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बांस से बना था पहला पटाखा, हजार साल का सफर तय कर चुकी आतिशबाजी की दुनिया के रोचक किस्से

8 महीने पहले
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  • इतिहासकारों के मुताबिक, जिस शोरा से बारूद बनता है, 18वीं सदी में उसका 90% उत्पादन भारत में ही होता था
  • चीन में मान्यता है कि पटाखों की आवाज से बुरी आत्माएं दूर भागती हैं, इसलिए सुख-शांति के मौकों पर जलाए जाने लगे पटाखे
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अक्षय बाजपेयी/निसर्ग दीक्षित (डीबी ओरिजिनल डेस्क). दिवाली पर सालों से आतिशबाजी करने और पटाखे जलाने की परंपरा देश में रही है। रावण वध और भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी में लोग आतिशबाजी करते हैं। पटाखे जलाते हैं। हालांकि पटाखे जलाने का इतिहास भारत में बहुत पुराना नहीं है। इसे नए रिवाज के तौर पर देखा जाता है। खुशियों में पटाखे कहां से शामिल हो गए? दीवाली पर क्यों जलाए जाने लगे? दुनिया में आतिशबाजी कहां से और कैसे आई? ऐसे ही सवालों के जवाब के लिए हमने इतिहासकारों से बात की। पेश है आतिशबाजी से जुड़ी ये दिलचस्प जानकारी।

हिंदुस्तान के लिए नई है आतिशबाजी की परंपरा : प्रो लोचन

  • पंजाब यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ हिस्ट्री में प्रोफेसर राजीव लोचन ने दैनिक भास्कर APP से खास बातचीत में बताया कि आतिशबाजी में कच्चे माल के रूप में जो चीज इस्तेमाल होती है जिसे शोरा (एक तरह का नमक) कहा जाता है, 18वीं सदी में तो इस नमक का 90 प्रतिशत उत्पादन हिंदुस्तान से होता था। यह यूरोप एक्सपोर्ट किया जाता था, इसलिए ये कहना सही नहीं होगा कि हिंदुस्तान में आतिशबाजी पहले नहीं होती थी।
  • ये जरूर है कि हमें पहले पटाखे जलाने या आतिशबाजी करने का जिक्र नहीं मिलता और करीब से देखें तो 16वीं सदी से बारूद का मिलिट्री इस्तेमाल शुरू हो जाता है, हम ऐसा मानते हैं कि मिलिट्री यूज हो रहा था तो सिविल यूज भी कहीं न कहीं हो ही रहा होगा, हालांकि हिंदुस्तान में आतिशबाजी का इस्तेमाल बहुत बड़े स्तर पर नहीं होता था।
  • अभी खुशियां मनाने में जो पटाखे जलाने या आतिशबाजी करने का रिवाज है, यह बिल्कुल ही नया है। ये हमें पहले देखने को नहीं मिलता था। शादी, बारात के पहले जो पिक्चर्स मिलते हैं, उनमें रोशनी के लिए मशालें जरूर मिलती हैं, लेकिन आतिशबाजी कहीं नहीं दिखती। पटाखों का जिक्र भी नहीं मिलता। 18वीं-19वीं सदी से लगातार आतिशबाजी, पटाखों का इस्तेमाल देखने को मिलने लगता है।

बाबर ने किया था बारूद का इस्तेमाल

  • प्रो लोचन कहते हैं कि बारूद औरआतिशबाजी चीन से ही शुरू हुई। हालांकि इसका जो रॉ मटेरियल है, बहुतायत में हिंदुस्तान में मिलता है। हिंदुस्तान में लोहे को गलाने का हुनर भी काफी पहले से है और चाइना से ज्यादा विकसित रहा है तो ये कहना सही नहीं होगा कि आतिशबाजी चीन से ही शुरू हुआ। दरअसल कुछ अंग्रेजों ने चीन के विज्ञान का इतिहास लिखा था चूंकि इसी के चलते उन्होंने लिखा कि चीन में ये सब चीजें हुआ करती थीं।
  • हिंदुस्तान में ऐसी जनरल हिस्ट्री लिखी नहीं गई तो इस कारण इसके बारे में जानकारी थोड़ी कम है। ये जरूर है कि चीन में भी बारूद का इस्तेमाल हथियार के तौर पर नहीं किया गया। हथियार के तौर पर इस्तेमाल तब शुरू होता है, जब बाबर ने भारत पर हमला किया। हालांकि सुरंग में विस्फोट डालकर उसमें ब्लास्ट करने की कहानियां तो हमारे यहां बाबर से भी पुरानी हैं। तुगलकाबाद फोर्ट को धराशायी करने के लिए तो बारूद का इस्तेमाल हिंदुस्तान में हो रहा था।

 

समय के साथ बदलते गए पटाखे, बांस से लेकर रिमोट तक का सफर

  • 600-900 एडी के आसपास कुछ चीनी रसायनशास्त्रियों ने चारकोल, सल्फर आदि मिलाकर कच्चा बारूद बनाया। बाद में इसे बांस में भरकर फोड़ा जाने लगा।
  • 10वीं सदी में चीनवासियों ने बांस की उपयोगिता को समझ कागज के बम बनाने शुरू किए, जिसका उपयोग वे दुश्मनों को डराने के लिए करते थे।
  • कागज के पटाखे इजाद करने के 200 साल बाद चीन में हवा में फूटने वाले पटाखों का निर्माण शुरू हो गया। इन पटाखों का उपयोग युद्ध के अलावा एयर शोज के लिए होने लगा।
  • 13वीं सदी में यूरोप और अरब देशों में बारूद के विकास का काम शुरू हुआ। यहां वैज्ञानिक और सेना ने बारूद के इस्तेमाल से शक्तिशाली हथियार बनाना प्रारंभ कर दिया।
  • मध्यकालीन इंग्लैण्ड में बारूद के हल्के स्वरूप के प्रयोग से जश्न मनाने का सिलसिला शुरू हुआ। इस दौरान जीत की खुशी और समारोह के मौके पर फायर शो के आयोजन होने लगे।
  • 1830 में प्रथम बार इटली में अलग तरह की धातुओं को मिलाकर रंग बिरंगी आतिशबाजी बनाई गई। हालांकि पायरोटेक्निक की शुरूआत 13वीं सदी में हो चुकी थी। इसकी शिक्षा के लिए पूरे यूरोप में ट्रेनिंग स्कूल खोले गए।
  • फिलहाल दुनियाभर में पटाखों की कई आधुनिक किस्में मौजूद हैं। इनका उपयोग फायर शो और जश्न के लिए किया जाता है। तेज आवाज से लेकर बेहतरीन आकार में रंग बिखेरने वाले इलेक्ट्रॉनिक पटाखे बाजार में दस्तक दे चुके हैं।

क्या है आतिशबाजी का इतिहास 

  • दरअसल बारूद और आतिशबाजी के इतिहास को लेकर अलग-अलग इतिहासकारों ने अलग-अलग दावे किए हैं। इनके अविष्कार का कोई एक लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। कई इतिहासकर यह मानते हैं कि बारूद दूसरी सदी में प्राचीन चीन के लियुयांग में बनाया गया। 'बांस' को पहला पटाखा माना गया। बांस को जब आग में फेंका जाता था तो अपनी विशेष बनावट के चलते अत्यधिक गर्मी होने पर यह आवाज के साथ फटते थे। प्राचीन चीन के लोग ऐसा मानते थे कि इस आवाज से बुरी आत्माएं दूरी भागती हैं और सुख-शांति करीब आती है। इसलिए वे बांस को आग में फेंकना शुभ मानते थे। कुछ इतिहासकार बारूद पटाखों के आविष्कार का श्रेय मध्य पूर्व को भी देते हैं।

किंवदंती है कि एक दुर्घटना से ईजाद हुआ बारुद

  • किंवंदती है कि चीन में करीब हजार साल पहले बारूद का अविष्कार हुआ। इसे लेकर एक कहानी भी प्रचलित है। ऐसा कहा जाता है कि चीन में बारूद का अविष्कार एक दुर्घटना के चलते हुआ था। एक चीनी रसोइए ने खाना बनाते समय गलती से साल्टपीटर (पोटेशियम नाईट्रेट) आग पर डाल दिया। इससे उठने वाली लपटें रंगीन हो गईं। इन रंगीन लपटों को देखकर लोगों की उत्सुकता बढ़ी। फिर रसोइए ने साल्टपीटर के साथ कोयले और सल्फर का मिश्रण इसमें डाल दिया, जिससे रंगीन लपटों के साथ ही काफी तेजी आवाज भी हुई। बस यहीं से बारूद की खोज हो गई। एक अन्य दावे के अनुसार, सॉन्ग वंश (960- 1276) के दौरान बारूद का आविष्कार हुआ था।
  • बारूद के अविष्कार को लेकर एक दावा यह भी है कि, हजार साल पहले एक संन्यासी ली तियान ने इसकी खोज की थी। वह चीन के हुनान प्रांत के लियुयांग शहर का रहने वाला था। यह क्षेत्र आज भी आतिशबाजी के उत्पादन में दुनियाभर में सबसे आगे माना जाता है। सोंग वंश के दौरान ली तियांग की पूजा के लिए एक मंदिर का निर्माण करवाया गया था। चीन के लोग आज भी हर साल 18 अप्रैल को आतिशबाजी के अविष्कार का जश्न मनाते हैं और ली तियांग को याद करते हैं। चीन में ऐसी मान्यता है कि आतिशबाजी, पटाखों से बुरी आत्माएं भागती हैं। इसलिए जन्मदिन, विवाह, नववर्ष जैसे खुशी के मौकों पर आतिशबाजी की परंपरा वहां से शुरू हुई और फिर दुनियाभर में फैलती गई।

भारत में 8वीं शताब्दी में बारूद होने के प्रमाण

  • इतिहासकारों का मानना है कि, भारत में बारूद का ज्ञान 8वीं शताब्दी से मौजूद है। 8वीं शताब्दी में संकलित संस्कृत भाषा के गृंथ वैशम्पायन के नीति प्रकाशिका में एक समान पदार्थ का उल्लेख मिलता है। हालांकि आतिशबाजी में इस्तेमाल होने के लिए बारूद की क्षमता उस वक्त महसूस नहीं की गई थी। इतिहासकार कौशिक रॉय का यह मानना है कि प्राचीन भारत साल्टपीटर को अग्निचूर्ण या आग पैदा करने वाले पाउडर के रूप में जानता था। 13वीं शताब्दी में चीन में मिंग राजवंश की सैन्य गतिविधियों ने दक्षिण पूर्व एशिया, पूर्वी भारत और अरब दुनिया से बारूद का परिचय करवाया। शुरुआत में बारूद का उपयोग सैन्य गतिविधियों में ही किया गया। आतिशबाजी के तौर पर भी इसका इस्तेमाल करना चीन ने ही दुनिया को सिखाया।

15वीं शताब्दी की पेंटिंग्स से मिलते हैं प्रमाण

  • 15वीं शताब्दी में मुगलों की पेंटिंग्स में बड़े पैमाने पर इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि भारत में उस दौरान उत्सवों में आतिशबाजी की शुरुआत हो चुकी थी। वर्ष 1633 में मुगल बादशाह शाहजहां के बेटे दारा शिकोज के बेटे के विवाह से जुड़ी एक पेंटिंग में भी आतिशबाजी होने के प्रमाण मिलते हैं। 1953 में इतिहासकार पीके गोड़े ने 'द हिस्ट्री ऑफ फायरवर्क्स इन इंडिया बिटवीन 1400 एंड 1900 एडी' लिखा था। वे 1518 में गुजरात में एक ब्राह्मण दंपत्ति की शादी में आतिशबाजी होने का प्रमाण भी देते हैं।

  • मध्यकालीन भारत पर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में इतिहासकार सतीश चंद्रा ने लिखा है कि 17वीं शताब्दी में बीजापुर के शासक रहे आदिल शाह के विवाह में 80 हजार रुपए आतिशबाजी पर खर्च किए गए। अंग्रेजों के शासन के दौरान उत्सवों में आतिशबाजी करना भारत में काफी लोकप्रिय हुआ। 19वीं शताब्दी में पटाखों की मांग बढ़ने का ही नतीजा था कि कई फैक्ट्रीज स्थापित हुईं। भारत में पटाखों की पहली फैक्ट्री 19वीं शताब्दी में कोलकाता में स्थापित हुई। बाद में यह तमिलनाडु के शिवकाशी में स्थापित हो गई।

दो भाइयों ने शिवकाशी में शुरू की थी फैक्ट्री, आज यहां सबसे बड़ा बाजार

  • दासगुप्ता नाम के व्यक्ति 1892 से कोलकाता में एक मैच फैक्ट्री चला रहे थे। भुखमरी और सूखे की समस्या से जूझ रहे शिवकाशी के दो भाई शणमुगा और पी नायर नाडर दासगुप्ता की फैक्ट्री में नौकरी के लिए पहुंचे। मैच फैक्ट्री के कामकाज को समझने और सीखने के बाद इन्होंने शिवकाशी में अपनी खुद का उद्योग शुरू किया।
  • शिवकाशी का शुष्क मौसम इनके लिए फायदेमंद साबित हुआ। इस तरह शिवकाशी में पहली पटाखा फैक्ट्री शुरू हुई। आज तमिलनाडु का शिवकाशी भारत में पटाखों का सबसे बड़ा बाजार है। देश के 85% पटाखे सिर्फ शिवकाशी में ही बनते हैं। हालांकि विश्व मानकों पर खरा न उतर पाने के कारण शिवकाशी का पटाखा बाजार विश्व बाजार में अपने पैर नहीं फैला सका।

यहां 130 साल पुराने चीनी तरीके से बनते हैं पटाखे

  • असम के गानाकच्ची गांव में 130 सालों से ऐसे पटाखे बनाए जा रहे हैं, जो सामान्य पटाखों की तुलना में कम धुआं छोड़ते हैं। यहां पर स्थित बारपेटा फैक्ट्री का काम संभाल रहे गोपजीत पाठक ने बताया, ‘‘बाजार में जो पटाखे बिकते हैं, उनमें बेरियम नाइट्रेट और एल्युमीनियम पाउडर का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है, जिस कारण इनसे ज्यादा धुआं निकलता है और यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन पर बैन लगाने की बात कही है। वहीं हमारे यहां 130 साल पुराने चीनी तरीके से जो पटाखे बनते हैं, उनमें ज्यादा केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसी वजह से पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम धुआं निकलता है।’’

तोहफे में मिली किताब से मिला था पटाखे बनाने का चीनी सूत्र

पुस्तक से इस पटाखा कंपनी की कहानी शुरू हुई। मेरे दादा का लक्ष्मी नुबी नाम का दोस्त था। लक्ष्मी बांग्लादेश गए थे, बिजनेस के सिलसिले में। वहां से उन्होंने एक पुस्तक खरीदी और मेरे दादाजी को गिफ्ट की। उसमें चीन के पटाखों का फॉर्मूला था। जिसे पढ़कर बांग्लादेश से सामान मंगाया और पटाखा बनाने की फैक्ट्री शुरू की। असम के बरकटा जिले में एक मंदिर था 'नामघर', वहां पर होली का त्योहार बहुत धूमधाम से मनाते हैं। ये सन 1885 के पहले की बात है, उस समय मेरे दादाजी ने लोगों को पटाखे जलाकर दिखाए। इसके बाद ही लोगों ने पटाखे खरीदना शुरू किया और तभी से हमारा कारोबार शुरू हुआ। मेरे दादाजी के गुजरने के बाद पिता ने और फिर मैंने इसका काम संभाला। अभी इस फैक्ट्री को चौथी पीढ़ी संभाल रही है।

2018 से ग्रीन पटाखों से दिवाली

  • 2018 से दिवाली पर ग्रीन पटाखों की कई वैरायटी नजर आ रही हैं। प्रदूषण घटाने, हानिकारक केमिकल और ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल के निर्देश दिए थे। एससी ने पिछले साल ही पारंपरिक पटाखों पर प्रदूषण के चलते बैन लगा दिया था। इसके बाद शिवकाशी ने खुद को ग्रीन पटाखों के लिए तैयार कर लिया है। तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड एमॉर्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (TNFAMA) के प्रेसिडेंट पी गणेशन ने मीडिया को दिए इंटरव्यू में बताया कि केंद्र और तमिलनाडु सरकार ने ग्रीन पटाखे के लिए ट्रेनिंग देने में हमारी मदद की। इससे 30 प्रतिशत तक प्रदूषण कम होगा।
  • हालांकि शिवकाशी में 98% पटाखे पुराने फॉर्मूले से ही बनाए जा रहे हैं। दरअसल, यहां सिर्फ चार कंपनियों को ही इसका लाइसेंस दिया गया है। जिस केमिकल को प्रतिबंधित किया गया है, उसका ग्रीन विकल्प पोटेशियम पेरियोडेट 400 गुना महंगा है, जिसके चलते निर्माताओं ने कम ग्रीन पटाखे बनाए।
  • शिवकाशी में फिलहाल हर तरफ पटाखे ही दिख रहे हैं। दिवाली के चलते पटाखे सप्लाई करने का काम जोरों पर है। शिवकाशी में रजिस्टर्ड पटाखा निर्माताओं की संख्या 1070 हैं और छोटे-बड़े मिलाकर 1800 से लेकर 2000 इकाइयां पटाखे बनाती हैं। बीते वर्ष यहां पटाखों के व्यापार का टर्नओवर 6500 करोड़ रुपए रहा। सुप्रीम कोर्ट की पाबंदी के बाद यह लगातार गिर रहा है। बीते पांच सालों में टर्नओवर 60 फीसदी कम हुआ है।
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