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डीबी ओरिजिनल / सोनोग्राफी की मोबाइल वैन का कमाल: उत्तराखंड के 133 गांवों में 216 बेटों का जन्म, बेटी एक भी नहीं



Dainik Bhaskar Investigation on Uttarakhand Illegal Gender Determination Test, Uttarakhand Asha workers
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  • आशा कार्यकर्ताओं के रजिस्टर में 2018 से अभी तक एक साथ नए सिरे से एंट्री हुई 
  • कुछ नवजात बच्चियों के नाम बीच रजिस्टर में बढ़ाए गए
  • जिला प्रशासन ने जांच शुरू की, लेकिन मंत्री ने कहा- आंकड़े पेश करने में जल्दबाजी हुई, इसलिए लिंगानुपात में फर्क दिख रहा

Dainik Bhaskar

Aug 06, 2019, 05:45 PM IST

प्रमोद कुमार त्रिवेदी (उत्तरकाशी). देवभूमि उत्तराखंड का जिला उत्तरकाशी। जिले में 506 गांव हैं। इनमें 50 किलोमीटर के दायरे में फैले 133 गांव ऐसे हैं, जहां सिर्फ बेटे जन्म ले रहे हैं। इससे सरकार भी सकते में आ गई है। वह आंकड़ों की बाजीगरी से इज्जत बचाने की कोशिश कर रही है। भ्रूण परीक्षण की आशंका के मद्देनजर जिस जिला प्रशासन ने खुद इस मामले का खुलासा किया, उसे ही अब अलग-अलग विभागों के आंकड़ों में फर्क नजर आ रहा है। जिले के सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इन गांवों में भ्रूण परीक्षण के लिए सोनोग्राफी मशीन लगी मोबाइल वैन आती है। कोख में बेटी हो, तो महिलाओं का गर्भपात करा दिया जाता है। वहीं, आशा कार्यकर्ता और ग्राम प्रधान इससे साफ इनकार करते हैं। उनका कहना है, ‘‘ये तो ईश्वर की मर्जी है, जो सबको बेटा दे दिया।’’ इस पर नाटककार उत्तम रावत कहते हैं कि जिले के केवल 133 गांवों में पहली बार ईश्वर की इस तरह की एकतरफा मर्जी समझ से बाहर है। ये तो ‘बेटा टूरिज्म’ जैसी बात हो गई कि जिसे बेटा न हो, वो उत्तरकाशी आ जाए।


भास्कर इन्वेस्टिगेशन में सामने आया कि जिन गांवों में केवल बेटों का जन्म हुआ है, उनमें गर्भवती महिलाओं का रजिस्ट्रेशन 3 से 4 माह बाद ही हुआ है। इसी के साथ इन गांवों में ऐसे सभी घरों में भी बेटों ने जन्म लिया है, जिनके यहां पहले से दो-तीन या चार बेटियां थीं और वे बेटा चाहते थे। लिंगानुपात के तथ्य साफ संकेत दे रहे हैं कि बड़ी गड़बड़ी हुई है। 


कलेक्टर आशीष चौहान बताते हैं कि 133 गांवों के अलावा 14 गांव ऐसे भी हैं, जहां बच्चियों के जन्म का अनुपात लड़कों के मुकाबले 25% से कम है। गड़बड़ी की आशंका के चलते कुल 147 गांवों को रेड जोन में शामिल कर जांच में लिया गया है। मेडिकल साइंस के मुताबिक गर्भधारण के 3 से 4 माह में अनाधिकृत तरीके से मालूम किया जा सकता है कि गर्भस्थ शिशु का लिंग क्या है? यही कारण है कि देरी से रजिस्ट्रेशन भी जांच का मुख्य बिंदु है। 


आशा कार्यकर्ताओं की लिस्ट से मामला सामने आया

अमूमन लिंगानुपात के आंकड़ों में सरकारी अस्पताल में बच्चों के जन्म की संख्या आ जाती थी। यही सूची राज्य शासन के पास चली जाती थी। इस बार उत्तरकाशी के कलेक्टर डॉ. आशीष ने सभी 506 गांवों की 664 आशा कार्यकताओं को गांव के हिसाब से सूची तैयार करने को कहा। 18 जुलाई को आशा कार्यकर्ताओं की बैठक के दौरान कलेक्टर ने जब सूची देखी तो 133 गांवों में केवल लड़कों के जन्म को देखकर हैरान रह गए। कन्या भ्रूण हत्या की आशंका के चलते उन्होंने जांच के आदेश दे दिए।

 

 

