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इंटरव्यू / संविधान से पुराने मंदिर के कानून, पालन करना ही होगा : सबरीमाला मंदिर के संस्थापक सदस्य



पीएन नारायण वर्मा। पीएन नारायण वर्मा।
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पीएन नारायण वर्मा।पीएन नारायण वर्मा।

  • कहा- महिलाओं पर प्रतिबंध कुप्रथा नहीं, छोटी-सी रोक है
  • दावा- महिलाओं कें मंदिर में प्रवेश से भगवान की शक्ति प्रभावित होती है

Dainik Bhaskar

Oct 19, 2018, 11:22 AM IST

स्पेशक डेस्क. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से ही यह मुद्दा लगातार चर्चा में है। सबरीमाला में पंडालम के राजा ही अयप्पा मंदिर के संस्थापक रहे हैं। यह परिवार कोर्ट के फैसले के विरोध में है। जेसी शिबु ने इसके संस्थापक सदस्य पीएन नारायण वर्मा से बात की।

 

सवाल : सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इतना विरोध क्यों?
जवाब : सबरीमाला अयप्पा मंदिर सदियों पुरानी परंपरा का पालन कर रहा है। मंदिर में वार्षिक मंडलम समारोह नवंबर से जनवरी तक होता है। तब परिवार के पुरुष प्रमुख को पूजा का विशेषाधिकार प्राप्त है। ‘प्रतिष्ठा संकल्पम’ के अनुसार महिला (पीरियड के दौरान) के प्रवेश से भगवान की शक्ति प्रभावित होती है। इस मंदिर की सबरीमाला धर्म संस्था नैष्ठिक ब्रह्मचारी है। इसी के निर्देशों पर नियम बनाए गए हैं।


सवाल : संविधान के आधार पर भी तो प्रवेश पर प्रतिबंध ठीक नहीं है?
जवाब : भारत के संविधान को लागू किए जाने से पहले ही ये कानून बन गए थे। अगर सबरीमाला में कोई निंदनीय आस्था है तो इसका फैसला पंडालम राज परिवार और पुजारी लेंगे। मंदिर में महिलाओं पर प्रतिबंध कुप्रथा नहीं है। बल्कि छोटी-सी रोक है। अगर उन्हें सबरीमाला में प्रवेश दिया जाता है तो देवता को नैष्ठिक ब्रह्मचर्य से दूसरे स्वरूप में बदलना होगा।
 

सवाल : तो यह नियम स्वामी अयप्पन के ब्रह्मचर्य के कारण है?
जवाब : महिला को गर्भ गृह में देखने से सबरीमाला के स्वामी अयप्पन का ब्रह्मचर्य नहीं टूटेगा। लेकिन सबरीमाला में तीर्थयात्री बनकर आ रहे भक्त के लिए मंदिर के नियमों का पालन करना फर्ज भी है।

 

सवाल : आप सुप्रीम कोर्ट की फैसला लेने की क्षमता पर प्रश्न उठा रहे हैं?
जवाब : ये नियम विद्वानों ने लागू किए थे। आज प्रगतिशील विचारों के नाम पर लोग अनपढ़ों जैसा व्यवहार करते हैं। इन आधुनिक बुद्धिजीवियों में व्यावहारिक विचारों की कमी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी संस्कारों, आस्थाओं, परंपराओं और मंदिर के देवता की प्रकृति जैसे पहलुओं के बारे में सोचे बिना ही अपना फैसला सुना दिया। कोर्ट ने भक्तों की भावनाओं का ख्याल नहीं रखा। कोर्ट केरल के मंदिरों के नियम समझने में भी नाकाम रहा।

 

सवाल : क्या एक रिवाज के लिए इतना संघर्ष करना ठीक है?
जवाब : हर कोई सोचता है कि यह सिर्फ रीति-रिवाज हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। यह सबरीमाला की धर्मसंस्था का कानून है। भारत के सभी मंदिरों के अपने-अपने नियम-कानून और प्रतिबंध हैं और सभी मंदिर इस पर चलते हैं। जो भक्त उन मंदिरों में जाते हैं, वे उन नियमों का पालन करते हैं।

 

सवाल : 1991 से पहले भी कानूनी प्रतिबंध नहीं था, तो अब इतना विरोध क्यों?
जवाब : जस्टिस परिपूर्णन और बालानारायण मरार ने 1991 में फैसला सुनाते हुए 10 से 50 वर्ष तक की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर रोक लगाई थी। यह फैसला तब सुनाया गया था जब हमने देखा कि सभी उम्र वर्ग की महिलाएं सबरीमाला आ रही थीं। जस्टिस परिपूर्णन ने इस मुद्दे पर काफी गहन अध्ययन के बाद यह फैसला सुनाया था। अयप्पन का ब्रह्मचर्य किसी महिला को देखने से नहीं टूट सकता। लेकिन अयप्पा गहरे ध्यान में बैठे हुए हैं, ऐसी आस्था सबरीमाला मंदिर में है। 
 

सवाल : यह अब राजनीतिक मुद्दा बन गया है। इससे कितने लोग प्रभावित हो रहे हैं?
जवाब : हम लालची राजनेताओं के हाथ की कठपुतली नहीं है, जो 2019 के लोकसभा चुनावों को जीतने की कोशिश कर रहे हैं। पहले तो केरल की सभी राजनीतिक पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया और कहा कि वे इसे लागू करने की पूरी कोशिश करेंगे। लेकिन जैसे ही हमने कोर्ट के फैसले का विरोध शुरू किया, सभी पार्टियों के नेता महल में आने लगे और अपना समर्थन देने लगे। भक्तों और नेताओं का आना-जाना अब भी लगा हुआ है। 
 

सवाल : अब आगे की क्या रणनीति है?
जवाब : हमने भक्तों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए इस बारे में फैसला लिया है, न कि किसी पार्टी या नेता या किसी रंग के झंडे के लिए। केरल के सभी अनुयायियों का समर्थन ही हमारी शक्ति है। भक्त ही भक्तों की आस्था की रक्षा करेंगे। और अगर उनकी मांग को नजरअंदाज किया गया तो वे सड़क पर उतरेंगे और ये आग केरल ही नहीं पूरे देश में फैलेगी।

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