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बंबई से बनारस: चौदहवीं रिपोर्ट:बनारस में कोरोना का हॉटस्पाट है गांव रुस्तमपुर, इकलौते पॉजिटिव मरीज के परिवार के लोग उसे क्वारैंटाइन सेंटर में खाना देने आते हैं तो गांववाले गालियां बकते हैं

वाराणसी4 महीने पहलेलेखक: विनोद यादव और मनीषा भल्ला
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रुस्तमपुर गांव के प्रधान बताते हैं, गांव में अब तक लगभग 40-45 लोग मुंबई और बाकी शहरों से आये हैं। जिसमें से गांव के सरकारी स्कूल में 4 लोगों को क्वारैंटाइन किया गया है। बाकी लोग डीएम के आदेश पर होम क्वारैंटाइन है।
  • गांव में 45 लोग मुंबई और बाकी शहरों से आए हैं, 4 को गांव के सरकारी स्कूल में और बाकी होम क्वारैंटीन हैं, गांव के दिनेश ने खेत में मचान बनाकर वहीं डेरा डाला
  • बनारस में अभी तक 4640 लोग ट्रेन से आए हैं, इसके अलावा बिना सूचना के ट्रक, टेंपों, जीप और ऑटो से भी बड़ी संख्या में लोग मुंबई, दिल्ली और गुजरात से पहुंचे हैं

दैनिक भास्कर के जर्नलिस्ट बंबई से बनारस के सफर पर निकले हैं। उन्हीं रास्तों पर जहां से लाखों लोग अपने-अपने गांवों की ओर चल पड़े हैं। नंगे पैर, पैदल, साइकिल, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर। हर हाल में वे घर जाना चाहते हैं, आखिर मुश्किल वक्त में हम घर ही तो जाते हैं। हम उन्हीं रास्तों की जिंदा कहानियां आप तक ला रहे हैं। पढ़ते रहिए...

14वीं रिपोर्ट, वाराणसी के कोरोना हॉट स्पॉट गांव रुस्तमपुर से:

बनारस से लगभग आठ किलोमीटर दूर वाराणसी सदर तहसील का रुस्तमपुर गांव कोरोना का हॉटस्पॉट बन गया है। इस गांव के प्रधान राममूरत यादव बताते हैं कि उनके गांव में मुंबई से आए राजेश गुप्ता की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आई है। उसके परिवार के लोगों के साथ गांव वाले बहुत ही बुरा बर्ताव कर रहे हैं। जब उसे घरवाले दूर से खाना देने आते हैं, तो लोग उन्हें गालियां बकते हैं।

कोरोना पॉजिटिव मरीज मिलने के बाद गांव में जगह-जगह तारों से बाउंड्री लगाकर नाकेबंदी की गई है।
कोरोना पॉजिटिव मरीज मिलने के बाद गांव में जगह-जगह तारों से बाउंड्री लगाकर नाकेबंदी की गई है।

सरकारी स्कूल में क्वारैंटाइन हुए नत्थू यादव विरार में वड़ापाव बेचा करते थे। रोजाना करीब 4-5 हजार रुपए का धंधा होता था और लगभग हजार रुपए खर्च निकालकर बाकी बचा लेते थे। उनकी दुकान चलाने में मदद करने वाले दो लड़के सूरज और हेरू यादव भी स्कूल में ही क्वारैंटाइन हैं। वे विरार से सारनाथ तक एक जीप से आए हैं। उनकी शिकायत है कि गांव के लोग उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार करते हैं। जबकि हम लोग अपनी ओर से पूरी सावधानी बरत रहे हैं।

रुस्तमपुर गांव के इसी स्कूल में बाहर से लौटे 4 लोगों को क्वारैंटाइन किया गया है।
रुस्तमपुर गांव के इसी स्कूल में बाहर से लौटे 4 लोगों को क्वारैंटाइन किया गया है।

नत्थू यादव और उनके साथ आए दोनों लड़कों की टेस्ट रिपोर्ट आना अभी बाकी है। मगर जिस स्कूल में ये लोग क्वारैंटाइन हैं। उसी में बगल के कमरे में राजेश गुप्ता की रिपोर्ट पॉजिटिव आने से ये लोग डरे हुए हैं।

विलेपार्ले में रहने वाला विशाल कुमार प्रजापति भी यहां क्वारैंटाइन है। वह मुंबई में वैल्डिंग का काम करता था और 20 हजार रुपए पगार पाता था। विशाल मुंबई से साढ़े तीन हजार रुपए देकर ट्रक से सारनाथ पहुंचा था। उसकी रिपोर्ट नेगेटिव आई है। उसे क्वारैंटाइन हुए लगभग नौ दिन पूरे हो गए हैं।

