओरिजिनल / सोशल मीडिया अकाउंट को आधार से जोड़ने की मांग, विरोधियों की दलील- इससे प्राइवेसी को खतरा



Aadhaar Social Media Linkage: Opponents Concerns Aadhaar's Security and Privacy
X
Aadhaar Social Media Linkage: Opponents Concerns Aadhaar's Security and Privacy

  • सोशल मीडिया अकाउंट और फेसबुक के वेरिफिकेशन के लिए 4 याचिकाएं अलग-अलग हाईकोर्ट में दाखिल हुईं
  • इस पूरे मुद्दे को समझने के लिए भास्कर ऐप ने याचिकाकर्ता रूबीन और एक्सपर्ट विराग गुप्ता और नमन अग्रवाल से बात की
  • सोशल मीडिया अकाउंट को आधार से लिंक करने की मांग के समर्थक कहते हैं- अफवाहों, फेक न्यूज पर रोक लगेगी
  • इस मांग के विरोधियों का कहना है- आधार से लिंक करने पर डेटा के साथ जीवन की सुरक्षा को भी खतरा हो सकता है

Dainik Bhaskar

Sep 12, 2019, 07:49 AM IST

नई दिल्ली. सोशल मीडिया अकाउंट को आधार से लिंक करने की मांग की जा रही है। इसका विरोध भी हो रहा है। मांग के समर्थन में दो याचिकाएं मद्रास हाईकोर्ट में दाखिल की गई हैं। इसी तरह की याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भी हैं। इस संबंध में देश के विभिन्न हाईकोर्ट में चल रहे मुकदमों को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने की फेसबुक की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। इस पूरे मामले और इससे जुड़ी बातें समझने के लिए भास्कर एप ने मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले एंटनी क्लिमेंट रूबीन, फेसबुक और गूगल के खिलाफ दायर एक याचिका की पैरवी कर चुके सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता और डिजिटल राइट्स पर काम करने वाली संस्था एक्सेस नाउ में एशिया पैसिफिक काउंसल नमन अग्रवाल से बात की।

 

मामला सुप्रीम कोर्ट में नहीं पहुंचा, अभी सिर्फ केस ट्रांसफर पर सुनवाई
कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि सोशल मीडिया को आधार से लिंक करने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है, लेकिन यह सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘Taxing Internet Giant’ के लेखक विराग गुप्ता बताते हैं कि मद्रास हाईकोर्ट में दो याचिका दाखिल की गईं। इसमें मांग की गई कि सोशल मीडिया अकाउंट का वेरिफिकेशन होना चाहिए। तमिलनाडु सरकार ने भी कहा कि सोशल मीडिया अकाउंट का आधार से वेरिफिकेशन होना चाहिए। मद्रास हाईकोर्ट इस पर सुनवाई कर रहा था और जल्द फैसला आने की उम्मीद थी। लेकिन हाईकोर्ट के फैसले से बचने के लिए फेसबुक और वॉट्सऐप सुप्रीम कोर्ट पहुंच गईं और देश की विभिन्न अदालतों में चल रहे 4 मामलों को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने इसी को लेकर सरकार समेत सोशल मीडिया कंपनियों को नोटिस जारी किया है। इस पर 13 सितंबर को अगली सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट अभी सिर्फ इस बात पर फैसला करेगा कि इन मामलों को शीर्ष अदालत में ट्रांसफर किया जाए या नहीं? 


समर्थन और विरोध : क्या सोशल मीडिया अकाउंट आधार से लिंक कर सकते हैं?
समर्थन में

1) डिजिटल राइट्स एक्सपर्ट नमन अग्रवाल कहते हैं कि सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था। इसमें कहा था कि निजी कंपनियां या संस्थाएं आधार डेटा का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं, लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार मानती है कि वो कानून लाकर ऐसा कर सकती है। अगर सरकार कानून लाकर सोशल मीडिया के लिए भी आधार जरूरी करती है, तो यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत माना जा सकता है। 


2) मद्रास हाईकोर्ट में एंटनी क्लीमेंट रूबीन और जननी कृष्णमूर्ति ने याचिका दाखिल की हैं। एंटनी कहते हैं कि अगर सोशल मीडिया अकाउंट को आधार कार्ड या दूसरी सरकारी आईडी से लिंक कर दिया जाता है, तो इससे पुलिस और कानूनी एजेंसियों को सोशल मीडिया के जरिए अपराध करने वाले अपराधियों को पकड़ने में आसानी होगी। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर लोगों की जिम्मेदारी भी तय हो जाएगी और फेक न्यूज रोकने में मदद मिलेगी।


