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बंबई से बनारस: नौवीं रिपोर्ट:बस हम मां को यह बताने जा रहे हैं कि हमें कोरोना नहीं हुआ है, मां को शक्ल दिखाकर, फिर वापस लौट आएंगे

झांसी5 महीने पहलेलेखक: विनोद यादव और मनीषा भल्ला
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यह चारों भाई मुंबई में अच्छी नौकरी करते हैं। इनकी मां को लगता है कि मेरे बेटे अगर मुंबई में रहेंगे तो जिंदा नहीं बचेंगे, इसलिए ये लोग मां को सिर्फ ये बताने जा रहे हैं कि हमें कोरोना नहीं हुआ है। हम एकदम ठीक हैं।
  • टीवी पर मुंबई के हालात देखकर परिवार वालों को लग रहा है कि मुंबई में जो भी रह रहा है वह मर जाएगा या उसे कोरोना हो जाएगा
  • बुंदेलखंड में बारिश भरोसे होती है खेती, कम जमीन है इसलिए नौकरी को बाहर जाना पड़ा, अब लौट रहे हैं

दैनिक भास्कर के जर्नलिस्ट बंबई से बनारस के सफर पर निकले हैं। उन्हीं रास्तों पर जहां से लाखों लोग अपने-अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। नंगे पैर, पैदल, साइकिल, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर। हर हाल में वे घर जाना चाहते हैं, आखिर मुश्किल वक्त में हम घर ही तो जाते हैं। हम उन्हीं रास्तों की जिंदा कहानियां आप तक ला रहे हैं। पढ़ते रहिए..

नौवीं स्टोरी, झांसी से बनारस के रास्ते पर:

मुंबई से ऑटो में जौनपुर के चार भाई जा रहे हैं। इनमें से घर का सबसे बड़ा बेटा मुकुंद अपने दोस्त के साथ बाईक पर था और बाकी तीन भाई ऑटो से। बाईक और ऑटो साथ-साथ चल रहे थे कि नासिक हाईवे पर कसारा के पास मुकुंद का एक्सीडेंट हो गया। बाइक चला रहे उनके दोस्त को गंभीर चोट आई और उसे मुंबई वापिस भेजना पड़ा। मुकुंद अपने भाईयों के साथ ऑटो में बैठ गए।

मुकुंद बताते हैं कि शनिवार को वे लोग मुंबई से निकले, सुबह चार बजे उनके दोस्त को नींद की झपकी लगी और बाइक पटरी पर चढ़कर पलट गई। मुकुंद कहते हैं, मुंबई में हम कई दिन से सोए ही नहीं थे। थकान के मारे झपकी लग गई। मुकुंद को एक्सीडेंट में कुछ खरोंचे आईं। लेकिन उनकी मां का घर लौटने के लिए इतना दबाव है कि उन्हें अपने दोस्त को रास्ते में ही छोड़ना पड़ा।

सभी भाईयों का कहना है कि बस एक दफा मां को चेहरा दिखा दें और बता दें कि वह बिल्कुल ठीक ठाक हैं। मां देखकर खुश हो जाए तो मुंबई वापिस लौट आएंगे।
सभी भाईयों का कहना है कि बस एक दफा मां को चेहरा दिखा दें और बता दें कि वह बिल्कुल ठीक ठाक हैं। मां देखकर खुश हो जाए तो मुंबई वापिस लौट आएंगे।

मुकुंद को अफसोस है कि वह अपने दोस्त को छोड़कर आ गया। वह कहता है कि वहां उसके पास कोई है भी नहीं लेकिन मजबूरी है कि मैं मुंबई वापस नहीं जा सकता। भाईयों के साथ आना ज्यादा जरूरी है। सबसे छोटे भाई रजनीश दुबे का कहना है कि वह मुंबई में बीएससी आईटी कर रहे हैं। वह जौनपुर से जल्द ही मुंबई लौटेंगे।

इनके तीसरे भाई गोविंद एक बैंक में गार्ड की नौकरी करते हैं। गोविंद की नौकरी भी सलामत है लेकिन वह भी घरवालों के दबाव में जा रहे हैं। चौथे भाई गिरीश एक मॉल में काम करते हैं सिर्फ उनका काम छूटा है।

रास्ते में कई और ऑटो वाले भी मिले, जो मुंबई से उत्तर प्रदेश के अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं।
रास्ते में कई और ऑटो वाले भी मिले, जो मुंबई से उत्तर प्रदेश के अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं।

इन भाईयों का कहना है कि हम लोगों को मुंबई में भी बहुत दिक्कत नहीं थी लेकिन टीवी पर मुंबई के हालात देखकर परिवार वालों को लग रहा है कि मुंबई में जो भी रह रहा है वह मर जाएगा या उसे कोरोना हो जाएगा। मुकुंद कहते हैं कि हमने अपनी मां को नहीं बताया है कि हम लोग ऑटो से आ रहे हैं या रास्ते में हमारा एक्सीडेंट हो जाएगा। परिवार वालों को यही पता है कि हम लोग बहुत अच्छे से मजे में आ रहे हैं।

