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  • People are afraid of us in the village, no one is coming to us, even though we have been tested and we do not have corona, the villagers have made a hua

बंबई से बनारस: बारहवीं रिपोर्ट / गांव में लोग हमसे डर रहे हैं, कोई हमारे पास नहीं आ रहा, जबकि हमारा टेस्ट हो चुका है और हमें कोरोना नहीं है, फिर भी गांववालों ने हउआ बनाया

देवरियासिंह पुरा गांव के इस घर में क्वारैंटाइन का स्टिकर लगा है। इस घर के 14 लोग 14 मई को हरियाणा के खरबोदा से पैदल ही दिल्ली के लिए निकले थे। राहुल गांधी की मदद से यह लोग घर पहुंच सके। देवरियासिंह पुरा गांव के इस घर में क्वारैंटाइन का स्टिकर लगा है। इस घर के 14 लोग 14 मई को हरियाणा के खरबोदा से पैदल ही दिल्ली के लिए निकले थे। राहुल गांधी की मदद से यह लोग घर पहुंच सके।
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देवरियासिंह पुरा गांव के इस घर में क्वारैंटाइन का स्टिकर लगा है। इस घर के 14 लोग 14 मई को हरियाणा के खरबोदा से पैदल ही दिल्ली के लिए निकले थे। राहुल गांधी की मदद से यह लोग घर पहुंच सके।देवरियासिंह पुरा गांव के इस घर में क्वारैंटाइन का स्टिकर लगा है। इस घर के 14 लोग 14 मई को हरियाणा के खरबोदा से पैदल ही दिल्ली के लिए निकले थे। राहुल गांधी की मदद से यह लोग घर पहुंच सके।

  • गांव में 40 लोग बाहर से लौटे हैं, लेकिन सिर्फ उस घर के आगे क्वारैंटाइन का स्टीकर है, जिसे राहुल गांधी ने गाड़ी में पहुंचाया
  • राहुल गांधी ने दो-दो लोगों को कुछ गाड़ियों में मथुरा तक पहुंचाया और वहां से बस से ये झांसी के अपने गांव तक आए
  • कहानी महोबा के रहने वाले अजीम की जो गुडगांव में नर्सरी चलाते हैं और दिव्यांग पत्नी को साइकिल पर बैठाकर घर जा रहे हैं

मनीषा भल्ला और विनोद यादव

May 21, 2020, 08:03 PM IST

बनारस. दैनिक भास्कर के जर्नलिस्ट बंबई से बनारस के सफर पर निकले हैं। उन्हीं रास्तों पर जहां से लाखों लोग अपने-अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। नंगे पैर, पैदल, साइकिल, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर। हर हाल में वे घर जाना चाहते हैं, आखिर मुश्किल वक्त में हम घर ही तो जाते हैं। हम उन्हीं रास्तों की जिंदा कहानियां आप तक ला रहे हैं। पढ़ते रहिए..

बारहवीं स्टोरी, देवरियासिंह पुरा गांव से:

लोग महानगरों से पलायन कर रहे हैं लेकिन गांव आने पर कर क्या रहे हैं या करेंगे क्या? यह देखने के लिए हम झांसी से बनारस बीच कुछ गांवों में गए। देवरियासिंहपुरा गांव में हमारी मुलाकात उस परिवार से हुई जिसे राहुल गांधी ने दिल्ली से झांसी भेजा है। पूरे गांव में सिर्फ इनके ही दरवाजे पर क्वारैंटाइन का स्टीकर लगा है जबकि इस गांव में 40 लोग दिल्ली-बंबई जैसे शहरों से लौटे हैं।

जब ये लोग दिल्ली निजामुद्दीन स्टेशन पर पहुंचे तो वहां इन्हें कुछ कैमरे लिए लोग मिले जिन्होंने कहा कि राहुल गांधी से मिलकर जाओ। परिवार की सदस्य रामसखी बताती हैं, राहुल गांधी इनसे मिले, इनका दुख दर्द पूछा और पूछा कि वह इनके लिए क्या कर सकते हैं। इन्होंने कहा कि किसी तरीके से इन्हें घर भिजवा दें बस। राहुल गांधी ने दो-दो लोगों को कुछ गाड़ियों में मथुरा तक पहुंचाया और वहां से बस से ये झांसी के अपने गांव तक आए।

