डीबी ओरिजिनल / दुनिया के सबसे लोकप्रिय शिक्षक प्रो. हरारी बोले: टेक्नोलॉजी इंसान को हैक कर लेगी, नौकरी 5 साल भी नहीं चलेगी



फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग और प्रोफेसर युवाल नाेआ हरारी। (फाइल फोटो) फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग और प्रोफेसर युवाल नाेआ हरारी। (फाइल फोटो)
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फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग और प्रोफेसर युवाल नाेआ हरारी। (फाइल फोटो)फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग और प्रोफेसर युवाल नाेआ हरारी। (फाइल फोटो)

  • इजराइल के हिब्रू विवि के प्रोफेसर युवाल नोआ हरारी दुनिया को भविष्य की तस्वीर दिखाते हैं
  • उनका इंटरव्यू फेसबुक सीईओ मार्क जकरबर्ग, पूर्व आईएमएफ प्रमुख क्रिस्टीन लेगार्ड तक ले चुकीं
  • दैनिक भास्कर ने भी टेक्नोलॉजी, मशीनों और भविष्य पर उनसे बातचीत की
     

Dainik Bhaskar

Sep 05, 2019, 07:27 PM IST

नई दिल्ली. इजरायल के हिब्रू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर युवाल नाेआ हरारी ऐसे शिक्षक हैं, जिनका इंटरव्यू फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग, पूर्व आईएमएफ प्रमुख क्रिस्टीन लेगार्ड और मशहूर एक्ट्रेस नेटली पोर्टमेन तक ले चुके हैं। 1976 में जन्मे हरारी की सैपियंस, होमो डायस और 21 लेसंस फोर 21 सेंचुरी जैसी उनकी किताबों की दो करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं। दैनिक भास्कर ने टेक्नोलाॅजी, रोजगार और इंसान के भविष्य पर उनसे बातचीत की।

 

भास्कर: टेक्नोलॉजी दुनिया को बदल रही हैै, ऐसे में राजनीतिक राष्ट्रवाद कब तक चल पाएगा? 
हरारी:
परमाणु युद्ध, पर्यावरण का कमजोर पड़ना और टेक्नोलॉजी इंसान के सामने तीन सबसे बड़ी चुनौतियां बनकर आई हैं। सभी देश मिलकर पहली दो चुनौतियों का सामना तो कर सकते हैं, पर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और बायो-इंजीनियरिंग वैश्विक व्यवस्था, जॉब मार्केट सहित हमारे मन-मस्तिष्क तक को झकझोर देंगे। अमेरिका, चीन, भारत जैसे बड़े देशों को मिलकर रोबोट और जेनेटिकली इंजीनियर्ड सुपर ह्यूमन्स के उत्पादन को नियंत्रित करना होगा। ऐसे में राष्ट्रवाद का वैश्वीकरण जरूरी हो जाता है।


भास्कर: अगर नई टेक्नोलॉजी इस्लामिक राष्ट्रवादियों और आतंकियों के हाथ लग जाए तो? 
हरारी:
यह खतरा तो है कि मजहबी उग्रवादी और आतंकियों के हाथ नई टेक्नोलॉजी लग जाए। इतिहास गवाह है कि उग्रवादियों ने हमेशा औरतों और कमजोरों पर अत्याचार किए हैं। अगर जेनेटिक इंजीनियरिंग से मनुष्य को फैक्ट्री में पैदा करना शुरू कर दिया जाए, तो औरतों की जरूरत ही खत्म हो जाएगी। मजहबी उग्रवादियों से टेक्नोलॉजी को बचाना जरूरी है। वैश्विक सहयोग के बगैर इनसे मुकाबला आसान नहीं होगा।   

 

भास्कर: अगर इंसान मशीनों से हारा तो अर्थव्यवस्था और नौकरी में उसकी क्या भूमिका बचेगी? 
हरारी:
आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ने इंसान की बुद्धि को भी पीछे छोड़ दिया है। भविष्य में पुराने रोजगार अस्तित्व खो देंगे। ऑटोमेशन टेक्नोलॉजी के कारण जितनी तेजी से नौकरियां उभरेंगी, उतनी ही तेजी से खत्म भी होंगी। सबसे बड़ी चिंता होगी कि लोग हर तीन से पांच साल में पुरानी नौकरी में रहते खुद को नई नौकरी के लिए कैसे ट्रेंड करें? आज की शिक्षा व्यवस्था इसके लिए तैयार नहीं है। सभी को लगातार नई चीजें सीखनी होंगी। ऐसा नहीं हुआ तो बड़ी आबादी यूजलेस हो जाएगी।  

 

