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लॉकडाउन की मजबूरी:सामान बांधकर, पैदल, घरों को निकलने वाले सिर्फ मजदूर ही नहीं, इंदौर से छत्तीसगढ़ के लिए निकले युवक-युवती भी

भोपाल5 महीने पहलेलेखक: अक्षय बाजपेयी
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  • कोचिंग बंद थी, काम भी नहीं था, पैसे खत्म होने लगे इसलिए पैदल ही घर के लिए चल पड़े
  • इंदौर से भोपाल पहुंचने में लग गए तीन दिन, कहने लगे लॉकडाउन खुलेगा तो फिर लौट आएंगे

भोपाल-होशंगाबाद हाईवे से लाइव रिपोर्ट

समय : शाम 7.30 बजे
जगह : होशंगाबाद रोड

दो युवक-युवती सर्विस रोड के किनारे बैठे थे। लड़के का चेहरा खुला था। लड़की ने दुपट्‌टा मुंह पर बांध रखा था। देखने में दोनों 20-22 साल के लग रहे थे। दोनों के पास तीन-तीन बैग थे।

मैंने पूछा - आप लोग कहां से आ रहे हैं? बोले इंदौर से।

पैदल आ रहे हैं? बोले, हां तीन दिन पहले चले थे वहां से। बीच-बीच में गाड़ी वालों ने थोड़ी-बहुत दूर के लिए लिफ्ट भी दी। फिर पैदल चलते रहे।

आप लोग देखने में स्टूडेंट्स लग रहे हैं। क्या आप बहन-भाई हैं। या दोस्त हैं। ऐसी क्या मजबूरी थी कि इंदौर से पैदल निकलना पड़ा? बोले, हम तीन महीने पहले इंदौर गए थे। वहां ई-कॉमर्स की कोचिंग कर रहे थे। पैसे खत्म हो गए थे। कुछ काम भी नहीं था। इसलिए तीन दिन पहले पैदल ही वहां से निकल गए। जब पूछा आपने घरवालों से खर्चे के लिए पैसे नहीं मंगवाए। इस पर बोले, हम इंदौर में काम भी करते थे और पढ़ाई भी। काम बंद हो गया तो पैसे खत्म हो गए। कोचिंग भी बंद है। इसलिए घर के लिए पैदल निकल गए।

बोले छत्तीसगढ़ जा रहे हैं। बिलासपुर के पास में गांव है, वहीं जा रहे हैं। फिर बोले, हमारा चेहरा मत दिखाइएगा, यदि हमारे गांव तक खबर पहुंच गई तो दिक्कत होगी। क्यों दिक्कत होगी? ये पूछने पर बोले, हमें इस बारे में बात नहीं करना।

आप लोग खाना-पीना कहां खा रहे हो। साथ में लड़की भी है, सुरक्षा का क्या? इस पर युवक ने कहा, हम रास्ते में बंटने वाला खाना खा लेते हैं।

कई जगह पुलिसवाले खाना खिला देते हैं। कहीं लिफ्ट मिलती है तो ले लेते हैं। वरना पैदल चलते रहते हैं। बोला, जगह-जगह पुलिस है इसलिए डर की बात नहीं है।

युवक-युवती ने सामने से फोटो न खींचने की गुजारिश की थी।
युवक-युवती ने सामने से फोटो न खींचने की गुजारिश की थी।

क्या रातभर चलते रहते हो? बोले नहीं। रात में 11-12 बजे तक चलते हैं। फिर जहां पुलिस दिखती है, वहीं कहीं रुक जाते हैं। फिर सुबह चलते हैं। दोपहर में भी कहीं रुक जाते हैं। 

आपने ई-पास क्यों नहीं बनवाया? बोले, हमें इस बारे में कुछ नहीं पता। गाड़ी करने के लिए हमारे पास पैसे भी नहीं थे। इसलिए हमने तो अपना सामान बांधा और निकल गए।

युवती बोली, भोपाल की बॉर्डर से हबीबगंज तक हम एक खाना बांटने वाली गाड़ी से आए थे। वहां उन्होंने उतार दिया फिर पैदल चलते-चलते यहां तक पहुंच गए।

इसके बाद दोनों अपना सामान उठाकर आगे बढ़ गए...

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