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गुरु नानक देव ने पहला लंगर अपने घर से शुरू किया था, कहते थे- असली खुशी घर में है

2 वर्ष पहले
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  • करतारपुर में गुरु नानक देव ने अपने जीवन का 17 साल से ज्यादा समय बिताया था, यहीं समाधि ली थी
  • गुरु नानक देव पर रिसर्च कर चुकीं डॉ. हरशिंदर कौर ने भास्कर APP से बातचीत में करतारपुर से जुड़ी बातें बताईं

नई दिल्ली. करतारपुर साहिब के लिए बने कॉरिडोर का 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और 9 नवंबर को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान उद्घाटन करेंगे। करतारपुर साहिब में ही गुरु नानक देव ने अपने जीवन के 17 साल से ज्यादा बिताए थे। करतारपुर में ही वे अंतरध्यान हुए थे। यहां उनकी समाधि बनी है। गुरुग्रंथ साहिब का अनुवाद करने वाले प्रोफेसर साहिब सिंह की नातिन डॉ. हरशिंदर कौर से दैनिक भास्कर प्लस APP से बात की और जाना कि ऐसे कौन-से संदेश हैं जो नानकजी ने करतारपुर से दिए थे। उनके मुताबिक, गुरु नानक जी कहते थे कि गुरु बनने का मतलब यह नहीं कि आप गद्दी पर बैठिए, बल्कि आम लोगों से मिलिए। उनके साथ खाना खाइए, उनसे बात कीजिए, तभी सच्ची खुशी मिलती है।

असली खुशी घर में ही होती है
डॉ. कौर बताती हैं कि गुरुजी से पहले जो संत-महात्मा थे, वे शांति के लिए घर से बाहर जाने की बात किया करते थे। लेकिन, गुरुजी ने करतारपुर में यही सीख दी कि सुख-शांति के लिए घर से बाहर जाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि असली खुशी तो घर में ही मिलती है। हम घर में रहकर ही भगवान की प्राप्ति कर सकते हैं।

महिलाओं को बराबरी का मौका मिले
करतारपुर में रहकर गुरु साहिब ने खेती-बाड़ी की। इस काम में उनकी पत्नी भी मदद करती थीं। उस जमाने में लड़कियों-महिलाओं को शादी के बाद पिता के घर दोबारा जाने का हक नहीं था। लेकिन गुरु साहिब ने यही संदेश दिया कि एक महिला को अपने माता-पिता का ख्याल रखने का हक है और वो ऐसा कर सकती है। वो अपने पति और उसके घरवालों का भी ख्याल रख सकती है। गुरुजी ने ही उस समय महिलाओं की स्वतंत्रता की बात कही थी।

गुरुजी के घर पर ही पहला लंगर शुरू हुई
डॉ. कौर बताती हैं कि गुरु साहिब कहते थे कि जितना भी कमाओ, लेकिन भूखे को खाना जरूर खिलाना चाहिए। वे खुद भी अपनी कमाई में से भूखों को खिलाते थे। उन्होंने अपनी पत्नी को कहा था कि घर पर जो भी भूखा आए, उसको बिना खाना खाए मत जाने देना। एक तरह से पहला लंगर उनके घर पर ही शुरू हुआ था, जिसे आने वाले गुरुओं ने भी जारी रखा। वे कहते थे कि चाहे अमीर हो या गरीब। ऊंची जाति का हो या नीची जाति का। अगर वह भूखा है तो उसे खाना जरूर खिलाओ। इसलिए स्वर्ण मंदिर में चार दरवाजे हैं। जो यही संदेश देते हैं कि कोई भी हो, उनके लिए चारों दरवाजे खुले हैं।

सभी इंसानों में भगवान है, कोई अलग नहीं है
डॉ. कौर कहती हैं कि उस समय समाज में जाति-पाति का भेदभाव बहुत था। गुरु साहिब हमेशा जात-पात को छोड़ने की बात कहा करते थे। वे कहते थे कि सभी इंसानों में भगवान बसता है। हम सभी एक हैं। कोई भी अलग नहीं है। और यह बात आज साबित भी हो गई। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि हम सभी लोगों का जीन अफ्रीका से शुरू हो रहा है। हम जहां-जहां पहुंचते रहे, वहां के पर्यावरण और वातावरण के हिसाब से ढल गए।

परमात्मा एक ही है
गुरु साहिब कहते थे कि सभी का एक ही परमात्मा है। आप किसी भी धर्म को मानते हों, लेकिन आपको सभी धर्म का सम्मान करना चाहिए। सबको अपने धर्म को मानने का हक है। धर्म हमें आपस में लड़ना नहीं सिखाता।

अपनी किस्मत खुद बनाइए
डॉ. कौर का कहना है कि उस समय जितने भी संत-महात्मा थे, वे सभी यही कहते थे कि हमें जो भी मिल रहा है, वह हमारी किस्मत का मिल रहा है। लेकिन गुरु साहिब कहते थे कि किस्मत के भरोसे बैठना छोड़िए और अपनी किस्मत खुद बनाइए। आप मेहनत करके अपनी किस्मत खुद बना सकते हो।
 
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