स्वास्थ्य विभाग के सत्यापन की पोल खुली

‘भास्कर’ जब केवल बेटों के जन्म लेने वाले गांवों में पहुंचा तो स्वास्थ्य विभाग की भौतिक सत्यापन की पोल खुलने लगी। आशा कार्यकताओं के रजिस्टर में बच्चों के जन्म के आंकड़े पल-पल बदल रहे हैं। एएनएम, आशा कार्यकर्ता और प्रशासन के नए-नए आंकड़े सामने आने के बाद महिला बाल विकास मंत्री की आंगनवाड़ी रिपोर्ट अलग ही कहानी बयां कर रही है। इनके रिकॉर्ड का अवलोकन किया तो सामने आया कि आंगनवाड़ी और आशा कार्यकताओं के रजिस्टर में 2018 से अभी तक एक साथ नए सिरे से एंट्री हुई है। कुछ नवजात बच्चियों के नाम बीच रजिस्टर में बढ़ाए गए हैं। 


एक साल की एक दिन में एंट्री

उत्तरकाशी से 10 किलोमीटर की दूरी पर तीन गांव हैं- साड़ग, थलन और मंगलपुर। पड़ताल के लिए ‘भास्कर’ ने सबसे पहले इन्हीं गांवों का रूख किया। इन गांवों में एक साल में 11 लड़के और 2 लड़कियों का जन्म हुआ। इनमें साड़ग में तो इस साल अप्रैल से जून तक केवल 5 लड़कों का जन्म हुआ, बेटी एक भी नहीं। गांव मंगलपुर और थलन का रिकॉर्ड देखा तो वह भी चौंकाने वाला था। आशा कार्यकर्ता अनिता के गर्भवती पंजीयन रजिस्टर में सभी एंट्री एक साथ की गई थीं। रजिस्टर में स्वास्थ्य विभाग की सील भी नहीं थी। आशा कार्यकर्ता ने रजिस्टर की दो लाइन में तीन गर्भवती और बच्चों के जन्म की एंट्री कर रखी थी। बीच में जिस गर्भवती का नाम बढ़ाया था, उसमें बेटी के जन्म की एंट्री थी। जबकि एंट्री गर्भवती पंजीयन दिनांक के अनुसार सूचीबद्ध तरीके से होती है। जब हमने अनिता से पूछा कि एक साथ और बीच में एंट्री कैसे की तो वे उत्तर नहीं दे सकीं। उन्होंने बताया कि ये रजिस्टर बीडीओ साहब जांच के लिए ले गए थे। 


दो से तीन बेटियों वाले परिवार में बेटा हुआ

मंगलपुर गांव की राजेश्वरी की तीन बेटियां और अंजलि की पहले से 2 बेटियां थीं। दोनों को इस बार बेटा हुआ। इन गांवों के बाद हम गंगोत्री रोड की मुख्य सड़क से आधा किलोमीटर दूर पहाड़ी पर बसे सिरोर गांव पहुंचे। प्रशासन ने पहले इस गांव में तीन महीने में 6 लड़के और एक लड़की का जन्म बताया था। बाद में 4 लड़के और 1 लड़की का जन्म बताया, लेकिन जब आशा कार्यकर्ता कृष्णा देवी से बात हुई तो यह आंकड़ा बदलकर 3 बेटे और 1 बेटी हो गया। आशा कार्यकर्ता से रजिस्टर मांगा तो वे बोलीं कि रजिस्टर मिल नहीं रहा है, लेकिन हमारे गांव की जांच हो चुकी है। 


एक साथ एक ही पेन से पंजीयन रजिस्टर भर दिया

केदारनाथ के रास्ते पर ही उत्तरकाशी से 55 किलोमीटर दूर है न्यूगांव। एक किलोमीटर की खड़ी पहाड़ी की चढ़ाई के बाद हम न्यूगांव पहुंचे तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता पीताम्बरी चौहान मिलीं। उनसे पूछा कि आपको पता है कि आपका गांव रेड जोन में है, तो जवाब मिला हां। पीताम्बरी ने रिकॉर्ड देखकर बताया कि इस गांव में एक साल में 11 बेटे और 2 बेटियों का जन्म हुआ है। जब आशा कार्यकर्ता जगदम्बरी देवी से बात हुई तो उन्होंने आंकड़े बताए 7 लड़के और 4 लड़की। जब गर्भवती पंजीयन रजिस्टर देखा तो वह एक साथ एक ही पेन से भरा हुआ दिखा। जब पूछा कि ये रजिस्टर क्या एक साथ भरा है तो उन्होंने बताया कि दो दिन पहले भी जांच हुई थी। आंकड़े बदलने की बात पर वे चुप रहीं। गर्भवती का पंजीयन तीन महीने बाद क्यों हुआ, इस पर कहा कि हां, तीन-चार महीने में ही किया था। 


आशा कार्यकर्ता ने कहा- साहब ने सही आंकड़े भरने को कहा है

अगले दिन हम गंगोत्री मार्ग पर बसे नेताला गांव पहुंचे। आशा कार्यकर्ता के आंकड़ों के मुताबिक इस गांव में तीन बेटे और एक बेटी हुई है। आशा कार्यकर्ता मीना ने बताया कि शायद पहले गलत आंकड़े बता दिए होंगे। अब उत्तरकाशी के साहब ने सही आंकड़े भरने को कहा है। ग्राम प्रधान जगदम्बा प्रसाद बोले कि हमारे प्रदेश को बदनाम किया जा रहा है, यहां भ्रूण परीक्षण जैसी कोई बात नहीं हैं। हम तो बेटियों को मारना पाप समझते हैं।


रेड जोन के गांव : यहां भी दो और तीन बेटियों वालों के यहां बेटा जरूर जन्मा

रेड जोन के गांवों की एक और खासियत रही। गांव में जिन परिवारों में पहले से दो या तीन बेटियां थीं, उनके यहां बेटों ने जरूर जन्म लिया। उत्तरकाशी से 12 किलोमीटर पर बसे गांव लोधाड़ा पहुंचे तो यहां पिछले तीन महीनों में पांच बेटों का ही जन्म हुआ, लेकिन बेटी एक भी नहीं। यहां के लक्ष्मण िसंह को पहले से तीन बेटियां थीं, वहीं जमना िसंह के यहां पहले से दो बेटियां थीं। गांव के मुकेश औैर बेताल के यहां भी पहले से बेटियां थीं, लेकिन इस बार सभी बेटी वालों के यहां बेटों का जन्म हुआ। 


ग्राम प्रधान सुजान सिंह चौहान बताते हैं कि ये तो ईश्वर की कृपा है। इसमें किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। उत्तरकाशी से केदारनाथ की तरफ पहाड़ी वाले रास्ते पर 50 किलोमीटर चलने के बाद आता है मट्‌टी गांव। यहां भी तीन महीने में पांच बेटों का ही जन्म हुआ, बेटी एक भी नहीं। गांव पहंुचने पर आशा कार्यकर्ता कुसुमलता तो नहीं मिलीं, लेकिन उनकी बेटी प्रीति ने बताया कि कुछ िदनों से बहुत जांच हो रही है। यहां भी केदारी बाई की तीन बेटियां थीं, लेकिन इस बार बेटा हुआ।


इलाज के लिए अस्पताल नहीं, जांच कैसे करवाएंगे?

उत्तरकाशी-केदारनाथ रोड पर बसे चौरंगी गांव के लोग रेड जाेन की खबर से खासे नाराज थे। इस गांव में पिछले एक साल में 6 लड़के और 2 लड़कियां जन्मी हैं। गांव में आशा कार्यकर्ता से बात कर ही रहे थे कि अमरपाल, खुशाल सिंह आ गए और हमारी बात सुनने लगे। कुछ देर बाद बोले कि हमारे गांव को बदनाम किया जा रहा है। यहां तो बुखार की दवा नहीं मिलती तो कोई जांच कैसे करवा सकता है? हम पर ईश्वर की कृपा है कि बेटे हो रहे हैं। अगर गड़बड़ की भी तो पहले रोकना था, अब क्यों रोज जांच करने आ रहे हैं।


जहां लड़कियां ज्यादा, वहां के रिकॉर्ड जमा

हम उन गांवों में भी पहुंचे जहां ज्यादा लड़कियों ने जन्म लिया है या उनकी समान संख्या है। जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर पर बसे धौंतरी गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी है। यहां तीन माह में 3 लड़की और 1 लड़के का जन्म हुआ है। धौंतरी गांव की आशा कार्यकर्ता गंगादेवी बताती हैं कि हमारा रिकॉर्ड स्वास्थ्य विभाग ने जमा करवा लिया है। ग्राम धनेटी की आशा कार्यकर्ता अंजना ने बताया कि हमारा गांव जांच में नहीं है, लेकिन रिकॉर्ड लिया गया है। जबकि हमारे यहां एक साल में केवल एक लड़का और एक लड़की हुई है। यही हाल गोरसाड़ा और गोर खेड़ा का है। पोखरियाल, अलेत, मानपुर गांव की आशा कार्यकर्ता का कहना है कि महंगाई के कारण लोग केवल 2 बच्चे चाहते हैं और एक बेटा सभी चाहते हैं। इस बार ईश्वर ने सबकी सुन ली।

 

जिला प्रशासन मान रहा है कि आंकड़े चौंकाने वाले हैं 

उत्तरकाशी के कलेक्टर डॉ. आशीष चौहान बताते हैं कि स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े हमेशा जिलावार आते थे। इस बार हमने गांवों का डेटा मंगवाया। जब हम जीरो लेवल पर काम करते हैं तो कई चीजें सामने आती हैं। कुछ सही होती हैं तो कुछ में जांच के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। मैंने ग्रामीण स्तर पर आशा कार्यकर्ताओं से बच्चों के जन्म का डेटा देखा तो 133 गांव ऐसे थे, जहां केवल बेटों का जन्म हुआ। यह आंकड़ा चौंकाने वाला था, क्योंकि ओवरऑल हमारे जिले का लिंगानुपात बहुत बेहतर है। बेटों से बेटियों की संख्या ज्यादा है। हम इन 133 ही नहीं, 148 गांवों की जांच करवा रहे हैं। हम ऐसे सभी गांवों की जांच भी करवा रहे हैं, जिनमें बेटों के अनुपात में बेटियों की संख्या 25% से कम है। अलग-अलग टीम बनाईं गईं हैं। स्वास्थ्य विभाग से ही आंकड़े मांगे गए हैं। अगर भ्रूण परीक्षण की बात सामने आती है तो कठाेर कार्रवाई की जाएगी।


सामाजिक कार्यकर्ता का आरोप- पहले एजेंट आते हैं, फिर सोनोग्राफी वैन आती है

उत्तरकाशी के सामाजिक कार्यकर्ता सूरज सिंह रावत कहते हैं कि लिंगानुपात की यह रिपोर्ट सही है। कन्या भ्रूण हत्या पाप हाेने के साथ सामाजिक बुराई है। मामला सामने आने के बाद जांच करने वाले चौकन्ने हो गए हैं। वरना हमारे जिले में तो देहरादून, हरिद्वार, चंडीगढ़, पंजाब, हिमाचल से सोनोग्राफी मशीन के साथ मोबाइल वैन आती हैं, जो गांव-गांव तक जाती हैं। वैन आने से पहले उनके एजेंट आते हैं जो पहले से ही गांव में जाकर जांच करवाने वालों को खोजकर रखते हैं। फिर रिपोर्ट बताकर गर्भपात करवाते हैं। देहरादून में तो एक नर्सिंग होम पर 10 से ज्यादा बार छापा पड़ चुका है। जाहिर है कि भ्रूण परीक्षण तो पहले से हो रहा है। अब सरकार को मामले पर पर्दा डालने की जगह सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।


हेल्थ डायरेक्टर भी किसी आशंका को खारिज नहीं कर रहीं

गढ़वाल की हेल्थ डायरेक्टर डॉ. तृप्ति बहुगुणा कहती हैं कि जिले का लिंगानुपात ठीक है, लेकिन 133 गांवों में केवल बेटों के जन्म की जांच की जा रही है। हम किसी भी आशंका को खारिज नहीं कर रहे। जांच रिपोर्ट के बाद ही भ्रूण परीक्षण या अन्य संभावना पर बात की जा सकती है। अभी हमारे सामने ऐसी कोई बात नहीं आई है। जिले में 668 आशा कार्यकर्ता सेंटर हैं। आशा, एएनएम और जिला स्तर पर प्राप्त आंकड़ों में अंतर आ रहा है। उत्तरकाशी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचना मुश्किल होता है। खासकर बारिश में। हम सभी गांवों में बच्चों के जन्म और लिंग का भौतिक सत्यापन करेंगे। डेटा इकट्ठा करने में कुछ माह का समय लगेगा। जांच रिपोर्ट के बाद कार्रवाई की जाएगी।


मंत्री का मानना है कि आंकड़े पेश करने में जल्दबाजी हुई 

उत्तराखंड सरकार में महिला कल्याण और बाल विकास राज्य मंत्री रेखा आर्य बताती हैं कि इस मामले में स्वास्थ्य विभाग तो अपनी जांच कर रहा है। उसकी जो रिपोर्ट आएगी, उससे स्थिति और स्पष्ट होगी। हमारे विभाग के माध्यम से जो जांच होनी थी, वह पूरी हो चुकी है। हमारे आंगनवाड़ी केंद्रों में पंजीकरण के अनुसार, इन गांवों में 216 नहीं, 222 बच्चों का जन्म हुआ है, जिनमें 62 लड़कियां और शेष लड़के हैं। आंकड़े प्रस्तुत करने में जल्दबाजी भी कहा जा सकता है। जैसा बताया जा रहा है कि एक तरफ केवल लड़के ही पैदा हुए हैं और एक तरफ केवल लड़कियां ही पैदा हुई हैं। मैंने उन गांवों की जांच नहीं करवाई, जहां केवल लड़कियों को जन्म हुआ है, क्योंकि लड़कों को कोई नहीं मारता केवल लड़कियों को मारा जाता है। हमें ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली कि किसी ने जांच करवाकर गर्भपात करवाया हो। इन गांवों में लड़कियां कम हैं तो वो कुदरती है। लिंगानुपात के आंकड़े ठीक हैं, बस सुधार की जरूरत है।

 

 

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