खेत में मचान बना क्वारैंटाइन में रह रहा दिनेश

वैसे तो गांव में ज्यादातर लोग अपने अपने घरों में ही क्वारैंटाइन हैं। जिनके घर में जगह नहीं है उनके परिवार उन्हें घर पर नहीं रहने दे रहे हैं। वे लोग खेतों खलिहानों में मचान बनाकर रह रहे हैं। दिनेश यादव भी अपने खेत में मचान बनाकर रह रहे हैं।

दिनेश मुंबई के मलाड में रहते थे जहां आरओ फिटिंग का काम करते थे। वह भी हर हाल में मुंबई वापस जाएंगे। उनका कहना है गांव में ज्यादा से ज्यादा एक महीने तक खा लेंगे उसके बाद भुखमरी के दिन आएंगे।
दिनेश मुंबई के मलाड में रहते थे जहां आरओ फिटिंग का काम करते थे। वह भी हर हाल में मुंबई वापस जाएंगे। उनका कहना है गांव में ज्यादा से ज्यादा एक महीने तक खा लेंगे उसके बाद भुखमरी के दिन आएंगे।

वह कहते हैं कि उनके परिवार में उनकी पत्नी, बच्चे, भाई और माता-पिता हैं। उन लोगों ने उन्हें घर पर नहीं रहने दिया, इसलिए वह मचान पर रह रहे हैं। उबलती दोपहर में वह अपनी मचान में पपीता खा रहे हैं।

दिनेश बताते हैं कि उन्होंने स्थानीय दीन दयाल उपाध्यय अस्पताल से कोरोना की जांच करवाई रिपोर्ट नॉर्मल आई है बावजूद इसके परिवार का कहना है कि उसे 14 दिन घर से बाहर रहना चाहिए। दिनेश ने भी परिवार वालों की बात मान ली क्योंकि वह नहीं चाहता कि घर में उसकी वजह से किसी और को कोई दिक्कत आए।

गांव के लोग आसपास के गांवों में भी नहीं जा रहे हैं।
गांव के लोग आसपास के गांवों में भी नहीं जा रहे हैं।

वाराणसी में 4640 लोग ट्रेन से आए, बाकी बिना सूचना के ट्रक, टेंपो, जीप और ऑटो से

वाराणसी सदर के  एसडीएम महेंद्र श्रीवास्तव के मुताबिक, बनारस में अभी तक 4640 लोग ट्रेन से आए हैं। इसके अलावा बिना सूचना के ट्रक, टेंपों, जीप और ऑटो रिक्शा से भी बड़ी संख्या में लोग मुंबई, दिल्ली और गुजरात के शहरों से आए हैं। सभी की पहचान कर उनकी मेडिकल जांच कराई जा रही है। रुस्तमपुर गांव में पॉजिटिव केस मिला है, इसलिए इस गांव को हॉटस्पॉट घोषित कर दिया गया है। जिस स्कूल में मजदूर को क्वारैंटाइन रखा गया था। उसे सील कर दिया गया है। इसके अलावा पॉजिटिव मिले व्यक्ति की पत्नी माधुरी गुप्ता व अन्य सदस्य की भी मेडिकल जांच करवाई जानी है।

खेती और पशु के अलावा गांव में आजीविका के अन्य साधन नहीं हैं।
खेती और पशु के अलावा गांव में आजीविका के अन्य साधन नहीं हैं।

बंबई कब खुलेगा मुझे बस यह बताओ...

गांव रूस्तमपुर संतोष मौर्या अपने घर में क्वारैंटाइन हैं। अकेले अलग थलग से कमरे में वह दूर से ही हमसे बात कर रहे हैं। उनकी एक ही चिंता है ‘बंबई कब खुलेगा, खुलेगा या नहीं, गांव में तो 5 रुपये का काम नहीं, वहां मैं रोज 500 कमा लेता था।’ मौर्या 1996 में मुंबई गए थे।

संतोष मौर्या के पास जमीन भी नहीं है। वह बीते छह दिन से घर में हैं। मुंबई में नालासोपारा में टेलरिंग का काम करते थे। अपने साले के साथ चार दिन में ऑटो से मुंबई से रूस्तमपुर पहुंचे।
संतोष मौर्या के पास जमीन भी नहीं है। वह बीते छह दिन से घर में हैं। मुंबई में नालासोपारा में टेलरिंग का काम करते थे। अपने साले के साथ चार दिन में ऑटो से मुंबई से रूस्तमपुर पहुंचे।

संतोष अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने का बहुत शौक था। वह कहते हैं ‘मैं बंबई न गया तो बच्चे न पढ़ा सकूंगा क्योंकि यहां तो मेरे पास पढ़ाने के पैसे तो दूर खाने की भी दिक्कत आ रही है।’

संतोष के अनुसार राशकार्ड पर तीन लोगों का गेंहू-चावल मिलता है लेकिन इसके अलावा भी खाने के लिए चाहिए होता है। मसाले, सब्जी, दूध, बच्चों की फीस, दवा वगैरह। संतोष के पांच बच्चे हैं और सभी गांव के एसएसबी इंटर मीडिएट कॉलेज स्कूल में पढ़ते हैं। पांचों की 250-250 रुपये फीस है।

संतोष की पत्नी बिमला देवी बताती हैं जो होता था इनके पैसों से ही होता था। जितना चलता था यही (संतोष) चलाते थे। अब खाली बैठे हैं।
संतोष की पत्नी बिमला देवी बताती हैं जो होता था इनके पैसों से ही होता था। जितना चलता था यही (संतोष) चलाते थे। अब खाली बैठे हैं।

बिमला के अनुसार यह लोग कर्ज पर पैसे  लेने की सोच रहे थे लेकिन ब्याज नहीं चुका सकते, इसलिए नहीं लिया। बिमला का कहना है कि ब्याज पर पैसे नहीं मिलेंगे क्योंकि लोगों को पता है कि हम लोग न तो मूल भी चुका नहीं पाएंगे।

बिमला बताती हैं ‘गांव में तो पहले से भी कुछ नहीं था, इसीलिए तो बंबई गए थे। जो थी वो इनकी कमाई थी।’ बिमला को भी चिंता है कि शायद अब उसके बच्चे प्राइवेट स्कूल में नहीं पढ़ पाएंगे। वह कहती है कि स्कूल खुल भी जाएंगे तो उनके पास बच्चों की फीस भरने के पैसे नहीं हैं।

बंबई से बनारस तक मजदूरों के साथ भास्कर रिपोर्टरों के इस 1500 किमी के सफर की बाकी खबरें यहां पढ़ें:

बंबई से बनारस Live तस्वीरें / नंगे पैर, पैदल, साइकिल से, ट्रकों पर और गाड़ियों में भरकर अपने घर को चल पड़े लोगों की कहानियां कहतीं चुनिंदा तस्वीरें

पहली खबर: 40° तापमान में कतार में खड़ा रहना मुश्किल हुआ तो बैग को लाइन में लगाया, सुबह चार बजे से बस के लिए लाइन में लगे 1500 मजदूर

दूसरी खबर: 2800 किमी दूर असम के लिए साइकिल पर निकले, हर दिन 90 किमी नापते हैं, महीनेभर में पहुंचेंगे

तीसरी खबर: मुंबई से 200 किमी दूर आकर ड्राइवर ने कहा और पैसे दो, मना किया तो गाड़ी किनारे खड़ी कर सो गया, दोपहर से इंतजार कर रहे हैं

चौथी खबर: यूपी-बिहार के लोगों को बसों में भरकर मप्र बॉर्डर पर डंप कर रही महाराष्ट्र सरकार, यहां पूरी रात एक मंदिर में जमा थे 6000 से ज्यादा मजदूर

पांचवीं खबर: हजारों की भीड़ में बैठी प्रवीण को नवां महीना लग चुका है और कभी भी बच्चा हो सकता है, सुबह से पानी तक नहीं पिया है ताकि पेशाब न आए

छठी खबर: कुछ किमी कम चलना पड़े इसलिए रफीक सुबह नमाज के बाद हाईवे पर आकर खड़े हो जाते हैं और पैदल चलने वालों को आसान रास्ता दिखाते हैं

सातवीं खबर: 60% ऑटो-टैक्सी वाले गांव के लिए निकल गए हैं, हम सब अब छह-आठ महीना तो नहीं लौटेंगे, कभी नहीं लौटते लेकिन लोन जो भरना है

आठवीं खबर: मप्र के बाद नजर नहीं आ रहे पैदल मजदूर; जिस रक्सा बॉर्डर से दाखिल होने से रोका, वहीं से अब रोज 400 बसों में भर कर लोगों को जिलों तक भेज रहे हैं

नौवीं खबर: बस हम मां को यह बताने जा रहे हैं कि हमें कोरोना नहीं हुआ है, मां को शक्ल दिखाकर, फिर वापस लौट आएंगे

दसवीं खबर: रास्ते में खड़ी गाड़ी देखी तो पुलिस वाले आए, पूछा-पंचर तो नहीं हुआ, वरना दुकान खुलवा देते हैं, फिर मास्क लगाने और गाड़ी धीमी चलाने की हिदायत दी

ग्यारहवीं खबर: पानीपत से झांसी पहुंचे दामोदर कहते हैं- मैं गांव आया तो जरूर, पर पत्नी की लाश लेकर, आना इसलिए आसान था, क्योंकि मेरे साथ लाश थी

बारहवीं खबर : गांव में लोग हमसे डर रहे हैं, कोई हमारे पास नहीं आ रहा, जबकि हमारा टेस्ट हो चुका है और हमें कोरोना नहीं है, फिर भी गांववालों ने हउआ बनाया

तेरहवीं खबर: वे जंग लगी लूम की मशीनें देखते हैं, कूड़े में कुछ उलझे धागों के गुच्छे हैं; कहते हैं, कभी हम सेठ थे, फिर मजदूर हुए, अब गांव लौटकर जाने क्या होंगे

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