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बंबई से बनारस: पांचवीं रिपोर्ट:हजारों की भीड़ में बैठी प्रवीण को नवां महीना लग चुका है और कभी भी बच्चा हो सकता है, सुबह से पानी तक नहीं पिया है ताकि पेशाब न आए

इंदौर5 महीने पहलेलेखक: मनीषा भल्ला
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प्रवीण का यह दूसरा बच्चा है। वह अपने पति के साथ अलीबाग से निकली थीं। पिछले दो दिन में ट्रक से लिफ्ट लेते-लेते यहां तक पहुंचीं। अब घर कब पहुंच पाएंगी इसका उन्हें अंदाजा नहीं है।
  • आसिया खातून की गोद में छह महीने का बच्चा है, जिसे दूध चाहिए, मां को खाने को नहीं मिल रहा है इसलिए आसिया का दूध नहीं उतर रहा है
  • मीरा अकेले अपने 15 दिन के बच्चे के साथ निकली है, ऑपरेशन से बच्चा हुआ था, टांके दिखाकर कहती हैं कि भीड़ में धक्का लगता है तो भयानक दर्द होता है

दैनिक भास्कर के जर्नलिस्ट बंबई से बनारस के सफर पर निकले हैं। उन्हीं रास्तों पर जहां से लाखों लोग अपने-अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। नंगे पैर, पैदल, साइकिल, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर। हर हाल में वे घर जाना चाहते हैं, आखिर मुश्किल वक्त में हम घर ही तो जाते हैं। हम उन्हीं रास्तों की जिंदा कहानियां आप तक ला रहे हैं। पढ़ते रहिए..

पांचवी खबर, महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश बॉर्डर के बिजासन माता मंदिर से:

महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश बॉर्डर की यह वह जगह है जहां सरकारीं बसें प्रवासियों को छोड़कर लौट रही हैं। चारों ओर भगदड़, शोर और बसों से उठ रही धूल है। दूर से देखो तो यह जगह कोई सब्जी मंडी सी नजर आ रही है। खुले से इस मैदान में एक शामियाने के नीचे टिमटिमाती रौशनी में राजरानी पेपर प्लेट पर सूखे चावल खा रही हैं। मैंने कहा, परेशानी तो बहुत है तो कहने लगी कि मैं आठ महीने पेट से हूं, बहुत दिक्कत हो रही है।

राजरानी को अपने पति दीपक वर्मा के साथ बांदा जाना है। दीपक मुंबई के एक रेस्त्रा में बावर्ची थे। मालिक ने न तो पैसे दिए, न सहारा, उल्टा नौकरी से निकाल दिया। मैं राजरानी से बात कर ही रही थी कि अचानक दीपक राजरानी को जोर से कुहनी मारते हैं। वह फटाक से सिर पर पल्लू रखती है। कहती हैं, ‘परेशानी पूछ रहे थे न यह भी परेशानी है कि बार-बार इस गरमी में सिर पर पल्लू रखना पड़े है। पैदल चलें, बस का इंतजार करें, समस्या से निपटें। यहां जीना मुश्किल हो रहा है लेकिन पल्लू सिर से नहीं खिसकना चाहिए।’

राजरानी को धक्का मुक्की से बहुत तकलीफ हो रही है। बोलती हैं, एक धक्का लगता है तो पेट में दर्द होने लगता है। वे यहां के हालत देख भी डरी हुई हैं। बोलती हैं कि पता नहीं जब बस आएगी तो कैसी भगदड़ मचेगी।
राजरानी को धक्का मुक्की से बहुत तकलीफ हो रही है। बोलती हैं, एक धक्का लगता है तो पेट में दर्द होने लगता है। वे यहां के हालत देख भी डरी हुई हैं। बोलती हैं कि पता नहीं जब बस आएगी तो कैसी भगदड़ मचेगी।

वह कहती हैं, मैं तो मुंबई से आना नहीं चाहती थी। क्योंकि गांव में भी काम नहीं है लेकिन जब पति की नौकरी नहीं रही तो क्या करते, पति के पीछे-पीछे जाना पड़ रहा है। राजरानी के जेठ भी उनके साथ जा रहे हैं।राजरानी बताती हैं, मुझे उठना बैठना भारी पड़ रहा है। खाने का न तो ठिकाना है, न बखत। दीपक बताते हैं, सेठ से हमने बोला था कि दो महीने तक की मदद कर दो लेकिन वह बोला कि मेरे पास पेड़ नहीं लग रहा है। अब बांदा जाकर इसे तो इसके मायके छोड़ देंगे ताकि जचकी ठीक से हो जाएा। इसलिए अब यह मायके रहेगी।