बुंदेलखंड में बारिश भरोसे होती है खेती, कम जमीन है इसलिए नौकरी के लिए बाहर जाना पड़ा
20 साल का राहुल हैदराबाद से अपने घर महोबा के लिए निकला है। वह अपने 8 दोस्तों के साथ शनिवार की रात डेढ़ बजे निकला था और मंगलवार को झांसी पहुंचा। अब उसे झांसी से 147 किलोमीटर महोबा जाने के लिए कोई साधन नहीं मिल रहा है तो ये 8 लड़के पैदल ही जा रहे हैं।

8 लोगों की यह टोली हैदराबाद से कभी पैदल तो कभी ट्रकों के सहारे आगे बढ़ रही है। इन्हें यूपी के महोबा जाना है। बुंदेलखंड की भयानक गर्मी के बीच इनके पास न तो पैसे हैं, न खाने के लिए कुछ बचा है, रास्ते में पानी भी बमुश्किल मिल रहा है।
8 लोगों की यह टोली हैदराबाद से कभी पैदल तो कभी ट्रकों के सहारे आगे बढ़ रही है। इन्हें यूपी के महोबा जाना है। बुंदेलखंड की भयानक गर्मी के बीच इनके पास न तो पैसे हैं, न खाने के लिए कुछ बचा है, रास्ते में पानी भी बमुश्किल मिल रहा है।

हैदराबाद में यह लोग एक सिक्योरिटी एजेंसी में नौकरी किया करते थे। सभी की एक जैसी 14 हजार तनख्वाह थी। राहुल का कहना है कि उसके पास 2 एकड़ जमीन है। फिलहाल उसपर पिता जी खेती कर रहे थे लेकिन अब वो भी पिता के साथ ही काम करेगा। यह जमीन भी बटाई पर ली गई है जिसके कुछ पैसे राहुल के वेतन से चुकाए जाते थे और कुछ उसके वेतन से।

वह कहता है, जमीनें इतनी कम हैं, खेत में मटर, चना, सरसों उगाई जाती है, ये सभी खेती बारिश भरोसे हैं इसलिए नौकरी के लिए हैदराबाद गए थे।

इसी ग्रुप में संदीप हैं जिनके पास 3 एकड़ जमीन है। उनका कहना है कि खेती करने में बुराई नहीं है लेकिन खेती के लिए भी बुंदेलखंड में सुविधा नहीं है। अगर बारिश नहीं हुई तो वो साल बेकार हो जाता है। विनोद का कहना है कि हैदराबाद लौटकर तो नहीं जाना है लेकिन यहां भी कुछ नहीं है।

ऐसे लोग भी जिन्हें नेपाल लौटना है
झांसी के कई होटल व मझोले रेस्टोरेन्ट में काम करने वाले नेपाल के लोगों ने लॉकडाउन खत्म होता न देख अब अपने गांव का रूख करना शुरू किया है। नक्शा बॉर्डर से गोरखपुर जा रही एक बस में हमारी मुलाकात एम कुमार भटराज से हुई। वे झांसी के सम्राट होटल में काम करते थे। उनके साथ नेपाल के तीन और लोग वहीं काम करते थे। उन्होंने कहा, हमें नहीं पता कि झांसी से कितने घंटे में बस गोरखपुर पहुंचेगी, लेकिन भरोसा है कि गोरखपुर पहुंच गए तो नेपाल पहुंचने का भी कोई न कोई इंतजाम हो ही जाएगा।

भटराज ने बताया कि लॉकडाउन की वजह से झांसी सहित शहर के सभी होटल बंद हैं। खाने को राशन नहीं और खर्च को पैसा भी नबा बचा तो सोचा गांव चले जाऊं।
भटराज ने बताया कि लॉकडाउन की वजह से झांसी सहित शहर के सभी होटल बंद हैं। खाने को राशन नहीं और खर्च को पैसा भी नबा बचा तो सोचा गांव चले जाऊं।

बंबई से बनारस तक मजदूरों के साथ भास्कर रिपोर्टरों के इस 1500 किमी के सफर की बाकी खबरें यहां पढ़ें:

बंबई से बनारस Live तस्वीरें / नंगे पैर, पैदल, साइकिल से, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर अपने घर को चल पड़े लोगों की कहानियां कहतीं चुनिंदा तस्वीरें

पहली खबर: 40° तापमान में कतार में खड़ा रहना मुश्किल हुआ तो बैग को लाइन में लगाया, सुबह चार बजे से बस के लिए लाइन में लगे 1500 मजदूर

दूसरी खबर: 2800 किमी दूर असम के लिए साइकिल पर निकले, हर दिन 90 किमी नापते हैं, महीनेभर में पहुंचेंगे

तीसरी खबर: मुंबई से 200 किमी दूर आकर ड्राइवर ने कहा और पैसे दो, मना किया तो गाड़ी किनारे खड़ी कर सो गया, दोपहर से इंतजार कर रहे हैं

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पांचवीं खबर: हजारों की भीड़ में बैठी प्रवीण को नवां महीना लग चुका है और कभी भी बच्चा हो सकता है, सुबह से पानी तक नहीं पिया है ताकि पेशाब न आए

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