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बंबई से बनारस: ग्यारहवीं रिपोर्ट:पानीपत से झांसी पहुंचे दामोदर कहते हैं- मैं गांव आया तो जरूर, पर पत्नी की लाश लेकर, आना इसलिए आसान था, क्योंकि मेरे साथ लाश थी

झांसी5 महीने पहलेलेखक: मनीषा भल्ला और विनोद यादव
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दामोदर के दो बच्चे हैं। दस साल की बेटी नीलम और 14 साल का बेटा दीपक।
  • पैदल घर आ रहे थे कि रास्ते में पता ही नहीं लगा कि कब एक ट्रक वाला पत्नी को अपने साथ घसीटता हुआ ले गया
  • जिनके पास 60 बीघा जमीन है वे भी पैसा कमाने गए थे अब लौट रहे हैं, जो कभी नहीं गए वो कहते हैं, हमय सकुन है। जे लोग पैसा कमाय शहर गए। वोहू अब गांव लौटत हैं

दैनिक भास्कर के जर्नलिस्ट बंबई से बनारस के सफर पर निकले हैं। उन्हीं रास्तों पर जहां से लाखों लोग अपने-अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। नंगे पैर, पैदल, साइकिल, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर। हर हाल में वे घर जाना चाहते हैं, आखिर मुश्किल वक्त में हम घर ही तो जाते हैं। हम उन्हीं रास्तों की जिंदा कहानियां आप तक ला रहे हैं। पढ़ते रहिए..

ग्यारहवीं रिपोर्ट, देवरीसिंहपुरा और रानीपुर गांव से:

झांसी के गांव देवरीसिंहपुरा में दामोदर के घर से रोने की आवाजें आ रही हैं। दामोदर की पत्नी उसे बार-बार गांव चलने के लिए कह रही थी। दामोदर गांव आया तो जरूर लेकिन अपनी पत्नी की लाश लेकर। रास्ते में एक ट्रक की टक्कर में पत्नी की मौत हो गई। दामोदर को भी काफी चोट आई है लेकिन वह बच गया। हम जब पहुंचे तो वह पत्नी को आग देकर घर लौटा ही था।

दामोदर कहते हैं, ‘हम लोग पानीपत में रहते थे, मैं लूम पर काम करता था लेकिन लॉकडाउन के बाद लूम बंद हो गए। मेरी साली को बेटी हुई थी। लॉकडाउन पर हम सब लोग घर आना चाहते थे। मेरी पत्नी और मैं साली की बेटी देखने के लिए गए और सोचा की घर जाने की सलाह भी कर लेंगे।’

पत्नी ने वहां कहा कि 17 मई देख लेते हैं कि मोदी क्या बोलते हैं, नहीं तो फिर पैदल ही चल देंगे गांव, लेकिन यहां नहीं रहेंगे। ऐसा मशविरा करके वे दोनों वहां से पैदल घर आ रहे थे कि रास्ते में पता ही नहीं लगा कि कब एक ट्रक वाला पत्नी को अपने साथ घसीटता हुआ ले गया।

दामोदर चिल्लाया। पत्नी के चीथड़े उड़ गए थे लेकिन सांस बाकी थी। एंबुलेंस आई। पानीपत अस्पताल वालों ने उसे रोहतक रेफर कर दिया लेकिन रास्ते में ही पत्नी की मौत हो गई। एंबुलेंस लेकर दामोदर अपने गांव आ गया।वह कहता है कि मैं गांव आया तो जरूर, लेकिन पत्नी की लाश लेकर। आना इसलिए आसान हो पाया क्योंकि मेरे पास लाश थी। लेकिन अब मैं जा नहीं पाउंगा।

