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बंबई से बनारस: छठी रिपोर्ट:कुछ किमी कम चलना पड़े इसलिए रफीक सुबह नमाज के बाद हाईवे पर आकर खड़े हो जाते हैं और पैदल चलने वालों को आसान रास्ता दिखाते हैं

देवास7 महीने पहलेलेखक: विनोद यादव
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देवास के रहने वाले रफीक सुबह की नमाज पढ़ने के बाद कड़ी धूप में घंटों खड़े होकर यूपी-बिहार के लोगों को रास्ता दिखाते हैं।
  • अपनी मां मीना के साथ आजमगढ़ जा रहा है गोलू, वह बोल नहीं सकता, सुन भी नहीं पाता, मां को चिंता है कि गांव जाकर उसके लिए स्पेशल बच्चों का स्कूल नहीं मिलेगा
  • देवास हाईवे पर अनिल अपने खेत से लाकर ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मियों को ककड़ी बांटा करते हैं, कहते हैं वो इतनी धूप में खड़े रहकर लोगों के लिए बड़ा नेक काम कर रहे हैं

दैनिक भास्कर के जर्नलिस्ट बंबई से बनारस के सफर पर निकले हैं। उन्हीं रास्तों पर जहां से लाखों लोग अपने-अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। नंगे पैर, पैदल, साइकिल, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर। हर हाल में वे घर जाना चाहते हैं, आखिर मुश्किल वक्त में हम घर ही तो जाते हैं। हम उन्हीं रास्तों की जिंदा कहानियां आप तक ला रहे हैं। पढ़ते रहिए..

छठी खबर, इंदौर-देवास हाईवे से:

हमें देवास बायपास का टोल प्लाजा पार करते ही कड़ी धूप में अकेला खड़ा एक शख्स दिखा। वह दूर से ही हाथों से कुछ इशारा कर रहा था। पास जाकर समझ आया कि वह उस ओर जाने का इशारा कर रहा है, जिस ओर सही रास्ता है।

हमने करीब जाकर उससे पूछा तो उसने अपना नाम रफीक बताया। रफीक बोले, मैं सुबह 5 बजे की नमाज पढ़ने के बाद यहां इस कॉर्नर पर आकर खड़ा हो जाता हूं। और यूपी-बिहार जाने वालों को रास्ता बताने का काम करता हूं। मैंने कई बार देखा है कि लोग रास्ता सीधा व खुला पाकर 50-100 किमी आगे निकल जाते हैं और बाद में लौटना पड़ता है। उन्हें थोड़ा कम पैदल चलना पड़े इसलिए मैं यहां खड़ा रहता हूं।

देवास के रहने वाले रफीक सुबह देवास बायपास के आगे वाले फ्लायओवर ब्रिज पर सुबह जल्दी आकर करीब 11 बजे तक और फिर शाम 4 बजे दोबारा आकर लोगों को रास्ता दिखाते हैं। वे बताते हैं कि कड़ी धूप में खड़े रहने की वजह से प्यास लग जाती है इसलिए मोटरसाइकिल के हैंडल पर एक थैली में पानी की बोतल भरकर रखते हैं।

रफीक से हम बात कर ही रहे थे कि हमें रॉन्ग साइड बाइक पर आते हुए अनिल जाधव दिखे। अनिल जाधव का उसी इलाके से कुछ दूरी पर खेत है। अनिल ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को ककड़ी बांटा करते हैं। बोलने लगे, मैं इन्हें (रफीक) पिछले 4-5 दिनों से यहां खड़े होकर लोगों को रास्ता दिखाते हुए देख रहा हूं। आज मैं इन्हें ककड़ी देने आया हूं क्योंकि ये बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।

मजदूरों को जो भी वाहन मिल रहा है, वे उस पर सवार होकर निकल पड़े हैं। तस्वीर इंदौर-देवास बायपास की है
मजदूरों को जो भी वाहन मिल रहा है, वे उस पर सवार होकर निकल पड़े हैं। तस्वीर इंदौर-देवास बायपास की है

बातों-बातों में रफीक ने बताया कि यह रमजान का महीना चल रहा है। इसलिए उन्हें लगता है कि कोरोनावायरस की वजह से शहर छोड़कर गांवों की ओर जाने वालों की किसी प्रकार से सेवा की जाए। और मैंने सही रास्ते पर जाने की दिशा बताना शुरू कर दिया।

मेरे गोलू का क्या होगा, वो बोल नहीं सकता, आजमगढ़ में उसे पढ़ा सकूं ऐसा स्कूल भी नहीं है

देवास बायपास टोल नाके से गुजर रहे थे कि नजर वहां खड़ी महाराष्ट्र नंबर की टेंपो एमएच-01-सीआर-8408 पर पड़ी। यहां मेरी मुलाकात नवी मुंबई के नेरुल में रहने वाले दो परिवार से हुई। यहीं हमें 16 साल का गोलू चौहान मिला। वह न तो सुन सकता है और न ही बोल सकता है। गोलू अपनी मां के साथ आजमगढ़ जा रहा है।

मीना चौहान के पति कारपेंटर का काम करते हैं। वे इस वक्त दुबई में हैं। लिहाजा मीना पर अपने दो बेटे सूरज और गोलू को संभालने की जिम्मेदारी है।
मीना चौहान के पति कारपेंटर का काम करते हैं। वे इस वक्त दुबई में हैं। लिहाजा मीना पर अपने दो बेटे सूरज और गोलू को संभालने की जिम्मेदारी है।

आजमगढ़ टेंपों से निकली मीना चौहान बताती हैं कि गोलू जब 6 साल का था, तब खेलते समय वह गिर गया और उसके कान की नस दब गई। हमने मुंबई, वाराणसी, आजमगढ़ व दिल्ली सहित कई शहरों में इसे इलाज के लिए दिखाया। मगर कुछ फायदा नहीं हुआ।

नवी मुंबई के घणसोली में कान से सुन पाने में असमर्थ बच्चों का स्कूल है। वहीं गोलू तीसरी क्लास में पढ़ता है। मीना बताती हैं, अब मुझे इस बात कि चिंता है कि मेरे गोलू का क्या होगा? आजमगढ़ में ऐसा कोई स्कूल भी नहीं है। जहां इसके जैसे अर्द्ध दिव्यांग को पढ़ाया जा सके।

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