विरोध में 
1) सोशल मीडिया को आधार से लिंक करने के दुष्परिणाम होंगे

नमन बताते हैं कि इससे लोगों की प्राइवेसी का उल्लंघन होगा। सरकार शायद सोशल मीडिया कंपनी पर किसी व्यक्ति की निजी जानकारी या आधार नंबर देने के लिए दबाव डाल सकती है। आधार डेटा काफी चीजों से लिंक होता है। अगर यह सोशल मीडिया से भी लिंक होता है, तो उसका काफी सारा डेटा शेयर हो जाएगा। लोगों को पता चल जाएगा कि सरकार उनकी निगरानी कर सकती है, तो वे सोशल मीडिया पर अपनी बातें खुल कर रखना कम कर देंगे, विशेष तौर पर ऐसी बातें जो सरकार की निंदा करती हो। सोशल मीडिया पर कई सारे लोग ऐसे होते हैं, जो अपनी बात रखना चाहते हैं लेकिन वे यह नहीं चाहते कि लोगों को उनकी निजी पहचान का पता चले। अगर सोशल मीडिया पर आने के लिए उन्हें निजी जानकारी देनी होगी और यह भी पता होगा कि जो जानकारी उन्होंने दी है, उस तक सरकार की पहुंच भी है, तो वह सोशल मीडिया पर अपनी बात रखने से डरेगा। इसको चिलिंग इफेक्ट ऑन फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन कहते हैं।


2) लिंक किया जाता है तो क्या राजनीतिक फायदे के लिए भी इसका इस्तेमाल होगा?
नमन कहते हैं कि अब जितनी ज्यादा जानकारी डिस्क्लोज होगी, उतनी ज्यादा जानकारी राजनीतिक दलों के पास जाना आसान हो सकती है। इसलिए वोटर आईडी और आधार को लिंक करने की बात भी हो रही है, लेकिन लोग इसके खिलाफ हैं। क्योंकि इससे वोटर को मैप करना और आधार के जरिए उसकी जानकारी को मैप करना और आसान हो जाएगा। इससे डेटा का दुरुपयोग करने का मौका जरूर मिल जाएगा, क्योंकि निजता की सुरक्षा के लिए वर्त्तमान में देश में कोई कानून नहीं है। ऐसा कानून नहीं होने के कारण, यूजर को मौलिक अधिकार भी नहीं है कि वो पूछ सके कि उसका डेटा का कहां-कहां इस्तेमाल हुआ है? आज की तारीख में अधिकार सरकार और कंपनियों के पास है और वो एक कॉन्ट्रेक्ट साइन करवाकर हमारे डेटा का जिस तरीके से चाहें, वैसा इस्तेमाल कर सकती हैं।


फिर इसका समाधान क्या हो सकता है?
विराग बताते हैं कि 2012 में केएन गोविंदाचार्य ने दिल्ली हाईकोर्ट में फेसबुक और गूगल के खिलाफ याचिका दाखिल की थी। इसमें मांग की गई थी कि सोशल मीडिया अकाउंट का  केवाईसी वेरिफिकेशन के जरिए हो और बच्चों की भी सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। विराग गुप्ता बताते हैं कि सोशल मीडिया अकाउंट का वेरिफिकेशन मोबाइल नंबर के माध्यम से किया जा सकता है और इसके लिए किसी अन्य दस्तावेज की जरूरत नहीं होगी। वर्तमान नियमों के अनुसार, देश में सभी मोबाइल नंबरों का केवाईसी वेरिफिकेशन जरूरी है। यदि मोबाइल पर सोशल मीडिया अकाउंट का ओटीपी आए तो सोशल मीडिया अकाउंट का भी अप्रत्यक्ष केवाईसी वेरिफिकेशन हो जाएगा।  यानी हर अकाउंट के लिए एक मोबाइल नंबर होना चाहिए। वे कहते हैं कि सोशल मीडिया को आधार से लिंक करना मुश्किल है और अगर लिंक कर भी दिया जाता है तो इससे फायदा सोशल मीडिया कंपनियों को ही होगा। क्योंकि, उनके पास लोगों का आधार डेटा का खतरा है। इससे न सिर्फ लोगों की निजता का उल्लंघन होगा बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरा है क्योंकि आधार विश्व का सबसे बड़ा डेटाबेस है। आधार से लिंक करने की बजाय सोशल मीडिया कंपनियों को अपने यूजर्स का 'ब्लू टिक' वेरिफिकेशन करना चाहिए।


चार याचिकाएं
मद्रास हाईकोर्ट में एंटनी क्लिमेंट रूबीन और जननी कृष्णमूर्ति ने याचिका दाखिल की हैं। एंटनी ने भास्कर एप से बातचीत में बताया कि वे एक एनिमल एक्टिविस्ट हैं। जनवरी 2018 में उन्हें एनिमल वेलफेयर बोर्ड की तरफ से गठित जल्लीकट्टू मॉनिटरिंग कमेटी का सदस्य बनाया गया था। इसके बाद एक फेसबुक पेज पर उनके खिलाफ कई बातें लिखी गईं और उन्हें धमकियां दी गईं। इसके बाद उन्होंने पुलिस से इसकी शिकायत की, लेकिन पुलिस ने कह दिया कि फेसबुक उस पेज की जानकारी नहीं दे रही है। इसके बाद एंटनी ने जुलाई 2018 में मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मांग की कि सोशल मीडिया को आधार कार्ड या किसी दूसरी सरकारी आईडी से जोड़ा जाए, साथ ही ऐसे मामलों के निपटारे के लिए ई-टास्क फोर्स का गठन किया जाए। एंटनी और जननी की याचिकाओं के अलावा इस संबंध में दो और याचिकाएं दाखिल हैं। तीसरी याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट में सागर राजाभाऊ सूर्यवंशी ने दाखिल की है, जबकि एक याचिका मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अमिताभ गुप्ता ने लगाई है। 