जिनके पास 50-60 बीघा जमीन है वे भी पैसा कमाने गए थे अब गांव लौट रहे हैं
इसी गांव के गुलाबचंद तिवारी के पास करीब 70 बीघा जमीन है। वे बताते हैं कि खेती में उपज कम होने की वजह से किराना की छोटी दुकान चलाते हैं। जिससे रोज 500 रुपये कमाते हैं। जमीन बटाई पर दे दी है। गुलाबचंद 20-25 साल पहले मुंबई के सी.पी. टेंक इलाके में रहते थे। मुंबई और भिवंडी से वे बड़ी कंपनियों के सिलाई के धागे लाकर गांव के बुनकरों को बेचा करते थे।

सब कुछ ठीक चल रहा था। पर जब गांव में बिजली की किल्लत होने लगी तो बुनकरों ने दिल्ली और पानीपत का रुख किया। जिसके बाद उन्होंने भी मुंबई आना-जाना बंद कर दिया। वे कहते हैं, ‘गांव के शहरी लोग कोरोनावायरस की वजह से लौट रहे हैं। गांव लौट कर भी ये लोग क्या करेंगे? यहां जमीन ज्यादा उपजाऊ नहीं है।

झांसी के देवरी सिंहरुरा गांव के गुलाबचंद तिवारी उम्मीद जताते हैं कि हो सकता है कि गांव में फिर से गमछा, पैंट-शर्ट और अन्य चीजों का बनना शुरू हो। क्योंकि गांव से गए बुनकर लौट आए हैं।
झांसी के देवरी सिंहरुरा गांव के गुलाबचंद तिवारी उम्मीद जताते हैं कि हो सकता है कि गांव में फिर से गमछा, पैंट-शर्ट और अन्य चीजों का बनना शुरू हो। क्योंकि गांव से गए बुनकर लौट आए हैं।

गुलाबचंद तिवारी बताते हैं कि हमें न पैसे की चिंता है और न ही हम ज्यादा पैसा चाहिए। हममें सब्र है। मैं सुबह उठता हूं। मेरी छोटा सा बाग है। उसे पानी देता हूं। पूजा-पाठ करता हूं। मेरा छोटा बेटा मुझे मदद करता है। बड़ा बेटा झांसी में हार्डवेयर की दुकान चलाता है। वह भी इन दिनों गांव आया हुआ है। मेरा पूरा परिवार अब साथ है। मुझे इसकी खुशी है।

मैं गांव में ही रहा, जो शहर गए वे भी अब लौट रहे हैं
रानीपुर गांव के घनश्याम प्रजापति कुम्हार हैं। एक छोटे से कमरे में मटकी बनाने में मगन मिले। उनसे पूछा एक मटकी बनाने में कितने दिन लगते हैं तो बिना सिर उठाए ऊंगली से तीन का इशारा किया। फिर जब पूछा कितना कमा लेते हो तो बुंदेली और टूटी-फूटी हिंदी में बोले, तीन दिन में 30 मटकी तैयार कर लेता हूं। एक मटकी कम से कम 100 रुपये में बेचता हूं। घर में दो भैंस रखी है। पांच-पांच लिटर दूध देती है।’

घनश्याम प्रजापति के तीन बेटे हैं। बड़ा बेटा 30 साल, दूसरा बेटा 14 साल का और सबसे छोटा वाला 12 का है। पूरा परिवार गांव में रहता है।
घनश्याम प्रजापति के तीन बेटे हैं। बड़ा बेटा 30 साल, दूसरा बेटा 14 साल का और सबसे छोटा वाला 12 का है। पूरा परिवार गांव में रहता है।

और बातें होने लगीं तो बोले- दिल्ली, मुंबई व कोलकाता बहुत दूर की बात हैं। वे कभी झांसी शहर भी रहने नहीं गए। प्रजापति कहते हैं, हमारा छोटा परिवार है। दिन भर में 100 रुपए गांव में कमा लेता हूं। मैं यहीं खुश हूं। मुंह पर कोई मास्क नहीं था, हमने कोरोना संक्रमण के बारे में पूछा तो बोले, ‘हमय सकुन है। जे लोग पैसा कमाय शहर गए। वोहू अब गांव लौटत हैं। दो रोटी मिल जाए तो उसी में सकून है।’

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