महाराष्ट्र- मध्यप्रदेश बॉर्डर पर यह तस्वीर रात 12 बजे की है। 24 घंटे यहां प्रवासियों का आना-जाना लगा हुआ है। ये लोग इसी तरह रात-दिन समूहों में इधर-उधर बैठे रहते हैं।
महाराष्ट्र- मध्यप्रदेश बॉर्डर पर यह तस्वीर रात 12 बजे की है। 24 घंटे यहां प्रवासियों का आना-जाना लगा हुआ है। ये लोग इसी तरह रात-दिन समूहों में इधर-उधर बैठे रहते हैं।

राजरानी मासूमियत से बोल रही है ‘जब आदमी की नौकरी नहीं है तो ससुराल में मेरा कौन करेगा, वो काम ढूंढे या बच्चा पैदा कराए। जितना कमाया था दो महीने में घर बैठकर खा लिया। अब जो भी जैसा भी काम मिलेगा करना पड़ेगा।’उनकी एक और सबसे बड़ी समस्या है कि वह बांदा जाकर क्वांरटीन में नहीं रहना चाहती। बोलती है ‘अपना नंबर दे दो, बस स्कूल में रहने से बचा लो, मैं एक-एक पल मुश्किल में हूं, वहां न रह पाउंगी।’

प्रवीण के पति नवाज़ुद्दीन का अलीबाग में सैलून था। तीन महीने से बंद पड़ा है। खाने के लाले पड़ने लगे और आगे के लिए रास्ता नजर नहीं आया तो घरवालों के बुलावे पर घर जा रहे हैं। प्रवीण को नवां महीना लग चुका है और कभी भी बच्चा हो सकता है।

प्रवीण को नवां महीना लग चुका है। पिछले दो दिन वे अपने पति के साथ अलग-अलग ट्रकों से होते हुए मध्यप्रदेश-महाराष्ट्र बॉर्डर पर पहुंची है।
प्रवीण को नवां महीना लग चुका है। पिछले दो दिन वे अपने पति के साथ अलग-अलग ट्रकों से होते हुए मध्यप्रदेश-महाराष्ट्र बॉर्डर पर पहुंची है।

मैंने प्रवीण से बात करना चाहा तो छपाक से मेरी कलाई पकड़कर बोलती हैं मेरे साथ चलो, मुझे टायलेट जाना है, कहीं कोई नहीं बता रहा है, चल मेरी बहन पहले मेरे साथ, फिर बाद में बात करेंगे। यहां-वहां पूछ पूछकर भीड़ को हटाते मैं उसका हाथ पकड़कर उसे ले जा रही ही। हम चले जा रहे, चले जा रहे फिर कुछ मिनट चलने के बाद अंधेरे में सुनसान सी पगडंडी पर एक मोबाइल टॉयलेट नजर आया। 

वह गई लेकिन खांसते हुए बाहर आ गई, बोलीं- अंदर इतनी गंदगी है कि पांव धरने की जगह नहीं है। तब तक प्रवीण के पति भी पानी की बोतल लेकर आ जाते हैं। हम और सुनसान रास्ते की ओर से टॉयलेट करवाने ले जाते हैं।

इस जगह पर अंदाजन 4000 लोग होंगे। इतने लोगों के लिए बीच सिर्फ एक मोबइल टॉयलेट है।
इस जगह पर अंदाजन 4000 लोग होंगे। इतने लोगों के लिए बीच सिर्फ एक मोबइल टॉयलेट है।

प्रवीण के पति बताते हैं कि जानवरों की मंडी लग रही है पूरी, हमरे यहां ऐसी ही होती हैं मंडियां। खैर प्रवीण आती हैं, मुंह हाथ धोती हैं। अब बात करती हैं। वह रोने लगती हैं। बताती हैं ‘मैंने सुबह से पानी नहीं तक नहीं पिया है ताकि पेशाब न आए। पेशाब आता है तो आंतों में दर्द होता है। खाना नहीं मिल रहा, पीना नहीं हो रहा है, आराम नहीं मिल रहा है, यह क्या जिंदगी हो गई है।’

प्रवीण के पति ने उसका और अपना 26 मार्च का टिकट करवाया था लेकिन वह कैंसल हो गया। वह बताती हैं कि दो टिकट का 1350 रुपया सरकार की ओर से अभी तक वापिस नहीं मिला है।फोटो-  बस्ती जाने वाली आसिया खातून रोते बच्चे को संभाल नहीं पा रही हैं। वह बताती है कि पति भंगार (स्क्रेप) का काम करते थे। सब काम बंद हो गया। अब घर जा रहे हैं। घर में हालांकि काम नहीं है लेकिन रोटी से भूखे नहीं मरेंगे।

महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश बॉर्डर पर लोग अपने राज्य के बोर्ड के पास जमा हो जाते हैं। किसी को नहीं पता होता है कि आगे जाने की व्यवस्था कैसे होगी।
महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश बॉर्डर पर लोग अपने राज्य के बोर्ड के पास जमा हो जाते हैं। किसी को नहीं पता होता है कि आगे जाने की व्यवस्था कैसे होगी।

आसिया खातून की गोद में छह महीने का बच्चा है, जिसे दूध चाहिए।उनकी ननद बोलती हैं, परेशानी ही परेशानी है। खाने को नहीं मिल रहा है इसलिए आसिया का दूध नहीं उतर रहा है, बच्चा रो रो कर पागल हो रहा है। गरमी लग रही है, भीड़ में घबरा रहा है।मीरा यादव की गोद में कुछ दिन का बच्चा है। वह अकेली ही है। उसे भी बस्ती जाना है।

वह बताती हैं कि हमारे पास इतने पैसे भी नहीं थे कि पति मेरे साथ आ पाते। पति मुंबई में ही रह गए और मैं अकेली 15 दिन के बच्चे को उठाकर धक्के खाती हुई यहां तक पहुंची हूं।

मीरा को सिद्धार्थनगर जाना है। सिजेरियन के जरिए उन्हें बच्चा हुआ है।
मीरा को सिद्धार्थनगर जाना है। सिजेरियन के जरिए उन्हें बच्चा हुआ है।

टांके दिखाते हुए मीरा बताती हैं कि इनमें इतना दर्द है कि जान निकल रही है। किसी का हाथ छू जाता है तो ऐसा लगता है किसी ने काट दिया हो। और सबसे बड़ी दिक्कत है कि बच्चा इतना रोता है, इतना रोता है कि मुझसे बर्दाश्त नहीं होता है। वह बताती हैं, सरकार अपनी जिम्मेदारी समझते हुए बसों से यहां तक तो छोड़ रही है लेकिन वह ऐसे छोड़ रही है कि अब चाहे तुम लोगों के साथ कुछ भी हो। कोरोना न भी हो तो दूसरी बीमारियां हो जाएंगी।

आठवें महीने में तीन दिन से एक छोटे से ट्रक में सिकुड़ कर बैठी हैं दो गर्भवती महिलाएंदेवास टोल नाके के पास एक 16 लोगों का परिवार खड़ा है। मुंबई के वाशी से शनिवार को यह परिवार एक छोटे फूड ट्रक में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के लिए निकला है। मुर्गियों की तरह ठूसकर बैठने से सबसे ज्यादा परेशान हैं दो गर्भवती महिलाएं।

परिवार में पांच महिलाएं है जिनमें दो महिलाएं गर्भवती हैं। अमृता को पांचवा महीना लगा है और ममता को आठवां।
परिवार में पांच महिलाएं है जिनमें दो महिलाएं गर्भवती हैं। अमृता को पांचवा महीना लगा है और ममता को आठवां।

ममता का कहना है कि तीन दिन से बैठी हुई हूं और अभी तीन दिन और बैठकर जाना है। गरमी में हालत खराब हो रही है। पास में दवाएं नहीं हैं। तबियत बहुत खराब हो रही है क्योंकि मुझे बार बार उल्टी हो रही है। ममता की वजह से बार-बार गाड़ी रोकनी भी पड़ रही है।वह बताती हैं, सिकुड़ कर बैठा नहीं जा रहा है, लेकिन जगह कम है तो लोग चौकड़ी मारकर बैठने को मना कर रहे हैं। पीना का पानी इन लोगों के पास नहीं है। खाने की जहां तक बात है तो साथ में सिर्फ एक टाइम का खाना साथ लिया था बाकी खाने के लिए रास्ते के भरोसे हैं। कहीं मिल जाता है तो कहीं नहीं।

ममता कहती हैं, मुंबई में समझ नहीं आ रहा था कि डिलेवरी कैसे होगी, कहां होगी। सरकारी अस्पताल ने तो मरीज लेना बंद कर दिया है। अमृता के मुताबिक, सरकारी अस्पताल वालों ने तो दवा देना भी बंद कर दिया था। बोलते थे कि सिर्फ कोरोना के लोग आएंगे अब। सोनेग्राफी भी नहीं हो रही है, दवा नहीं मिल रही है तो मुंबई में रहकर क्या करेंगे।

अमृता बताती हैं कि परेशानी तो हर चीज की है। ट्रक में इस हालत में चढ़ना उतरना और ज्यादा दिक्कत वाला है। अमृता के पति उनके साथ नहीं आए हैं। उन्होंने अपने रिश्तेदारों के साथ इन्हें अकेला भेज दिया है वह बाईक से आजमगढ़ आएंगे।

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पहली खबर: 40° तापमान में कतार में खड़ा रहना मुश्किल हुआ तो बैग को लाइन में लगाया, सुबह चार बजे से बस के लिए लाइन में लगे 1500 मजदूर

दूसरी खबर: 2800 किमी दूर असम के लिए साइकिल पर निकले, हर दिन 90 किमी नापते हैं, महीनेभर में पहुंचेंगे

तीसरी खबर: मुंबई से 200 किमी दूर आकर ड्राइवर ने कहा और पैसे दो, मना किया तो गाड़ी किनारे खड़ी कर सो गया, दोपहर से इंतजार कर रहे हैं

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