 

SOCIAL MEDIA


भारत में सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी तय नहीं

  • मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले एंटनी रूबीन कहते हैं कि अमेरिका में अगर कानून प्रवर्तन एजेंसियां किसी मामले की जांच के लिए सोशल मीडिया कंपनियों से जानकारी मांगती हैं, तो कंपनियां जल्द ही उन्हें जानकारी दे देती हैं। लेकिन, जब भारत में कंपनियों से जानकारी लेने में या तो बहुत ज्यादा समय लगता है या फिर जानकारी मिलती ही नहीं है। सोशल मीडिया कंपनियां भारत से अरबों डॉलर कमाती हैं, लेकिन उसके बावजूद कानूनी एजेंसियों की मदद नहीं करतीं। इसलिए सोशल मीडिया कंपनियों को भारत में डेटा सेंटर और नोडल ऑफिस स्थापित करना चाहिए, ताकि जल्द से जल्द जवाब मिल सके। इससे यह फायदा होगा कि भारतीयों का डेटा भारत में ही सुरक्षित रहेगा। एंटनी चाहते हैं कि भारत में भी सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय हो।
  • विराग भी यही कहते हैं कि अमेरिका जैसे देशों में बहुत सख्त डेटा प्रोटेक्शन कानून है और अगर वहां नियमों का उल्लंघन होता है तो भारी जुर्माना लगता है। लेकिन भारत में डेटा प्रोटेक्शन कानून ही नहीं है और जब कोई कानून नहीं तो उल्लंघन भी नहीं। इससे कंपनियां भारत का डेटा बाहर बेचती हैं और करोड़ों कमाती हैं, लेकिन फिर भी हम उनपर कोई जुर्माना नहीं लगा पाते। विराग कहते हैं कि सोशल मीडिया कंपनियों पर नकेल कसने के लिए हमें डेटा प्रोटेक्शन कानून की जरूरत है। जिस बारे में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने दो साल पहले बड़ा फैसला भी दिया था। जब सरकार के पास इतना बड़ा बहुमत है और डेटा प्रोटेक्शन को लेकर इतनी बड़ी-बड़ी बात भी करती है, तो फिर डेटा प्रोटेक्शन कानून क्यों नहीं लाया जा रहा?


सोशल मीडिया से आधार लिंक होने पर सरकार, यूजर्स और कंपनी पर क्या असर होगा? 

सरकार : नमन कहते हैं कि दुनिया में आज कल कई लोग अपनी सरकारों की आलोचना करने के लिए सोशल मीडिया को एक बहुत बड़ा प्लेटफॉर्म मानते हैं। कई सरकारें इसे नियंत्रित करना चाह रही हैं। अगर आधार से लिंक किया जाता है तो इससे सरकार के पास और ज्यादा ताकत आ जाएगी। अगर कोई सरकार के खिलाफ कुछ लिखता है या कमेंट करता है, तो सरकार उसके बारे में पता कर सकती है या उसके खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती है। भारत में फिलहाल निगरानी (सर्विलांस) को नियंत्रित करने के लिए कोई विस्तृत कानून नहीं हैं। 

यूजर्स : नमन के मुताबिक, इससे सबसे ज्यादा नुकसान यूजर्स को ही होगा क्योंकि उनकी सारी जानकारी सरकार और कंपनी नियंत्रित करने लगेगी। हमारे यहां वैसे भी कोई डेटा प्रोटेक्शन कानून नहीं है। इससे हमारी निजता का उल्लंघन होगा। यूजर्स की निगरानी हो सकती है। उनको ट्रेस किया जा सकता है।

कंपनी : नमन बताते हैं कि सोशल मीडिया कंपनियों के पास हमारी और ज्यादा जानकारी पहुंच जाएगी और उन्हें ज्यादा जानकारी देनी होगी। आधार कार्ड कई सारी चीजों से लिंक है तो कंपनियों की पहुंच हमारे उस डेटा तक भी हो सकती है, जिससे आधार लिंक है। कंपनियां इसका इस्तेमाल हमें एडवर्टाइज करने में कर सकती हैं या हमारा डेटा शेयर कर सकती हैं। विराग भी यही कहते हैं कि सोशल मीडिया आधार से लिंक हो या न हो, दोनों ही स्थिति में सोशल मीडिया को कंपनी को ही फायदा होगा। क्योंकि, अगर आधार लिंक हुआ तो इससे सोशल मीडिया कंपनी को लोगों का डेटा मिल जाएगा और अगर लिंक नहीं हुआ तो सोशल मीडिया कंपनियों को नियम-कानून से बचने का मौका मिल जाएगा।

 

 

COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना