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डीबी ओरिजिनल / देश के पहले सूचना आयुक्त हबीबुल्लाह बोले- आरटीआई कानून में संशोधन कर सरकार ने दुरुपयोग के रास्ते खोले



RTI  (Amendment) Bill | Wajahat Habibullah On RTI Act (Amendment) Bill 2019; Dainik Bhaskar Exclusive
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RTI  (Amendment) Bill | Wajahat Habibullah On RTI Act (Amendment) Bill 2019; Dainik Bhaskar Exclusive

  • वजाहत हबीबुल्लाह बताते हैं कि अगर सरकार सूचना आयुक्तों का कार्यकाल तय करेगी तो यह संस्था कमजोर होगी और कर्मचारी भी अफसरों के आगे झुकने को मजबूर होंगे

  • संसद के दोनों सदनों में पिछले हफ्ते सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक पारित हो गया

  • संशोधित विधेयक के तहत सरकार सूचना आयुक्तों को कभी भी हटा सकेगी

Dainik Bhaskar

Jul 30, 2019, 01:47 PM IST

प्रियंक द्विवेदी (नई दिल्ली).  सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक पिछले हफ्ते संसद के दोनों से पारित हो गया। अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा। राज्यसभा में विपक्ष ने बिल को सिलेक्ट कमेटी के पास भेजने का प्रस्ताव दिया था। यह प्रस्ताव 75 के मुकाबले 117 वोटों से गिर गया। कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने आरटीआई को कमजोर करने का आरोप लगाया, लेकिन सरकार ने कहा कि इस कानून के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जा रही। आरटीआई कानून में क्या संशोधन हुए हैं और उनका असर क्या होगा, यह जानने के लिए दैनिक भास्कर ऐप ने देश के पहले मुख्य सूचना आयुक्त रहे वजाहत हबीबुल्लाह से बात की। 1968 की बैच के आईएएस अफसर हबीबुल्लाह 2005 से 2010 के बीच मुख्य सूचना आयुक्त थे।

 

आरटीआई कानून में संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी?

हबीबुल्लाह : यह मुझे भी समझ नहीं आ रहा। क्या इस कानून में कोई कठिनाई आ रही थी? या सूचना आयुक्त किसी तरह के अधिकार मांगने की कोशिश कर रहे थे? जब ऐसा कुछ भी नहीं था, तो इसमें संशोधन क्यों किया गया? आरटीआई संवैधानिक और मौलिक अधिकार है। लिहाजा, इसमें संशोधन की जरूरत थी ही नहीं। सुप्रीम कोर्ट भी कई बार कह चुका है कि आरटीआई हर व्यक्ति का संवैधानिक और मौलिक अधिकार है।

 

आरटीआई (संशोधन) बिल का लगातार विरोध हो रहा है, इसके क्या कारण हैं?

हबीबुल्लाह : विरोध का सबसे बड़ा कारण है कि इससे सूचना आयुक्त कमजोर हो जाएंगे। उनकी नियुक्ति से लेकर वेतन-भत्ते तक सब सरकार तय करेगी। पहले सरकार के पास यह अधिकार नहीं था। इससे आयुक्तों की स्वतंत्रता को खतरा हो सकता है।

 

आरटीआई (संशोधन) बिल किस तरह आरटीआई कानून को कमजोर कर रहा है?

हबीबुल्लाह : सूचना आयोग या सूचना आयुक्त जो पहले संवैधानिक पद या संस्था थे, अब वे केंद्र सरकार के अधीन हो जाएंगे। जो आयुक्त पहले जनता की प्रति जवाबदेह थे, वे अब सरकार के प्रति जवाबदेह हो जाएंगे। सरकार भले ही कह रही है कि संशोधन से आरटीआई कानून का दुरुपयोग नहीं होगा, लेकिन सरकार ने इस कानून के दुरुपयोग का रास्ता खोल दिया है। हो सकता है कि मौजूदा सरकार इस कानून का दुरुपयोग न करे, लेकिन भविष्य में अगर दूसरी सरकार आती है तो वह इसका दुरुपयोग नहीं करेगी, यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता।

 

आरटीआई (संशोधन) बिल के पास होने पर क्या फायदे और क्या नुकसान होंगे? 

हबीबुल्लाह : मुझे इस संशोधित कानून का कोई फायदा तो नजर नहीं आता, लेकिन इससे नुकसान जरूर हो सकता है। क्योंकि इससे न सिर्फ सरकारी कर्मचारियों की स्वतंत्रता को खतरा है, बल्कि सूचना से जुड़ा कामकाज देख रहे सरकारी कर्मचारियों के अपने वरिष्ठ अफसरों के सामने झुकने की भी आशंका है। सूचना आयोग एक संवैधानिक संस्था है, लेकिन संशोधन से यह संस्था कमजोर हो सकती है।

 

सरकार के पास अधिकार आने से क्या आयुक्तों को उनके पद से कभी भी हटाया जा सकता है?

हबीबुल्लाह : पहले मुख्य सूचना आयुक्तों और सूचना आयुक्तों को हटाने का अधिकार राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास था। लेकिन अब यह अधिकार भी केंद्र सरकार के पास आ गया है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या सरकार जब चाहे तब आयुक्तों को उनके पद से हटा सकती है? इस बारे में तभी कुछ कहा जा सकता है जब तक सारे नियमों को अंतिम रूप नहीं दे दिया जाता।

 

केंद्र सरकार के पास अधिकार आने से क्या सरकार से जुड़ी जानकारी मांगने में दिक्कत हो सकती है?

हबीबुल्लाह : आरटीआई के जरिए सरकार से जुड़े फैसलों और उनके कामकाज की जानकारी लेने में पहले भी दिक्कत होती थी। आरटीआई लगने पर किसी बात की जानकारी देने पर आखिरी फैसला सूचना आयोग करता था, लेकिन अब उसी आयोग की स्वतंत्रता कमजोर होने का खतरा रहेगा।

 

क्या आरटीआई (संशोधन) बिल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है? 

हबीबुल्लाह : ऐसी बहस चल रही है कि आरटीआई (संशोधन) बिल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, क्योंकि यह अब एक संवैधानिक समस्या बन गई है। सरकार को भी आयोग की शक्ति कम करने से पहले सुप्रीम कोर्ट से विचार-विमर्श करना था। अगर इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिलती है और सुप्रीम कोर्ट सरकार से इस कानून से संशोधन हटाने को कहती है, तो सरकार को इसे अमल करना होगा।

 

आरटीआई कानून में और क्या संशोधन हो सकते हैं? 

हबीबुल्लाह : आरटीआई कानून में अब संवैधानिक शक्ति की आवश्यकता है, क्योंकि इसमें न सिर्फ सरकार, बल्कि जनता और मीडिया भी हिस्सेदार है। अगर इस कानून को और शक्तिशाली बनाना है तो इसमें जनता की भागीदारी होनी चाहिए। इस बिल को सरकार ने जल्दबाजी में पास करा लिया, लेकिन इसे पास करने से पहले जनता से विमर्श जरूर करना चाहिए था। अगर जनता इसमें कोई संशोधन सुझाती, तो वे संशोधन होने चाहिए थे, क्योंकि यह कानून जनता का अधिकार है।

 

आरटीआई (संशोधन) बिल में क्या है?

 

  • आरटीआई कानून की धारा 13, 16 और 27 में संशोधन किया गया है। यह वे धाराएं हैं, जिनमें मुख्य सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति, कार्यकाल, वेतन और भत्ते तय किए जाते हैं। 

  • पहले मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता या सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री का पैनल करता था। संशोधन के बाद अब केंद्र सरकार ही इनकी नियुक्ति करेगी। पहले आयुक्तों का कार्यकाल 5 साल या 65 वर्ष की आयु तक (जो भी पहले हो) होता था, लेकिन अब इनका कार्यकाल भी केंद्र सरकार ही तय करेगी। 

 

आरटीआई कानून

पहले क्या था?

अब क्या होगा?

कार्यकाल

पहले मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त (केंद्र और राज्य स्तर के) का कार्यकाल 5 साल या 65 वर्ष तक आयु तक होता था।

अब इनका कार्यकाल तय नहीं होगा। केंद्र सरकार जब चाहे इन्हें हटा सकती है।

वेतन

मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन मुख्य चुनाव आयुक्त और सूचना आयुक्त का वेतन चुनाव आयुक्त के बराबर होता था। इसी तरह राज्य मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन राज्य के चुनाव आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त का वेतन राज्य के मुख्य सचिव के बराबर होता था।

अब मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त के वेतन, भत्ते और सेवा शर्तों का निर्धारण केंद्र सरकार करेगी।

नियुक्ति

मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बना सदस्यीय पैनल करता था। इसमें प्रधानमंत्री के अलावा कैबिनेट मंत्री और विपक्षी पार्टी का नेता या विपक्ष का नेता शामिल होता था।

 

इसी तरह से राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की नियुक्ति मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में बना पैनल करता था। इसमें मुख्यमंत्री के अलावा एक मंत्री और विपक्षी पार्टी का नेता या विपक्ष का नेता शामिल होता था।

अब मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त (केंद्रीय और राज्य स्तर दोनों) की नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी।

हटाने की प्रक्रिया

मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त को उनके पद से हटाने का अधिकार राष्ट्रपति के पास था। राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त को उनके पद से हटाने का अधिकार राज्यपाल के पास था।

अब सूचना आयुक्तों को हटाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होगा।

 

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