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बंबई से बनारस : सोलहवीं रिपोर्ट:पीएम मोदी के गोद लिए ‘जयापुर’ में गांववालों ने निगरानी समिति बनाई, 35 लोग बाहर से लौटे हैं, लेकिन अब तक यह गांव कोरोना संक्रमण से बचा हुआ है

वाराणसी3 महीने पहलेलेखक: विनोद यादव और मनीषा भल्ला
गमछा लपेटे ग्राम प्रधान श्रीनारायण पटेल ने बताया कि चूंकि बनारस धीरे-धीरे पूर्वांचल का कोरोना संक्रमितों का हॉटस्पॉट बनता जा रहा है, इसलिए निगरानी समिति का काम बढ़ गया है। 
  • निगरानी समिति चुपचाप इस बात पर नजर रखती है कि क्वारैंटीन व्यक्ति कहीं गांव में बाहर तो नहीं घूम रहा, गांव में बाहर से किसी व्यक्ति के आते ही उसे मेडिकल जांच के लिए ले जाते हैं
  • गांव में पिछले 20 दिनों में 35 लोग मुंबई, दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात से आए हैं, ये सभी होम क्वारैंटीन हैं

दैनिक भास्कर के जर्नलिस्ट बंबई से बनारस के सफर पर निकले हैं। उन्हीं रास्तों पर जहां से लाखों लोग अपने-अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। नंगे पैर, पैदल, साइकिल, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर। हर हाल में वे घर जाना चाहते हैं, आखिर मुश्किल वक्त में हम घर ही तो जाते हैं। हम उन्हीं रास्तों की जिंदा कहानियां आप तक ला रहे हैं। पढ़ते रहिए..

16वीं स्टोरी, प्रधानमंत्री के गोद लिए गांव जयापुर से:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गोद लिए गांव जयापुर में दाखिल होते ही हमें मुंह पर गमछा लपेटे ग्राम प्रधान श्रीनारायण पटेल लॉ की पढ़ाई कर रहे अपने बेटे राहुल को कुछ समझाइश देते दिखे। पूछने पर बोले राहुल निगरानी समिति का सदस्य है, जिसके जिम्मे गांव में कोरोना न हो इसकी देखरेख करना शामिल है। जिसमें लोगों को मुंह बांधे रखने से लेकर बाहर से आने वालों को क्वारैंटीन करने तक शामिल है।

गांव में पिछले 20 दिनों में 35 लोग मुंबई, दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात से आए हैं। ये सभी लोग इन दिनों होम क्वारैंटीन हैं। चूंकि बनारस धीरे-धीरे पूर्वांचल का कोरोना संक्रमितों का हॉटस्पॉट बनता जा रहा है, इसलिए निगरानी समिति का काम बढ़ गया है। लेकिन अब तक गांव कोरोना संक्रमण से बचा हुआ है।

निगरानी समिति के युवा सदस्य राहुल सिंह पटेल बताते हैं, ‘हम लोग गांव में जो भी प्रवासी मजदूर आ रहे हैं। उन्हें पहले थर्मल स्क्रीनिंग सेंटर ले जाते हैं। वहां उनकी जांच कराने के बाद उन्हें क्वारैंटीन करने की व्यवस्था करते हैं। इसके बाद हमारी समिति के सदस्य चुपचाप इस बात पर नजर रखती है कि क्वारैंटीन व्यक्ति कहीं गांव में बाहर तो नहीं घूम रहा’।

निगरानी समिति क्वारैंटीन किए व्यक्ति के परिवार को भी जाकर समझाती है कि क्या एहतियात बरतना है। इसके अलावा होम क्वारैंटीन किए लोगों पर नजर रखती है और यदि किसी मजदूर के पास होम क्वारैंटीन रहने की जगह नहीं होती है तो प्रशासन की मदद से उसकी व्यवस्था भी करती हैं। निगरानी समिति में गांव के ही वार्ड सदस्य या फिर आम लोग हैं। इस तरह गांवों को कोरोना वायरस से बचाने को योद्धा तैयार किए जाते हैं। ग्राम प्रधान पटेल कहते हैं कि यही वजह है कि जयापुर में 35 लोगों के होम क्वारैंटीन होने के बावजूद अभी तक एक भी पॉजिटिव केस नहीं मिला है।

4200 आबादी वाले इस गांव में बैंक, एटीएम, पोस्ट ऑफिस, सोलर प्लांट जैसी हर सुविधा मौजूद है।

बनारसी हरियाणा से 9 लोगों के साथ गांव लौटे हैं। वे अपने मिट्टी के बने घर को दिखाते हुए कहते हैं कि प्राइमरी स्कूल से क्वारैंटीन सेंटर हटाना सही फैसला नहीं था। बनारसी की शिकायत है कि उनके पास मिट्टी के दो कमरों का छोटा सा घर है। लिहाजा सरकार को सरकारी स्कूलों में उन जैसे गरीब लोगों को क्वारैटीन रखने की सुविधा मुहैया करानी चाहिए।

भिवंडी से नासिक तक पैदल और फिर ट्रक से गांव पहुंचे गौतम को लगता है कि प्रशासन को उनके जैसे प्रवासी मजदूरों को घर के बदले स्कूलों में ही क्वारैंटीन रखना चाहिए। वहां टॉयलेट-बाथरूम की व्यवस्था ठीक रहती है। होम क्वारैंटीन रहने वालों को कई बार घर में बच्चों के चलते दूरी बनाए रखने में मुश्किल आती है। वे बताते हैं, ‘मेरे तीन बच्चे हैं। गांव आने के बाद से ही क्वारैंटीन हूं। तीनों बच्चों को नजर के सामने देखता हूं, तो उन्हें गले लगाने का मन करता है। पर कोरोना वायरस के डर से बच्चों को पास तक आने से मना कर देता हूं’।

भिवंडी से नासिक तक पैदल और फिर ट्रक से गांव पहुंचे गौतम को लगता है कि प्रशासन को उनके जैसे प्रवासी मजदूरों को घर के बदले स्कूलों में ही क्वारैंटीन रखना चाहिए।

गांव के ही राजाराम का कहना है कि ‘हम गरीबों को एक-एक कमरे का घर देकर सरकार ने एहसान किया है शायद। उसी कमरे में भरे पूरे परिवार के साथ हम क्वारैंटीन हैं। वहीं राशन की भी किल्लत है।’ राजाराम सरकार से सख्त नाराज़ हैं। उनके दो बेटे हैदराबाद और मांडू में फंसे हुए हैं। दोनों कंपनियों में मज़दूरी किया करते थे। करीब 8 हजार वेतन मिला करता था लेकिन आज दो महीने हो गए हैं वे लोग सड़क पर हैं। राजाराम का कहना है कि ‘सरकार हमारे बच्चों को लावारिस समझती है,घर बच्चों की कमाई से चलता था और सरकार हमारे हाथ में भीख का कटोरा थमवा कर रहेगी।’ वह गुस्से में कहते हैं, ‘तुम मीडिया वाले दिखाते हो न यह ट्रेन चल गई, यह बस चल गई, सब वोट लेने के धंधे हैं। मेरे बच्चे भूखे हैं,चारों ओर ताले लगे हुए हैं, परदेसों में उन्हें कोई खाने को नहीं दे रहा है।’

गांव के ही राजाराम का कहना है कि ‘हम गरीबों को एक-एक कमरे का घर देकर सरकार ने एहसान किया है शायद। उसी कमरे में भरे पूरे परिवार के साथ हम क्वारैंटीन हैं।’

इसी गांव की गुडडी के पति भी हैदराबाद में फंसे हुए हैं। दो महीने हो गए वह घर आने की कोशिश कर रहे हैं। गुड्डी बताती है कि उसकी पति से बात होती है। उनके पास पैसे खत्म हो चुके हैं, खाने की सुविधा नहीं है। न तो वह घर पैसे भिजवा पा रहे हैं और न ही खुद आ पा रहे हैं। गुड्डी के अनुसार मनरेगा के काम के अभी तक पैसे नहीं मिले हैं। फिलहाल तो गांव में मनरेगा का काम नहीं है लेकिन जो काम पहले किया था उसके भी पैसे नहीं मिले हैं।गांव की 80 महिलाओं के पास सूत कातने का काम था। इन्हें 20 लच्छी कातने के 100 रुपये मिला करते थे। यह सूत खादी सेवापुर के ग्रामोद्ग में जाया करता था। गांव के राहुल यादव का कहना है कि धीरे धीरे कई महिलाएं इस प्रॉजेक्ट से जुड़ रहीं थी लेकिन लॉकडाउन की वजह से यह काम भी आजकल बंद है। 4200 आबादी वाले इस गांव में बैंक, एटीएम, पोस्ट ऑफिस, सोलर प्लांट जैसी हर सुविधा मौजूद है। 

निगरानी समिति क्वारैंटीन किए व्यक्ति के परिवार को भी जाकर समझाती है कि क्या एहतियात बरतना है। इसके अलावा होम क्वारैंटीन किए लोगों पर नजर रखती है।

बंबई से बनारस तक मजदूरों के साथ भास्कर रिपोर्टरों के इस 1500 किमी के सफर की बाकी खबरें यहां पढ़ें:

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आठवीं खबर: मप्र के बाद नजर नहीं आ रहे पैदल मजदूर; जिस रक्सा बॉर्डर से दाखिल होने से रोका, वहीं से अब रोज 400 बसों में भर कर लोगों को जिलों तक भेज रहे हैं

नौवीं खबर: बस हम मां को यह बताने जा रहे हैं कि हमें कोरोना नहीं हुआ है, मां को शक्ल दिखाकर, फिर वापस लौट आएंगे

दसवीं खबर: रास्ते में खड़ी गाड़ी देखी तो पुलिस वाले आए, पूछा-पंचर तो नहीं हुआ, वरना दुकान खुलवा देते हैं, फिर मास्क लगाने और गाड़ी धीमी चलाने की हिदायत दी

ग्यारहवीं खबर: पानीपत से झांसी पहुंचे दामोदर कहते हैं- मैं गांव आया तो जरूर, पर पत्नी की लाश लेकर, आना इसलिए आसान था, क्योंकि मेरे साथ लाश थी

बारहवीं खबर : गांव में लोग हमसे डर रहे हैं, कोई हमारे पास नहीं आ रहा, जबकि हमारा टेस्ट हो चुका है और हमें कोरोना नहीं है, फिर भी गांववालों ने हउआ बनाया

तेरहवीं खबर: वे जंग लगी लूम की मशीनें देखते हैं, कूड़े में कुछ उलझे धागों के गुच्छे हैं; कहते हैं, कभी हम सेठ थे, फिर मजदूर हुए, अब गांव लौटकर जाने क्या होंगे

चौदहवीं खबर: बनारस में कोरोना का हॉटस्पाट है गांव रुस्तमपुर, इकलौते पॉजिटिव मरीज के परिवार के लोग उसे क्वारैंटाइन सेंटर में खाना देने आते हैं तो गांववाले गालियां बकते हैं

पंद्रहवीं खबर: बंबई से बनारस LIVE रिपोर्ट्स / काशी के एक गांव में दो लोग नाव पर क्वारैंटाइन हैं, धूप में पीपा पुल के नीचे चले जाते हैं, उसी पर चूल्हा रखकर खाना भी बनाते हैं

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