भास्कर: भविष्य के स्कूल और शिक्षक कैसे होंगे?
हरारी:
टेक्नोलॉजी इतनी तेजी से बदल रही है कि जो नौकरी आज है वो दो साल रहेगी कि नहीं, यह कहना मुश्किल है। इंटरनेट के आने के बाद स्कूलों में भी शिक्षकों की आवश्यकता बचेगी या नहीं, यह कहना मुश्किल है। अगर आने वाला समय ऐसा हो जाए कि बच्चे अपने स्मार्टफोन पर विश्व के बेस्ट टीचर से पढ़ लें और स्मार्टफोन पर ही परीक्षा देकर रिजल्ट पा लें तो क्या आने वाले समय में स्कूल या टीचर का अस्तित्व बचेगा? ये एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर अभी भी समाज की दृष्टि नहीं जा रही है। एक बात तय है कि आने वाले समय के हिसाब से जो दो चीजें सीखने की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ेगी वो है- भावनात्मक शक्ति और बदलाव से जूझने का मनोबल। अगर इनमें कमी रही, तो कामकाजी बने रहना किसी के लिए भी मुश्किल हो जाएगा।


भास्कर: क्या टेक्नोलॉजी लोकतंत्र को कमजोर करेगी?
हरारी:
टेक्नोलॉजी हर राजनीतिक परंपरा को निष्क्रिय कर सकती है। चाहे लोकतंत्र हो, समाजवाद हो या फिर पूंजीवाद। 21वीं शताब्दी की टेक्नोलॉजी तो मनुष्य को भी हैक कर सकती है। यहां हैक का मतलब है कि अब कंप्यूटर अपने यूजर को इतनी अच्छी तरह समझने लगा है, जितना यूजर भी खुद को नहीं जानता। इस टेक्नोलॉजी से कोई सरकार या कंपनी हमसे ऐसे निर्णय करवा सकती है, जो हमारे नहीं हैं, बल्कि उनके फायदे के हों। 

भास्कर: क्या तीसरा तीसरा विश्वयुद्ध 21वीं सदी में संभव है? अगर हुआ तो कारण क्या होंगे?
हरारी:
वैसे आज हम इतिहास के सबसे शांत युग में जी रहे हैं। छिटपुट युद्ध दुनिया के किसी न किसी कोने में हो रहे हैं, लेकिन दुनिया का बड़ा हिस्सा युद्ध से मुक्त है। प्राचीन समय में 15% मौतें मानवीय हिंसा के कारण होती थीं। आज यह संख्या 1.5% पर सिमट गई है। अब हिंसा से कई गुना ज्यादा मौतें ज्यादा खाने और मोटापे के कारण हो रही हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि आज चीनी (शक्कर) बारूद से ज्यादा खतरनाक है। 1945 में खत्म हुए दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया में बड़े युद्ध रुक गए, इसलिए नहीं कि धरती पर देवता का वास हो गया, बल्कि इसलिए कि मनुष्यों ने समझबूझ कर फैसले लिए।

 

इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि भविष्य में भी सोच-समझकर निर्णय लिए जाएंगे। हमें कभी भी मानवीय बेवकूफियों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि इतिहास में मानवीय बेवकूफियों से ज्यादा ताकतवर और कुछ नहीं रहा। अगर युद्ध होता है तो उसका कारण बेवकूफी के अलावा कुछ और नहीं होगा। अगर यह पूछा जाए कि वो बेवकूफी क्या होगी, तो इसका उत्तर हमें पहले दो विश्व युद्ध से मिल सकता है। अगर कुछ ताकतवर बेवकूफों को यह महसूस हो जाए कि युद्ध व्यापार से ज्यादा लाभदायक हो सकता है तब कई समझदार मिलकर भी युद्ध नहीं रोक पाएंगे।

 

भास्कर: ...तो हमारे पास उपाय क्या है? 
हरारी:
उपाय मुश्किल और लंबा है। अब संभव नहीं है कि पूरा जीवन किसी एक धार्मिक ग्रंथ के सहारे निकल जाए। आज के समय में बहुत सारी किताबें बहुत जल्दी-जल्दी सबको पढ़ने की आवश्यकता है। पर सिर्फ पढ़ने से काम नहीं चलेगा, मेडिटेशन जैसी क्रियाओं का भी भरपूर लाभ लेना होगा, ताकि हम अपने दिमाग और शरीर को हैक होने से बचा सकें। मैं खुद रोज दो घंटे मेडिटेशन करता हूं और हर साल करीब दो महीने कहीं दूर जाकर विपश्यना करता हूं।

 

आज हमें बहुत सतर्क रहने की जरूरत है कि हम अपने बारे में किन बातों को सार्वजनिक कर रहे हैं। आज हम खुलेआम सोशल मीडिया पर अपनी पसंद और नापसंद को व्यक्त करते हैं। असल में हम अपने बारे में डेटा फ्री में दान कर रहे हैं। उलटे हमें हमारे डेटा को बहुत ध्यान से बचाने की जरूरत है। अगर संभव हो तो हमें हरसंभव उपाय करने चाहिए कि पसंद-नापसंद के बारे में नेता और कॉर्पोरेट्स भ्रमित रहें।

 

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