रामसखी कहतीं हैं, हम सामान भी साथ लेकर नहीं आए, सब वहीं छोड़ दिया।

फिलहाल यह लोग क्वारंटाइन में हैं। इनका कहना है कि गांव में लोग हमसे डर रहे हैं। कोई हमारे पास नहीं आ रहा है। जबकि हम लोगों का टेस्ट हो चुका है और हमें कोरोना नहीं है। लेकिन फिर भी गांव वालों ने हउआ बना लिया है।

गांव के मुखिया नारायण सिंह कहते हैं, राहुल गांधी की वजह से यह परिवार थोड़ा लाइम लाइट में ज्यादा आ गया। इसलिए गांव में केवल इसी परिवार की चर्चा है जबकि आए तो और भी लोग हैं।

रामसखी का परिवार अब गांव लौट कर अपनी आठ बीघा जमीन पर खेती करेगा। रामसखी के देवर विनोद का कहना है कि हरियाणा में ये लोग बेलदारी का काम करते थे। 200 रुपये दिहाड़ी पाते थे। विनोद के मुताबिक, उनके माता-पिता घर में खेती का काम संभाल रहे थे लेकिन चार ज्यादा पैसे के लालच में वह लोग कमाने के लिए परदेस चले गए, लेकिन अब गांव में रहकर खेती ही करेंगे।

राह में मजदूरों के टोलों के अलावा और कुछ नजर नहीं आता।

नर्सरी चलाने वाले शख्स दिव्यांग पत्नी को साइकिल पर बैठाकर घर जा रहे हैं

कहानी महोबा के रहने वाले अजीम की है, उन्हीं की जुबानी में - ‘पत्नी से मैं बेपनाह मोहब्बत करता हूं। कोरोना का संकट है, तो क्या हुआ? उसे गुड़गांव में अकेला छोड़कर मैं गांव नहीं आ सकता था। लॉकडाउन होने पर मेरा नर्सरी का धंधा ठप्प हो गया। इसलिए मैंने अपनी साइकिल के कैरियर पर लकड़ी का एक चौड़ा प्लाय लगाया। ताकि पत्नी उस पर आराम से बैठ सके और घर का जरूरी सामान भी बांधा जा सके।

अजीम गुड़गांव से महोबा के लिए साइकिल पर ही चल पड़े। साथ में पत्नी भी हैं। 

गुड़गांव से मैं साइकिल चला कर पलवल तक आया। यहां मुझे कुछ पुलिस वाले मिल गए। उन्होंने एक ट्रक रोककर मेरी साइकिल उस पर चढ़ा दी। इस ट्रक ने मुझे मथुरा से थोड़ा पहले ही उतार दिया। उसके बाद मैने फिर 15-20 किमी तक साइकिल चलाई। रास्ते में एक ट्रैक्टर वाले को दया आई। उसने मुझे, मेरी पत्नी और साइकिल को झांसी से पहले डबरा तक पहुंचाया। किसी तरह मैं झांसी पहुंचा तो पुलिस ने मुझे साइकिल नहीं चलाने दी। उन्होंने एक बस से मुझे उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश के इस छतरपुर बॉर्डर तक पहुंचवाया है।

सामान रखने के लिए अजीम ने साइकिल के पीछे एक लंबा सा प्लाय का टुकड़ा लगा रखा है।

मैं और मेरी पत्नी दोनों ही बहुत थक गए हैं। हमें महोबा जाना है। यहां से बस मिलने का इंतजार कर रहा हूं। नहीं तो धूप कम होने पर साइकिल से गांव की ओर निकलूंगा। जब गुड़गांव से छतरपुर पहुंच गया हूं, तो महोबा गांव भी आज नहीं तो कल पहुंच ही जाऊंगा।

मुझे नर्सरी के अलावा मजदूरी का भी काम आता है। इसलिए गांव में अगर मुझे मनरेगा में भी काम मिल जाएगा तो मेरी रोजी-रोटी चल जाएगी। क्योंकि परिवार में मैं और पत्नी दो ही लोग हैं। और थोड़ी खेती भी है।’

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