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  • Arriving 200 km from Mumbai, the driver said and give the money, refused, the vehicle stood on the side and slept, waiting since noon

बंबई से बनारस: तीसरी रिपोर्ट / मुंबई से 200 किमी दूर आकर ड्राइवर ने कहा और पैसे दो, मना किया तो गाड़ी किनारे खड़ी कर सो गया, दोपहर से इंतजार कर रहे हैं

टेंपो ड्राइवर ने 50 लोगों को गाड़ी में भरा, आधे पैसे लिए और बोला बाकी पैसे गांव पहुंचकर दे देना, लेकिन फिर आधे रास्ते में ही पूरे पैसे लेने के लिए गाड़ी खड़ी कर दी।
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  • कांदिवली से 20 किमी पैदल चलकर आए थे मजदूर, ड्राइवर ने तरबूज से भरा टेंपो भी उन्हीं से खाली करवाया
  • हमने एक ट्रक के अंदर चढ़कर देखा तो घुटनभरे उस ट्रक में नीचे प्लास्टिक बिछी थी और लोग जानवरों की तरह भरे थे

दैनिक भास्कर

May 20, 2020, 04:46 PM IST

मुंबई. दैनिक भास्कर के जर्नलिस्ट बंबई से बनारस के सफर पर निकले हैं। उन्हीं रास्तों पर जहां से लाखों लोग अपने-अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। नंगे पैर, पैदल, साइकिल, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर। हर हाल में वे घर जाना चाहते हैं, आखिर मुश्किल वक्त में हम घर ही तो जाते हैं। हम उन्हीं रास्तों की जिंदा कहानियां आप तक ला रहे हैं। पढ़ते रहिए..

तीसरी खबर, नासिक हाईवे से:

दोपहर के करीब साढ़े तीन बज रहे थे। 50 लोग हमें एक टेंपो में जानवरों की तरह भरे हुए दिखाई दिए। 20-25 मजदूर टेंपो के बाहर बैठे हुए थे और इतने ही करीब अंदर सोए हुए थे। हमने उनसे बात शुरू की तो पता चला कि ये लोग बिहार के मधुबनी जिले के हैं। मुंबई के कांदिवली स्थित हनुमान नगर में रहते हैं। वहां सिलाई का काम करते थे।

जकाउल्ला बताते हैं कि हमारे समूह ने रविवार को भोर दो बजे घर से चलना शुरू किया। कांदिवली इलाके से हम 20 किमी पैदल चलकर मुंबई-अहमदाबाद हाईवे स्थित फाउंटन होटल के पास पहुंचे। यहां हमें एक टेंपों मिला, जिससे मधुबनी (बिहार) जाने की बात हुई थी। मगर टेंपों तरबूज से भरा था। हम लोगों ने घर पहुंचने की उम्मीद में तरबूज को टेंपो से खाली कर उसे साफ किया और फिर बैठ गए।

जकाउल्ला के एक और साथी जावेद आलम कहने लगे, गार्मेंट सिलाई का काम बंद होने की वजह से मजबूरी में हम लोगों ने गांव से 5-6 हजार रुपए मंगाया और टेंपो से जाने का निर्णय लिया। मधुबनी तक हमें टेंपो से पहुंचाने का किराया चार से साढ़े चार हजार रुपये तय हुआ था। लेकिन नासिक से 20-25 किमी पहले लाकर टेंपो चालक सो गया है। अब टेंपों का मालिक कह रहा है कि पहले पूरा किराया दो तभी आगे ले जाएंगे। जबकि तय हुआ था कि किराया गांव पहुंचकर देना होगा।

जावेद आगे बताते हैं, दोपहर 12 बजे से ये हम लोग नासिक हाईवे पर खड़े हैं और ड्राइवर गाड़ी में सो रहा है। उसको उठाने की कोशिश की तो कहने लगा पहले मालिक आएगा तब ही वह गाड़ी आगे बढ़ाएगा। पता नहीं उसका मालिक आएगा भी या नहीं। यहां आसपास पीने का पानी तक नहीं है। और हमारे साथ दो बच्चे भी हैं।

जावेद बताते हैं कि हमें डर है कि चार पहिए का मालिक और ड्राइवर हमसे पूरा किराया लेगा और आगे चलकर हमें कोई न कोई बहाना कर घर भी नहीं पहुंचाएगा।

मोहम्मद उमर फारुख अपने साथ सफर कर रहे मजदूरों का दर्द बयां करते हैं कि जिस आदमी के यहां हम लोग काम करते थे, वह हमें हमारी पगार दिए बिना दक्षिण भारत अपने गांव चला गया और हम पैसे-पैसे को मोहताज हो गए हैं।

मोहम्मद उमर फारुख बताते हैं कि हमने समतानगर पुलिस स्टेशन में चार घंटे लाइन में खड़े रहकर गांव जाने का फार्म भरा था। 5-6 दिनों बाद जब यह पूछने गए कि जाने की मंजूरी मिली या नहीं, तो पुलिस ने हमें डंडे मारकर भगा दिया। जिसकी वजह से मजबूरी में अब हम इस टेंपों में 50 लोग भर कर जा रहे हैं। जिसमें 7 साल की बच्ची भी है।

फारुख मुंबई छोड़ने की अपनी मजबूरी थोड़ा रुआंसे होकर बताते हैं। वह कहते हैं, हम दस बाय बारह के छोटे से कमरे में 10 लोग रहते हैं। सरकार कहती है कि दो गज की दूरी बनाकर रखो। हम कैसे सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन कर सकते हैं?

मधुबनी के लिए निकले इन लोगों में तैय्यब शाह भी शामिल हैं। वे कहते हैं, मेरा बिहार सरकार से निवेदन है कि वह मुंबई में फंसे हम बिहारी मजदूरों के बारे में सोचे। हमें यहां से निकालकर घर पहुंचाने की सुविधा जुटाए। वे महाराष्ट्र सरकार से भी गुहार लगाते हैं कि वह भी हमारे बारे में सहानुभूति से सोचे। आप लोग सरकारी बस से यात्रा क्यों नहीं करते? इस सवाल पर सभी कहने लगे कि हम इन बसों के बारे में कुछ मालूम भी नहीं है।

पैदल चल रहे इस परिवार को बीच में ट्रक ने बैठाया, पैसे लिए फिर उतार दिया
नासिक हाईवे पर जहां ये टेंपो और उसमें बैठे 50 लोग खड़े हैं, वहां से लगभग 150 किमी दूर धूलिया में महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश सीमा के पास सात लोगों का एक परिवार हमें छत्तीसगढ़ के लिए पैदल चलता मिला।

एक छोटे बच्चे को उसके पिता ने कंधे पर बिठा रखा है और परिवार में दो महिलाएं भारी वजन सिर पर रखे भागी चली जा रही हैं। समझो पूरा कुनबा समाया है इन सात लोगों में।

कोमल यादव  छत्तीसगढ़ के राजनंद गांव से पैदल निकले हैं। 4 दिनों से लगातार चल रहे हैं। बेटी भूमिका 4 साल की है। पैदल चलते-चलते वह थक गई है। इसलिए पिता ने उन्हें कांधे पर बिठा लिया है।

मुखिया बांदाराम बताते हैं कि हम लोग सीमेंट का मसाला बनाने का काम करते थे, काम बंद हो गया और ठेकेदार ने निकाल दिया। बांदाराम का कहना है कि वे लोग कल्याण से पैदल आ रहे हैं। बीच बीच में ट्रक मिल जाता है और पैसे लेकर कहीं भी इन्हें उतार देता है।

गाड़ी और ट्रक वाले इनका जमकर शोषण कर रहे हैं। नासिक नाके पर तीन ट्रक खड़े हैं और आरटीओ वाले ट्रकों से लोगों को उतार रहे हैं। बच्चे, बूढ़े, गर्भवती औरतें सब शामिल हैं इनमें। महाराष्ट्र पुलिस, आरटीओ इन्हें कतार में खड़ा कर सरकारी बसों में बिठा रही है। लोग रो रहे हैं। इनमें से दो ट्रक ओडिशा जा रहे थे और एक झारखंड।

नासिक नाके पर महाराष्ट्र पुलिस मजदूरों को ट्रकों से निकालकर लाइन में खड़ी करती है फिर इन्हें बस में बिठाकर महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश बॉर्डर पर छोड़ा जा रहा है।  

ओडिशा जाने वाले ट्रक से नीचे उतरे बलराम बताते हैं कि हमने एक ट्रक का भाड़ा एक लाख रुपये दिया था। इस किराए के लिए हममें से किसी ने सामान बेचा तो किसी ने टूटे फूटे बर्तन-गहने। अब ये लोग बॉर्डर तक तो छोड़ देंगे लेकिन वहां से हम ओडिशा कैसे जाएंगे। ट्रक के पैसे बरबाद हुए सो अलग।

झारखंड वाले ट्रक का तो ड्राइवर ही भाग गया है। लोगों ने उसे 3500 रुपये प्रति सवारी दिया था। रोकर सूख चुके आंसू उनके चेहरे की लकीरों में नजर आ रहे हैं। लोग बोल रहे हैं कि हम आपके पांव पड़ते हैं किसी तरह घर भिजवा दो बस।

पुलिसवालों का कहना है कि ये लोग अपने शोषण के खुद जिम्मेदार हैं। क्यों ट्रकों में भर भर कर जा रहे हैं। बॉर्डर पर तैनात पुलिसकर्मियों से जब बात की तो बोले हम उन्हें बसों से बॉर्डर तक छोड़ आएंगे। बेशक यह महाराष्ट्र सरकार की अच्छी पहल है लेकिन महाराष्ट्र बॉर्डर पर इनका क्या होगा कोई नहीं जानता।

नासिक नाके पर एक पिता अपनी बेटी को गोद में उठाए बस में बैठने की अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

हमने एक ट्रक के अंदर चढ़कर देखा तो घुटनभरे उस ट्रक में नीचे काले रंग की प्लास्टिक बिछी थी और हवा आने की कोई जगह नहीं थी। आधे ट्रक में बल्लियों से छत बनाई हुई थी, जिसपर सामान रखा था। दड़बों की तरह ठूंस ठूंस कर लोगों को ले जाया जा रहा है। मनमर्जी से कहीं भी उतार दिया जा रहा है।

ओडिशा जाने वाले करुणाकर बता रहे हैं कि उन्होंने गांव में कर्ज लिया है। तब कहीं जाकर ट्रक का भाड़ा देने के लिए पैसे आए थे। अब पैसे भी गए और घर कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। मुंबई में तो लोग खाना बांट रहे हैं लेकिन उसकी ज्यादा जरूरत तो हाईवे पर है। यहां न तो दुकानें खुली हैं और न ही ऐसा कोई सामान है इनके पास जिससे भूख मिटाई जा सके।

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पहली खबर: घर जाने की जिद के आगे चुनौतियां छोटीं / 40° तापमान में कतार में खड़ा रहना मुश्किल हुआ तो बैग को लाइन में लगाया, सुबह चार बजे से बस के लिए लाइन में लगे 1500 मजदूर

दूसरी खबर: घर से पैसे मंगवाकर खरीदी साइकिल / 2800 किमी दूर असम के लिए साइकिल पर निकले, हर दिन 90 किमी नापते हैं, महीनेभर में पहुंचेंगे

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