• Hindi News
  • Delhi
  • Delhi ncr
  • I have not yet written the lion that will keep me alive even after 100 years, if I get the news of stubbornness, then I have written that lion, I want to find pockets, those lines will be found there.

भास्कर खास / मैंने अब तक वो शेर नहीं लिखा, जो 100 साल बाद भी मुझे ज़िंदा रखे; रुख़सती की ख़बर मिले तो समझ लेना, वो शेर लिख लिया: राहत

राहत कहते हैं- कौमें सारी रात शाइरी सुनने में गुज़ारेंगी, वो तरक्की नहीं कर पाएंगी। राहत कहते हैं- कौमें सारी रात शाइरी सुनने में गुज़ारेंगी, वो तरक्की नहीं कर पाएंगी।
X
राहत कहते हैं- कौमें सारी रात शाइरी सुनने में गुज़ारेंगी, वो तरक्की नहीं कर पाएंगी।राहत कहते हैं- कौमें सारी रात शाइरी सुनने में गुज़ारेंगी, वो तरक्की नहीं कर पाएंगी।

  • शायरी के 50 बरस पूरे होने पर राहत इंदौरी ने दैनिक भास्कर से साझा की यादें जिन्हें वे अपनी नेमत कहते हैं
  • ‘बच्चियों-महिलाओं के साथ हो रहे ज़ुल्म अफ़सोसनाक हैं, तहज़ीब में इतनी गिरावट आ सकती है, सोचा नहीं था’

Dainik Bhaskar

Dec 04, 2019, 09:33 AM IST

राहत इंदौरी. शायरी के 50 बरस पूरे होने पर इन दिनों बहुत लोगों के कॉल आ रहे हैं। लोग मोहब्बतें लुटा रहे हैं, मैं भी इस सफ़र को कामयाब मानता हूं, लेकिन आज यह भी कहना चाहता हूं कि अक्सर भीतर एक खालीपन महसूस करता हूं। मेरी बात इस शेर से समझिए- इस शायरी से भी मुतमइन हूं मगर, कुछ बड़ा कारोबार होना था...’  मैं अक्सर सोचता हूं कि ऐसी दो लाइनें अब तक नहीं लिखीं, जो 100 साल बाद भी मुझे ज़िंदा रख सकें। मुशायरे लूटकर मोटा लिफाफा बीवी के हाथ में रख देने को मैं कामयाबी नहीं मानता। (और ख़ामोशी का एक वक्फ़ा लेकर वे कहते हैं) जिस दिन यह ख़बर मिले कि राहत इंदौरी दुनिया से रुख़सत हो गए हैं, समझ जाना कि वो मुकम्मल दो लाइन मैंने लिख ली हैं। आप देखिएगा मेरी जेबें।

मैं वादा करता हूं कि वो दो लाइनें आपको मिल जाएंगी..। मैंने सुबह 9 बजे तक मुशायरे पढ़े हैं। वह भी तब जब फ़ैज़, फ़िराक़ जैसे आलातरीन शायर मुशायरे पढ़ रहे थे। मैंने कहना शुरू किया कि जो कौमें सारी रात शाइरी सुनने में गुज़ारेंगी, वो तरक्की नहीं कर पाएंगी। ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा मैंने मुशायरों को दिया है, वो भी नौकरी करते हुए। 16 बरस आईकेडीसी में पढ़ाते हुए रानीपुरे की स्टारसन फैक्ट्री में बरसों काम किया। वहां लाइटिंग के बोर्ड बनते थे, मैं उन्हें पेंट करता था। सुबह की चाय पीकर फांके करते हुए काम किया, शायरी की।

किसी को तसदीक नहीं कराना, मुझमें कितना हिंदुस्तान है 
लोग कहते हैं आजकल बात रखना मुश्किल हो गया है। मैं तो जो कहना है, कह देता हूं। मुझे किसी को तसदीक नहीं कराना है कि मुझमें कितना हिंदुस्तान है। ... सभी का खून है शामिल यहां की मिट्‌टी में, किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़े ही है...’ पहले मुशायरे के लिए मेरी मां ने मेरे मामा से सिफारिश की थी। मुझे 30 रुपए मिले थे। इतने बरस हो गए, आज भी कोई वाह करे तो लगता है अशर्फियां लुटा रहा है। अब शायरी जिन कंधों पर है उन पर ख़ुदपसंदी हावी है। मैंने हमेशा यही चाहा कि - ख़ुदा मुझे सब कुछ दे दे, दुनिया दे दे, ग़ुरूर न दे...’ 

लगता नहीं बच्चियों के साथ ज्यादती करने वाले हिंदुस्तान के हैं 
बच्चियों-महिलाओं के साथ हो रहे ज़ुल्म अफ़सोसनाक हैं। तहज़ीब में इतनी गिरावट आ सकती है, सोचा नहीं था। तमाम फ़सादात हुए मगर शहर फिर पहले जैसा हो गया। एक बार डेढ़ महीने तक कर्फ्यू था। मैं अमेरिका में था। डेढ़ महीना हिंदू भाइयों ने परिवार की हिफ़ाज़त की। हमें ताले पर कम पड़ोसियों पर भरोसा ज्यादा था। बच्चियों के साथ हो रही ज्यादतियां देख लगता ही नहीं कि ये करनेवाले हिंदुस्तान के हैं। चंगीराम वाला जो पहला दंगा हुआ इंदौर में, तब मैंने लिखा - जिन चराग़ों से तआस्सुब का धुआं उठता है, उन चराग़ों को बुझा दो, तो उजाले होंगे।’ 


जैसा राहत साहब ने अंकिता जोशी को बताया

COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना